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बरगढ़ (उड़ीसा), २१ फरवरी,२०१९ । अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर आय भारत भर के सैकड़ों भाषा कार्यकर्ता सिनीं न॑ कोसली क्रियास्थान कमेटी, CLEAR  आरू अखिल भारतीय अंग-अंगिका विकास मंच  केरौ संयुक्त तत्वाधान मँ बरगढ़ में रैली करलकै आरू अंगिका, कोसली सहित सब्भे ३८ अनुसूचित भाषा केरौ संवैधानिक अधिकार के माँग करतें हुऐ समेली मंदिर सें बीजू पटनायक टाउन हॉल तक  मार्च करलकै ।

बीजू पटनायक टाउन हॉल केरौ बैठक में, संगठन के समन्वयक साकेत श्रीभूषण साहू ने परिचयात्मक भाषण देलकै आरू अतिथि केरौ स्वागत करलकै। सभा केरौ आरंभ मँ उपस्थित जनौ नँ पुलवामा के शहीदौ लेली दू मिनट के मौन रखलकै । तत्पश्चात भाषा कर्मियों नँ मातृ भाषा के रक्षा आरू संरक्षण के शपथ लेलकै । भाषा कार्यकर्ता सिनी नँ उम्मीद जतैलकै कि अंगिका, कोसली सहित सब्भे केंद्र सरकार के अधीन सक्रिय विचार लेली लंबित सब्भे ३८ भाषा सिनी के संविधान केरौ ८ वाँ  अनुसूची में शामिल करलौ जैतै ।

अंगिका भाषा केरौ साहित्यकार व कार्यकर्ता कुंदन अमिताभ नँ सभा क संबोधित करतें कहलकै कि भारत केरौ बिहार, झारखंड, पं. बंगाल राज्य के २६ जिला के ६ करोड़ लोगौ के अंगिका भाषा क संविधान केरौ अष्टम अनुसूची में यथाशीघ्र शामिल करलौ जाना चाहियौ । साथ ही सीताकांत महापात्रा समिति द्वारा अनुशंसित सब्भे ३८ भाषा क भी संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल करलौ जाय ।

हुनी कहलकै कि जब तलक मातृभाषा में शिक्षा आरू रोजगार पाबै के आजादी नै मिली जाय छै, देश केरौ आजादी के सही उद्देश्य क हासिल करना नामुमकिन छै ।

श्री अमिताभ नँ कहलकै कि भारतीय संस्कृति क बचाना छै त सब्भे भारतीय भाषा क विकास केरौ समान अवसर प्रदान करै के प्रयास होना चाहियौ । कोय भी देश लेली वहाँकरौ भाषा सब अमूल्य निधि होय छै कैन्हेंकि कोय भी भाषा क बनै में हजारों-लाखों साल लगै छै आरू  जे विभिन्न संस्कृति आरू परंपरा के संवाहक भी होय छै ।

हुनी कहलकै कि ई बेहद दुःखद छै कि राजनैतिक वर्चस्व के बदौलत कुछ भाषा पड़ोस सें सटलौ दोसरौ बड़ौ भू-भाग के भाषा क अपनौ उपभाषा बताय क अष्टम अनुसूची में स्थान पाबी लेनै छै । उदाहरण स्वरूप बिहार के केवल दू जिला के चंद हजार लोगौ के भाषा मैथिली, बिहार, झारखंड, आरू बंगाल, के २६ जिला के करोड़ों लोगौ के भाषा अंगिका के क्षेत्र क अपनौ बताय क अंगिका भाषा व अंग संस्कृति के विनाश के कारण बनी रहलौ छै । ठीक ओहै चीज उड़िया भाषां, कोसली भाषा के साथ करी रहलौ छै ।

ई पितृात्मक समाज में मातृभाषा ही खाली ऐसनौ अनमोल विरासत छै जे हमरा अपनौ माय सें मिलै छै  । मातृभाषा के प्रति प्रेम रखी क एकरौ विकास हेतु काम करना दरअसल सच्चा राष्ट्रप्रेम ही छेकै, कैन्हेकि एकरा सँ देश सांस्कृतिक आरू बौद्दिक रूप सें मजबूत होलौ जाय छै ।

