समधी | अंगिका कहानी | Angika Story | डॉ. रामनंदन विकल

समधी | अंगिका कहानी | डॉ. रामनंदन विकल
Samadhi | Angika Story | Dr. Ramnandan Vikal

हम्मं॑ कहै छिहौं , टेम्पू छोड़ी दहो । हमरा नञ छ॑ अत्त॑ औकात कि समधी ऐता त॑ दिन भर गाड़ी राखी क॑ हुनकऽ सेवा सत्कार करंऽ । सुनथैं समधिन के पति कहलकै – “धीरे बोलऽ समधी कोठरी मं॑ बैठलऽ छौं, सुनथौं ।“ हय सुनी क॑ समधिन कह॑ लागलै – “सुनता त॑ सुनता – बलैयै से, सुनी क॑ की करता, नञ ऐता आरो की । हमरा नञ चाहियऽ । हम्मं॑ फेरू कहै छियौं, छोड़ी द॑ टेम्पू ।”

समधी कोठरी मं॑ बैठी क॑ चुपचाप सुनी रहलऽ छेला । चुपचाप सोच॑ लागलात, कत्त॑ शौकऽ सं॑ बेटा केरऽ बियाह करलां, बराती मं॑ बैंड-बाजा मं॑ नाचलां-कुदलां, कत्त॑ नोट उड़ाय देलां । जेवरऽ सं॑ बहू क॑ छारी देलां । दुकानी पर बोलाय क॑ पसंद कराय क॑ जेबर किनलां । कहूँ कोय कमी नञ करलां । मंझला समधी यहीं हिनके शहरऽ मं॑ बीमार छऽथ हुनका देखै ल॑ ऐलां त॑ यहूँ आबी गेलाँ । नञ ऐला स॑ भी समाजऽ मं॑ बदनामी । समधी उठी क॑ तैयार हुअ॑ लागला । कपड़ा पिन्हतं॑ – पिन्हतं॑ सुनलका समधिन केरऽ आवाज फेरू जोरऽ–जोरऽ सं आबी रहलऽ छेलै । जानै छै परकलऽ गिदरां ककड़ी – फूट खाय छै । हिनकऽ हिसकऽ लागी जैतै । हिसकऽ त॑ छोड़ैये पड़तै । आब॑ हिनका सं॑ हमरा की सरोकार । बियाह होय गेलै । आब॑ खाली बेटी – दमाद सं॑ रिस्ता ।हिनका सं॑ की । छोड़ऽ हटाबऽ । तब तांय कोठरी सं॑ तैयार होय क॑ समधी जी बाहर आबी गेला । समधी क॑ कहलकात, “ हमरा मँझला समधी क॑ देखै ल॑ अस्पताल जाना छै, हम्मं॑ जाय छी । संझकी हमरऽ गाड़ी छै, हम्मं॑ पटना जैबऽ । जाम के पहलें आबी क॑ समान लेलं॑ जैबऽ ।” हय कही क॑ समधी जी बाहर निकली गेलै । कहल॑ गेलै, “हम्मं॑ टेंपो ल॑ जाय छियौं ।” Continue reading “समधी | अंगिका कहानी | Angika Story | डॉ. रामनंदन विकल”