कल॑-कल॑ | अंगिका कविता | कुंदन अमिताभ

कल॑-कल॑
— कुंदन अमिताभ —

कल॑-कल॑
गरै छै दूध
गाय केरऽ थऽन सं॑
दोल भरी जाय छै.
कल॑-कल॑ ।

कल॑-कल॑
टपकै छै बूँद
सरंग सं॑
सागर भरी जाय छै.
कल॑-कल॑ ।

कल॑-कल॑
बिखरै छै चाँदनी चान सं॑
धरती तरी जाय छै
दिल बहुराय छै
कल॑-कल॑ ।

कल॑-कल॑
भरै छै आग सीना मं॑ मानव के
जोद्दा बनी जाय छै देशऽ के दुश्मन क॑
धूरा चटाय छै जंगभूमि मं॑
कल॑-कल॑ ।

Angika Poetry : Kale-Kale
Poetry from Angika Poetry Book : Dhamas (धमस)
Poet : Kundan Amitabh

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