चनवतिया फूआ | अंगिका कहानी | Angika Story | राकेश पाठक

चनवतिया फूआ | अंगिका कहानी | राकेश पाठक
Chanvatiya Phooaa | Angika Story | Rakesh Pathak

            इनरदेव मालिक मान॑ कि गामऽ केरऽ पचास-साठ बीघा के जोतदार बाबू इंद्रदेव नारायण सिंहऽ के चारो बेटा म॑ स॑ माय के पेटपोछना बेटा रजिनरा मानं॑ कि राजेन्द्र सिंह पढै़ लिखै म॑ बड़ी तेज छेलै । पहिला-दोसरा किलास स॑ खाली मैट्रिके नै इ.ए.बी.ए. ताँय फस्टे करन॑ छेलै । कहियो सेकेंड-थर्ड नै ऐलऽ छेलै। ओकरा बी.ए. पास करत॑ नै करैत॑ बड़का तीनों बेटा आरू पुतौहू म॑ जे महाभारत मचलै कि बॅंटवारा होइये क॑ रूकलै। माय-बाप लेली दस बीघा निकाली क॑ जे बचलै, चारो बेटा म॑ बटी गेलै । पेटपोछना बेटा पर माय के बेसी ममता छेलै । माय के दृढ प्रतिज्ञा- “हम्मं॑ रहबऽ त॑ छोटका नुनुआँ दन्नं॑ ।” सेहे रजिनरा बूढ़ा-बूढ़ी क॑ ल॑ क॑ सरबन कुमार बनी गेलऽ। हिस्सा मं॑ मिललऽ खेत-खरिहान, बाग-बगैचा देख॑ लगलऽ । देखत॑-देखत॑ चार साल बीती गेलै । यह॑ बीचऽ मं॑ चार-चार टा बच्चा-बुतरू के बापऽ बनी गेलऽ छेलै । खेती स॑ गुजर-बसर जब॑ संभव नै हुअ॑ लगलै तब॑ गोहाटी मं॑ एक टा मारवाड़ी सेठऽ कन मुनीमी करै वला अपनऽ दोस्तऽ के सिफारिस प॑ वह॑ सेठऽ कन मुनीमी कर॑ लगलऽ छेलै।

            नौकरी करतं॑ साल भर स॑ उपर होय गेलऽ छेलै मतुरकि रजिनरा केरऽ मऽन गोहाटी मं॑ नै बैठलऽ छेलै। मैट्रिक पास त॑ अपनऽ जनम भूमि सं॑ एत्त॑ दूर कहियऽ गेलऽ नै छेलै । मैट्रिक तलक त॑ गामे केरऽ इसकूल मं॑ पढ़न॑ छेलै । मैट्रिक पास करी क॑ बड़ी दूर गेलऽ रहै त॑ सुलतानगंज मुरारका कौलेज मं॑ पढ़ै लेली । वोहो जाड़ा गर्मी केरऽ छुट्टी म॑ घोरे चल्लऽ आबै छेलै ।

            गोहाटी में रजिनरा केरऽ मऽन नै बैठै केरऽ दोसरऽ कारन छेलै अपनऽ लोगऽ के अभाव। अपनऽ भासा अंगिका बोलै बतियावै बला कोय अपनऽ नै छेलै। गोहाटी मं॑ दरभंगा – मिथिलांचल, समस्तीपुर – वैशाली-मुजफ्फपुर, आरा, छपरा आरनी जिला के लोग भरलऽ छै मतुरकि भागलपुर जिला आरो अंग क्षेत्र के लोग खोजलऽ प॑ नै मिलै छै। गामऽ के जे दोस्त ओकरा गोहाटी आनलै छेलै सेठवां ओकरऽ दीमापुर के अपनऽ गद्दी मं॑ भेजी देन॑ छेलै कैहने कि ओकरऽ जग्घऽ प॑ रजिनरा क॑ लगाय देन॑ छेलै। जनम स॑ सुनत॑ आबै वला अंगिका भासा सुनै लेली रजिनरा केरऽ कान तरसी गेलऽ छेलै।

