-क्षिप्रा किरण-

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते हैं। बोली की धुन, लय और उच्चारण में तो अंतर होता ही है, कई बार उसके शब्द-संदर्भों के अंतर को भी आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

व्यक्ति अपने परिवेश की उपज होता है और भाषा उसके परिवेश के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। वह जब संस्कृतियों का वहन करती है तो साथ-साथ मनुष्य के भावों का भी वहन कर रही होती है। व्यक्ति चाहे किसी भी भाषाई परिवेश में चला जाए उसकी अपनी भाषा या बोली कहीं न कहीं उसके अवचेतन में बनी ही रहती है। वह स्वयं को या किसी भी अन्य वस्तु को अपने ही भाषाई संदर्भों से जोड़कर देख पाता है। यह सिर्फ हिंदी के लिए ही नहीं, बल्कि किसी भी भाषा-भाषी के लिए भी उतना ही सच है। लेकिन हिंदी और उसकी बोलियों में इतनी विविधता है, उसके इतने अधिक और अलग-अलग अर्थ-संदर्भ हैं कि यही चीज उसकी ताकत बन जाती है। हिंदी की इस विविधता को समझने के लिए वास्तव में उसकी बोलियों को भी बहुत बारीकी से समझना होगा।

भाषाई विविधता वाले देश हिंदुस्तान में किसी भी भाषा या बोली को किसी खास दायरे में बांध कर नहीं रखा जा सकता। ऐसा करना भाषा के लोकतंत्र का हनन होगा। भाषा सीखने और उसके प्रयोग का अधिकार कहीं न कहीं शिक्षा और जीवन के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, क्योंकि सदियों से भाषा ही मानव जाति और विभिन्न सभ्यताओं की पहचान रही है। यही कारण है कि हमेशा सबसे पहले भाषा ही अस्मिताओं और संस्कृतियों के टकरावों का शिकार भी हुई है। हिंदी ने भी भाषा के रूप में ऐसे कई प्रहार झेले हैं।

उसे कभी राजनीतिक अवसरवादियों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहा है तो कभी कुछ अन्य असामाजिक लोगों ने उसका दुरुपयोग करना चाहा। भूमंडलीकरण की कोख से पनपा बाजार भी उन्हीं शरारती तत्त्वों में से एक है। बाजार ने अंग्रेजी को माध्यम बनाकर हिंदी और हिंदुस्तानियों की जातीय स्मृतियों को, उनकी भाषाई संस्कृतियों को मिटाने का प्रयास किया है। बाजार ने धर्म, राजनीति, मीडिया, विज्ञापन जैसे अपने औजारों की मदद से हिंदी की अस्मिता को चोट पहुंचाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन वह बार-बार अपनी पूरी शक्ति से उठ खड़ी हुई है। अपने अस्तित्व पर आए तमाम नवउपनिवेशवादी-नवउदारवादी हमलों से जूझती हुई बड़े ही चाक-चौकबंद ढंग से अपना विस्तार कर रही है। अब तो वह अपने खिलाफ खड़ी इन ताकतों का अपने पक्ष और अपने प्रसार में प्रयोग करना भी सीख गई है। सिनेमा और विज्ञापन के क्षेत्र में हिंदी के इस रूप को सहज ही देखा जा सकता है।

किसी सभ्यता का अंत करने के लिए सदैव वर्चस्ववादी शक्तियों ने वहां की भाषा को अपना लक्ष्य बनाया है। हिंदी ने भी उपनिवेशवादी शक्तियों का सामना किया है, लेकिन वह बिखरी नहीं है। एक उपनिवेश की भाषा होते हुए भी, उसके हमलों को सहते हुए वह ताकतवर भाषा की बराबरी में खड़ी है या कहें कि कई मायने में और कम समय में उससे अधिक विस्तार और लोकप्रियता मिल रही है। हिंदी का विस्तार उसकी बोलियों का विस्तार है। हिंदी अकेली नहीं है, बल्कि वह अपनी सभी बोलियों के साथ मिलकर हिंदी है।

आज हिंदी ने अपना अंतरराष्ट्रीयकरण किया है। सिर्फ प्रचार-प्रसार के संदर्भ में नहीं, बल्कि हिंदी की कुछ स्वभावगत विशेषताओं के कारण ऐसा हुआ है। हिंदी की एक बड़ी खासियत है , आत्मसात और अनुकूलन की प्रवृत्ति। हिंदी ने बदलते हुए समय के साथ खुद को इतना लचीला बनाया कि सिर्फ भारतीय बोलियों के शब्दों को ही नहीं, बल्कि विदेशी भाषाओं के शब्दों को भी अपने भीतर समेटा है। फ्रांसीसी, लातीनी, जापानी अरबी और न जाने कितनी ऐसी विदेशी भाषाएं हैं, जिनके तमाम शब्दों को हिंदी ने अपनाया है। अनुकूलन की अपनी इसी क्षमता के कारण ही बाजार के इस भयाक्रांत कर देने वाले दौर में भी हिंदी अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है।

सामंजस्य बिठाने की अपनी क्षमता के कारण आज हिंदी ने यह साबित कर दिया है कि तीसरी दुनिया की भाषा होते हुए भी वह बेचारी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के हर क्षेत्र में अब वह एक नए तेवर और अपने नए अंदाज के साथ स्वयं को प्रस्तुत कर सकती है। भारतीय संस्कृति की समावेशी प्रवृत्ति को आज हिंदी के वर्तमान नए रूप में अनायास ही देखा जा सकता है। यह समावेशी प्रवृत्ति एक नए तरह की सृजनशीलता को जन्म देती है और यही किसी भी सभ्यता को गतिशील और ऊर्ध्वगामी भी बनाती है।

(साभार – जनसत्ता)

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