पंजाबी व हिन्दी भाषाशास्त्र के प्राध्यापक  आरू CLEAR के अध्यक्ष डॉ. जोगा सिंह नँ जोर द क कहलकै कि कोसली भाषा या कोय भी मातृभाषा में ओतना ही भाषाई ताकत छै, जेतना की अंग्रेजी आरू हिंदी जैसनौ तथाकथित अन्य विकसित भाषा में छै । हुनी नवीनतम वैज्ञानिक शब्दावली सें उदाहरण लेलकै आरू देखैलकै कि कोसली या कोय भी मातृभाषा  केरौ माध्यम सँ वू अवधारणा सब क केतना आसानी सें व्यक्त करलौ जाबै सकै छै ।

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हुनी ई भी कहलकै कि कोय भी समुदाय मातृभाषा क छोड़ी क कोनो अन्य भाषा में शिक्षा ग्रहण करी क कोय भी क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति नै करै सकै छै । हुनी जोर दै क कहलकै कि शिक्षा, प्रशासन आदि में मातृभाषा के अलावा कोनो अन्य भाषा के प्रयोग सामाजिक बहिष्कार पैदा करै छै जेकरौ  गंभीर सामाजिक आरू राजनीतिक परिणाम हुऐ सकै छै ।

हुनी हर भारतीय के आह्वान करलकै कि हुनी सब आगू आबी क  भारत सरकार केरौ भारतीय भाषा विरोधी नीति आरू प्रथा क उलट दै। हुनी कहलकै कि भारतीय मातृभाषा के लड़ाई भारत के भविष्य केरौ लड़ाय छेकै । हुनी कोसली कृष्णानुष्ठान समिति आरू एकर समन्वयक साकेत साहू के प्रयासौ के सराहना करलकै । हुनी कोसल क कोसल क्षेत्र केरौ पहलौ भाषा के रूप में मान्यता दै लेली आरू संविधान के 8 मो अनुसूची में शामिल कराबै लेली सब तरह के समर्थन के आश्वासन देलकै।

तमिलनाडु के अज़ी सेंथिलनाथन, फ़ेडरल कोऑर्डिनेटर CLEAR आरू नेशनल कोऑर्डिनेटर, अजी सेंथिलनाथन कहै छै  कि ओडिया गवर्नमेंट क इ विषय पर गंभीरता सँ विचार करना चाहियौ । हुनी एगो ऐतिहासिक घटना के उल्लेख करलकै जे 120 साल पहलें उड़ीसा मँ घटलौ छेलै । औपनिवेशिक काल के दौरान, जबै आधुनिक ओडिशा क पश्चिम में मध्य प्रांत, उत्तर में बंगाल प्रांत आरू दक्षिण में मद्रास प्रांत जैसनौ विभिन्न प्रांतों में समाहित करलौ गेलौ छेलै , त हिंदी, बंगाली आरू तेलुगु क ओडिया लोगौ पर थोपलौ गेलौ छेलै । 1895 में, संबलपुर नँ हिंदी क थोपै के खिलाफ आंदोलन देखलकै । ई प्रकार ओडिया भाषी लोग भाषा के अधिकारों के महत्व क जानी रहलौ छेलै । अखनी, विडंबना ई छै कि ओडिशा केरौ ओहै क्षेत्र म, हम्में आय कोसली आंदोलन देखै छियै । अबै कोसली क मान्यता देना ओडिया शासन आरू केंद्र सरकार के कर्तव्य छेकै।

एक अन्य प्रतिभागी सिद्धब्रत दास, वरिष्ठ मेम्बर बंगला पोक्खो नँ कहलकै कि अपना सब क इतिहास सँ सीखना चाहियौ । भाषा साम्राज्यवाद नँ कभी भी एक राज्य क मजबूत नै करलै छै । हम्में अपनौ मातृभाषा में अध्ययन नै करै सकै छियै, हममें अपनौ मातृभाषा में काम नै करै सकै छियै, हमरा अपनौ मातृभाषा में सेवा नै मिलै सकै छै, त कि ई हमरौ देश छेकै ? के सरकार क ई अधिकार देलै छै  कि वू हमरा अपनौ देश म दोसरौ श्रेणी के नागरिक के रूप में बदली क रखी द ? ई लेली ह्में माँग करै छियै कि सरकार सीताकांत महापात्र समिति द्वारा सिफारिश क स्वीकार करै आरू कोसली सहित सब्भे अनुशंसित ३८ भाषा सब क  संविधान केरौ 8मों अनुसूची में शामिल करै ।

