तिलकामाँझी | नौमां सर्ग |अंगिका कविता | हीरा प्रसाद हरेंद्र

तिलकामाँझी

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तिलकामाँझी

नौमां सर्ग ()

— हीरा प्रसाद हरेंद्र —

रहै सूरजा मंदारऽ के,
मुखिया ग्राम प्रधान।
पहाड़िया के अन्दर पूरा,
रहै मान-सम्मान।। 1।।
नीना के आंखी म॑ भरलऽ,
देखी क॑ तूफान।
सोचै मन-मन कहिया ऐतै,
नीना के भगवान।। 2।।
हुन्नें द्वारी पर देखै छै,
संन्यासी अनजान।
राम-नाम के रट्ट लगाबै,
खींचै सबके ध्यान।। 3।।
बाबा जी के भेष बनैनें,
चन्दन शोभै भाल।
ढिब्बो, गरभू सब क॑ देलक,
भौचक्का म॑ डाल।। 4।।
कहै सूरज आबोॅ बैठोॅ,
करै छिहौं सम्मान।
वहीं समय नीना के गेलै,
संन्यासी पर ध्यान।। 5।।

नाचेॅ लगलै नीना केरऽ,
देखी क॑ मन मोर।
भरमैनें भेषोॅ सें छेलै,
नीना के चितचोर।। 6।।
तिलका मांझी क॑ पहिचानी,
पूछै सब्भैं बात।
कैसें क॑ होलै अन्यायी,
क्लीवलैण्ड के घात।। 7।।
तिलका पर होले गेलै जब,
प्रश्नोॅ के बौछार।
बतलाबै तब संक्षेपोॅ म॑,
घटना के सब सार।। 8।।
सुनथैं नीना के आंखी म॑,
छैलै हर्ष अपार।
हंसी-खुसी सें भरलऽ लागै,
तखनी ग्राम मंदार।। 9।।
तिलका नीना केरऽ शादी,
जŸोॅ जल्दी होय।
तैयारी म॑ लागी गेलै,
तखनी सब्भे कोय।। 10।।

जुटलै शादी धरियां ढेरी,
पहाड़िया जामात।
संताल युवक ढिब्बो गरभू,
छेलै दू बारात।। 11।।
सब बाबा देहरी बताबै,
शादी केरऽ रीत।
अगल-बगल गामोॅ के महिला,
आबी गाबै गीत।। 12।।

नीना केरऽ रूप, संवारै सखिया सारी।
सिर सें लेॅ क॑ पैर, सजाबै पारा-पारी।
उबटन रगड़ै देह, निखारै रूप सलोना।
मीना क॑ उल्लास, ॉदय के कोना-कोना।। 13।।
तिलका क॑ चुपचाप, बैठलऽ देखी आबै।
नीना के भौजाय अनोखा रूप बनाबै।।
मन म॑ भरल उमंग, सही छेलै मतवाली।
खुराफात के बात, विचारै सरहज-साली।। 14।।
पुलिसोॅ रंग पोशाक पिन्हलकै अद्भुत न्यारी।
बनबै दाढ़ी-मोंछ, कमर म॑ कसै कटारी।।
टोपी पीन्ही माथ, बनै छै बढ़िया फौजी।
अकड़ै सीना तान, रहै नीना के भौजी।। 15।।
लकड़ी के पिस्तौल, हाथ म॑ लेनें आबै।

तिलका आगू जाय, अचानक धोंस जमाबै।।
क्लीवलैण्ड क॑ मार गिराबै वाला पट्ठा।
बनलऽ छें बलवान, देह छौ हट्टा-कट्ठा।। 16।।
भेजी तोरा जेल, बिहा नीना सें करबै।
नीना केरऽ साथ आज सें जीबै-मरबै।।
एक सखी ई देख, रहै जे वैझैं ठाढ़ी।
लपकी आबी पास उखाड़ै मोछो दाढ़ी।। 17।।
टोपी फेकै दूर, केश ओरमावै माथें।
सखी-सहेली आय ठठाबै एक्खै साथें।।
हास्य पूर्ण माहौल बनाबै सखी-सहेली।
तिलका आगू खूब करै छै हंसी-ठिठोली।। 18।।
पंडित लगन बिचार, बुलाबै मंडप लड़का।
जकरा माथें केश नदारत चोटी बड़का।।
करलक कुच्छू बीध, मंगाबै आगू नीना।
सजलऽ-धजलऽ आय, कुशल आरू परवीना।। 19।।
मांगोॅ म॑ सिन्दूर, भरलकै तिलका आबी।
नीना होलै धन्य, पति तिलका रंग पाबी।।
शोभा वर्णन हीन, हाथ पर हाथ धरलकै।
निखरै अनुपम रूप, मांग सिन्दूर भरलकै।। 20।।
वस्त्राभूषण लाल, रंग मनमोहक भेलै।

