विरह गीत

विरह गीत

— नरेश जनप्रिय —

बदरा भैया हो लेनें जा हमरऽ ई सनेश ।
पियवा भुलैलै पता नै जाय कोन देश ॥

कही दिहौ जाय क॑ हमरऽ ई बतिया
बिरहा में फाटै छै रात-दिन छतिया
बेरथ होलऽ जाय छै हमरऽ जिन्दगानी
तड़पी क॑ रात काटौं आरो दिन कानी
कही दिहौ आबी देतै पलो भर दरेस
बदरा भैया हो लेनें जा हमरऽ ई सनेश ।
पियवा भुलैलै पता नै जाय कोन देश ॥

सौंन बितलै, भादऽ बितलै, बितलै बसंत हो
चिट्ठी-पतरियो नै भेजै निर्मोही कंत हो
सोचऽ – फिकिरऽ सें हमरऽ देहो झंखरैलै
आस हुनकऽ देखी-देखी आँख पथरैलै
नै जों अबकी ऐतै धरबै योगिनी के भेष
बदरा भैया हो लेनें जा हमरऽ ई सनेश ।
पियवा भुलैलै पता नै जाय कोन देश ॥

कि हक छै हुनका बोलिहौ हमरा जराय क॑
कैन्हें करै छै ठट्ठा ऐन्हऽ तड़पाय क॑
कथी ल॑ डोली सजाय क॑ हमरा आनलकै
कैन्हें नी फेरू दोहराय क॑ घुरी ताकलकै
पता नै कहाँ छै नुकैलऽ दिलऽ के नरेश
बदरा भैया हो लेनें जा हमरऽ ई सनेश ।
पियवा भुलैलै पता नै जाय कोन देश ॥

Angika Poetry : Virah Geet
Poet : Naresh Janpriya

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