            एक दिन केरऽ बात छेकै, रजिनरा तगादा मं॑ निकललऽ छेलै सायकिल ल॑ क॑ । अखनी गोहाटी के मुख्य मार्केट फैंसी बजार स॑ दोसरऽ मार्केट पल्टन बाजार पहुँचले छेलै कि अचानक झऽर पड़॑ लगलऽ छेलै । रजिनरा क॑ असाम केरऽ बिन मौसम के बरसात सं॑ बड़ी चीढ़ छेलै। बुद-बुदाब॑ लगलऽ छेलै- “भला बताबऽ त॑, ई बैसाखऽ के कड़कड़िया रौदा म॑ झऽर पड़ै के कोनऽ कारन छिकै…. की जे देस छिकै असाम….बून-बादर केरऽ कोनऽ समय – कुसमय नय… अखनी तड़तड़िया रौदा आरो अखनिये झऽर-बरसात….।” मने मऽन कुढ़तं॑ रजिनरा पलटन बजार के कोना प॑ बनलऽ एकटा बड़का बिल्डिंग केरऽ छोटका रं बरंडा के आगू मं॑ साइकिल खड़ा करी क॑ बरंडा मं॑ ठारऽ होय गेलऽ छेलै। मुँहऽ प॑ झऽर के दू-चार बून पड़ी गेलऽ छलै। जेबी स॑ रूमाल निकाली क॑ मुँह पोछला के बाद अगल बगल मं॑ नजर दौड़ैलकै– देखलकै – बरंडा केरऽ एक टा कोना मं॑ हरियर रं मैलऽ लूँगी आरो उज्जर रं मैलऽ चिक्कट अधबैंय्या अंगा पिन्हल॑ एक टा युवक फटल रं एक टा बोरा प॑ बैठी क॑ आगू मं॑ लोहा केरऽ फर्मा रखी क॑ एक टा टुटलऽ जुत्ता मं॑ काँटी ठोकी रहलऽ छेलै। रजिनरा कुछ देर ओकरा काँटी ठोकतं॑ देखत॑ रहलऽ छेलै। ऊ युवक अचानक काँटी ठोकना छोड़ी क॑ दहिना हाथऽ केरऽ थप्पड़ स॑ बाँया हाथऽ प॑ बैठलऽ मक्खर क॑ चट् स॑ मारी क॑ कहन॑ छलै- “धौ बरगांही साँय मक्खर कामऽ करै ल॑ नै दै छै।“ युवक के भासा सुनी क॑ रजिनरा चौंकी गेलऽ छेलै- ठेठ अंगिका भासा, एकदम ओकरऽ गामऽ केरऽ। कत्ते दिनऽ बाद ओकरा कानऽ म॑ अमरित घोरैलऽ छेलै। कत्त॑ दिन बाद लगलऽ छेलै- ओकरऽ कोय ऽ अपनऽ ओकरा सामने बैठलऽ छै। अपनऽ भासा बोली केरऽ टान ऐहने जबरदस्त होय छै। एकरऽ मिठास केरऽ कीमत एकरा स॑ दूर होला के बादे पता चलै छै। गुड़ऽ स॑ भी बेसी मिट्ठऽ।

            रजिनरा अपना क॑ रोक॑ नै सकलऽ छलै। ऊ युवक लगाँ जाय क॑ पुछन॑ छेलै- “तोरऽ घरऽर कहाँ छिकौं?“

“बिहार… भागलपुर जिला…“ – युवक रजिनरा दन्नं॑ अचरज स॑ देखी क॑ कहन॑ छेलै।

“भागलपुर जिला मं॑ कहाँ ?“ – रजिनरा फेरू पुछन॑ छलै, युवक मं॑ ओकरा ल॑ क॑ अचरज बढ़ी गेलऽ छेलै।

