तिलकामाँझी | चौथऽ सर्ग | अंगिका कविता | हीरा प्रसाद हरेंद्र

तिलकामाँझी

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तिलकामाँझी
– चौथऽ सर्ग –
(सिराजुदौला-गरजन मित्रता, लैक हॉल डन्ेजडी घटना, शिबू-जैबा के संतान जबड़ा, ज≈राह के आतंक, शिबू के मौत)

— हीरा प्रसाद हरेंद्र —

औरंगजेब केरऽ वारिस,
सब्भे ठो नाकाम।
दफन करलकै बापोॅ साथें,
खनदानोॅ के नाम।। 1।।
मुगलऽ के शासन के जेना,
ऐलै अन्तिम काल।
ठीक वही धर्रा पर चललै,
शासन म॑ बंगाल।। 2।।
केतना दसको अली बर्दी,
बनलऽ रहै नवाब।
बीमारी के कारण देहें,
देलके तबेॅ जवाब।। 3।।
छोटी बेटी के बेटा क॑,
सिराजुदौला नाम।
रश्म ताजपोशी के सारा,
क॑ देलक अंजाम।। 4।।

पूरा होलै रश्म तखनियें,
निकली गेलै प्राण।
धरलऽ रहलै धरती पर बस,
देह सिर्फ बेजान।। 5।।
ताजपोशी दौरान,
सिराजु क॑ होलै पहचान।
गरजन सिंह सें जे कि छेलै,
महेशपुर के शान।। 6।।
सिराजुदौला के क्षेत्रऽ म॑,
महेशपुर अनमोल।
जहां पहाड़िया जाति केरऽ,
खाली बाजै ढोल।। 7।।
गरजन केरऽ सैन्य संगठन,
देखै लेॅ मुहताज।
दोस्ती खातिर कदम बढ़ाबै,
गरजन संग सिराज।। 8।।
मित्रता के सूत्र म॑ दोनों,
बंधी गेलै फूल।
शŸार् करलकै रस्ता केरऽ,
टारी देबै शूल।। 9।।

सिराजऽ के ताजपोशी सें,
होलै सब खुशहाल।
पर मिरजाफर सेनापति के,
बिगड़ी गेलै चाल।। 10।।
अंग्रेज केरऽ प्रलोभन म॑,
छोड़ी क॑ ईमान।
करेॅ लागलै अंग्रेजऽ के,
भीतर सें गुणगान।। 11।।
अंग्रेज करै कलकŸा म॑,
किला एक निर्माण।
सूचित करै गुप्तचर आबी,
सिराजुदौल कान।। 12।।
ध्वस्त कराबै किला तुरन्ते,
मजदूरऽ के हाथ।
कारीगर कुछ आनाकानी,
करै सिराजऽ साथ।। 13।।
पकड़ी-पकड़ी तंग कोठरी,
करी देलकै बन्द।
खिड़की एक वहां नैं छेलै,
हवा कहां स्वछन्द।। 14।।

ढेरी के ढेरी कारीगर,
दम तोड़ै ≈ रात।
घटना ‘ब्लैक होल टन्न्ेजेडी’,
छै जग म॑ विख्यात।। 15।।
≈ घटना के चलतें जानोॅ,
मिटै नवाबी राज।
ककरा माथा पर सब्भे दिन,
रहलऽ छेलै ताज।। 16।।
जैबा के कोखी म॑ पाबी,
एक सुदर्शन लाल।
गोबिन चाचा साथें यॉहीं,
शिब्बू बड़ा निहाल।। 17।।
पर शिब्बू सरदारऽ केरऽ,
हरेक पल के बात।
हरदम करतें रहलऽ छेलै,
गरजन सिंहें ज्ञात।। 18।।
छुट्टी म॑ बितैलकै शिब्बू,
करीब दू-तीन साल।
आबी गेलै महेशपुर सें,
बोलावा तत्काल।। 19।।

दू सालऽ के बच्चा साथें,
जैबा क॑ घर छोड़।
जाना मुश्किल लागै छेलै,
जैबा के दिल तोड़।। 20।।
पर डिग्गन केरऽ आग्रह क॑,
कहां सकलकै टाल।
कौनें मेटेॅ सकलै जकरा,
जे लिखलऽ छै भाल।। 21।।
धरमू कहियो आबी-आबी,
खबर सुनाबै नीक।
पर जैबा सें दूर जरा नैं,
शिब्बू के मन ठीक।। 22।।
धरमू आबी खबर सुनाबै,
नानी छै बीमार।
सुनथैं शिब्बू सबौर लेली,
होलै झट तैयार।। 23।।
तखनी सिराजुदौला केरऽ,
आबै छै फरमान।
क्लाइब सें युह् करैलेॅ,
जाना छै मैदान।। 24।।

