टुटलौ कटोरी | अंगिका कहानी संग्रह | डॉ. (श्रीमती) वाञ्छा भट्ट शास्त्री | Angika Story Collection । Dr. (Smt.) Vanchha Bhatta Shastri

टुटलौ कटोरी | अंगिका कहानी संग्रह | डॉ. (श्रीमती) वाञ्छा भट्ट शास्त्री
Tutlow katori | Angika Story collection | Dr.(Smt.) Vanchha Bhatta Shastri

1- ईश्वर केरऽ संकेत समझऽ
एक गाँव में पंडित, मौलवी, पादरी रहे छेला । लोगऽ करेऽ मानना छेले कि ई तीनों को भगवान् दर्शन देते रहे हथिन । एक दिन गाव में बाढ़ आबी गेले ऊ तीनों केरऽ भक्त हुन्खऽ पास पहुँचले आरऽ कहल के तोहें तीनों भी गांव छोड़ी के हमरा साथ चलऽ अबे तीनों केए मनऽ में विचार ऐते, जे भी गाँव छोड़ते ओकरऽ मतलब छै, अपनऽ मालिक पर भरोसा नाय रहले । तीनऽ अपनऽ भक्त के जवाब देल के तोरा सनीजा, हमरऽ रक्षक उपर वावला छै । बाढ़ केए पानी बढ़ते गेले । तबे फेरक कुछ लोब नाव लै के ऐले आरो कहकके तोरा लेबे ले ऐलऽ छिहों । तीनों ने एक दोसरा केए मुँह देखी के बोलले तोरा सनी जा हमरा बचाबे वाला ऊपर वाला छै । अबे हुन्कऽ धार्मिक स्थानऽ पर पानी भरी गोल्हें, अबे तीनों डुबे लागला तबे रक्षाकेरऽ दृष्टि से हेलीकाप्टर ऐले, तीनों केरऽ आणु में रस्सी फेंकलके । तीनों प्रतिस्पर्धा में एक बात रटते रही गेले । हमरा ऊपरवाला पर भरोसा छै । हम्में हुन्कऽ भक्त छिकां, हमरऽ रक्षा जरूर करता । लेकिन पानी ऊपर तक चढ़ी गेलऽ आरो तीनों केरऽ मृत्यु होय गोलऽ । जबे स्वर्ग पहुँचले ते परमात्मा से पुछ लके हम्में तोरऽ भरोसा में बैठलऽ छेलां । तोहें हमरा सनी के मरैले छोड़ी देल्हे । तबे परमात्मा ओकरा सें कहलका किं हम्में तोरा सनी के मदद करे ले एलऽ छेलियों, लेकिन तोहें हमर संकेत के नांय समझे पार ले। तीनों आश्चर्य से एक दोसरा केरऽ मुंह देखे लागलऽ । परमात्मा मालिक कहलका हमें तोरा तीनों के बचाबे ले नाव ले के ऐलऽ छेलियो, लेकिन तोहें हमरऽ संकेत नांय समझले, हम्में हेलीकाप्टर लेके ऐलऽ छेलियो, तोहें अपने में उलझलऽ रही गेले । प्रतिस्पर्धा में लागलऽ रहले । अपने भी प्राण रक्षा के लेलऽ कुछ नांय कर ले । चाहे छेले भगवान बचैता । खाली हमरा पर टिकलऽ रहले तबे तीनों के समझ में ऐले कि अध्यात्मक करेऽ दुनियां, ईश्वर करेऽ संसार समानता आसे संकेत से चले छै । अपनऽ भीतर एतना समझ पैदा करे ले होवे कि हम्में ईश्वर केए इशारा समझे सकिये तबे भक्ति करिये ।

2- जेन्हऽ वातावरण तेन्हऽ विचार