“सुलतानगंज लगाँ…….।“

“हमरो घऽर सुलतानगंज स॑ थोड़े दूर प॑ शंभुगंज थाना लगाँ कुर्मीचक गामऽ मं॑ छै ।“ रजिनरा हुलसी के बिना पुछले कही देन॑ छेलै।

“ हमरऽ घऽर सुलतानगंज स॑ लगभग एक कोस दूर दक्खिन एक टा गामऽ म॑ ।“ ऊ युवक रजिनरा दन्न॑ ताकी क॑ कहने छेलै।

“हमरऽ नाम राजेन्द्र सिंह… तोरऽ नाम की ?“

“हमरऽ नाम बुध्दन राम “ – ऊ युवक जवाब देन॑ छेलै।

            तब तलक बादर फटी गेलऽ छेलै, झऽर पड़ना बंद होय गेलऽ छेलै। रजिनरा अपनऽ साइकिल पर चढ़ी क॑ तगादा करै लेली चल्लऽ गेलऽ छेलै। ऊ युवक दोहराय रहलऽ छलै- “शंभुगंज लगाँ…. कुर्मीचक गाम… रजिन्नर सिंघ नाम…।“

            ई घटना के बाद रजिनरा जब॑ भी पटलन बजार के ऊ वरंडा पर के बुद्दन राम केरऽ जूता मरम्मत के दोकान के सामने स॑ पार होय छेलै साइकिल पर स॑ उतरी क॑ बुध्दन राम नामक ऊ युवक स॑ अंगिका मं॑ दू गाल बतियाय लै छेलै। हाल समाचार पूछी लै छेलै। कहियऽ-कहियऽ एतबार के छुट्टी के दिन सपरी क॑ फुर्सत स॑ घंटा-दू-घंटा जाय क॑ बैठी क॑ बोली बतियाय लै छेलै- दुख-दुख केरऽ बात। ऐसनऽ करै के पीछू शायद अपनऽ भाषा बोली केरऽ रस छेलै। अपनऽ जड़-जमीन के जुड़ाव छेलै। अपनऽ जिला-जवार के अपनापन के खिचाब छेलै।

            बीचऽ में कुछ दिन बुद्धन के दोकान बंद छेलै। बुद्धन स॑ बतियाबै के लालसा ल॑ क॑ रजिनरा जाय छेलै मतुरकि बुद्धन के बंद दोकान के सामने स॑ लौटी जाय छेलै मने मऽन खिसियैलऽ- निराश होलऽ। आरू एक दिन जब॑ गेलऽ छेलै तब॑ देखन॑ छेलै बुद्धन पहिले जैसनऽ टुटलऽ जुत्ता मं॑ काँटी ठोकी रहलऽ छेलै। रजिनरा हॅंसी क॑ पुछन॑ छेलै- “की हो दोस्त बुद्धन कहाँ गायब होय गेलऽ छेला ?“

            “मामू के बेटा केरऽ बिहा छेलै ओह॑ न्यौता पुरै लेली ननिहर चल्लऽ गेलऽ छेलियै।“ बुद्धन जवाब देन॑ छेलै। साथं॑-साथं॑ ईहो कहन॑ छेलै- “हे हो मालिक हमरऽ माय तोरा बोलैन॑ छौं। “ बुद्धन के ई बात सुनी क॑ रजिनरा क॑ अपनऽ कानऽ प॑ बिसवास नै होलऽ छेलै। अचरज स॑ बोललऽ छेलै- “तोरऽ मायऽ हमरा कथी ल॑ बोलैन॑ छै ?“ ऊ त॑ माइए कह॑ पारै छै, तब॑ काल्ह एतबार छिकै… हमरऽ घऽर..।“

‘गोहाटी मं॑ तोरऽ घऽर छौं कहाँ ?“

            “गनेसीपाड़ा मं॑ शंकर होटल के ठीक बगल मं॑…. ठीक सड़क पर…“ “ठीक छै, काल्हे नौ-दस बजे तलक पहॅुंची जैभौं ।“ कही क॑ रजिनरा अपनऽ साइकिल पर चढ़ी क॑ आगू बढ़ी गेलऽ छेलै ।