English Language Version

Language activists rallied at Bargarh to demand constitutional rights of Angika, Kosali and all scheduled languages

Hundreds of language activists from around India today, on International Mother Language Day, rallied at Bargarh organised jointly by Kosali Kriyanusthan Committe, CLEAR, All India Ang Angika Development Forum and took out a march from Samlei Temple to Biju Patnaik Town Hall with slogan demanding the constitutional rights of 38  unrecognised languages including Angika & Kosali.

In the meeting at Biju Patnaik Town Hall, Coordinator of the organisation Saket Sreebhushan Sahu gave the introductory speech and welcomes the guest. Then the gathering kept two minute silence for the martyrs of Pulwama. Again language workers took oath to protect and preserve mother languages. The language activists expressed their hope that Kosali and all the 38 languages pending under active consideration of the Union Government to be included in the 8thSchedule of the Constitution.

Author and activist of Angika language, Kundan Amitabh added, the Angika language which is mother language of 6 crore people of 26 districts of Bihar, Jharkhand, West Bengal must be included in the eighth schedule of Constitution as early as possible. Also, all 38 languages recommended by the Sitakanta Mohapatra Committee be included in the Eighth Schedule of the Constitution.

As long as there is no freedom of getting education and employment in mother tongue, it is impossible to achieve the right purpose of the country’s independence.

To save Indian culture, we should endeavour to save all the Indian languages by providing equal opportunities. The language of any country is invaluable resource because it takes thousands and millions of years for any language to be formed and which is also the conductors of different cultures and traditions.

It is very sad that due to political dominance, some languages have found place in the eighth schedule by describing the language of the adjacent largest land as their dialect. For example, Maithili the language of only few thousand people in Bihar’s 2 districts has encroached the land of Angika – the language of millions of people in 26 districts of Bihar, Jharkhand and Bengal. This is causing the destruction of Angdesh culture by declaring the region of Angika as its own. In the same way Odia language has been doing it with Kosali language.

Dr. Joga Singh, Professor in Linguistics and President Campaign for Language Equality and Rights emphasized that Kosali language and any other Mother Languages have as much linguistic strength as any other so called developed languages like English and Hindi. He took examples from the latest scientific terminology and showed how easily those concepts can be expressed through Kosali. He also stated that no community can make any significant progress in any field by handing over linguistic domains such as education to any language other than mother tongue. He stressed that the use of a language other than mother tongue in education, administration, etc. creates appalling social exclusions which can have serious social and political consequences. He called upon Indian people to come forward and reverse the anti-Indian languages policies and practices of Indian governments. He said that the fighting for Indian mother tongues is fighting for India’s future. He lauded the efforts of Kosali Kriyanushthan Committee and its Coordinator Saket Sahu. He assured all kind of support for recognition of Kosali as the first language of Kosal region and its inclusion in the 8th schedule of the constitution.

Aazhi Senthilnathan, Federal Coordinator CLEAR and National Coordinator, Thannatchi Thamizhagam, Tamil Nadu says, Odia goverment should seriously consider the demand. Let me refer an historical event that too happened in this same place 120 years ago. During the colonial period, when the modern Odisha was amalgamated in various provinces like Central Province in the west, Bengal Province in the North and Madras Province in the south, Hindi, Bengali and Telugu were imposed on the Odia people. In 1895, Sambalpur saw agitation against the imposition of Hindi. Thus the Odia speaking people knew the importance of language rights. Now, ironically, in the same region of Odisha, we see the Kosali movement today. Now it is the duty of Odia govermnent and Union government to recognize Kosali.

