तिलकामाँझी | एगारमा सर्ग |अंगिका कविता | हीरा प्रसाद हरेंद्र

तिलकामाँझी

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तिलकामाँझी

एगारमा सर्ग (.)

— हीरा प्रसाद हरेंद्र —

यात्रा छेलै गुप्त यही सें,
बनवारी नैं जानै।
बदला लैलेॅ भीतर-भीतर,
वें तेॅ खह खान्है।। 1।।
नीना द्वारा अपमानों के,
बदला लेना चाहै।
पर नीना केन्हौं क॑ पाबौं,
अभियो मन-मन आहै।। 2।।
बनवारी अवसर के ताकें,
समय पैलकै फांका।
पहुंची गेलै डेग बढ़ैनें,
ठाम्हैं थाना बांका।। 3।।
बात दरोगा क॑ बतलाबै,
थाना पहुंचै जखनी।
मंदार पहाड़ोॅ पर दलबल,
तिलका मिलथौं अखनी।। 4।।

आन्दोलन के तैयारी म॑,
सोच-बिचार करै छै।
पहाड़िया अब टकराबै म॑,
बाथैं बात डरै छै।। 5।।
दर्जन भरी पुलिस आबी क॑,
मंदारऽ क॑ घेरै।
बनवारी वोही बीचोॅ म॑,
मोंछ कखनियों टेरै।। 6।।
नीना देखी बनवारी क॑,
पूरा समझी गेलै।
पर बनवारी के आंखी म॑,
नीना हरदम हेलै।। 7।।
खोजी-ढूंढ़ी हारी गेलै,
छानी मारै पूरा।
रहलै बनवारी के सब्भे,
तखनी आस अधूरा।। 8।।
बनवारी के बहिन छोटकी,
सब्भे जानै छेलै।
गिहैरऽ के राह पकड़नें,
जन्नें तिलका गेलै।। 9।।

बनवारी क॑ चुपके-चुपके,
सब्भे बात बताबै।
फेनूं फौजऽ के टुकड़ी क॑,
गिहैरो सिधियाबै।। 10।।
आन्दोलन म॑ मन लपटैलऽ,
नीना करलक तेजी।
तिलका क॑ सब बात बताबै,
पहाडिया क॑ भेजी।। 11।।
गिहैरऽ म॑ सुमरू के घर,
रहै पहाड़ी ढेरी।
खबर जानथैं सिधियाबै सब,
नैं लगलै कुछ देरी।। 12।।
जुटलऽ छेलै देखै खातिर,
क्लीवलैण्ड हत्यारा।
जकरा आगू अंग्रेजऽ के,
चललै नैं कुछ चारा।। 13।।
युवक गुरिल्ला युह् प्रशिक्षित,
भागै तिलका साथें।
तारापुर जंगल पार करलकै,
सब्भैं बातें-बातें।। 14।।

सुलतानगंज के नजदीकें,
पहाड़ झलकै छेलै।
स्थान सुरक्षित जानी-बूझी,
सब वोहीं ठां गेलै।। 15।।
मिललै ढेरी वीर लड़ाकू,
चाहै लेना टक्कर।
पर अखनी अंग्रेजऽ केरऽ,
भारी छेलै चक्कर।। 16।।
बांका वाला पुलिस निकललै,
रहै संग बनवारी।
रस्ता-पैड़ा, कांटोॅ-कूशोॅ,
सगरे जंगल झारी।। 17।।
भागलपुर भेजी क॑ नौतोॅ,
फौजी क॑ सनकाबै।
घुड़सवार सेना तब ढेरी,
गिहैरऽ दिश आबै।। 18।।
गिहैरऽ म॑ पता लगाबै,
तारापुर के जंगल।
पहाड़िया सब वहीं मचैतै,
अंग्रेजऽ सें दंगल।। 19।।

