पहिया पर जिनगी | अंगिका कहानी | Angika Story | राकेश पाठक

पहिया पर जिनगी | अंगिका कहानी | राकेश पाठक
pahiya par jinagi | Angika Story | Rakesh Pathak

‘अस्सी चुटकी नब्बे ताल तब॑ पूछऽ खैनी के हाल’-कही क॑ बिसेसर चौरसिया ठठाय क॑ हंसी देने छेलै। एकरऽ बाद अपनऽ प्लास्टिक केरऽ खैनी के डिबिया सें एक चुटकी लगैलऽ खैनी निकाली क॑ सामने पसरलऽ हमरऽ तरहत्थी पर रक्खी देने छेलै। हम्में वू खैनी क॑ अपनऽ निचला ठोरऽ तर दबैतें-दबैतें कहने छेलियै-‘तोरऽ हाथऽ के लगैलऽ खैनी खैने बिना तिरिपती नै होय छै बिसेसर भाय! सच्चे कहै छिहौं…..’ हम्में खैनी के सबाद लेतें-लेतें सोच॑ लगलऽ छेलियै जे वें केना खैनी लगाबै छै जे ओकरऽ लगैलऽ खैनी में एतना सबाद होय छै।

खैनी के बारे में ओकरऽ पफैकड़ा सुनी क॑ ओकरा सामने गहकी के जे भीड़ लगलऽ छेलै वूहऽ सिनी ठठाय देने छेलै। असल में बिसेसर चौरसिया एक नम्बर केरऽ हंसोड़ आरो बतबन्नर छेलै। पान, बीड़ी, सिगरेटऽ के साथें-साथें गहकी सिनी ओकरऽ बातऽ के रस लै छेलै। हम्में कत्त॑ दिन तांय यह॑ समझै छेलियै जे ई गाहक जुटाबै के आरो अपनऽ समान बेचै के ओकरऽ तरीका छेकै नै त॑ एतना दुखी आदमी एतना हंसोड़, एतना मजाकिया, बात-बात पर ठहाका लगाबै बला केना हुअ॑ पारै छे? मतुरकि हमरऽ ई भूल एक दिन खतम होय गेलऽ छेलै।

‘एक खिल्ली पान खिलाबऽ चौरसिया भाय! गजब के सबाद रहै छां तोरऽ लगैलऽ पानऽ में….’-एक टा गहकीं वू दिन कहनें छेलै।
‘चौरसिया के माने तों जानै छऽ ….पान, सोपारी, कत्था, चूना, ई चार रस क॑ जें खूब बढ़ियां सें मिलाबै ल॑ जानै छै, वह॑ असली चौरसिया होय छै….चार रस के रसिया…चौरसिया…ई बिसेसर छिकै असली चौरसिया..यह॑ लेली एकरऽ लगैलऽ पानऽ में एतना सबाद होय छै। ’-कही क॑ बिसेसर पहिले रं ठठाय देने छेलै। तखनी हमरऽ ठोरऽ पर हंसी आबी गेलऽ छेलै। हम्मू ठठाय देने छेलां।

‘हों मालिक कहियै अपने क॑ कै कनमा खैनी दै देलऽ जाय?’ हमरा सामने देखी क॑ बिसेसरें पूछने छेलै। ई ग्राम, किलोग्राम के जुगऽ में बिसेसरऽ के खैनी कनमैं में बिकै छेलै। अब॑ बिसेसरें जानै छेलै कि ओकरऽ एक कनमा खैनी कै ग्राम के बराबर होय छेलै। हलांकि बजारऽ में खैनी के रंग-बिरंगा पौच, डिब्बा मिलै छेलै मतुरकि बिसेसर के पान बेचै बला डाला