सही पलासी युह् भूमि म॑,
मिरजाफर गद्दार।
क्लाइव साथें अखनी आबी,
देनें छै ललकार।। 25।।
संवाद मुताबिक शिब्बू तेॅ,
झट होलै तैयार।
वीर बांकुड़ा के सहनें छै,
दुश्मन के ललकार।। 26।।
सिराजुदौला युह् भूमि म॑,
करेॅ लागलै जंग।
गरजन, गरजन करनें ऐलै,
अपनों सेना संग।। 27।।
दोन्हूं मिल कुहराम मचैलक,
पर सब्भे बेकार।
गोलाबारी के अभाव म॑,
गेलै दोनों हार।। 28।।
गरजन क॑ कांधा पर टांगी,
लानै अपनों राज।
गरजन घायल, सेना साथें,
माथा गिरलै गाज।। 29।।

गरजन केरऽ अंग-अंग म॑,
बारूद विष समाय।
माह भरी के भतर-भीतर,
गेलै काल चबाय।। 30।।
गरजन के मरथैं राजऽ म॑,
मचलै तब कुहराम।
कार्य-भार थाम्हैं छै विधवा,
सर्वेश्वरी तमाम।। 31।।
ग्यारह पीढ़ी राज करलकै,
गरजन तक सुख चैन।
पहाड़िया भी सटले रहलै,
हर संकट दिन-रैन।। 32।।
बारहवीं पीढ़ी म॑ ऐलै,
विधवा केरऽ राज।
करतें रहलै राजऽ केरऽ,
हिम्मत सें सब काज।। 33।।
बाहुबली धनुर्धर पहिल्हां,
पहाड़िया के ढेर।
राखनें राज महेश पुर क॑,
छेलै खूबे घेर।। 34।।

पहाड़िया पर देवी जी के,
रहै खूब विश्वास।
रमणा आहिड़ी जनजाति पर,
खूब करलकै आस।। 35।।
गरजन के मरला पर बढ़लै,
अंग्रेजऽ के मोॅन।
महेशपुर राजऽ के लूटेॅ,
चाहै सब्भै धोॅन।। 36।।
सदी अठारह सतमा दसकोॅ,
केरऽ छेकै बात।
अंग्रेजऽ के बढ़लऽ गेलै,
अंगोॅ म॑ उत्पात।। 37।।
मुगलऽ साथें अंग्र्रेजो जब,
थाम्है वहीं कमान।
सरदार आहिड़ी रमना के,
खाढ़ोॅ होलै कान।। 38।।
सर्वेश्वरी तब आहिड़ी क॑,
सोंपी सब्भे भार।
युह् भूमि म॑ टक्कर लेली,
करै तुरत तैयार।। 39।।

पहाड़िया सैनिक के साथें,
पुजहर, शिब्बू साथ।
अंग्रेजऽ के टक्कर म॑ तब,
सही बंटाबै हाथ।। 40।।
प्रखण्ड नाला निकट मालचा,
पर्वत छेलै एक।
वहीं भुलाबै अंग्रेजऽ के,
सब्भे बुहि् विवेक।। 41।।
≈ सत्रह सौ छियासठ रहै,
अंग्रेजो लाचार।
टक्कर जखनी-जखनी आबै,
परेशान हर वार।। 42।।
पर अनहोनी होलै कुच्छू,
रमणा त्यागै प्राण।
उप सरदारऽ केरऽ आगू,
झलकै कहां निदान।। 43।।
करिया पुजहर या शिब्बू के,
रहै हाल बेहाल।
रांची केरऽ कोकराह म॑,
जगलै कुछ संताल।। 44।।

अंग धरा पर ढेर जाति के,
लोग बसै छै आय।
परंपरा ई पहिन्हौ छेलै,
पढ़लऽ-सुनलऽ जाय।। 45।।
पहाड़िया, संताली दोनों,
मिलता-जुलता जात।
खान-पान म॑, रहन-सहन म॑,
मिलथौं सब्भे बात।। 46।।
दोनों के जीवन म॑ जंगल,
झरना, नदी, पहाड़।
दोनों जात शिकारी जकरऽ,
खूबे मजबूत हाड़।। 47।।
दुश्मन सें टकराबै लेली,
आयुध तीर-कमान।
जकरा बल पर हरदम राखै,
अपनों शान-गुमान।। 48।।
लड़ना-भिड़ना जीवन केरऽ,
सदा उद्देश्य लखाय।
अन्यायी के नाश करै म॑,
कहियो नैं सकुचाय।। 49।।

