बड़ी दूर भागलपुर | अंगिका कहानी | Angika Story | राकेश पाठक

बड़ी दूर भागलपुर | अंगिका कहानी | राकेश पाठक
badi door bhagalpur  | Angika Story | Rakesh Pathak

सनिच्चर दिन छेलै। रात के आठ-सवा आठ बजी रहलऽ छेलै। हिन्दी शिक्षक नागेंद्र पाठक अपनऽ एक कोठरी आरो कोठरियै सें लगलऽ भंसा घऽर बला भाड़ा के डेरा में बैठलऽ छेलै। दसमा किलास के एक टा विद्यार्थी टिसन पढ़ी क॑ अभी तुरन्ते गेलऽ छेलै। टी.बी. के ई-बिहार चैनल पर ‘फोल्क जलवा’ कार्यक्रम चली रहलऽ छेलै। असल में नागेंद्र जी के अपनऽ टी.वी. त॑ चार-पाँच महीना पहिलैं बिकी गेलऽ छेलै- पेटऽ के भूख मेटाबै लेली। बारह हजार के बड़का रंगीन टी.वी. सेट अन्न के अभाव में माटी के मोल मात्रा तीन हजार टका में बेची दैल॑ पड़लऽ छेलै। बेसी दिनकऽ नै मात्रा एक-डेढ़ बरिस के पुरानऽ छेलै। आदमी, आदमी केरऽ दुख कहाँ देखै छै। मजबूरी कहाँ समझै छै। खाली अपनऽ सुभिता देखै छै। अपनऽ लाभ देखै छै। टी.बी. कीनै वलां ई नै देखलकै कि चलै-पिफरै सें नचार, पक्षाघात सें पीड़ित मास्टर नागेंद्र पाठक भूख सें बिलखतें अपनऽ कनियांय आरो बेटा क॑ नै देख॑ पारी क॑ टी.वी. बेचै लेली मजबूर होय गेलऽ छेलऽ।

नागेन्द्र जी के बगल के कोठरी में मुजफ्रपफरपुर के कैलाश बाबू रहै छेलै अपनऽ परिवारऽ साथें। गौहाटी के पल्टन बजार में पफल-पफूल के छोटऽ रं दोकान चलाबै छेलै। बड्डी भलऽ आदमी। नागेंद्र जी केरऽ बोलचाल के भाषा अंगिका छेलै। अंगिका जनपद के बांका जिला के रहै बला छेलात मतुर कि हुन्कऽ घरऽ के अगल-बगल उŮार प्रदेश के गाजीपुर, बलिया जिला केरऽ ढेर सिनी मातवर भूमिहारऽ केरऽ घऽर छेलै। वह॑ सिनी के बीच हुनी पललऽ, बढ़लऽ छेलात। एक तरह सें नागेंद्र जी के मातृभाषा अंगिका के साथ-साथ भोजपुरियो होय गेलऽ छेलै। मुजफ्रपफरपुर निवासी कैलाश बाबू संगे भोजपुरियै में बतियाबै छेलात। कैलाश बाबूं समझी गेलऽ छेलात कि मास्टरजी भोजपुरी गीतऽ के रसिक छऽत। सेहे हुनी अपनऽ भंसिया आरो बेटा सें कही देने छेलै कि ई टी बी. पर जखनी पफोलक जलवा के कार्यŘम चलै तखनी टी.वी. के अवाज बढ़ाय दैं ताकि मास्टर साहेब अपनऽ कोठरियै में बैठलऽ-बैठलऽ पफोल्क जलबा में बजै वाला भोजपुरी गीतऽ के रस लिय॑ पार॑। सेहे कैलाश बाबू के टी.वी. चली रहलऽ छेलै। मास्टर जी खटिया पर बैठलऽ-बैठलऽ भोजपुरी गीत के आनन्द ल॑ रहलऽ छेलात। हुनकऽ भंसियां पठकायन जी भंसा घरऽ के दुआरी पर बैठी क॑ रसून छिली रहली छेली।

दू टा नै तीन टा भोजपुरी गीत खतम होला के बाद भोजपुरी के प्रसिź गायिका मालिनी सिंहें अंगिका के एक टा ऐसनऽ गीत गाब॑ लगली छेली जे गीतऽ के बोल आरो भाव बचपनै सें मास्टर जी के खाली मनेप्राण में नै बल्कि रोइंयां-रोइंयां में रची-बसी गेलऽ छेलै। बचपन सें क॑ बेर ई गीत सुनने छेलै। मतुरकी हुन्कऽ मऽन नै अघैलऽ छेलै। बार-बार सुनै के मऽन करै छेलै। कारण ई छेलै कि वू गीतऽ में हुन्कऽ पुरनका जिला के नाम भागलपुरो छेलै। हुन्कऽ सबसें अत्यंत प्रिय शब्द ‘भागलपुर’।