Another participant Siddhabrata Das, Senior Memeber Bangla Pokkho says, “We must learn from history. Language imperialism has never strengthened a state. I cannot study in my mother tongue, I cannot work in my mother tongue , I cannot get service in my mother tongue then is it my nation ? Who has given the government right to turn me into a second class citizen in own nation? So I demand that government accepts Sitakanta Mahapatra committee recommendations and include Kosali along with all other unrecognized language in the 8th Schedule of the Constitution.”

Hindi Language Version

अंगिका, कोसली और सभी अनुसूचित भाषाओं के संवैधानिक अधिकारों की मांग के लिए भाषा कार्यकर्ताओं ने की बरगढ़, उड़ीसा में रैली

बरगढ़ (उड़ीसा) । अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस पर आज भारत भर के सैकड़ों भाषा कार्यकर्ताओं ने कोसली क्रियास्थान कमेटी, सी.एल.ई.ए.आर.  और अखिल भारतीय अंग-अंगिका विकास मंच  के संयुक्त तत्वाधान में बरगढ़ में रैली व सभा आयोजित किया और अंगिका, कोसली सहित सभी अनुसूचित भाषा के संवैधानिक अधिकार की माँग करते हुए समेली मंदिर से बीजू पटनायक टाउन हॉल तक  मार्च किया ।

बीजू पटनायक टाउन हॉल की बैठक में, संगठन के समन्वयक साकेत श्रीभूषण साहू ने परिचयात्मक भाषण दिया और अतिथियों का स्वागत किया। सभा के आरंभ में उपस्थित जनो ने पुलवामा के शहीदों के लिए दो मिनट का मौन रखा  । तत्पश्चात भाषा कर्मियों ने मातृ भाषा की रक्षा और संरक्षण का शपथ लिया । भाषा कार्यकर्ताओं ने उम्मीद जताई है कि अंगिका, कोसली सहित केंद्र सरकार के अधीन सक्रिय विचार हेतु लंबित सभी  ३८ भाषाओं को संविधान की ८ वीं  अनुसूची में शामिल की जाय़ ।

अंगिका भाषा के साहित्यकार व कार्यकर्ता कुंदन अमिताभ ने कहा कि भारत के बिहार, झारखंड, पं. बंगाल राज्य के २६ जिलों के ६ करोड़ लोगों की अंगिका भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में यथाशीघ्र शामिल किया जाना चाहिये । साथ ही सीताकांत महापात्रा समिति द्वारा अनुशंसित सभी ३८ भाषा को भी संविधान के अष्टम अनुसूची में शामिल किए जाएँ ।

उन्नहोंने कहा कि जब तलक मातृभाषा में शिक्षा और रोजगार पाने की आजादी नहीं मिल जाती , देश की आजादी के सही उद्देश्य को हासिल करना नामुमकिन है ।

श्री अमिताभ ने कहा कि भारतीय संस्कृति को बचाना है तो सभी भारतीय भाषाओं को विकास के समान अवसर प्रदान करने के प्रयास होना चाहिए । किसी भी देश के लिए वहाँ की भाषाएँ अमूल्य निधि होती हैं क्योंकि किसी भी भाषा को बनने में हजारों-लाखों साल लग जाते हैं और जो विभिन्न संस्कृति और परंपरा के संवाहक भी होते हैं ।

उन्होंने कहा कि यह बेहद दुःखद है कि राजनैतिक वर्चस्व के बदौलत कुछ भाषायें पड़ोस से सटे दूसरे बड़े भू-भाग की भाषा को अपनी उपभाषा बताकर अष्टम अनुसूची में स्थान पा लिया है । उदाहरण स्वरूप बिहार के केवल दो जिलों की चंद हजार लोगों की भाषा मौथिली, बिहार, झारखंड, और बंगाल, के २६ जिलों के करोड़ों लोगों की भाषा अंगिका के क्षेत्र को अपना बता कर अंगिका भाषा व अंग संस्कृति के विनाश का कारण बन रही है । ठीक वही व्वयहार उड़िया भाषा द्वारा कोसली भाषा के साथ किया जा रहा है ।