अंग्रेजऽ सें लड़ै-भिड़ै म॑,
दोन्हूं केरऽ नाम।
दोन्हूं माथा पर ऐलऽ छै,
स्वतंत्रता संग्राम।। 50।।
संतालऽ के अगुआई म॑,
रहै श्याम गंजाम।
चोहड़ केरऽ आन्दोलन म॑,
सब होलै नाकाम।। 51।।
करिया पुजहर दम साधी क॑,
जब करलक हुंकार।
शिब्बू, जबड़ा, डोम्बा, धरमा,
सब होलै तैयार।। 52।।
छोॅ सालऽ के बाद बहŸार,
ईस्वी जखनी आय।
अंग्रेजऽ के माथा ≈पर,
काल घटा घहराय।। 53।।
राजमहल के नजदीकोॅ म॑,
उधवा नाला पास।
सब पहाड़िया अंग्रेजऽ क॑,
करलक बड़ी हतास।। 54।।

राजमहल ईंचार्ज तखनकोॅ,
कैप्टन ब्रुक के हार।
वारेन हेस्टिंग्स देहोॅ पर,
आबी गेलै भार।। 55।।
अंग्रेजऽ के चाल समूच्चे,
गेलै जब छितराय।
सैनिक शासन अंग क्षेत्र के,
तब गेलै बदलाय।। 56।।
कैप्टन ब्रा≈न क॑ भेजलकै,
खूब लगैनें आस।
भागलपुर के जिलाधिकारी,
क्लीवलैण्ड के पास।। 57।।
पहाड़िया पर विजय प्राप्ति के,
भी देलके निर्देश।
ठीक मौत के घाट उतारऽ,
रहै एक नैं शेष।। 58।।
कहला करला म॑ छै अंतर,
की बुझतै अंग्रेज।
जकरा नसीब म॑ लिखलौ छै,
फूलऽ केरऽ सेज।। 59।।

कुच्छू दिन के बाद अठŸार,
जेन्हैं ऐलै साल।
जागी गेलै-पहाड़िया के,
तब सेना विकराल।। 60।।
जबड़ा पहाड़िया ठानै छै,
सामूहिक विद्रोह।
राजमहल के साथ रामगढ़,
केरऽ लेलक टोह।। 61।।
दोन्हूॅ जग्घोॅ के कैम्पोॅ म॑,
खूब लगैलक जोर।
सैनिक के माथा पर झलकै,
काल घटा घनघोर।। 62।।
तहस-नहस होलै सेना सब,
हताहतो कुछ लोग।
बाल न बांका पहाड़िया के,
ई सुन्दर संयोग।। 63।।
अगुआई जबड़ा पहाड़िया,
करनें छेलै भाय।
सच्चा मानों जबड़ा क॑ तों,
तिलका मांझी आय।। 64।।

पहाड़िया सैनिक के हाथें,
जनरल मुंहकी खाय।
चाह॑ लगलै संतालऽ क॑,
लियै केना बसाय।। 65।।
सीमांकित क्षेत्रऽ म॑ बसतै,
पहाड़िया समुदाय।
वारेन हेस्टिंग्स सब्भैं नें,
लेलकै मोंन बनाय।। 66।।
≈ क्षेत्रऽ के नाम घरलकै,
जब दामिन-ई-कोह।
पहाड़िया के आगू लागै,
विचित्रे उहा-पोह।। 67।।
सिंहभूमि सें, मानभूम सें,
वीरभूम सें भाय।
मिदनापुर, बांकुड़ा सगर सें,
थोड़ेॅ-थोडेॅ आय।। 68।।
अमरा पाड़ा, मझवामेली,
बांझी म॑ तत्काल।
लोभोॅ म॑ आबी-आबी क॑,
बसलै कुछ संताल।। 69।।