उपदेशं से जीवन देखे करेऽ दृष्टि बदली जाय छै । आरो दृष्टि बदलते ही सृष्टि बदली जाय छै । एकबार एक राजा शिकार पर गेलऽ छेलात । रास्ता में देखल का कि एक साधु पथलऽ पर धयन मग्नन बैठलऽ छै । राजा अपनऽ एक नौकर के कुछ टाका दे के साधु के पास भेजलका नौकर साधु करेऽ पास गेलऽ आरो टाका दे करेऽ कोशिश करे लागलऽ साधु आंख खोली के देखलका आरेा टाका ले से इंकार करी देलका । राजा दोसरऽ नौकर के कुछ ज्यादा टाका देके भेजलका, साधु टाका लेसे इंकार करी देलका । राजा फेरू तेसरऽ नौकर के भेजलका, साधु टाका ले से इंकार करते गेला । अंत में राजा अपने टाका ले के साधु केरऽ पास गेला । आरो साधु के टाका दे लागला । साधु कहलका राजा ई टाका कोय गरीब कंगाल के बांटी दहऽ जेसे ओकरऽ कुछ उद्धार होता जेते । राजा कहलका महाराज आपने के पास कुच्छु दिखाई नांय दे रहलऽ छै, नां कम्बल नांप कमंडल, आपने से बदी के कंगाल आरो कौन होय सके छै । साधु कहलका राजा हम्में कंगाल नांय छिये, हमरा पास सोना बनावे केरऽ यंत्र छे । एहे से हमरा तोरऽ धन केरऽ कोय जरूरत नांय छै । हम्में चाहिये तो सोना केरऽ पहाड़ बनाय सके छिये। राजा वहां से अपनऽ महल चलऽ ऐला । लेकिन हुन्कऽ मनऽ में सोना बनावे केरऽ बात कानऽ में गूंजे लागल्हें । राजा साधु केरऽ पास फेरू गेला आरऽ सोना बनाबे केरऽ रसायन जाने केरऽ इच्छां प्रकट करलका, साधु राजा के रोज वहाँ आबे ले कहलका । राजा रोज साधु के पास जाय लागला । आरो साधु रोज राजा से धर्म चर्या बताबथ । एक साल तक राजा रोज धर्मचर्या सुनते- सुनते राजा केरऽ मनऽ में धार्मिक भाव जागी गेल्हें । आरो हुन्हीं साधु केरऽ सोना बनाबे केरऽ रसायन जानी गेलात । राजा के लेलऽ स्वर्ण रसायन केवल भौतिक विषय नांय रहलऽ धार्मिक उत्थान से भी वैराग्य भाव पैदा होय छै । ओकरऽ आगु बाड़ेऽ से बाड़ेऽ शक्ति भी फीका छै । नियमित रूपऽ से व्यक्ति जे वातावरण में रहे छै वेहे विचारऽ वाला हो जाय छै । चाहे ई विचार कोय भी प्रकार केरऽ हुए ।

3- पाप केरऽ फल
कुछ साल पहिले हम्में अपनऽ भाय करेऽ साथ भागलपुर केरऽ जोगसर महल्ला में रहे छे लिये, दुमहला मकान छेलऽ । वही कचहरी में कर्मचारी के पद पर नौकरी करे छेलिये । मकान बहां बाड़ेऽ छेले । नीचे वाला मकान एकटा निस्पिटर के रिाया पर दे देलऽ छेलिये । निपिटर केरऽ बिहा नांय भेलऽ छेले । बगल में एकटा मियां जी रहे छेला, हुन्हीं मुर्गी बहुत पोषलऽ छेला । मुर्गी केरऽ अंडा बेची के अपनऽ जीवन यान करे छेला । मुर्गी दिन भर हिन्ने-हुन्हे से दाना चुनी बिछी के पेट भरी ले छेली । सांझ होते घऽर आबी जाय छेली । मियां जी गिनती करी के सब के घरऽ में ढुकाय ले छेल निस्पिटर केए मनऽ में पाप ढुकले अपनऽ घरऽ के बाहर दाना छिटी दे छेला । मुर्गी जबे दाना चुनते-चुनते ओकरऽ द्वारी पर आवे ते एकटा कम्बल झांपी दे छेला । आरो मांस बनाय के खाय जाय छेला शनिचर के शनिचर एक मुर्गी मारे छेला । मियां जी हल्ला गुल्ला करी के रही जाय छेला । निस्पिटर उलटे मियां जी पर धौंस देखाबे तोरऽ मुर्गी हमरऽ द्वारी पर आबी के गंदा करे छै । अपनऽ मुर्गी ठीक से राखड । ई तरह से मियांजी केरऽ सभे मुर्गी खतम होय गेले, थोड़ऽ बहुत जो