विकलांग | अंगिका कहानी | Angika Story | राकेश पाठक

विकलांग | अंगिका कहानी | राकेश पाठक
Viklang  | Angika Story | Rakesh Pathak

‘‘एकरै कहै छै राह बता त॑ आगे चल…. एक त॑ टियूशन के जोगाड़ करी द॑…..दोसरें घऽर देखाय द॑…तेसरें गार्जियन सें बात कराय द॑….चौथऽ..’’ मने मन कूढ़तें-भनभनैतें सेंट जोन्स इस्कूल के इंगलिश टीचर कमलेश ठाकुरें अपनऽ पुरनका साइकिल के पायडिल अपनऽ करेजा के पूरा जोर लगाय क॑ चलाय रहलऽ छेलऽ जल्दी-जल्दी ताबड़ तोड़ नजर एक बेर कार, मोटर, बाइक, रिक्शा सें रेलम-पेल होलऽ रस्ता पर जाय छेलै त॑ एक बेर बामा हाथऽ पर बन्हलऽ पुरनका रं घड़ी पर जेकरऽ स्टील के चमकै वला पालिश जगह-जगह सें झड़ी गेलऽ छेलै। इस्कूल पहुंचै में लेट होय रहलऽ छेलै। किलास त॑ नौ बजे शुरू होय छेलै मतुर की इस्कुल के गेट आठ बजी क॑ पैतालिसे मिनट पर बन्द होय जाय छेलै। गेट बंद होय गेला पर खाली विद्यार्थिये नै, कोय मास्टरऽ इस्कूल में घूस॑ नै पारै छ॑। गेट बन्द होय गेला के मतलब एक दिन के दरमाहा कटना। प्रायवेट स्कूलऽ में दरमाहे केतना मिलै छै? ओकरौ में जदी एक दिन के दरमाहा कटी जाय तब॑ सौंसे परिवारऽ के एक दिन के तरकारी के पैसा चल्लऽ जाय छै। देहऽ के रोइयां-रोइयां झरकाय दै बला तड़तड़िया बैसखा रौदी में कमलेश ठाकुर ताबड़तोड़ पायडिल चलाय रहलऽ छेलै। पैंट-शर्ट पसीना सें लथपथ।

असल में बात ई छेलै कि कमलेश ठाकुर जी केरऽ ननिहर के एकटा बी.ए. बी.एड. करलऽ जुवक जब॑ बिहार में अपना लेली सरकारी नौकरी के जोगाड़ नै कर॑ पारलकै तब॑ ई आशा सें गौहाटी आबी गेलै कि कमलेश भांय गौहाटी में नौकरी के कोनऽ जोगाड़ त॑ लगाइये देतै, कैहने कि हुनी कै बरिस सें गौहाटी में छऽत प्रायवेट इस्कूली में। जदी कोय जोगाड़ लगी जाय त॑ खराब की? नै मामू सें काना मामू भलऽ। वू जुवकें कमलेश ठाकुर के बड़का मामू अचुतानन्द झा सें एकटा चिठियो लिखाय क॑ आनल॑ छेलै। सेहे कमलेश ठाकुरैं वू जुवक याने कि मदन सिंह क॑ अपना इस्कूल में अंग्रेजी शिक्षक के रूप में रखवाय देने छेलै। एक टा टियूशन के बारे में खबर देने छेलै। खबर यानी वुतरू के बापऽ के नाम पता एक टा कागज पर लिखी क॑ देने छेलै। मतुरकी मदन सिंहके कहना छेलै कि कमलेश जी खुद्दे ओकरा साथें जाय क॑ वुतरू के घऽर देखाय देतै आरो गार्जियन सें बात कराय क॑ पफीस तै कराय देतै। से हे उफ दिन इस्कूल जाय सें पहिलें मदन सिंह क॑ लै क॑ कमलेश ठाकुर टियूशन बला गार्जियन कन गेलऽ छेलै। लौटै में याने कि इस्कूल पहुंचै में देर होय रहलऽ छेलै। आगू-आगू कमलेश जी आरो पीछू-पीछू मदन जी केरऽ साइकिल सड़कऽ पर दौड़ी रहलऽ छेलै। पियास के मारे गला सूखी रहलऽ छेलै। मतुरकि इस्कूल के गेट बंद होय जायके डरऽ सें कहीं रूकी क॑ एक गिलास पानियों नै पीय॑ पारै छेलऽ जबकि सड़कऽ के बगल-सायट में कत्त॑ सिनी केतारी के रस, शर्बत, मलाय बरपफ, ठंडा पानी बेचै बला सिनी खड़ा छेलै।