भागलपुर सें एकबारगी,
आबी फौजी दस्ता।
सुलतानगंज में छेकै छै,
आगू-पीछू रस्ता।। 20।।
जासूसें तब पता बताबै,
होलै जहां सबेरा।
सुलतानगंज के पहाड़ पर,
तिलका केरऽ डेरा।। 21।।
घेरी लै छै पहाड़ सौंसे,
पूरा फौजी दस्ता।
निकली भागै के नैं रहलै,
कौनों देॅ क॑ रस्ता।। 22।।

पर तिलका तेॅ भागै वाला,
छेलै कहां जवान।
युह् भूमि म॑ मरना-मिटना,
समझै शान-गुमान।। 23।।

पचास-साठ गुरिल्ला सैनिक,
तिलका साथें आय।
अंग्रेजऽ सें लोहा लै म॑,
देलक धूम मचाय।। 24।।
पर बन्दूकोॅ के गोली सें,
जंगल भी थर्राय।
बंदर डाली-डाली कूदै,
भागै जान बचाय।। 25।।
अंग्रेजऽ के ताकत आगू,
पहाड़िया कमजोर।
तिलका के माथा मंडराबै,
काल घटा घनघोर।। 26।।
बन्दूकोॅ सें घायल होलऽ,
पीछू हटलऽ जाय।
जान बचाना मुश्किल जानी,
गेलै सब घबड़ाय।। 27।।

तिलका मांझी के जांघी म॑,
गोली धसलै जाय।
जैजां गान्दो के युह॑ म॑,
लगलऽ छेलै भाय।। 28।।

गोली लगै तिलका गिरै, होलै पहाड़ी सब विकल।
तिलका भरोसा पर बनै, जे योजना सारा विफल।। 29।।
जानों बचाबै भाग जे, ≈ लोग जैतै अब कहां।
चारो तरफ अंग्रेज के सेना बिथरलऽ छै वहा°ं।। 30।।
कुहराम मचलै जोर सें तिलका जहां बेहोश छै।
चुपचाप पड़लऽ भूमि पर, वातावरण खामोश छै।। 31।।
जानी निधन, हरखित बदन, अंग्रेज सब खुशहाल छै।
पर पास ऐतें सब डरै, समझै कि कोनों चाल छै।। 32।।
जे क्लीवलैंडोॅ क॑ गिराबै मार हिम्मतवाज छै।
चुप्पी यहां पर ओकरऽ, देखी लगै कुछ राज छै।। 33।।
लेकिन कमांडर धर दबोचै जाय जल्दी पास म॑।
कब तक रहतियै ≈ भला, सब सैनिकोॅ के आस म॑।। 34।।
बेहोश तिलका क॑ लगाबै, हथकड़ी तब हाथ म॑।
बेड़ी पिन्हाबै गोड़ आरू लेॅ चलै छै साथ म॑।। 35।।
जब होश ऐलै तिलमिलाबै, देख बेड़ी गोड़ म॑।
अंग्रेज सेना छै बिथरलऽ, हर दिशा, हर मोड़ म॑।। 36।।
जे वीर बलिदानी धरा पर, ओकरा नैं डोॅर छै।
बनलऽ हमेशा स्वर्ग म॑, एगो मनोहर घोर छै।। 37।।

इतिहास गवाही अभियो छै,
≈ हालत भी जानी क॑।
घोड़ा साथें घीचै छेलै,
गोड़ें रस्सी बान्ही क॑।। 38।।
सुलतानगंज सें औन्हें क॑,
भागलपुर तक लानै छै।
लहुलुहान तिलका लेॅ तभिया,
अंगधरा तक कानै छै।। 39।।
लहुलुहान बेहोशी हालत,
तिलका क॑ वैठां लानी।
राखलकै जहां बसै छेलै,
शिब्बू के नाना-नानी।। 40।।
खनदानिक नानी के घर म॑,
तिलका केरऽ जन्म रहे।
वोही जग्घोॅ पर बादोॅ म॑,
बनै जेल सब कोय कहै।। 41।।
कुछ घण्टा लेली जेलऽ म॑,
तिलका क॑ जब डालै छै।
देखोॅ पहाड़ी बाबा कबतक,
ओकरऽ मौत क॑ टालै छै।। 42।।

