कल भी कल भी | अंगिका कविता | कुंदन अमिताभ

कल भी कल भी

— कुंदन अमिताभ —

ताड़ॊ गाछी सॆं पकलॊ ताड़ गिरी पड़लै
घरॊ पीछू लद्दी मॆं – धप्प सॆं आवाज ऐलै
नीन टूटी गेलै आधे रात कॆ
लग्गा लॆ कॆ आबी गेलॊ छियै नद्दी किछ्छा
भादो के नद्दी पानी किधोर बही रहलॊ छै कोरे – कोर
टार्च भी छै हाथ मॆं
ताड़ निकालै के अभियान शुरू होय गेलॊ छै

ताड़ वू पार करगी मॆं
सिनवारी लगाँ अटकलॊ छै
लग्गा जादे लम्बा नै छै
इ लेली कुछ आरू करै लॆ होतै
इ पार एकदम नद्दी करगी मॆं ही
लागलॊ छै बसबिट्टा
जेकरा सॆं जोगार बनी जैतै

एगॊ बाँसॊ कॆ थामी कॆ
झुल्ली गेलियै बीच धार मॆं
जोखिम छै – धार बहुत तेज छै
लेकिन ताड़ कॆ भी तॆं बही कॆ नै जाबॆ देना छै
ताड़ लग्गा के पहुँच मॆं आबी गेलॊ छै
लग्गा सहारे थापी – थापी कॆ ताड़
इ करगी पर आपनॊ हाथॊ मॆ आबी गेलॊ छै

करगी मॆ होय गेलॊ पिच्छड़ सॆं
पिछड़तॆं -पिछड़तॆं बचलियै
बसबिट्टा मॆ लम्बा धमना साँप
दरबन मारतॆं घुसतॆं नजर ऐलै
नीम डाली पर कुछ परिंदा
कुनमुन – कुनमुन करतॆं नजर ऐलै
बाड़ी टप्पी कॆ तेजी सॆं अँगना आबी गेलियै

बाड़ी दनकरॊ केबड़ा भिरकाबै वाला रहियै
कि बूलॊ बाबू आबी गेलै – हमरॊ पड़ोसी
कहै लागलै – हौ ताड़ हमरा गाछी सॆं नै
हुनकॊ गाछी सॆं गिरलॊ रहै – धारॊ मॆं
बही कॆ आबी गेलॊ रहै हमरा दन्नॆं
कहलियै टूटथैं गेलॊ रहियै देखलियै हमरे गाछी लगाँ परलॊ रहै
बूलॊ बाबू कहलकै कि हुनखौ जगाय देतियै तॆ नै पतियाबै के सवाले नै रहै

बूलॊ बाबू पतियाय कॆ आपनॊ अँगना लौटी गेलॊ रहै
भुरूकबा उगी रहलॊ छेलै अन्हार बिलाय रहलॊ छेलै
माल जाल खुली रहलॊ छेलै तारा डुबी रहलॊ छेलै
हर वू चीज बिलैतै जे बियैलॊ छै इ धरती पर
हर वू चीज डूबतै जे उगलॊ छै इ धरती पर
इंसान केरॊ संघर्ष जारी रहतै समय सथॆं
कैन्हॆं कि समय सॆं जादा नै कोय बलवान नै कोय सामर्थ्यवान

Angika Poetry : Kal Bhi Kal Bhi
Poetry from Angika Poetry Book : Sarang
Poet : Kundan Amitabh