            रजिनरा बुध्दन राम कन जाय के बात कही त॑ देन॑ छेलै मतुरकि मनऽ मं॑ खुदबुदी होय रहलऽ छेलै- गेला प॑ चाह- चूह त॑ पियै लेली देलऽ जैतै…. राजपूत होय क॑ एक टा हरिजन के हाथऽ के चाह…जिन्दा माछी त॑ निगललऽ नै जाब॑ पारै छै…. ऊ दिन ससुरा फगुआ मेस्तर जे ओकरा डेरा मं॑ आबी क॑ नाली साफ करै छेलै, सड़क बोढ़ै के काम करै छेलै, होटलऽ मं॑ ओकरऽ सामन्है के कुर्सी प॑ बैठी क॑ की सानऽ स॑ चाहऽ के चुस्की लिअ॑ लगलऽ छेलै… गाम होतियै तब॑ देखाय देतियै…. भारत अजाद होय गेलऽ छै त॑ की होतै… छोटका सिनी कि बड़का के माथा पर चढ़ी क॑ मुततै… मारतं॑-मारतं॑ पीठी के चपड़ी उधेड़ी देतियै… गरदन के मैल छोड़ाय देतियै…. जमीनदारी चल्लऽ गेलै त॑ की होलै…. रजपूती दबदबा अखनियऽ तलक कायम छैं…. ओह…. बुद्धन राम के बात मानी क॑ हम्म॑ त॑ धरम संकट मं॑ पड़ी गेलंऽ…. साँप-छूछून्नर केरऽ हाल होय गेलऽ… नै निगलतं॑ बनै छै… नै उगलतं॑…।“

            धरम संकट मं॑ पड़लऽ रजिनरा अपनऽ साइकिल लेन॑ पहुंची गेलऽ छेलै गनेसी पाड़ा मुख्य गौहाटी शहर स॑ करीब करीब पाँच किलोमीटर दूर । देहाती इलाका । एक दन्न॑ धानऽ के खेत आरू दोसरऽ दन्न॑ बसलऽ गनेसीपाड़ा । बीचऽ स॑ पार होलऽ पक्की सड़क कोनऽ देहाती छौड़ी के तीसी केरऽ तेल दै के झाड़लऽ बाँधलऽ माथा के सीधा फाड़लऽ माँग रं चमकी रहलऽ छेलै । जैसनऽ कि असाम मं॑ गरीब-गुरूआ सिनी के घऽर रहै छै, बाँसऽ के टटिया प॑ मट्टी के लेप द॑ क॑ देवाल खड़ा करी देलऽ जाय छै आरू उपर म॑ सुखलऽ कास के छप्पर छारी देलऽ जाय छै वैसने घऽर चारो दन्न॑ बनलऽ छेलै। देखी क॑ रजिनरा क॑ लगलऽ छेलै कि ऊ गनेसीपाड़ा मं॑ नै, सीधा अपनऽ गाम कुर्मीचक मं॑ आबी गेलऽ छै । ओह॑ रं मट्टी केरऽ देबाल, फूस के छौनी बला घऽर ।

            शंकर होटल के मालिक शंकर झा एक टा ओसरा मं॑ बनलऽ अपनऽ छोटऽ रं ‘शंकर होटल’ मं॑ कोयला के भट्टी के आगू मं॑ बैठलऽ चाह खौलाय रहलऽ छेला।  हुन्क बारह तेरह बरिस के बेटा गहकी क॑ चाह मिठाय परोसी रहलऽ छेलै । रजिनरा जाय क॑ पूछलकै- “बुध्दन राम का घर किधर है ?“

            शंकर झा मुँहऽ स॑ कुछ नै बोली क॑ एक टा घरऽ के दुआरी प॑ जाय क॑ हकैन॑ छेलै “बुध्दन राम घरऽ मं॑ छ॑ ?“