पर ओकरऽ हाथऽ के लगैलऽ खैनी केरऽ पुरनका अखबारऽ के पुड़िये नजर आबै छेलै।
‘बेसी नै एक-एक कनमा के चार टा पुड़िया द॑। परसूं त॑ पफेरू यहां आबिये रहलऽ छी। ताजा लगैलऽ कीनी लेबऽ….।’
‘हमरऽ लगैलऽ खैनी कहियो बासी नै होय छै…चार-पांच दिन बादो ताजे रहै छै।-कही क॑ बिसेसर ठठाय देने छेलै आरो हमरऽ तरहत्थी पर चार टा पुड़िया रखी देने छेलै, बड़ी तासीर बला खैनी केरऽ पुड़िया।

कोर्ट-कचहरी के काम सें, टŞेक्टर, पंपिंगसेट के भंगठलऽ कल पुर्जा खरदै लेली, खाद-बीज, कीटनाशक दबाय खरदै लेली हमरा जिला मुख्यालय के ई शहर में हरदम आबै लेली पड़ै छेलै। ई केतना बड़ऽ विडम्बना छै कि खेती होय छै गाम में आरो खेती केरऽ सरमजाम मिलै छै शहर में। शहर आबै-जाय में रिक्शा, मोटर, टमटम के भाड़ा अलग सें द॑…बुतरू सें बुतरू के गंड़तरऽ बेसी भारी। शहर ऐला पर बिसेसर चौरसिया सें पान आरो खैनी खरीदना हमरऽ आदत बनी गेलऽ छेलऽ। ओकरऽ लगैलऽ पान आरो खैनी खाय के हमरा चस्का लगी गेलऽ छेलऽ। साथें साथें ओकरऽ पफैकड़ा सुनी क॑ ठहाका लगाबै केरऽ चस्का पड़ी गेलऽ छेलऽ।

शहर ऐला पर हमरा बिसेसर सें कहीं न कहीं भेंट होइए जाय छेलै। मतुरकी जŮोबेर ओकरा सें भेंट होय छेलै ओŮो बेर हम्में अचरज में पड़ी जाय छेलां ओकरऽ हालत देखी क॑। ओकरऽ दोनो गोड़ टेहुना के नीचे सें कटलऽ छेलै। चलै-पिफरै आरो खड़ा होय सें भी नचार। गला में पान के एक टा डाला लटकैलें, ओकरा में पान, सोपारी, कत्था, चूना, बीड़ी, सिगरेट आरो अपनऽ हाथऽ के रटैलऽ खैनी के पुड़िया रखने एक टा जंग खैलऽ टुटलऽ भांगलऽ पुरानऽ रं पहिया के कुर्सी पर बैठलऽ लग-भग सौंसे शहर में घूमी-घूमी क॑ पान बीड़ी बेचै छेलै। चालीस छूऐ-छूऐ के उमीर। बुढ़ापा लगभग आबै-आबै बला छेलै। मतुरकी जोश जवानी रं। दाढ़ी-मोछ आबै के सिरखार बला छौंड़ा सिनी रं हंसोड़। साहस एतना, निडर एतना कि गाड़ी, मोटर, बाइक, रिक्शा आरन्ही सें भरलऽ सड़क पर बेčाड़क पहिया वला कुर्सी चलाय क॑ यहां सें वहां चल्लऽ जाय छै। नै čाक्का खाय के डऽर, नै चपाय के डऽर, नै मरै के डऽर। तब्ब॑ इहऽ बात छै कि मजबुरियौं आदमी क॑ साहसी बनाय दै छै। खिस्सा में कहने छै-‘मरता क्या नहीं करता। ’

