रात बितलऽ छै होलै बिहान

रात बितलऽ छै होलै बिहान
अंगिका गीत | कैलाश झा ‘किंकर’

रात बितलऽ छै होलै बिहान
लाल भेलै सगर आसमान ।

जागि गेलै चिड़ैया तमाम
खेत चललऽ छै अपनऽ किसान ।

सौऽन-भादऽ के भरलऽ तड़ाग
भोर होतं॑ शुरू छै स्नान ।

नोन-रोटी के चिन्ता सताय
काम ढूँढै ल॑ चललै जवान ।

अंग देशऽ के उमगित बयार
अंगिका के बढ़ाबै गुमान ।

फेनू बर्षा के ऐलै फुहार
जाड़ आबै के आहट सुजान ।