टितभांति रो फूल | अंगिका कहानी | Angika Story

टितभांति रो फूल | अंगिका कहानी | सुजाता कुमारी
Titbhanti Ro Phool | Angika Story | Sujata Kumari

अधिकतर लोगऽ क॑ देखय छियै प्यार करै लेली गुलाबऽ रो फूलऽ क॑ महत्व दै छै मतरकि हमरऽ प्यारो अजब आरू इजहार करै रो बिधियो गजब ! हमरा वू दिन आय भी खुब्बे बढ़ियां सं॑ खियाल छै । फगुआ नगीच आबी गेलऽ छेलयै । यह॑ कोनो चार-पांच रोज बचलऽ होतै । कहै छै नी कि “फागुन मं॑ बुढ़वो जुवान होय जाय छै “, जे जुवान छै त॑ ओकरो त॑ बाते की…………..। मऽन हरदम्में गुलाबी रंगो सं॑ रांगलो ! दीदी रो दियोर छेलै फागुनियैलो मिजाज……होइये जाय छै भैया रो ससुरारी मं॑ आबी क॑, सेह॑ त॑ होलै । हमरौ आँखि क॑ त॑ उनकऽ आबै रो असरा  छेलै । करीब तीन बजतं॑ होतै, हुनी ऐलै आरू हमरा एकटक्के नजरऽ सं॑ निहार॑ लगलै । हुनको हय ढंग्गऽ सं॑ देखबऽ, एकदम्मे टकटकियेलऽ……… हम्मं॑ ढेर देरी तलक सह॑ नय सकलियै । हमरऽ नजर खुद्दे झुकी गेलय, मतरकि हम्मूं तं॑ उनका मऽन भरि क॑ नय देख॑ पारलिऐ, सेहे झठ आपनऽ नजर क॑ थेथरऽ बनी क॑ उनका प॑ टिकाय देलियै । बस……..फिरू त॑ हुनी हमरऽ हाथ पकड़ी लेलकै आरू कस्सी क॑ दाबी देलकै । जेना लागलै कि प्रीत रो जबरदस्त—-दस्तक होलै ।

कहै छै नी कि प्रीत रो परिभाखा चुप्पी या मौन होय छै, मतरकि सौंसे अंगों क॑ झंकारी जाय छै; जेना कत्त॑ डंका जौरे बाजलऽ रह॑ कानों मं॑ ढन…नननन । जेकरा झंकारऽ सं॑ सौंसे अंगऽ मं॑ सनसनी बिछुआ रो बिख नाकि सौंसे अंग-अंग मं॑ रेंग॑ लागलै । पक्का वह॑ होलै हमरा साथैं पक्का बिछुआ रो बिख…उनकऽ रौबीला अंग बदन, “टितभांति रो फूल नाकि भिनी -भिनी खुशबू बिखरलऽ .…..मुखड़ा चुल त॑ हुनी सीधा-साधा संस्कारी नाकि झलकै छेलै जे आरू मन- मोहना बनी गेलऽ छेलै । हस्सय छेलय त॑ लागै जेना उजरऽ मोती रो हार भीतरी मुँहों मं॑ सेट करल॑ छै । जखनि बोलै आरू चुप  हो जाय त॑ लगै कि झिलमीलिया उजरऽ–उजरऽ बत्ती जरी रहलऽ छै । सब्भै सं॑ बढ़ियां आरू मोहै वाला बात त॑ उनकऽ हाजिरजवाबी, पक्का ‘ कबीर’ नाकि कोय एक्को टा लाइन जे काट॑ पार॑ हुनकऽ बातऽ रो । भला अतना गुनऽ रो खजाना साथें चलवैया साथें के अभागली होतै जे साथें रहै ल॑ नय सोचतै ।

          नजरऽ सं॑ नजरऽ मं॑ इशारा होलै । दुनू कन्हौं घुमै रो मोन पक्का करलियै । कन्न॑ जैबऽ बिचारतं॑-बिचारतं॑ पाँच बजी गेलै । समय अपनऽ चालऽ स॑ सब्भै क॑ ठेल्लऽ भागलऽ जाय रहलऽ छेलै । हमरा तुरंते टिल्हा कोठी (रविन्द्र भवन) रो खियाल पड़ी गेलै । टिल्हा कोठी हमरऽ घरऽ सं॑ नगिचे रहै । हुनिहौं हाँमि भरी देलकै-–- । घुमै रो इच्छा लेलं॑ चललंऽ दूनू सड़कऽ रो दोनों छोर पकड़लंऽ । डरो लागै जेना लागै कि राही मुसाफिर,चिड़िया चुनमुन सब्भैं हमरै देखय छै । लागै जेना केकरो सम्पत्ति चोराय रहली छियै । मनो मं॑ डऽर त॑ छेलै मतरकि रग्गो ओतने बढ़लऽ । कहै छै, “प्रीतऽ मं॑ लाख गुना रग बढ़ी जाय छै ” सेह॑ होलै…..चल्ले गेलियै ।