एक बेर के बात छिकै। हम्में पटना सें लौटी रहलऽ छेलियै। टŞेन लेट ऐलऽ छेलै। गांव जाय के पहिला बस खुली चुकलऽ छेलै। दोसरऽ बस खुलै में अभी देरी छेलै। समय काटै लेली हम्में टीसन के बाहर बला पक्की सड़कऽ पर एन्है टहली रहलऽ छेलियै। सड़कऽ के दोनो पफुटपाथ पर बांसऽ के खुट्टा गाड़ी क॑ आरो प्लास्टिक तानी क॑ कŮा॑ सिनी अस्थाई दोकान बनाय लेलऽ गेलऽ छेलै। टहलतें-टहलतें हमरऽ नजर अचानक बिसेसर पर पड़ी गेलऽ छेलै। वू एक टा छोटऽ रं पफुटपाथी होटल के सामने अपनऽ पहिया बला कुर्सी पर बैठी क॑ बीड़ी टानी रहलऽ छेलै। ओकरऽ पान के डाला होटल के एक कोना में रखलऽ छेलै। बांसऽ के खुट्टा पर एक टा छोटऽ रं साइन बोर्ड लटकलऽ छेलै। जेकरा पर लिखलऽ छेलै-‘अन्नपूर्णा भोजनालय।’ होटल के एक तरपफ एक टा बेंच आरो एक टा डेक्स रखलऽ छेलै गहकी क॑ बैठी क॑ खाना खाय लेली आरो चाय-पानी पीयै लेली।एक तरपफ कोयला केरऽ भट्टी जरी रहलऽ छेलै। ओकरे अगल-बगल में भात, दाल, तरकारी केरऽ बटलोही-कड़ाही, थरिया-गिलास-कटोरी रखलऽ छेलै। पुरानऽ मतुरकी सापफ-सुथ्थर सड़िया पिन्हलें लगभग पैंतीस-छŮास बरिस के गोरी-नारी एक टा जनानी कोयला के भट्टी पर चाह खौलाय रहलऽ छेली। इन्नर के परी त॑ नै तब॑ भरलऽ-पुरलऽ देह, आकर्षक नैन-नक्श वाली सुन्नर जनानी कहाबै के लायक।

हम्में टहलतें-टहलतें बिसेसर के सामने जाय क॑ खड़ा होय गेलऽ छेलियै। मुहों में भरलऽ बीड़ी के घुइयां क॑ नाकऽ आरो मुंहां सें बाहर करी क॑ ठठाय देने छेलै हमरा देखी क॑। हंसतें-हंसतें कहने छेलै-‘‘आय सुरूज भगमान कन्न॑ सें उगलऽ छै… सुदामा के देहरी पर किसन भगमान पčारने छऽत…..’’

‘की जे तों मजाक करै छऽ बिसेसर…कहां कृष्ण भगवान, कहां हम्में’ ‘दोकनदार लेली त॑ गहकिएनी भगमान होय छै….यह॑ रमुआ के माय….देखऽ साक्षात भगमान ऐलऽ छैन भगत के दुआरी पर…पूजा अरचना करऽ…परसाद चढ़ाबऽ…..भोग लगाबऽ….’ हंसतें-हंसतें बिसेसर चौरसियां कहने छेलै।
‘द॑…एक पैकेट पिफल्टर द॑…’

रूकियै नी मालिक पहिलें भगमान क॑ भोग लगतै तब॑ अगरबŮा जरैलऽ जैतै…’-कही क॑ बिसेसर पहिले रं ठठाय देने छेलै। आगू कहने छेलै-‘रमुआ

माय, मालिक क॑ इसपीसल चाह पिलाबऽ आरो बढ़ियका बला बिस्कुट खिलाबऽ।

कोयला के भट्टी पर जे जनानी चाय बनाय रहली छेली, ओकरा तरपफ इशारा करी क॑ बिसेसर हंसतें-हंसतें कहने छेलै-‘रमुआ के माय… अन्नपूर्णा देवी ….ई अन्नपूरना होटल के मालकीन।’’ ‘‘हम्में…रमुआ के माय…तों रमुआ के बाप नै…ई होटल के मालिक नै…’’तनी टा खिसियैली र॑ जनरजी बोलली छेली।

‘तां त॑ गोस्साय जाय छऽ रमुआ के माय….ई हौटल त॑ तोंही खोलने छऽ नी…..तोंही चलाय छऽ नी….अपनै बतैइयै मालिक हौटल के मालकिन हिनिये छेकीत कि हम्में…’

