पेटऽ के आग | अंगिका कविता | लखनलाल सिंह ‘आरोही’

पेटऽ के आग

— प्रो. (डॉ.) लखनलाल सिंह ‘आरोही’ —

कन्हों कुच्छु नै झलकै छै
सूरजऽ क॑ मारी देल॑ छै लकवा
बिहान कुहासऽ के चद्दर ओढ़ी
मौन छै ।
गाछऽ के पत्ता थर-थर काँपै छै
फूलऽ के चेहरा सं॑
लोर टपकै छै ।
कन्हों कुच्छु नै हलचल छै
जिनगी क॑ पल्ला
मारी देल॑ छै ।
चारों तरफ सन्नाटा छै
खोता मं॑ कलरव कैद छै ।
आतंकऽ के पहरा छै
मौसम बड़ा कसाय छै ।
रूकिया हाथऽ मं॑ ल॑ कचिया
गोदी मं॑ ल॑ क॑ बच्चा
धान काटै ल॑ जाय छै ।
है के पतियैतै ?
पेटऽ के आगें
की नै करवाय छै ।

Angika Poetry : Petow Ke Aag
Poet : Prof. (Dr.) Lakhanlal Singh ‘Aarohi’