भागलपुर बिश्वविद्धालय केरऽ बीचों-बीच उच्चऽ टिल्हा जेकरऽ अखनकऽ नाम रविन्द्र भवन छेकै, मतरकि हम्मं॑ सिनी अखनियो तिलहे कोठी कहै छियै । ऊपर जाय लेली दू रास्ता छै । एक दिस सीढ़ी बनलऽ छै आरू पूर्व दिसां मं॑ ढलवां सड़क जे आधो ढ़लाय छै आरू आधऽ असही सुरकी बिछैलऽ ।  सीढ़ी दन्न॑ ढेरी लोग छेलै, बड़ऽ–बूढऽ, जुवान -बच्चा,जनानी मरद,सब्भे छेलै ।  दलुवा दन्न॑ एक्के टा लोग आवै जाय रहलऽ छेलै । हम्मं॑ दुनू ढ़लुवां सड़की दिस सं॑ चढ़॑ लगलियै । हुनहि हमरऽ हाथ पकड़ी लेलकै, हमरौ अच्छा लगै मतरकि डरो लागै कि कोय देखि नय लिअ॑ । तहिय्यो तखनी बहादुरी रो इनाम जे लेना रहै । अपने आप सं॑ ताकत त॑ आविये गेलै एक दू टा मिट्ठऽ–मिट्ठऽ गप करलियै । खनु वहाँ दले चढ़ियै खनु उतरियै । मौसमौं त॑ साथ द॑ रहलऽ छेलै, नय जादे गरमी नय जादे ठंडी ।   सुरजो दिन भर के कामऽ सं॑ हरसान होय गेलऽ छेलै । हैय हम्मं॑ ओकरऽ ताबऽ सं॑ पकड़लियै । तनटा दुरी प॑ गंगा जी बही रहलऽ छेलै जेकरऽ लहरऽ सं॑ उठलऽ बियारो शहरो दिस आबै ल॑ बौखलऽ छेलै ओहो धड़फड़ैलऽ मं॑ हमरा दुनू सं॑ टकराय -टकराय क॑ चूर- चूर होलऽ जाय रहलऽ छेलै । हम्मूं दुनू आनन्द रस मं॑ डुबलऽ …..मतलऽ…..बिभोर छेलां ।

भाव रोमनी, मऽन गुलाबी मतरकि संयमित । चढ़तं॑-उतरतं॑ तीन चार……….गिन॑ नय सकलियै याकि गिनती भूली गेलियै अखनी दिमागों मं॑ कुछुओ नय आवै छै । यह॑ खियाल छै कि सड़की रो आढ़ी-आढ़ी मं॑ बड़ऽ छोटऽ गाछ ,घास -पात, जंगल झार , काँटऽ-कूसो नाय जानिओ कत्त॑ रंगऽ रो गाछ बिरिछ होतय् ओखरैं मं॑ एकठो गाछ छोटो मतरकि ओकरा मं॑ छोटऽ- छोटऽ उजरऽ–उजरऽ ,भिनी-भिनी खुशबू  बिखरैलऽ फगुनाहट रो बियारी सं॑ मातलऽ हय खुशबूदार छोटका फूल त॑ आरू घावऽ मं॑ निम्मक लगाय रहलऽ छेलै । अचोके हमरऽ हाथ फूलऽ दिस गेलय । कुच्छू देरी मं॑ चार ,पांच…………..डार तोरी लेलियै । एकठो गुच्छा बनी गेलै । हम्मं॑ उनका  सौगात रूपऽ मं॑ देलियै । “अरे बाह हय त॑ टितभांति रो फूल छेकै, अत्त॑ बढ़ियां हुऐ छै हम्म॑ आय जानलियै । हमरा त॑ यें मदाय देलखौं ।” कहै भर के देरी छेलै कि कखनी हमरा पंजियाय लेलकै जान्है नय पारलिऐ ।