बचले बेची-बिकनी के खतम करी ढेलकऽ मजदूरी करी के जिये लागलऽ निस्पिटर साहब रिटयर्ड होय गेला । अपनऽ धडऽ मथुरा में छेलहें, वहीं चलऽ गेला । हम्में घुमते-घामते मथुरा पहुँचलीये, हुन्खा से मिले वास्ते हुन्खऽ घऽर गेलिये । देखे छी पलंगऽ पर बैठलऽ छथ बगलऽ में बैशाखी रखलऽ छै । पुछला पर कहलकात ई सब वेई मियां केरऽबद दुआ छिकऽ । जेकरऽ मुर्गा- मुर्गी जबानी में हम्मे खाय गेलऽ छेलिये । रिटायर्ड, भेला केरऽ बाद गाड़ेऽ में कैंसर होय गेलऽ, जेकरा चलते एक गाड़े कटवावे ले पड़लऽ । कहे केरऽ मतलब छै कि भगवान से न्याय कबे आरो कौन रूपऽ में मिलते एकरा कोय नांय जाने ले पारै छै । ई अनुभव कई केरऽबातछिके ।

4- किसान
एक गरीब किसान भगवान केरऽ पूजा-पाठ बड़ी भक्ति भाव से कई छेल ओकरऽ निर्मल भक्ति देखी के भगवान प्रसन्न होय गेला आरो एक दिन प्रकट होय के किसान के दर्शन देलकात कहलक तोरऽ भक्ति से प्रसन्न छी । तोरा की वरदान चाहीवऽ मांगी ले भगवान के सामने देखी के किसान अचरजऽ में पड़ी गेलऽ । ओकरा कुच्छु समझ में नांय ऐसे कि हम्में की वरदान मांगें भगवान से कुछ समय मांगलकऽ । भगवान एक दिन केरऽ समय देलकाता आरऽ कहलका सोची-समझी के मांगीहें, तोहे जे मांगबे, ऊसमे के होय जेते । किसान अपनऽ कनियाय के वरदान केरऽ बात बतैलकऽ । कनियाय कहलके भगवान से एक संदूक मांगऽ जे टाका से भरलऽ होय । केतनो खरचा करिये संदूक खाली नांय होवे । दोसरऽ दिन भगवान प्रकट हुवे किसान अपनऽ वरदान मांगलकऽ । भगवान तथास्तु कही के चलऽ गेला किसान अपनऽ जेबऽ में नोट भरी के बाजार गेलऽ दुकानदार से सामान मांगलकऽ, दुकानदार पुछलके सामानऽ के बदला में की देवे ? किसान कहलके जेतना टाका मांगमे, ओतना टाका देभो । दोकानदार कहलके दाम में टाका नांय चाहीवऽ । टाका तो सभे के पास अपार छै । िकसान ई सुनी के चकराय गेलऽ, दोकानदार कहलके अबे सभे के पास अपार धन छै । ऐहे से टाका केरऽ कोय कीमत नांय रही गेले । दाम के रूपऽ में अनाज दे के कोय ससामान ले जाय सके छे । किसान भागलऽ- भागलऽ घरऽ ऐलऽ आरे भगवान से प्रार्थना करे लागलऽ । भगवान ई वरदान वापस ले ले। काहे कि ई तरह से जीना मुश्किल होय जातऽ किसान केए करूणा पर भगवान वरदान वापस ले लेलकात । भगवान किसान के समझेलकात, अति कोय चीज केरऽ खराब होय छै । जबे लोगऽ के पास मुफ्रत केरऽ चीज धन होय जाय छै ते ओकरऽ कीमत नांय होय छै । चाहे पहिले कितनों महंगऽ काहे ने हुवे, धनकेरऽ साथ भी वेहे होय छै । धन जबे ज्यादे मात्र में होय जाय छै ते कीमत घटी जाय छै । दरअसल धन केरऽ महत्व अभावऽ केरऽ साथ ही छै ।

5- ज्योतिष विद्या