टी.वी. पर मालिनी सिन्हां गाबी रहलऽ छेली-‘‘पिया हो मत करऽ दूर, परवल बेच॑ जैबै भागलपुर….. परवल बेची क॑ झुमका लेबै, हंसुली गढ़ैबै जरूर….पिया हो मत करऽ दूर….’’-हुन्न॑ मालिनी सिन्हा गावी रहलऽ छेली हिन्न॑ मास्टर जी गीत के ताल पर मुड़ी डोलाय-डोलाय गीत के रस-आनन्द ल॑ रहलऽ छेलात। पठकायन क॑ गीत गौनय सें कोय विशेष लगाव नै छेलै। हुनी एक मनऽ सें रसून छिली रहली छेली।
मालिनी सिंहा गैलें जाय रहलऽ छेली-‘पिया हो मत करऽ दूर…. भागलपुर…..’’

अचानक मास्टर जी के कपसै के आवाज सुनी क॑ पठकायन जी हैरान-परेशान होय गेली-हे गे माय की होय गेलै …अखनी त॑ मास्टर जी मुड़ी हिलाय-हिलाय क॑ गाना सुनी रहलऽ छेलै, अखनिये की होय गेलै जे मास्टर जी है रं कपस॑-कान॑ लागलै। ’’ पठकायन घबड़ाय गेली छेली मास्टर जी के अचानक कानतें-कपसतें देखी-सुनी क॑। घबरावै के असल कारण ई छेलै कि पक्षाघात सें पीड़ित होय क॑ इलाज लेली महीना भर नर्सिंग होम में भर्ती रहला के बाद मास्टर जी जखनी डिसचार्ज होलऽ छेलै तखनी नर्स सें लै क॑ डाक्टर समेत सभ्भैं पठकायन क॑ समझैने छेलै कि मास्टर जी क॑ कोनऽ तरह के टेंशन नै होव॑ दिहऽ….टेंशन होला सें स्ट्रॉक होबै के डऽर छै….अबरी स्ट्रॉक होला सें मास्टर जी क॑ बचाना मोसकिल होय जैतै।

टेंशन त॑ डेग-डेग पर छेलै। मास्टर जी अपनऽ आमदनी सें काटी-कपची क॑ जे कुछ बैंकऽ में जमा करने छेलै सब इलाज में खतम होय गेलऽ छेलै। उपर सें माय-बाप के तरपफ सें सिन्नुरदान घरियां पठकायन क॑ जे दू-चार टा सोना के गहना मिललऽ छेलै सेहो बिकी गेलऽ छेलै। प्राइवेट इस्कूल के नौकरी त॑ छुटिये गेलऽ छेलै साथे-साथ इस्कूल के विद्यार्थी सिनी वला

टियूशनऽ छूटी गेलऽ छेलै। इस्कूल में नागेंद्रजी के जगह जे दोसरऽ मास्टर रखलऽ गेलऽ छेलै, विद्यार्थी सिनी ओकरै सें टियूशन पढ॑ लगलऽ छेलै।

मास्टर जी कपसी रहलऽ छेलै। दोनों आंखी सें टप-टप लोर चूबी रहलऽ छेलै, पठकायन हुन्कऽ माथा हंसोती-हंसोती कही रहलऽ छेली ‘‘चुप होय जा गुड्डु के पपा… की होल्हौं हय रंग कैहने कानी रहलऽ छियै…’

पठकायन अपनऽ पति क॑ चुप त॑ कराय रहली छेली मतुर कि हुन्कऽ दोनो आंख डबडबाय गेलऽ छेलै। हुन्न॑ टी.बी. पर गीतऽ के अंतिम कड़ी चली रहलऽ छेलै-‘‘…जैबै भागलपुर… भागलपुर…. भागलपुर….’’ गीतऽ के अंतिम कड़ी खतम होला के साथे-साथ मास्टर जी के कन्नाहट के आवेगो शांत होय गेलै। दोनों गाल लोर सें भीजी गेलऽ छेलै। अपनऽ अंचरा सें मास्टर जी केरऽ दोनो गाल पोछतें हुअें पठकायनें पूछने छेली-‘‘अपने गीत सुनतें-सुनतें अचानक है रं कैहने कान॑ लगलऽ छेलियै जी?’’

कन्नाहट भरलऽ अवाज में मास्टर जी कहने छेलै ‘‘ई गीत सुनी क॑ भागलपुर के, विनोद दादा के, रूक्मी भौजी के, आमोद भैया के बड़ी याद आबी गेलऽ…..’’

