ठारी के चुकलऽ बानर आरी के चुकलऽ गृहस्त | अंगिका कहावत

ठारी के चुकलऽ बानर आरी के चुकलऽ गृहस्त

अर्थ –  डाल के चूके बंदर और आर (खेत के मेढ़) को अच्छी तरह से बाँधने में चूके गृहस्थ को कहीं भी शरण नहीं मिलती  ।