एक बहुत बाडे़ऽ भविष्यवक्ता छेलात । एक दिन हुन्हीं राजा केरऽ दरवार में गेला । आरो राजा से कहलका महाराज हम्में भविष्यवत्ता छिकां । हम्में त्रिकाल केरऽ बात बताये सके दी । एक बेर अपने करेऽ भविष्य बताने ले चाहे छिपे । कृपया एक बेर एकरऽ मौका दे ? बात सुनी के राजा ने कहलका तोरऽ बात हम्में स्वीकार कई घेर लेकिन जभी राज दरबार करेऽ समय खत्म होये वाला छै। आरो हमरा नांय लागे छै कि एतना कम समय में हमरऽ भविष्य बताबे सकबे । कल्ह बिहाने आय जइहें । राजा करेऽ बात सुनी के भविष्य वक्ता चलऽ गेलऽ । दोसरऽ दिन बिहान भेलऽ भविष्य वक्ता दरबार में पहुँची गेलऽ । वेहे घड़ी दरबान ओकरा पर कोड़ा बरसाये लागलऽ । जबे दरवान मारते-मारते धकी गेलऽ तब छोड़ी देलकऽ भविष्यवक्ता राजा के पास पहुँचलऽ । राजा व्यंग करते बोललात जबे तोहें अपनऽ भविष्य नांय जाने ले पारले, ते हमरऽ भविष्य को बताबे ? भविष्यवक्ता कहलके राजा यहाँ आबे से पहिले हम्में एकरा कागजऽ पर लिखी के राखी देलऽ छेकिये कि आज हमरा साथे कुछ अशुभ घटना घट वाला छै। आरो ओहऽ घटना संभावना राज महल में ही कलित होते। ज्योतिष शास्त्र एक विज्ञान छै। यहाँ संकेत मिले छै शुभ- अशुभ केरऽ । बस समझी ले पड़े छै। राजां ने जबाव देलका, हम्में तोरऽ ज्ञानऽ के परखे ले चाहे छिये । आज- कल केत्ते आदमी जे प्रकार से अपनऽ अधुरऽ ज्ञान के आधार पर प्रसिद्धि पावे ले चाहै छै । हम्में नांय चाहे छी कि हमए द्वारा कोय एन्हऽ आदमी होय जाय। जे आगे चली के गलत साबित होय जाय। ऐहे से हम्में तोरा साथ एन्हऽ वयावहार करलिहों । ई कही के राजा भविष्य वक्ता के सम्मान करल का आरो बहुत सेवा सत्कार भी करलका । हर आदमी के ई जानी लेना चाहीवऽ कि ऊ जे आदमी के ज्ञानी समझी रहलऽ छै, वास्तव में ज्ञानी छै कि नांय कहीं हम्में एन्ह आदमी के ते मान नांय दे रहलऽ दी । जे ओकरऽ वास्तविक हकदार नांय छै ।

6- दोसरा के सुधारै से पहिले अपने सुधरें
एक आदमी अपनऽ बेटा के लैके एक महात्मा पास पहुंचलऽ, महात्म से कहलकऽ महाराज हमरऽ बेटा रोज गुड़ खाय छै। मांय ढेला पर कान्दे लावे छै। लड़ाई-झगड़ा शुरू करी छै छै । हम्में बेटा केरऽ आदत से परेशान छी ? कृपा करी के कोप उपाय बताबऽ । जेकरा से एकरऽ ई आदत छुटी जाय। महात्मा कहलका एक महीना केरऽ बाद बेटा के लै के अइहऽ तबे उपाय बतैभों। एक महीना के बाद महात्म ने बच्चा के अपना पास बोलैल कात, आरे कुछ देर बात कहलका, बेटा देखऽ ? अबे गुड़ कम खइहऽ आरो गुड़ के लेलऽ लड़ाय भी नांय कहरहऽ । महात्मा केरऽ बात बच्चा केरऽ मना में असर करी गेले । वहे दिनऽ से गुड़ खाना छोड़ी देलके । ओकरऽ स्वास्थ भी सुधरे लागले। बच्चा केरू बाप एक महीना के बाद महात्मा के प्रणाम करे ले गेलऽ, महात्मा जी तोरा बहुत-बहुत धन्यवाद छों । तोए बातऽ में जादू छें । तोहें समझैल्हऽ तोरऽ बात मानी के गुड़ खाना छोड़े देलके। लेकिन हमरा समझ में नांय आबी रहलऽ छै कि एहे बात पहिले दिन बताय देतल्हऽ, एक महीना बाद बोलैल्हऽ । एकरा की