जिल्द | अंगिका कविता | कुंदन अमिताभ

जिल्द

— कुंदन अमिताभ —

जीवन तोरॊ हमरॊ
एगॊ किताब ऐन्हॊ उपहार
इ उपहार ढकलॊ छै जिल्दॊ सॆं
जिल्द बड़ा ही नाजुक छै
उपहार कॆ ठीक सॆं राखै लेली
जरूरी छै जिल्द कॆ ठीक सॆं रखना
ऐन्हॊ नै हुऎ कि जिल्दॊ सथॆं
उपहार भी नष्ट होय जाय

भगवान केरॊ देलॊ इ अमूल्य शरीर
एगॊ जिल्द ही तॆ छेकै
वातावरण परिवेश जेकरा मॆं रही रहलॊ छियै
एगॊ जिल्द ही तॆ छेकै
पल पल उत्पन्न होय रहलॊ परिस्थिति
एगॊ जिल्द ही तॆ छेकै
हर घड़ी घटित होय रहलॊ घटना
एगॊ जिल्द ही तॆ छेकै

धैर्यवान बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
बुद्धिमान बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
सहनशील बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
अनुकुल बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
दूरदृष्टा बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
संपुष्टिता बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
दुःखहर्ता बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ
विषहर्ता बनी कॆ उपहार केरॊ आनन्द लॆ

Angika Poetry : Jild
Poetry from Angika Poetry Book : Sarang
Poet : Kundan Amitabh