सब्भै खातिर खूब करलकै,
शिक्षा क॑ अनिवार्य।
जकरा कहलऽ जाबेॅ पारेॅ,
परम मनोहर कार्य।। 70।।
जे दामिन-ई-कोह कहाबै,
ओहो ≈पर काल।
बनलै ≈ संताल परगना,
अहिनों चललै चाल।। 71।।
पहाड़िया समुदाय यहां पर,
रहै निवासी मूल।
जकरा आंखी झोक॑ लगलै,
देखोॅ गरदा-धूल।। 72।।
सदी अठारह अर्हली तक,
हुगली म॑ अंग्रेज।
पांव पसारी जन्नें-तन्नें,
कभी दिखाबै तेज।। 73।।
मुगल शासकोॅ क॑ भड़काबै,
वाला चललै चÿ।
पहाड़िया के होलऽ गेलै,
जीवन रेखा वÿ।। 74।।
जंगल तेॅ दोहन सें होलै,
फल-फल्हारी हीन।
पहाड़िया तब झलक॑ लगलै,
दुर्बल आरू दीन।। 75।।
आफत ऐलै, अहिनों होलै,
अन्नोॅ लेॅ मुहताज।
संतालऽ के हक म॑ गेलै,
पहाड़िया के राज।। 76।।
क्लीवलैण्ड के साथी मिललै,
इक विलियम होजेज।
सचमुच छोड़ै क्लीवलैण्ड लेॅ,
फूलऽ केरऽ सेज।। 77।।
पहाड़िया क॑ फोडै़े वाला,
हरदम चललै चाल।
एक तिहाई आवादी तेॅ,
फसै लोभ के जाल।। 78।।
मात्र अजण्टी क्षेत्रऽ केरऽ,
लोभोॅ क॑ ठुकराय।
देलकै विलियम होजेज के,
माथोॅ क॑ चकराय।। 79।।

बात बेरासी केरऽ छेकै,
पहाड़िया समुदाय।
जंगल-जंगल घूमी-घूमी,
केन्हौं जान बचाय।। 80।।
जे छेलै सम्पन्न ओकरऽ,
व्यर्थ सुनाना गीत।
पद लोलुपता म॑ लिपटैलऽ,
जकरऽ सब संगीत।। 81।।
फूट डालना सŸा लेली,
यह आवश्यक मंत्र।
फूटोॅ के चलतें आबै छै,
दुनिया म॑ परतंत्र।। 82।।
जनजाति क॑ फोड़ी देलकै,
चललै अहिनों चाल।
ज≈राह क॑ अंग्रेजें नें,
मानै अपनों ढाल।। 83।।
राजमहल क्षेत्रऽ के डाकू,
ज≈राह दुर्दान्त।
करी देलकै पहाड़िया के,
संगठनों के अन्त।। 84।।
रहै सर्वेश्वरी सहायिका,
पहाड़िया के भाय।
पर ज≈राह अंग्रेजऽ क॑,
देलक भेद बताय।। 85।।
सेनाध्यक्ष बनाबै केरऽ,
जेन्हैं दै छै लोभ।
ज≈राह सब भूली गेलै,
अंग्रेजऽ प्रति क्षोभ।। 86।।
जउराह सें करबाबै,
एगो भारी शŸार्।
तिलका-आरू धरमा गुटक॑,
भेजै केरऽ गŸार्।। 87।।
क्लीवलैण्ड नें ज≈राह क॑,
सेनाध्यक्ष बनाय।
लोभोॅ केरऽ मकड़जाल म॑,
लेलक तुरत फसाय।। 88।।
धरमू चाहें शिब्बू सब्भे,
ज≈राह के पास।
बैठी-बैठी खूब करलकै,
मिलै केरऽ प्रयास।। 89।।
सब्भे तेॅ होथैं छै अपनों,
आदत सें लाचार।
ज≈राह तेॅ पहिनें ही सें,
डाकू इक खूंखार।। 90।।
ज≈राह नैं छोड़ै कखनूं,
अपनों शान-गुमान।
सेनाध्यक्ष बनी क॑ लेलक,
आरू सीना तान।। 91।।
करबाबै छै वही काल म॑,
शिब्बू के पहिचान।
क्लीवलैण्ड के आंखी झलकै,
ज≈राह इन्सान।। 92।।
क्लीवलैण्ड शिब्बू केरऽ ,जबेॅ पहिचान करै।
कुच्छू-कुच्छू सोची-साची मन मुस्काबै छै।।
जकरा सें रात-दिन आतंकित रहै छेलै।
ओकरा आगू म॑ पाबी मन हरसाबै छै।।
देर नैं लगाबै तनी, सेना क॑ बोलाबै खनी।
हथवा म॑ कस्सी-कस्सी रस्सी बंधबाबै छै।।
अगुआ पहाड़ी केरऽ, सब्भे जनजाति केरऽ।
फांसी केरऽ तखता पर, तखनी झुलाबै छै।। 93।।

तिलकामाँझी

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Angika Poetry  : Tilkamanjhi / तिलकामाँझी
Poet : Hira Prasad Harendra / हीरा प्रसाद हरेंद्र
Angika Poetry Book / अंगिका काव्य पुस्तक – तिलकामाँझी