माने भेलो । हम्में नांय समझैले पार लिये । महात्मा मुस्कराय के बोलला जे आदमी अपने अपनऽ नियम पालन नांय करै सके छै । ऊ आदमी दोसरा के की नियम पालन करें ले कहते, ओकरऽ उपदेश करेऽ की असर पड़ते । हम्में रोज खाना के साथ गुड़ खाय छेलिये, हम्में बच्चा के गुड़ खाय ले मना केसे करतीय, पहिले स्वयं गुड़ खाना बन्द करनिय, तबे तोरऽ बेटा के गुड़ खाय ले मना करलिये असल में संयम करेऽ नियम पहिले अपने से होना चाहीवऽ । संयम बोलै करेऽ नांय पाले केरऽ बिलय छै । संयम के लेलऽ आदमी के भीतर ढुंढना जरूरी छै । जे आदमी भीतर नांय ढुंढ़ी सकै छै= ऊ आदमी संयम केए पालन नाय करी सकै छै ।

7- क्रोध नांय करऽ आरऽ सत्य बोलऽ
गुरू द्रोणाचार्य कौरव- पांडव के पढ़ाबै छेलात । एक दिन गुरूजी ने जीवन मूल्य पर शिक्षा देते होलऽ कहलका, सबबे बाड़ेऽ पाठ छै क्रोध नांय करऽ आरऽ सत्यबोलऽ । गुरूजी आदेश देलका कि कल ई पाठ सभे कोय याद करी कें अइहें । सब ने बताय देलके क्रोध नहीं करऽ सत्य बोलऽ । युधिष्ठिर कहलके हमरा पाठः याद नां होलक दोसरऽ दिन याद करी के आबै ले कहलऽ गेले । करीब दस दिन तक युधिष्ठिर कहते रही गेले कि हमरा पाठ याद नांय होलऽ छै। द्रोणाचार्य ने युधिष्ठिर के डाँटते होलऽ कहलका माथा में भूसा भरलऽ छवडा 11 वाँ दिन युधिष्ठिर ने कहलका- आज पाठ याद होय गेलऽ छै । क्रोध नांय करऽ सच बोलऽ । द्रोणाचार्य कहलका हैंसे कैसे काम चलतां, एक छोटऽ सन पाठ याद करे में तोरा एत्ते दिन लागी गेलां । भविष्य में कैसे पढ़बे ? युधिष्ठिर ने जबाब देलका कि तोहें जबे पाठ पढ़ैल्हऽ क्रोध नांय करए सच बोलऽ, आर दोसरे दिन तोहें हमरा पर क्रोध व्यक्त करल्हऽ । हमरो मनऽ में क्रोध आबी गेलऽ छेले । असत्य हम्में बोली नांय सके छेलिये । ऐहे से हम्में रोज दिन ई प्रयास करते रहीगे लिये आरो जबे- जबे तोहें डांटे छेल्हऽ, हमरा भी क्रोध आवी जाय छेले । जे दिन से तोहें डाँटल्हऽ आरे भीतर से हमरा गुस्सा नांय होले, वहे दिनऽ से हमरऽ भीतर सत्य जागले । तब हम्में कहैले पार लिये कि हमरा पाठ याद होय गेलऽ द्रोणाचार्य आनन्द होय गे लाता आरो हुन्हीं सभे छात्रऽ से कहलका, शिक्षा जबे एतना गहरी तक उतरे तबे ऊ अपनऽ सही फल देतै । सत ही शिक्षा आदमी के ज्यादे समय काम बांय एते । रटलऽ- रटेलऽ ज्ञान आरऽ समझ के साथ जीवन में उतारलऽ गेलऽ शिक्षा में बहुत फर्क होय जाय छै । जे विद्यार्थी शिक्षा धैर्य उतरऽ मेहनत से प्रापत करे छै । ऊ अपनऽ जीवन में ज्यादा योग आरऽ सफलता पावै छै । जाने छै सफलता करेऽ कोय शर्टकट नांय होय छै ।

8- सुख आरऽ शान्ति केरऽ मार्गछैमोन