हाय रे दैवा है की होलै, बड़का बाबू रो बड़का बेटा जानो हमरो बड़का भैया हमरा दुनू  क॑ खोजल॑-खोजल॑ आबी रहलऽ छेलै । जरूर भौजी कहल॑ होतै, वहीं बाड़ी सं॑ देखल॑ छेलै । हमरा त॑ काटो त॑ खून नय,अब॑ की करियै वहीं स॑ दुनू दू दिस लुकी लुकी डेरा मं॑ डरलऽ–डरलऽ घऽर घुसलियै । साँझ दियै रो काम हमरे छेलै । जेन्हैं गोसांय घरऽ मं॑ लुत्ती बरलै, भौजी जहो कल॑-कल॑ बोली रहलऽ छेलै सेहो उनकऽ अबाज जोरऽ–जोरऽ सं॑ हुअ॑ लगलै । कान॑ लगलियै । भौजी मसल्ला पीसी रहली छेलै  आरू भैय्या क॑ बोलली जाय छेलै, “ बड्डी बढ़ियां हमरऽ बहिन,पढ़ली लिखली छै, गयान रो बात करै छै,सुसुरमुही, मुँह कथी ल॑ कारऽ करल॑ फिरै छै ! ऊह दादा, गाँवऽ रो मड्ड छेलै देखो नी केना क॑ मड़ड़ो रो पगड़ी उतारै छौं वही बिधोतमा (विद्द्योतम) ! आरू पढ़ाबऽ एम. ए. बीए पास ,लिये दिये साफ !” “ चुप रहऽ ।” हैय भैय्या रो अबाज छेलै । हमरा दम्मऽ मं॑ दम ऐलै ।

देर रात बाबूजी आरू भैय्या दोनो फुसुर फुसुर की बतियैलकै दैवे जान॑ । हम्मं॑ देखलिये भैय्या न॑ इनको बाबूजी क॑ फोन करलकै । दीदी साथ॑ इनकऽ बाबूजी भी ऐलै । दोनो समधी बैठी क॑ सजा रो फरमान जारी करलकै । दोनो क॑ सजा सुनैलऽ जाय । आखिर हमरो दोनो समधी रो मऽन मरजाद छै कि नय । सजा सुनैलऽ गेलै- दोनो क॑ आजीवन कारावास एक साथ जीना-मरना । बैसाखऽ म॑ ढ़ोल बजतै । ऐ ! भौजी ख़ुशी सं॑ उछली गेलै । एँगनऽ मं॑ फुदकी -फुदकी खनु हिन्न॑ जाय खनु हुन्न॑, जेना लगै बौराय गेली रह॑ । बैसाखऽ मं॑ ढोल बजतै भौजी ख़ुशी स॑ कुद॑ लागलै । भौजी रो हैय चरित्र देखि क॑ हम्म॑ अचरजऽ मं॑ पड़ी गेलिऐ । काल पगड़ी उछलै छेलै !आय ढ़ोलो बज॑ लगलै ।भौजी फुदकी फुदकी क॑ धोती रंगलकै, टुह- टुह .…गुलाबी । फगुआ आवै सं॑ पहिलै फगुआ होय गेलै ।

            टिल्हा कोठी हम्म॑ दुनू अखनियो जाय छियै । अब॑ अलग -अलग नय साथं॑–साथं॑ । टितभांति रो फूल आजो हमरऽ स्वागत मं॑ बिछलऽ रहै छै । टितभांति के फूल देखि क॑ खियाल जागी जाय छै । रोजे हुनका सौगात दै छियै । हूनीहो हमरा टितभांति के फूल तोड़ी क॑ थमाय दै छै । आरू कहै छै, “रे टितभांति रो फूल तोहीं त॑ हमरऽ असली प्रीत रो प्रतीक छें…… असली गवाह…..तोहीं त॑ हमरो प्रीत कथा जानै छैं….. रे टितभांति रो फूल हम्म॑ तोरा त॑ प्रीत रो इजहार बनैल॑ छियौ….पहला प्रेम त॑ हम्मं॑ तोहरे सामने करल॑ छियो, तोहीं ..हाँ ! तोहीं त॑ हमरऽ अनमोल हीरा । रे टितभांति रो फूल हमरऽ प्रीत भी पक्का टितभांति रो करुआपनऽ लेलऽ उजरऽ -उजरऽ  फूलऽ मं॑ भीनी-भीनी खुशबू लेलऽ श्याम रंग खूबसूरती लेलऽ हमरो प्रीत ! हमरो सच्चा प्रीत …………….”टितभांति रो फूल” “।

                        ( सुजाता कुमारी, सराय, भागलपुर-7870967698)

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