‘आबियै मालिक चाह पिबी लेलऽ जाय।’-डेक्स पर चाय के गिलास आरो बिस्कुट के प्लेट रखतें-रखतें रमुआ के माय हमरा सें कहने छेली। हम्में बेंच पर बैठी क॑ चाह के चुस्की लेना शुरू करी देने छेलां।

‘रमुआं की करै छौन बिसेसर?’-चाय के चुस्की लेंते-लेंतें हम्में एन्है पूछी देने छेलियै।

‘पफल-सब्जी बेचै छै मालिक…’ -कहतें-कहतें बिसेसर हाथऽ सें एक टा दोकान दिस इशारा करी देने छेलै। हम्में देखने छलियै-दोसरका पुफटपाथ पर तरकारी आरो पफलऽ के एक टा छोटऽ रं पफुटपाथी दोकान छेलै। एक टा साइन बोडो लटकलऽ छेलै-‘‘रामचरण प्रफुट भण्डार।’’
सब देखी क॑ हम्में घोर अचरज में पड़ी गेलऽ छेलां। एक टा छोटऽ-मोटऽ होटल, एक टा तरकारी, पफल-पफूल केरऽ छोटऽ-छोटऽ दोकान, तइयो बिसेसर एŮा॑ बड़ऽ खतरा उठाय क॑ पहिया बला कुर्सी चलाय क॑ पान-बीड़ी बेचै छै।

अन्नपूर्णा होटल, रामचरण प्रफूट भण्डार साथें एक टा बिसेसर पान भण्डार खुली जाय तब॑ केतना अच्छा होय जाय …तहूं अन्नपूर्ण होटल के बगल में एक टा पान दोकान कैहने नै खोली लै छऽ बिसेसर…’

‘अब॑ अपन्है समझैइयै मालिक। हमरऽ माय-बेटा के बात पर त॑ हिनी अनठियाय दै छऽत…हिनी त॑ डाला, कुर्सी लै क॑ निकली जाय छऽत…हमरऽ माय-बेटा के परान टंगलऽ रही जाय छै…कखनी कऽन गाड़ी-मोटरें čाक्का मारी देतै…चांपी देतै…कखनी की होय जैतै…’’-हमरऽ बात बिचै में काटी क॑

रमुआ माय कहने छेलै।

‘‘की तहूं गैलऽ गीत पफरू गाब॑ लगल्ह॑ रमुआ माय…होनी क॑ कोय नै टार॑ पारै छै…घरऽ में खटिया पर बैठले-बैठले आदमी सिनी के हाट पफेल होय जाय छै…’’-बिसेसरें कहने छेलै।

‘से त॑ होय छै बिसेसर….तब्ब॑ सावčान रहना त॑ जरूरी छै।’

‘से त॑ ठीक छै मालिक। मतुरकी हम्में ठहरलां सब दिन घूमै-पिफरैबला आदमी। एक जगह चुतड़िआय क॑ बैठै के आदत नै छ॑ हमरऽ। हम्में तेरह-चौदह बरिस के उमिर सें रेलऽ के डब्बा में घुरी-घुरी क॑ पान-बीड़ी बेचना शुरू करने छेलां। सुलतानगंज सें लै क॑ जमालपुर तांय रौन करै छेलां। भरलऽ जवानी में čाक्का खाय क॑ खुलतें टरेन सें गिरी पड़लां। दोनऽ गोड़ कटी गेलऽ…’-कहतें-कहतें बिसेसर के गला भरी गेलऽ छेलै।

‘की करभ॑ बिसेसर…भाग के बात…भाग में जे लिखलऽ रहै छै, वू त॑ होइये क॑ रहै छै नी।’-हम्में बिसेसर क॑ ढाढ़स बंčौल॑ छेलियै।
आंखी में आबी गेलऽ लोर क॑ कोय तरह सें सम्भारी क॑ बिसेसरें कहने छेलै-‘हम्में नचार, बेकार होय गेलऽ छेलां। हमरऽ जिनगी हमरे बोझा लग॑ लगलऽ छेलऽ। रमुआ माय दोसरा के घरऽ में वर्तन मांजै के, कपड़ा čाय के काम शुरू करी देने छेली। अपनै बतैइयै मालिक जवान होना, सुन्नर होना कोय पाप छिकै?