‘जनम सें जुड़लऽ जग्घऽ के आदमी सिनी के याद त॑ आबिये जाय छै नी। आदमी पूरा तरह सें कहां भुलाब॑ पारै छै।’’
‘‘गुड्डु के माय….जर-जमीन, जिला-जवार सें उखड़ले आदमी बताब॑ पारै छै अपनऽ जर-जमीन सें उखड़ै केरऽ दुख, अपनऽ जिला-जवार सें बिछुड़ै के दुख।
‘‘से त॑ छै। ’’

‘ई गीत हमरऽ सबसें प्रिय गीत छेकै…..बचपन सें सुनतें ऐलऽ छी। ई गीत में हमरऽ जिला के नाम छै। भागलपुर के नाम सुनथैं बहादुरपुर उच्च विद्यालय जहां सें हम्में मैटि्रक पास करने छी… बरारी रोडऽ के डी.भी.सी. कॉलोनी जहां हम्में विनोद दादा, आमोद भैया के साथें रहै छेलंऽ, तिलका मांझी चौक जहां अंगिका के वीर जोźा तिलका मांझी के करिया पत्थर सें बनलऽ भव्य मूर्ति छेलै, भीखनपुर, सूजागंज, खलीपफाबाग चौक आंखी के सामने नाच॑ लागलऽ छेलऽ….अखनियों नाची रहलऽ छ॑। अपनऽ गाम,अपनऽ जिला के नाम सुनथैं आदमी पता नै कैहने एŮा॑ भावुक होय जाय छै कि भावना पर काबू पाना कठिन होय जाय छै। आंख अपनै आप बह॑ लगै छै।’’

‘‘अच्छा ई सब बात छोड़ियै….बेसी याद करबै त॑ पफेरू अपने कान॑ लगबै। नौ बजी गेलऽ छै, नूनू के आबै के टैम होय गेलऽ छै। बेचारा सबेरे साते बजे मुंहऽ में दू कोर पनिहौतऽ दै क॑ घरऽ सें बहरैलऽ छै। कॉलेज खतम होला के बाद कम्पूटर के दोकानऽ पर डिपटी दै ल॑ पड़ै छै।

की बनैभ॑ आय त॑ पफीस मिलै बला बात छेलै। मतुरकी बच्चा सिनी पफीस नै आनलकै….घरऽ में चावरो त॑ नै होथौं। ’’
‘‘काल्हकऽ दोकानी सें आनलऽ आčा सेर चॉर बचलऽ छै। आčा टा पियाज छै। चार दाना लहसून छै। मरचाय क॑ गुंडी क॑ माड़ के चटकदार झोर बनाय देबै। अपने के बेटां खाय लेथौं…चिंता नै करियै। ‘तों जे उचित समझऽ से करऽ। ’’

पठकायन जी भात आरो मांड़ के चटकारऽ झोर बनाबै लेली भंसा घरऽ में चल्ली गेली। हिन्न॑ मास्टर जी पफरू भागलपुर के बात सोच॑ लगलऽ छेलात-‘भागलपुर जे कहियो हमरऽ घऽर दूआर छेलऽ से आय हमरा सें बड़ी दूर होय गेलऽ छ॑…कहां गौहाटी कहां भागलपुर। ओना त॑ देखलऽ जाय त॑ ई तेज सें तेज चलै बला रेल, मोटर, गाड़ी के जमाना में गौहाटी सें भागलपुर कोय बड़ी दूर नै छै। आज दिन में एक बजे गौहाटी में ट्रेन पर बैठऽ काल सबेरे के आठ बजतें-बजतें भागलपुर टीसण पर उतरी जा। मतुरकी हमरा जैसनऽ एकदम लोथ आदमी क॑ ट्रेन पर चढ़ना-उतरना त॑ भारी कठिन बात छै। पता नै गाड़ी केतना नम्बर प्लेटपफोरम पर लग॑? एक प्लेटपफारम सें दोसरऽ प्लेटपफारम पर टांगी क॑ लै जाय लेली चार टा आदमी के जरूरत। हंऽ ई होव॑ पारै छै कि टैक्सी-गाड़ी रिजपफ करी क॑ गौहाटी सें भागलपुर जाब॑ पारलऽ जाय। गौहाटी में तीन-चार आदमी उठाय क॑ गाड़ी में बैठाय दै आरो भागलपुर में तीन-चार आदमी मिली क॑ रिजपफ गाड़ी सें उतारी लै। मतुर की हमरा जैसनऽ कंगाल रिजपफ गाड़ी केरऽ भाड़ा कहां सें जुटाब॑ पारतऽ…..हे भगवान कोय गरीब-कंगाल क॑ विकलांग नै बनैहऽ या त॑ गरीब बनाबऽ या पफरू विकलांग…दोनो एक साथ नै बनाबऽ…’’यह॑ सब सोचतें -सोचतें मास्टर पफरू भावुक होय गेलऽ छेलऽ। आंखी सें दू बूंद लोर टपकी गेलऽ छेलै। बुदबुदाब॑ लगलऽ छेलऽ भागलपुर बड़ी दूर होय गेलऽ छ॑ हमरा लेली।

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