कुमकुम, बिन्दी भाल, गाल पर लाली छेलै।।
नाकोॅ म॑ नथ, हार गला म॑ सुन्दर शोहै।
टेढ़ोॅ करिया भौंह, सदा सब के मन मोहै।। 21।।
चलै सहेली संग, बनी नीना मतवाली।
मन पर डालै डोर, हिलै कानों के बाली।।
जादू भरलऽ नैन, नैन के कोरे कजरा।
खुल्लऽ-खुल्लऽ केश, केश म॑ शोभै गजरा।। 22।।
कंठश्री भी कंठ, लगैनें चंदन रोली।
मोहक मीठी तान, कोकिला अहिनों बोली।।
दांतोॅ के द्युति देख, लजाबै बिजली रानी।
चेरी अहिनों लाल होठ, जिह्वा पर बाणी।। 23।।
पेट-पीठ सम रंग, वक्ष, ठोड़ी, कटि सुन्दर।
सुन्दरता के खान, सीप में बसै समुन्दर।।
चूड़ी-कंगन हाथ, अंगूठी पोरे-पोरे।
चमकै जेना चांद, शाम सें लेॅ क॑ भोरे।। 24।।
जूड़ा केरऽ फूल, कमर शोभे करधनिया।
लागै अनुपम रूप, बनै सुन्दर दुलहिनिया।।
गोड़ोॅ केरऽ रूप, महावर खूब बढ़ाबै।
बिछिया अंगुली बीच, सदा अहिवात बताबै।। 25।।

पायल पीन्है पांव, झनाझन जे झनकौवा।
सब अंगोॅ म॑ फूल, गमागम जे गमकौवा।।
लगै मेंहदी हाथ, प्रकृति आभूषण सारा।
फूलऽ के ९ांगार, पहननें बल्कल न्यारा।। 26।।

होलै पूरा रश्म, तिलका, नीना ब्याह के।
बनवारी तेॅ भस्म, ÿोधों केरऽ आग म॑।।27।।
मस्ती रहलै छाय, तीन दिनों तक जश्न के।
पहाड़िया समुदाय, नाचै-गाबै धूम सें।। 28।।

बाबा विवाह कार्य, पूर्ण करलकै देहरी।
जे छेलै अनिवार्य, हंसडीहा सें आय क॑।।29।।
ढिब्बोॅ, गरभू खास, भेजै तिलका आदमी।
ज≈राह के पास, हुलिया लै लेॅ काम के।। 30।।

गेलै संबंधी-सगा, शादी केरऽ बाद।
नीना चाहै छेड़ना, जुल्मीं सें जेहाद।। 31।।
तिलका रोकै तब तलक, खबर न जानी जाय।
क्लीवलैण्ड के मौत के, पहाड़िया समुदाय।। 32।।

गुरूधरमा जे तीर पर, विष के लेप लगाय।
तिलका के अनुमान सें, व्यर्थ कभी नैं जाय।। 33।।

हिम बरसै हेमंत Ωतु, करै कलेजा फांक।
ठिठुरै हाथो शीत सें, लोर चुवाबै आंख।। 34।।

चमचम चमकै घास पर, जन्नें-तन्नें ओस।
शीतलहरी प्रकोप सें, नरमैलै कुछ जोश।। 35।।

लेतें रहलै रात-दिन, क्लीवलैण्ड के हाल।
क्लीवलैण्ड क॑ पर कहां, छोड़ै कखनूं काल।। 36।।

होलै सच्चा एक दिन, फैली गेलै बात।
क्लीवलैण्ड के सांस के, छेलै अंतिम रात।। 37।।

करलक चौवालीस दिन, मौतोॅ संग लड़ाय।
पर तिलका के तीर नें, अद्भुत असर दिखाय।। 38।।

सतरह सौ चौरासी ईस्वी,
रहै जनवरी तेरह भाय।
क्लीवलैण्ड के प्राण-पखेरू,
उड़लऽ-उड़लऽ जमपुर जाय।। 39।।

तिलकामाँझी

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Angika Poetry  : Tilkamanjhi / तिलकामाँझी
Poet : Hira Prasad Harendra / हीरा प्रसाद हरेंद्र
Angika Poetry Book / अंगिका काव्य पुस्तक – तिलकामाँझी