‘‘नै….कोय पाप नै….ई त॑ भगवान के कृपा होय छै जनानी सिनी पर।’’

‘रमुआ माय जब॑ दोसरा के घरऽ में काम करै लेली जाय छेली तखनी कोय हुन्कऽ हाथ पकड़ै छेलै कोय बांय। रमुआ माय गोस्सा सें, नपफरत सें भरलऽ घऽर आबी क॑ हमरा बताबै छेली। हम्में गोस्सा सें भितरे-भीतर खौलै छेलां। कुछु कर॑ नै पारै छेलां। एक त॑ विकलांग उप्पर सें घोर दरिद्दर…की कर॑ पारै छै…’’ कही क॑ बिसेसर बड़ी तेज नजर सें देखने छेलै। जेनाकि हमरा सें पूछी रहलऽ छेलै प्रश्न के उŮार। हम्में की

उŮार देतियै। चुप रही गेलऽ छेलां।

बिसेसरें पफनु कहने छेलै-‘आरो एक दिन की होलऽ छेलै जानै छियै मालिक…एक दिन रमुआ माय कानतें सुबकतें कहने छेली जे वू अब॑ नवल बाबू कन काम करै लेली नै जैती…नवल बाबूं ओकरऽ इज्जत पर हाथ रक्खी देने छेलै।

हम्में हय बात सुनी क॑ अचम्भा में पड़ी गेलऽ छेलियै। पूछने छेलियै-‘इज्जत पर हाथ?’
‘माने कि छाती पर हाथ čारी देने छेलै। तखनिये हम्में पफैसला करी लेंल॑ छेलियै आरो रमुआ माय सें कहने छेलियै-अब्ब॑ तोरा काम पर नै जाना छौं। ’ एकरऽ बाद तों की करल्ह॑?’

चुŮार घसकैंलें-घसकैलें भोला बाबा के शरण में चल्लऽ गेलां। माने कि चौक पर जे भोला बाबा के बड़का मंदिर बनलऽ छै वहीं जाय क॑ अपनऽ पफटलऽ-पुरानऽ गमछी आगू में बिछाय क॑ भीख मांगै लेली बैठी गेलऽ छेलां। भिखमंगा त॑ बनी गेलऽ छेलां मालिक मतुरकी माथऽ čारती में गड़ी गेलऽ छेलऽ लाजऽ सें। दिन भर मुड़ी नबाय क॑ बैठला के बाद सांझ क॑ गमछी समेटी क॑ घऽर आबी गेलऽ छेलां। गमछी रमुआ माय क॑ दै देने छेलां। यह॑ हमरऽ काम होय गेलऽ छेलऽ।’’
‘‘एकरऽ बाद?’’

‘एक महीना तांय यह॑ रं चललऽ। एक दिन रमुआ माय हमरा हाथऽ पर साठ टका के रेजगारी रखी देने छेली। खाय पियै के खर्चा सें काटी-कपची क॑ बचैने छेली…अनपुरना छिकी न ई। ओकरै सें हम्में ई टुटलऽ-भांगलऽ पहिया वला कुर्सी किनलां कबाड़ी के दोकान सें। पानऽ के डाला गला में लटकाय क॑ पहिया बला कुर्सी पर घुर॑-पिफर॑ लगलां। हम्में कमाब॑ लगलां। अनपूरना बचाब॑ लगली। अनपूरना हौटल खुली गेलै। रमुआ बड़ऽ होलै। रामचरन प्रफूट भण्डार खुली गेलै। हम्में वह॑ रं सड़कऽ पर घूमतै रहलां।’’
-‘‘यह॑ लेली त॑ कहै छिहौं बिसेसर अन्नपूर्णा होटल के बगल में बिसेसर पान भण्डार खोली क॑ बैठी जा।’’