प्यार हमेशा ≈ धरती सें,
तिलका मांझी क॑ छेलै।
धन्य भूमि वोही जग्घा पर,
बचपन म॑ कूदै-खेलै।। 43।।
≈ धरती म॑ लोटी-पोटी,
बचपन सदा बितैनें छै।
सूरज, चांद, सितारा केरऽ,
गीत मनोहर गैनें छै।। 44।।
गंगा के गोदी म॑ बैठै,
कखनूं पथली मारी क॑।
साथी-संगी साथें खेलै,
छप-छप पानी टारी क॑।। 45।।
तिलका मांझी गंगा जी म॑,
पहिनें खूब नहैलऽ छै।
गंगा मांटी केरऽ चंदन, माथा,
देह लगैलऽ छै।। 46।।
गंगा केरऽ नामे लेतें,
तरै लोग कतना पीढ़ी।
गंगा तेॅ धरती पर छेकै,
स्वर्ग जाय के बस सीढ़ी।। 47।।

गंगा के दर्शन करला सें,
पाप-ताप सब भागै छै।
गंगा जी म॑ स्नान करऽ तेॅ,
भूख जोर सें जागै छै।। 48।।
होशोॅ म॑ तिलका कुछ ऐलै,
बड़-बड़ कुच्छू बोलै छै।
तब फौजी कप्तानें पूछै,
तिलका नैं मुख खोलै छै।। 49।।
बात उगलबावै के कोशिश,
जों अंग्रेजऽ के द्वारा।
‘पहाड़िया जंगे आजादी’,
मुंह सें निकलै छै नारा।। 50।।

सतरह सौ पचासी केरऽ,
छेलै पहिलऽ माह।
जनवरी तेरह तारीख क॑,
पकड़ै दोनों बांह।। 51।।

तिलका क॑ उल्टा लटकाबै,
बरगद केरऽ डाल।
कप्ताने तेॅ बनलऽ छेलै,
तिलका केरऽ काल।। 52।।
तिलका केरऽ रोम-रोम म॑,
भरलऽ छै फौलाद।
डर के मारें पास ओकरऽ,
आबै नैं जल्लाद।। 53।।
वहीं जगह पर क्लीवलैण्ड क॑,
मारै तिलका बाण।
वह॑ जगह तेॅ तिलका केरऽ,
घर-द्वार जन्म स्थान।। 54।।
ठाकुर बाबा मिललऽ छेलै,
वही जगह सुनसान।
वही जगह पर अखनी तिलका,
देशोॅ लेॅ कुर्वान।। 55।।
जनवरी तारीख तेरह ही,
क्लीवलैण्ड क॑ भाय।
कष्ट निवारण लेली मानोॅ,
मौतें गला लगाय।। 56।।

आय ओकरो बरखी के दिन,
बरखासन के रूप।
मौज मनाबै, खुशी लुटाबै,
तखनी भर-भर सूप।। 57।।

आंख लाल गोस्सा सें करनें,
फौजी के कप्तान।
करी देलकै गोली मारी,
तिलका क॑ बेजान।। 58।।

पहाड़िया आन्दोलन केरऽ,
कहोॅ अन्त तत्काल।
अंग भूमि म॑ लोटै छेलै,
अंग भूमि के लाल।। 59।।

अंग्रेज जुल्मी के विरोधी,
जिन्दगी भर हर घड़ी।
अंतिम समय म॑ गोड़ बेड़ी,
हाथ रहलै हथकड़ी।। 60।।

तिलकामाँझी

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Angika Poetry  : Tilkamanjhi / तिलकामाँझी
Poet : Hira Prasad Harendra / हीरा प्रसाद हरेंद्र
Angika Poetry Book / अंगिका काव्य पुस्तक – तिलकामाँझी