म्यांमार के पहाड़ पर एक बौद्धवाहुल्य गांव छेले । वहाँ चोरी जेन्हऽ अपराध बढ़ी गेलऽ आरे लोगऽ केरऽ जीना मुश्किल होय गेलऽ छेले गांव केरऽ बीच अविश्वास केरऽ वातावरण बनी गेलऽ छेले । एक दिन जबे एक किसान केरऽ दुधारू गाय चोरी होगिले तबे लोगऽ केए गुस्सा फुटी पड़ले । गांव भर केए लोग जमा होले आरो पंचायत बैठेलऽ गेले । जे एं कि पंचायत में होय छै, अपराधि के खोजे आरो ओकरा से जोड़लऽ समस्या के कारणऽ पर विचार शुरू ते होले, लेकिन ऊ जल्दी ही एक दोसरापर दोषी लगाबे के कामऽ में बदली गेले । गांव केरऽ धर्मगुरू सामने ऐला आसे बोलना दोष खोजे केरऽ इमार्ग कटुता बढ़ैथों आरो मन कलुषित करथो। जहां ई दुबात होते वहां ते सत्य टिकिये नांय सकते । आबऽ कुच्छु नया दृष्टि से देखिये । यहाँ उपस्थित हम्में सब जेते लोग छिपे, एक घंटा मौन रखबे आसे गांव के लेलऽ कल्याण भावना से विचार करबे ? सभे गांव वाला मौन धारण करी के बैठऽ । एक घंटा बाद किसानऽ में से एक आदमी उठले आरो अपनऽ माथऽ नवाय के खड़ा हो गेलऽ, अपनऽ अपराध स्वीकार करी के बोलले हमरा दुःख होय रहलऽ छै कि एकरऽ गाय हमहीं चोरैलऽ छिपे, आरो मारी के फेंकी देलऽ छिपे। हम्में अपनऽ अपराध स्वीकार करे छी । आरो दंड सहे ले तैयार छी । सबके कल्याण के भावना से रखलऽ मौन आरो आदमी केरऽ अपराध स्वीकृत से गांव वाला केरऽ विचार दूर तक प्रभावित होले । मौन करेऽ ई प्रयोग करते रहला से वहां लोगऽ के मनऽ केरऽ दुष्ट भावना खतम होय के सुख- शान्ति आरो सौहार्द्र लौटी ऐले । जीवन केरऽ समस्या में मौन करेऽ प्रयोग विधायी रूप से करलऽ जाय सके छै । मौन मन के एकागु करे छै आरो एकरऽ प्रयोग हम्में हृदय स्थित सत्य आरऽ धैर्य केरऽ ऊ आदर्श के अपनाबे में मदद करै छै । जे शब्द केरऽ कोलाहल में दबी जाय छै ।

9- भारतीय संस्कृति केरऽ पहचान
भारतीय संस्कृति में समय केरऽ गणना आदमी केरऽ जीवन चक्र में जोड़लऽ गेलऽ छै । सब महीना में जीवन केरऽ विभिन्न विधि समैलऽ होलऽ छै । सावन महीना केरऽ आखिरी दिन पुर्णिमा राखी केरऽ त्योहार मनैलऽ जाय छै । भारत में ई बोड़ऽ आरो भावना से परिपूर्ण राखी केरऽ बन्धन त्योहार के मनाबे के पिछे आदमी केरऽ जीवन में एक बाडेऽ संदेश छिपलऽ होलऽ छै । राखी यानि रक्षा सूत्र केरऽ अर्थ छै एक दोसरा के लेलऽ परोपकार जीवन जीना आरऽ रक्षा के लेलऽ सब घड़ी तत्पर रहना। पुराण में चर्चा छै कि देवता आरो दैत्य के बीच युद्ध होलऽ छेले देवता कमजोर पड़ी रहलऽ छेलात । तबे ह राजा इन्द्र के रानी इन्द्राणी ने ब्राह्मण्ड से स्वस्ति वाचन करवाय के दहिना हाथ में रक्षा सूत्र बांधलऽ छेला, ऊ दिन पुर्णिमा छेले । ने भाव से रक्षा सूत्र बांधलऽ गेलऽ छेले ऊर्जा, उत्साह, आरो साहस केरऽ संचार छेली रक्षा सूत्र साबित करी देलके कि केकरा आशीर्वाद में केतना ताकत होता छै । रक्षा सूत्र केरऽ ही फल छै कि देवता विजयी होलाव आरो दैत्य केरऽ हार होले । तभी से रक्षा सूत्र बाँधै केरऽ परम्परा शुरू भेले । अपनऽ परिवार केरऽ रक्षा हेतु संकल्प कामना के