‘‘हम्में कहलिहौं नी मालिक एक जगह चुतड़ियाय क॑ बैठना हमरऽ आदत नै छै। हम्में छेलां हरदम चलतें-पिफरतें रहै बला, दस लोगऽ सें बोलै -बतियाबै बला, हंसी-दिल्लगी करै बला आदमी। मतुरकी आव॑ हम्में लोथ होय गेलऽ छी। दोसरा के चलतें-पिफरतें देखी क॑ मऽन ललचाय जाय छ॑ चलै-पिफरै लेली। ’’-कहतें-कहतें बिसेसर के गला पफेनु भारी होय गेलऽ छेलै। बोली कंठऽ में अटक॑ लगलऽ छेलै-‘एक जगह बैठला सें दुख के दिन, दुर्दिन याद आव॑ लगै छै मालिक। खास करी क॑ ई बात याद आब॑ लगै छै मालिक जे तखनी रमुआ माय अपनऽ इज्जत केना क॑ बचैने छेली, ई बात

हुनिये जानै छऽत नै त॑ भगमानै जानै छऽत। एक बात आरो मालिक…। विकलांग के सबसें बड़ऽ दुख ओकरऽ विकलांगता होय छै। गरीबी, भुखमरी सें भी बढ़ी क॑। विकलांग दू-तीन दिन भुखलऽ त॑ रह॑ पारै छै मतुरकी अपनऽ विकलांगता क॑ भुलाब॑ नै पारै छै। जखनी हम्में चुपचाप एक जगह बैठी जाय छी तखनी घुरी-पिफरी क॑ हमरऽ दिल, दिमाग नजर हमरऽ दोनऽ कटलऽ गोड़ऽ पर टिकी जाय छै। पहिया बला ई कुर्सी पर चली पिफरी क॑, पान खैनी बेची क॑ आदमी सिनी सें हंसी-दिल्लगी करीक॑, बात-बात पर मतलब-बे मतलब ठहाका लगाय क॑ थोड़े देर लेली हम्में ई बात क॑ भुली जाय छी कि हमरऽ दोनऽ गोड़ कटलऽ छै। यह॑ लेली हम्मे चक्का बला कुर्सी पर घुरै छी नै त॑ खाना त॑ हमरा अनपूरना हौटलें बैठले-बैठले खिलाब॑ पारै छै।’’-कहतें-कहतें बिसेसर मन झमान होय गेलऽ छेलै। तखनी हमरा एक टा एकदम अलगे विसेसर नजर आबी रहलऽ छेलै जे बिसेसर क॑ हम्में कहियऽ नै देखने छेलियै। बात-बात में पफैकड़ा पढ़ैवला, ठहाका लगावै बला, आदमी सिनी से हंसी दिल्लगी करै बला बिसेसर ई नै छेलै। ई छेलै दुख, नचारी, लोर सें भरलऽ बिसेसर। बिना मुखौटा बला एक अपाहिज, ऐबाहा बिसेसर।

बिसेसर अपनऽ मुंह दोसरा देने घुमाय लेने छेलै। शायद आंखी सें टपकै बला लोर वू हमरा देखाबै लेली नै चाहै छेलै। तखनी हमरा लगलऽ छेलै कि जदि हम्में ई मुखौटाहीन बिसेसर के सामने आरो खड़ा रहबै त॑ कानी देबै। आंखी में लोर सम्हार॑ नै पारबै। हम्में कहने छेलियै-‘एक पैकेट पिफल्टर दे विसेसर…हमरऽ बस खुलै के टैम होय गेलऽ छ॑।’

बिसेसर मुंह दोसरा दने घुमैल्हैं पैकेट हमरा हाथऽ में पकड़ाय देने छेलै। कुछु बोललऽ नै छेलै। मतुरकी खूब जोर सें नाक सुड़कने छेलै। हम्में एक टा पचास टकिया ओकरऽ गोदी में पफेंकी क॑ चुपचाप चली देने छेलियै।

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