हाँक सुनी क॑ बुध्दन घरऽ से बहराय ऐलऽ छेलै आरू हँस्सी क॑ कहत॑-कहत॑ रजिनरा क॑ ऐंगना मं॑ ल॑ गेलऽ छेलै, “आबियै मालिक आबियै….।“

ऐंगना मं॑ आबी क॑ रजिनरा आरो हैरान रही गेलऽ छेलै ई देखी क॑ कि कुर्मीचक के घऽर सिनी मं॑ बनलऽ ऐंगना जैसनऽ बनलऽ ऐंगना, एक दन्न॑ लंबा रं ओसरा आरू ओसरा प॑ बनलऽ दू ठो कोठरी । असाम मं॑ ई रं घऽर कहाँ बनै छै ।

            गोबर से निपलऽ एँगना मं॑ असम केरऽ बनलऽ बेंतऽ केरऽ दू टा मोढ़ा रखलऽ छेलै । ओकरे मं॑ स॑ एक टा मोढ़ा पर बड़ी आदर-सम्मान स॑ रजिनरा क॑ बैठाय क॑ बुध्दन राम माय क॑ हाँक लगैन॑ छेलै- “माय गे…. देक्खैं रजिन्नर मालिक आबी गेल्हैन…“

            रजिनरां माथा उठाय क॑ ओसरा दन्न॑ ताकलकै । देखलकै ठीक ओकरऽ माय केरऽ उमिर केरऽ एक टा करिया रं सुखल-पकलऽ जनानी मतरकि छोटऽ छोटऽ छापा वाला हलका लाल रंग के साफ-सुथ्थर सड़िया पिन्हलें कोठरी स॑ बहराय क॑ ओसरा पर स॑ उतरी क॑ एँगना मं॑ रजिनरा के आगू मं॑ ठाड़ी होय गेलऽ छेलै ।

            “की रे नूनू चिन्हलैं अपनऽ चनवतिया फुआ क॑…?“ ई छेली बुद्धन रामऽ के माय । तखनी रजिनरा चनवतिया दन्न॑ ताकी क॑ कुछू याद करै के कोसिस करी रहलऽ छेलै । रजिनरा तखनी बारह-तेरह बरिस के छेलै जखनी चनवतिया क॑ अंतिम बेर देखन॑ छेलै गामऽ मं॑ । रजिनरा के माय कहन॑ छेली – “रे नूनू तोरऽ जनम यह॑ चनवतिया फुआ के हाथ पर होलऽ छौ… दू- अढ़ाय बरिस के उमिर ताँय चनवतिया फूआ रोज आबी क॑ तोरा कड़ुआ तेलऽ के मालिस करी देन॑ छेलौ….“

            “चनवतिया फूआ… तोंय गोहाटी मं॑…. हय केना भ॑ गेलै… घरऽ स॑ एत्त॑ दूर आबी क॑ ई नदी-नाव संजोग केना होय गेलै? “ – रजिनरा केरऽ बोली अचरज स॑ भरलऽ छेलै ।

“बुधना के बाबू त॑ गोहाटिये मं॑ नी कमाय छलैन… सेहे हमहॅूं यहाँ आवी गेलाँ….।“

            “हे गे माय ! खाली बतियैथैं रहभैं कि मालिक के कुच्छू आदर-सतकारऽ करभैं ?”