लेलऽ राखी के त्योहार सामाजिक रूप लै तोलके । काहे कि ई दिन सावन ट्टतु केरऽ अंतिम भी होता छै । किसान भी नई फसल के लेलऽ अपनऽ आंखऽ में खुशी केरऽ सपना देखे छै । सब तरफ हरिअरे हरिअर देखाबे छै । सब केरऽ मन प्रसन्न देखावे छै । राखी केरऽ त्योहार में खुशी दुगुन्ना होय जाय छै । स्त्री-पुरूष केरऽ बीच सबसे शुभ आरो आत्मा केरऽ सम्बन्धन भाई-बहिन केरऽ रूपऽ में पर्व बनी जाय छै । रक्षा बन्धन मनाबे के पिछे भी कत्ते धार्मिक सामाजिक कथा जोड़लऽ छै । मगर एन्हऽ अनोखा त्योहार भारत जेन्हऽ महान संस्कृति वाला देशऽ में ही संभव छै ।

10- प्रिय चीज केरऽ मोह छोड़ना असली त्याग
एक संत केरऽ जीवन कथा छिके । संत जी बड़ी तपस्वी आरो संयमी छेलत्त। एक दिन टुन्कऽ मन में बिचार ऐल्हें कि हम्में खान- पान पर संयम करी लेलऽ छी लेकिन हमरा दूध पीना बड़ी प्रिय लागे छे। काहे नाय एकरो छोड़ी ढेलऽ जाय। असली त्यागवेहे होवे छै, जबे प्रिय चीज छोड़ी ढेलऽ जाय । तपस्या में सबसे पहिले स्वाद के ही छोड़े ले होप छै । संत जी दूध पीये ले छोड़ी देलकात । सबसे बड़ी आश्चर्य भेले हुन्हीं कठीन संयम करो के 45 साल बित्प्रय ढेलका, एक दिन अचानक हुन्कऽ मनऽ ने कह लके दूध पीलऽ जाय, नांप चाहते होलऽ भी दूध पीये केरऽ इच्छा बढ़ते गेलऽ । संतजी के यहाँ एक धनी जनानी केरऽ आना- जाना छेले । हुन्हीं ऊजनानी से कहलका देवी जी रात में हम्में दूध पीये ले चाहै छी । ऊ जनानी जाने छेली कि संत जी जीवन भर दूध नांय पीये केरऽ प्रतीज्ञा करलऽ छय । जब रात होले तने ऊ जनानी ने करीब 45 हौला दूध से भरलऽ होलऽ संतजी केरऽ कुटिया के बाहर रस देलकी आरो संत जी से कहलकी महाराज, दूध पी ले । संत चौंकी के ऊ जनानी से पुछलका, हमरा ऐर्त्त दूध अकेले पीये पड़ते, एतना हौला कथी ले ? ऊ जनानी कहलकी आखिर 45 सालऽ से दूध पीये ले छोड़ल छऽ ते । ओकरऽ हिसाब से एक ते कागजे ने करथों, संत जी ऊ जनानी केरऽ बातऽ के समझी गेलाता संतजी ने ऊ जनानी से क्षमा माँ गर्त्त होलऽ कहलकात हम्में मनऽ पर टुटते संयम पर काबू पाय लेलऽ छिये । सही मन कोय भी उम्र में विपरीत प्रभाव डाली दै छै। काबू कोर एके तरीका छै अभ्यास । लेकिन सतत अभ्यास जड़ता केरऽ रूपऽ नांय होय जाय एहे से एकरा में चैतन्य बनैलऽ रखना चाहीव आदमी केरऽ मोन बच्चा के तरह चंचल होय छै । कभी ते समय बजाय छे कभी ते कुछ ने कुछ मचाबे लगे छै। मन के नियंत्रित राखे ले नया-नया तरीका खोजे ले पड़े छै । आरो जेकरऽ में नियंत्रित में छै, ओकरऽ नियंत्रित कहियों गलत नांय होय छै ।

11- दो दोस्त
