तिलकामाँझी | दसमा सर्ग |अंगिका कविता | हीरा प्रसाद हरेंद्र

तिलकामाँझी

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तिलकामाँझी

दसमा सर्ग ()

— हीरा प्रसाद हरेंद्र —

तीस नवम्बर क्लीवलैण्ड जब,
कॉकरेल क॑ सौपै भार।
भागलपुर के जिलाधिकारी,
के रूपोॅ म॑ पहनै हार।। 1।।

कोकरेल केरऽ आग्रह पर,
सर आयर कट सेना साथ।
ऐलै यहां, मगर डगलस तेॅ,
रहै लगैनें आगू हाथ।। 2।।

सर्वेश्वरी महारानी के,
निधन बढ़ैनें छेलै जोश।
ताकत खूबे बढ़लै तखनी,
मिललै जब पूरा धन कोष।। 3।।

पहाड़िया आन्दोलनकारी,
संतालऽ क॑ लै क॑ साथ।
आगू केरऽ सब कामोॅ म॑,
दोनों मिली बंटाबै हाथ।। 4।।

पर बाबा तिलका मांझी के,
बदतर होलऽ गेलै हाल।
बलिदानी, जेहादी दस्ता,
अन्नोॅ लेॅ हरदम बेहाल।। 5।।
महेशपुर राजऽ के संपत,
पर छेलै पूरा अभिमान।
रानी केरऽ मौत करलकै,
पहाड़िया के ही नुकसान।। 6।।
तिलका सोचै नुकसानें छै,
संघर्षों म॑ देर लगाय।
जेना होतै आयर कट सें,
लेना छै जल्दी फड़ियाय।। 7।।
गान्दो आरू बारकोप के,
बीचें आखिर बिगुल बजाय।
घमासान दोनों पक्षोॅ के,
योह तखनी करै लड़ाय।। 8।।
अंग्रेजें बन्दूक चलाबै,
गाछी आढ़ें देह छिपाय।
पहाड़िया-संताल तीर सें,
अंग्रेजऽ क॑ दै बिथराय।। 9।।

दोनों दल के पूरा सेना,
युह्भूमि म॑ होलै ढेर।
पहाड़िया के पांव उखड़लै,
ज≈राह र≥्् गिरलै शेर।। 10।।
गेढ़वो कुंवर गिरलै जखनी,
पहाड़िया होलै भयभीत।
तिलका जखनी घायल होलै,
अंग्रेजऽ के होलै जीत।। 11।।
बचलऽ-खुचलऽ पहाड़िया सब,
तिलका क॑ लानै मंदार।
नीना साथें-साथें छेलै,
बनलऽ सदा ॉदय के हार।। 12।।
परम धर्म देशोॅ के रक्षा,
बड़ोॅ एकरा सें नैं काम।
अमर शहीदों के सब्भे दिन,
रहतै इतिहासोॅ म॑ नाम।। 13।।
तिलका केरऽ सेवा सब्भैं,
तन-मन सें करलक भरपूर।
दवा दारू के प्रभावोॅ सें,
दैहिक संकट होलै दूर।। 14।।

मंदारऽ के पावन धरती,
पपहरणी के पावन नीर।
मधुसूदन के दया दृष्टि सें,
ठाम्हैं होलै स्वस्थ शरीर।। 15।।
पहाड़िया तेॅ पहाड़ ≈पर,
सुखमय जीवन सदा बिताय।
पहाड़ रमनीक स्थल छेकै,
झरना गीत मनोहर गाय।। 16।।
पहाड़िया जे हट्ठा-कट्ठा,
खान-पान छेकै आधार।
पहाड़ जंगल म॑ भरलऽ छै,
सब जीवोॅ के सब आहार।। 17।।
फोल-फलेरी हर मौसम म॑,
पहाड़िया क॑ आबै काम।
कटहर, बड़हर, केन, सपाटू,
महुआ बेल, शरीफा, आम।। 18।।
तिलका के देहोॅ म॑ ताकत,
ऐलै जखनी करै बिचार।
आगामी आन्दोलन लेली,
होना छै फेन°ू तैयार।। 19।।

आबी गेलै दस-बारह ठो,
चुनलऽ पहाड़िया सरदार।
हुवेॅ लागलै आन्दोलन के,
नया रूप फेनूं तैयार।। 20।।
हिन्नें नीना के प्यारऽ म॑,
बनवारी के होलै हार।
वही दिनां से बदली गेलै,
बनवारी के सोच-विचार।। 21।।
तिलका के बांहों म॑ झूलै,
जब सें बनवारी के चाह।
चौपट होलै बनवारी के,
मनम॑ जे छेलै उत्साह।। 22।।
तिलका क॑ पकड़ाबै केरऽ,
घोषित छेलै कुछ ईनाम।
बनवारी क॑ लोभ समैलै,
देखोॅ आगू के परिणाम।। 23।।
तिलका क॑ फांसी पड़ला पर,
पहिनेॅ तेॅ मिलतै ईनाम।
नीना भी ऐतै बांहों म॑,
मौज मनैबै आठो याम।। 24।।

तिलका क॑ पकड़ाबै वाला,
बनवारी के होलै चाल।
बदला केरऽ भाव जागलै,
तिलका हक म॑ होलै काल।। 25।।
युह् क्षेत्र म॑ निपुण गुरिल्ला,
पहाड़िया योह के साथ।
सोच-बिचारऽ म॑ तिलका के,
लगलऽ छेलै पूरा हाथ।। 26।।
गिहैरऽ म॑ सुमरू गिरही,
केरऽ छेलै पूरा नाम।
रहै ओकरा सें तिलका क॑,
आन्दोलन संबंधी काम।। 27।।
अपनों सहयोगी के साथें,
जखनी नीना के सिरमौर।
बात करलकै भोरे-भोरे,
निकली जाना छै गिहैर।। 28।।
नीना भी सब्भै के साथें,
होलै जाबै लेॅ तैयार।
मगर थामलै सोची-समझी,
रहै पिता पूरे बीमार।। 29।।

सेवा करै पिता के आरू,
आन्दोलन पर छेलै ध्यान।
हिन्नें तिलका गिहैरऽ लेॅ,
साथी संग करै प्रस्थान।। 30।।

लक्ष्मीपुर के बीहड़ जंगल,
होलऽ गेलै तुरत चकाय।
आगू बढ़थैं पहुंची गेलै,
सुमरू छेलै आस लगाय।। 31।।

सेवा-स्वागत खूब करलकै,
तिलका गदगद होलै।
आन्दोलन के बात वहां पर,
धीरें-धीरें खोलै।। 32।।

तिलकामाँझी

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Angika Poetry  : Tilkamanjhi / तिलकामाँझी
Poet : Hira Prasad Harendra / हीरा प्रसाद हरेंद्र
Angika Poetry Book / अंगिका काव्य पुस्तक – तिलकामाँझी