            – बुद्धन अपनऽ माय क टोकन॑ छेलै । मतुरकि बुद्धन केरऽ बातऽ पर धियान नै द॑ क॑ चनवतिया कहन॑ छेलै- बुधना जोन दिना आबी क॑ हमरा कहन॑ छेलै कि माय गे नाना कन केरऽ रजिन्नर मालिक स॑ आज हमरऽ भेंट भेलै, तखनिये हम्मं॑ तोरा चिन्हीं लेल॑ छलियऽ नूनू ।”

“माय गे तोंय चाहऽ के पानी चूल्हा पर चढ़ाबं॑…“ हम्मं॑ शंकर झा के होटल स॑ कुछू मिठाय ल॑ आबै छियै ।“ खुसी स॑ हुलसी क॑ बुद्धन राम कहन॑ छेलै ।

            “हय की बोलै छें नूनू…. सौंसे जिनगी बिती गेलऽ… अब॑ चला-चली के बेला मं॑ बाभन राजपूत के धरम भरस्ट करै के पाप कैहन॑ माथा प॑ लेबऽ, छोटऽ जात हरिजन केरऽ बेटी होय क॑ एक टा राजपूतऽ के बेटा के अपनऽ छूलऽ चाह पिलाय देला स॑ हमरा मरलऽ प॑ नरकऽ म॑ जगह नै मिलतऽ…. “जो शंकर पंडीजी के बेटा जनार्दन नूनू क॑ कहियैं कि ऊ अपनऽ हाथ स॑ एक गिलास इसपेसल चाह आरू बढ़िमका रं चार टा मिठाय द॑ जैतै…“ – माय केरऽ कहना मानी क॑ बुद्धन शंकर झा के होटल दन्न॑ चल्लऽ गेलै । थोड़े देर मं॑ लौटलै तब॑ शंकर झा केरऽ बेटा जर्नादन साथ छेलै एक हाथऽ मं॑ चाह के गिलास आरो दोसरऽ हाथऽ मं॑ मिठाय केरऽ प्लेट लेन॑ ।

            हरिजन के एँगना मं॑ बैठी क॑ जर्नादन झा ब्राम्हण के हाथऽ के चाह पीबी क॑ मिठाय खाय क॑ आरू एकटा हरिजन जनानी चनबतिया स॑ गामऽ-घरऽ के हाल-समाचार जानी क॑, अपनऽ घरौआ भासा अंगिका मं॑ मऽन भरी क॑, अघाय क॑ बोली बतियाय क॑ कुर्मीचक गामऽ के सम्मानित राजपूत मालिक इन्द्रदेव नारायण सिंह के बेटा राजेन्द्र सिंह (रजिनरा) जब॑ अपनऽ डेरा पर जाय लेली मोढ़ा पर स॑ उठी क॑ ठाढ़ऽ भेलै तखनी चनबतिया फेनु कहन॑ छेलै- “बड़की भौजी मन॑ कि तोरऽ माय तोरा लेली ठेकुआ, पेड़ुकिया भेजैन॑ छौन नूनू, चलऽ लै लिहऽ झा जी केरऽ होटल मं॑ हम्मं॑ रखबाय देन॑ छिहौं …. तेबारी जी के मँझला बेटा जगदम्बा नूनू द्वारा तोरा लगाँ भेजबाय लेली भौजीं निहौरा करी रहलऽ छेली । जगदम्बा नूनू कही रहलऽ छेल्हैन जे हुनका त॑ दिमापुर जाना छै… रजिन्नर नूनू स॑ भेंट करै के टैम नै मिलतैन । तखनिये हम्मं॑ भौजी स॑ भेंट करै लेली तोरा कन पहुँची गेलऽ छेलाँ । हम्मं॑ कहलियै हे हो जगदंबा नूनू गोहाटी पहुँचला प॑ आधा घंटा बादे तोरा दिमापुर के बस मिलथौं । भौजी के देलऽ समान लै ल॑ । एक जगह बताय देभौं । वही ठाम रखी दिहऽ, रजिन्नर नूनू क॑ मिल जैतैं । हम्मं॑ हरिजन होय क॑ राजपूतऽ के खाय पियै के समान केना छूबै… दोसरऽ समान रहतियै तब॑ हम्हीं ल॑ जैतियै । से हे जगदम्बा नूनूये केरऽ हाथऽ स॑ झाजी के होटल म॑ रखबाय देन॑ छिहौं । हम्मं॑ हाथ नै लगैन॑ छिहौं । छुतैलऽ नै छौन । खाय लिहऽ । भौजी कहन॑ छेली “हे गे चनवतिया, छोटका नूनू क॑ हमरऽ हाथऽ के बनैलऽ ठेकुआ, पेंड़ुकिया बड़ी पसन पडै़ छै ।“