साइकिल चलैतें-चलैतें मदन सिंह के नजर एक टा पफुटपाथी होटल दने गेलै। पफुटपाथी होटल सिनी जैसनऽ रहै छै गंदगी सें भरलऽ वैसने रं वूहऽ होटल छेलै। तब॑ खिस्सा में कहने छै नी-‘भूख नै देख॑ छुछऽ भात, पियासें नै देख॑ čाबी घाट। ’’ पानी के जोगाड़ देखी क॑ पियास ऐसौं बढ़ी जाय छै। मदन जी साइकिल सें उतरी क॑ कमलेश जी क॑ हांक लगैलका-‘‘सर एक गिलास पानी पी लिया जाय….’’ ‘आप पीकर आइए मैं धीरे-धीरे आगे बढ़ता हूं।’- साइकिल पर चढ़ले बिरेक मारी क॑ आरो दहिना गोड़ जमीन पर टिकाय क॑ कमलेश ठाकुर कहने छेलात आरो फिनु साइकिल चलाब॑ लागलऽ छेलात।

असल वू होटल नै, बांसऽ के चार टा खुट्टा पर प्लास्टिक टांगी क॑ एक टा छोटऽ रं दोकान बनाय लेलऽ गेलऽ छेलै। एक टा पुरानऽ बिना हथ्था के कुर्सी पर पैतीस-चालीस बरिस के एक टा आदमी बैठलऽ छेलै जेकरऽ दहिना हाथ केहुनी लगां सें आरो दहिना गोड़ आčा जांघ सें कटलऽ छेलै। यह॑ दोकान केरऽ मालिक या कहऽ कि दोकनदार छेलै। सामने टेबुल पर एक स्टोव, चाह बनाबै के सरमजाम, बोयामऽ में तरह-तरह केरऽ बिस्कुट, भुजिया पौं रोटी रखलऽ छेलै। स्टोव पर अल्मुनियम केरऽ सस्पेंस में चाह खौली रहलऽ छेलै। ओकरऽ बामा हाथ हिन्न॑ सें हुन्न॑, हुन्न॑ सें हिन्न॑ वह॑ रं दौड़ी रहलऽ छेलै जेना कि मैदानऽ में कोनऽ पफुटबौल खेलबैया के गोड़ऽ के इशारा पर पफुटबॉल दौड़ै छै। चाह बनाबै में, छांकै में, गिलासऽ में ढारी क॑ गहकी क॑ दै में, गहकी सें चाहऽ के दाम लै में, गहकी क॑ रेजगारी लौटाय क॑ दै में ओकरऽ बामा हाथऽ केरऽ कर्तब आरो पफुर्ती देखै के लायक छेलै। मजाल कि जे कोय पूरा हाथ गोड़ बला आदमीं दोकान चलाबै में वै विकलांग केरऽ मोकाबला कर॑ पारै छ॑। मदन सिंह त॑ ओकरऽ करतब देखी क॑ अचरज सें हक्का-बक्का रही गेलऽ छेलऽ। ‘‘के ओकरा विकलांग कह॑ पारै छै?’’-हुनी मनेमन बुदबुदैने छेलै।

एक बजी गेलऽ छेलै। इस्कूलऽ में टिपिफन होय गेलऽ छेलै। बच्चा-बुतरू इस्कूलऽ केरऽ फिल्ड में दौड़ी-भागी रहलऽ छेलै। मास्टर सिनी टीचर्स रूम में बैठी क॑ गप-सप, हंसी-मजाक करी रहलऽ छेलै।
‘‘आप वहां पानी पीने नहीं रूके सर…..’’ मदन सिंह कमलेश ठाकुर सें कहने छेलै।
‘‘रूकने का समय भी नहीं था और दूसरा भी एक कारण था।’’
‘‘दूसरा कारण क्या?’’

