पूलऽ पर के आदमी

पूलऽ पर के आदमी

— अचल भारती —

ई दुनियाँ एक पूल छेकै
जै पूलऽ के दोनों मँहऽ पर
लिखलऽ छै — ‘बंद’
उपर छै खाली आकाश
नीचें फकत बालू के रेत
आरो पूलऽ पर उमड़लऽ छै
आदमी रऽ समुंदर
आदमी रऽ उड़ै छै मऽन
धूरा नाखी उपर
आरू आदमी रऽ तपै छै जीवन
बालू के रेता नांखीं
आरू आदमी के केरऽ आवाज
आदमी केरऽ भीड़ मं॑ दबी जाय छै
आदमी सिरिफ पूलऽ पर के आदमी
रही जाय छै
आदमी सिरिफ पूलऽ पर के आदमी
रही जाय छै

Angika Poetry :Poolow Per Ke Aadmi
Poet : Achal Bharti
Poetry from Angika Magazine : Ang Madhuri – Year 1980

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