            “हे हो जर्नादन मालिक ऊ दिन के रखलऽ मोटरी आनी क॑ रजिन्नर मालिक क॑ द॑ दहऽ“ – शंकर होटल के सामने आबी क॑ शंकर झा के बेटा जर्नादन झा स॑ चनबतिया ई आग्रह करन॑ छेलै । जर्नादन छौंड़ा मोटरी आनी क॑ रजिनरा के हाथऽ म॑ पकड़ाय देन॑ छेलै । माय के भेजलऽ ठेकुआ, पेंड़ुकिया के मोटरी हाथऽ मं॑ पकड़ल॑ रजिनरा सोच॑ लगलऽ छेलै- बड़ऽ के, कुर्मीचक गामऽ के पचास-साठ बीघा के जोतदार बड़का जात वाला राजपूत मालिक इंद्रदेव नारायण सिंह के बेटा राजेन्द्र सिंह जे हरदम बड़का जात के घमंड मं॑ चूर रहै छै से आकी कुर्मीचक के हरिजन टोला के मरलऽ गाय बैल के चमड़ा स॑ अपनऽ हाथ स॑ जुत्ता बनावै वला गनौरी राम के बेटी चनबतिया जे एक तरफ त॑ राजपूत के जात नै लेली ली खाय-पीयै केरऽ समानऽ के मोटरी नै छुलकै आरू दोसरऽ तरफ गौआं होय के करतब निभाबै लेली ऊ मोटरी ब्राम्हण युवक स॑ अनवाय क॑ ब्राम्हण केरऽ होटल मं॑ रखबाय देलकै । अपनऽ परंपरा गत धरम निभावै के प्रति आरू गौआँ के करतब निभाबै के प्रति सजग रहै वाली चनबतिया कुर्मीचक के केकरऽ दीदी, केकरऽ मौसी त॑ केकरऽ फुआ लगै छेलै मतुरकि ब्राम्हण, राजपूत टोले नै, कोयरी टोला, यादव टोला केरऽ कोय जादब जी अरकी मंडल जी के भी कोय बच्चा बुतरू चनबतिया क॑ “चनबतिया दीदी“ “चनबतिया मौसी“ आकी ‘चनबतिया फूआ’ जैसनऽ अपनत्व स॑ भरलऽ सम्मानित सम्बोधन नै करल॑ छेलै । खाली ‘चनबतिया-चनबतिया’ कही क॑ ही हँकाबै छेलै ।

            “माय क॑ चिट्ठी लिखी क॑ बताय दिहऽ रजिन्नर नूनू कि सब समान तोरा मिली गेल्हौं ।“ – चनबतिया कहने छलै । “तोंय चिंता नै करं॑… हम्मं॑ चिट्ठी नै फोन करी क॑ आइए माय क॑ बताय देबै कि चनबतिया फूआं हमरा तोरऽ भेजलऽ सब समान द॑ देलकै ।“ – बड़ी आत्मीयता स॑ आरू भावुक होय क॑ कहन॑ छेलै रजिनरा । ऊँच्चऽ जात के घमंड के बाँध तोड़ी क॑ ‘‘चनबतिया फूआ’’ जैसनऽ अपनत्व भरलऽ सम्मानित शब्द पानी रं उपलाय गेलऽ छेलै रजिनरा के मुँहऽ स॑ अनपढ़ किंतु कर्तव्य आरू नीतिगत धार्मिक परंपरा निभावै के ज्ञान स॑ भरलऽ चनबतिया केरऽ बात-विचार सुनी क॑ ।

चनवतिया फूआ | अंगिका कहानी | राकेश पाठक
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