‘अगर मैं चाय की उस दुकान पर पानी पीने रुकता तो दुकानदार का घाटा होता। वह पानी के साथ-साथ चाय भी पिलाता और बिस्कुट भी खिलाता। लाख कहने पर भी इसका दाम नहीं लेता। मैं बेचारे का नुक्सान कराना नहीं चाहता था।’’-कहतें-कहतेंं कमलेश ठाकुर गंभीर होय गेलऽ छेलऽ। मदन सिंह क॑ लगलऽ छेलै कि कमलेश ठाकुर के बोली भारी दुख आरो अपफसोस सें भिजलऽ छै।
‘माने कि उफ चाह वाला अपने के जान पहचान के छै?’

‘हां, वह मेरे जान पहचान का है। मैं पहले उसके लड़के को टियूशन पढ़ाता था। उस समय वह विकलांग नहीं था। एक मॉल में सेल्समैन था। उसका लड़का इसी स्कूल में क्लास सेभन में पढ़ता था। मॉल के काम से ही वह पोस्टऑपिफस गया था। लौटते समय ट्रक के नीचे आ गया। ’
‘बेचारा…… हाथ गोड़ दोनों चल्लऽ गेलै …..’’ कमलेश जी केरऽ बात सुनी क॑ मदन सिंहे अपफसोस प्रगट करल॑ छेलै।

‘‘हाथ पैर उस एक्सीडेंट में नहीं कटा था।’’ ‘‘तब्ब॑?’’-अचरज सें पूछने छेलै मदन जीं।
‘उस एक्सीडेंट में तो पैर की हड्डी टूट गई थी और हाथ का प्रफैक्चर हो गया था। बेचारा गरीब आदमी किसी प्राइवेट नरसिंग होम में जा नहीं सका था। सरकारी अस्पताल में भर्ती हुआ था। सरकारी अस्पताल के डाक्टर की लापरवाही और गलत इलाज के कारण हाथ पैर के घाव में इतना भयंकर इंपफेक्सन हो गया था कि जान बचाने के लिए हाथ पैर काटना पड़ा। महीनों सरकारी अस्पताल की खाट पर पड़ा रहने के बाद वहां से छुट्टी मिली। जान तो बच गई लेकिन जीवन भर के लिए विकलांग हो गया। मॉल के मालिक ने एक पैसे की भी सहायता नहीं की। अस्पताल से लौटने के बाद भीख मांगने की नौबत आ गई थी। अंत में मैंने ही थोड़े पैसे देकर चाय की वह दुकान खुलवा दी। उसकी औरत भी दूसरों के घरों में वर्तन मांजने का काम करने लगी है। पफीस न देने से लड़के का नाम इस स्कूल से कट गया। अब वह सरकारी स्कूल में पढ़ता है…’’

भगवान के मर्जी… भाग के बात….. मतुरकी जे पफुर्ती सें वू अपनऽ बामा हाथ चलाय क॑ काम करै छै…अच्छो आदमी ओकरा रं तेजी आरो पफुर्ती सें काम नै कर॑ पारै छ॑। भगवानें एक दुआर बंद करै छथिन त॑ दोसरऽ खोली दै छथिन।’’

‘‘भगवान नहीं आदमी की जीने की इच्छा और हिम्मत बड़े से बड़े संकट और बाधा को हटा देता है, दूर कर देता है।’’ -कमलेश बोललै।

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