उन्होंने कहा कि पितृात्मक समाज में मातृभाषा ही एकमात्र ऐसी अनमोल विरासत है जो हमें अपनी माँ से मिलती है  । मातृभाषा के प्रति प्रेम रखकर इसके विकास हेतु काम करना दरअसल सच्चा राष्ट्रप्रेम ही है, क्योंकि इससे देश सांस्कृतिक और बौद्दिक रूप से मजबूत होता जाता है ।

भाषाशास्त्र के प्राध्यापक अभियान और भाषा अभियान के अध्यक्ष डॉ. जोगा सिंह ने जोर देकर कहा कि कोसली भाषा या किसी भी मातृभाषा में उतनी ही भाषाई ताकत है, जितनी किसी अन्य तथाकथित अंग्रेजी और हिंदी जैसी विकसित भाषाओं की है। उन्होंने नवीनतम वैज्ञानिक शब्दावली से उदाहरण लिया और दिखाया कि कोसली के माध्यम से उन अवधारणाओं को कितनी आसानी से व्यक्त किया जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी समुदाय मातृभाषा को छोड़कर  किसी अन्य  भाषा में शिक्षा ग्रहण कर किसी भी क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि शिक्षा, प्रशासन आदि में मातृभाषा के अलावा किसी अन्य भाषा का प्रयोग सामाजिक बहिष्कार पैदा करता है जिसके गंभीर सामाजिक और राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।

उन्होंने भारतीय लोगों से आह्वान किया कि वे आगे आएं और भारतीय सरकारों की भारतीय भाषा विरोधी नीतियों और प्रथाओं को उलट दें। उन्होंने कहा कि भारतीय मातृभाषाओं की लड़ाई भारत के भविष्य की लड़ाई है। उन्होंने कोसली कृष्णानुष्ठान समिति और इसके समन्वयक साकेत साहू के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने कोसली को कोसल क्षेत्र की पहली भाषा के रूप में मान्यता देने और संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करने के लिए सभी तरह के समर्थन का आश्वासन दिया।

तमिलनाडु के अज़ी सेंथिलनाथन, फ़ेडरल कोऑर्डिनेटर CLEAR और नेशनल कोऑर्डिनेटर, अजी सेंथिलनाथन, कहते हैं कि ओडिया गवर्नमेंट को इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। मुझे एक ऐतिहासिक घटना का उल्लेख करना चाहिए जो 120 साल पहले इसी स्थान पर हुई थी। औपनिवेशिक काल के दौरान, जब आधुनिक ओडिशा को पश्चिम में मध्य प्रांत, उत्तर में बंगाल प्रांत और दक्षिण में मद्रास प्रांत जैसे विभिन्न प्रांतों में समाहित किया गया था, तो हिंदी, बंगाली और तेलुगु को ओडिया लोगों पर लगाया गया था। 1895 में, संबलपुर ने हिंदी को थोपने के खिलाफ आंदोलन देखा। इस प्रकार ओडिया भाषी लोग भाषा के अधिकारों के महत्व को जानते थे। अब, विडंबना यह है कि ओडिशा के उसी क्षेत्र में, हम आज कोसली आंदोलन देखते हैं। अब कोसली को मान्यता देना ओडिया शासन और केंद्र सरकार का कर्तव्य है।

एक अन्य प्रतिभागी सिद्धब्रत दास, वरिष्ठ मेम्बर बंगला पोक्खो कहते हैं, “हमें इतिहास से सीखना चाहिए। भाषा साम्राज्यवाद ने कभी भी एक राज्य को मजबूत नहीं किया है। मैं अपनी मातृभाषा में अध्ययन नहीं कर सकता, मैं अपनी मातृभाषा में काम नहीं कर सकता, मुझे अपनी मातृभाषा में सेवा नहीं मिल सकती है तो क्या यह मेरा राष्ट्र है? किसने सरकार को यह अधिकार दिया है कि वह मुझे अपने राष्ट्र में दूसरी श्रेणी के नागरिक के रूप में बदल दे? इसलिए मैं मांग करता हूं कि सरकार सीताकांत महापात्र समिति की सिफारिशों को स्वीकार करे और कोसली सहित सभी अनशंसित ३८ भाषाओं को  संविधान की 8 वीं अनुसूची में शामिल करे ।

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