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गीतिका – कणहपा

गीतिका – कणहपा

गीतिका – कणहपा– मण तरू पाँच इन्द्रि तसू साहा । आसा-बहल परत फल बाहा ।। वर गुरू वअणों कुठारे छिज्जअ । कणह भणइ तरू  पुणणइजअ।। बढइ सो तरू सुभासुभपाणी । छेवइ विदुजन गुरूपरिमाणी ।। जो तरू छेवइ भेउ ण जाणइ । सडि पडिआँ मुठा ना भव माणइ ।। सुणणा तरूवर गऊण कुठार । छेवई सो तरू मूल ण डाल ।।[Read More...]