दु दोस्त छेलऽ । एक धर्मात्मा, दो सरऽ नास्तिक, एक केरऽ समय बीतते छेले पूजा-पाठ भजन सत्संग में, दोसरऽ नास्तिक, एक केरऽ समय बीतते छेले पूजा- पाठ भजन सत्संग में, दोसरऽ केरऽ चोरी बदमासी मार-काट में जीवन बिताबे छेलऽ एक दिन कोय काम से एक साथ जाय रहलऽ छेलऽ । रास्ता में नास्तिक ने कहलके तोहें अपनऽ जीवन व्यर्थ में गंवाय रहलऽ छें ? ई जीवन केरऽ कोय भरोसा नांय छै, थोड़ आनन्द से रही लेब ते पिछु पछताय ले नांय पड़तौ । धर्मात्मा ने कहलके हम्में अपनऽ जीवन केरऽ बारे में जाने छी । एहे से हम्में जीवन दे वाला के याद करते रहे छी । जे हमरा जीवन छेला छै, हम्में हुन्से नांय याद करजै ते ई जीवन हमरऽ बेकार नांय होतऽ ? तमिये रास्ता में एक अनहोनी घटना घटले । अचानक धर्मात्मा केरऽ गोड़ऽ में कांटऽ गड़ी गेले। धर्मात्मा कांटऽ निकाले के फेरू साथ चले लागलऽ । कुछ दूर चलला के बाद नास्तिक केरऽ गोड़ऽ में कुछ टकरैले, नास्तिक झुकी के देखलके ते टाक से भरलऽ थैली छेले । नास्तिक हँसते होलऽ कहलके देखऽ तो हे आरऽ हम्में एक साथ जाप रहलऽ छिये । तोरा गोड़ऽ में काँटऽ गड़ल्हों, हमरा टाका गरलऽ थैली मिललऽ । ई देखी के धर्मात्मा करेऽ मनऽ में संदेह पैदा हुवे लायले । एक महात्मा आते देखाई देलके, धर्मात्मा ने प्रणाम करी के अपना संदेह केरऽ निराकरण जाने ले चाहलके । महत्मा कहलका तो हैं अगला जनम में बहुत पाप करलऽ छेले। ई जनम में तोरा फांसी पड़े वाला छेलऽ । लेकिन तोहें पूजा पाठ गजन सत्संग में भगवान करेऽ नाम ले छें, ओकरे फल प्रताप से काँटऽ गड़ी के रही गेलो। तोरऽ जे साथी छऽ अगला जनम में बहुत पुण्यवाला छेलै जप- तप पूजा- पाठ बहुत करे छेले। बहुत बोड़ऽ धनवान बने वाला छेले । लेकिन ई जनम में बहुत पाप करलऽ छै, तही से कुछ टाका मिली के रही गेले । ऐहे से कहलऽ गेलऽ छै कि आदमी के भाग्य ही पूरी तरह से ओकरऽ कर्मो में निहित नांप छै । लेकिन भविष्य में कर्म केरऽ परिणाम के योग केरऽ सहनशीलता पर एकरऽ अवश्य असर पड़े छै ।

12- सद्गुण केरऽ साथ शोभा दे छै धन
एक बार भगवान आरो लक्ष्मी में झगड़ा हो गेलऽ । भगवान करेऽ कहना छै हमरऽ भक्त हमरा बहुत चाहे छै । लक्ष्मी जी केरऽ कहना छेले भगवान तोरऽ भक्त तोरा हमरा चलते याद करे छे। काहे कि जाने छै जहाँ तोहें जेगे वहीं हम्में जरूर जेब जबे झगड़ा बढ़ी गेलऽ तबे भगवान पृथ्वी वासी केरऽ परीक्षा लेबे करेऽ सोचलकात । भगवान एक साधु केरऽ भेष बनाय के एक नगर में ऐला। हुन्हीं एक सेठ से मिलला आरो सेठ से कहलका, हम्में जे नगर में जाय छी लोग नाराण्यण केरऽ गुण गान कर छै। तोहें एन्हऽ व्यवस्था करी सकै छड़ कि ई नगर में हमरऽ सत्संग होय जाय । सेठ ने सत्संग केरऽ व्यवस्था करबाय देलके । सत्संग केरऽ प्रचार- प्रसार चारऽ तरफ करबाय देलकऽ । पूरा नगर केरऽ आदमी प्रवचन सुने ले आवै लागलऽ चार दिन करे बाद लक्ष्मी जी एक वृद्धा केरऽ रूपधरी के नगर में ऐली । एकरा घरऽ के सामने रूकली, ऊ घरऽ के मालकिन कथासुन ले सत्संग में जाय रहलऽ छेली । लक्ष्मी जी ने हुक्का रोकलके आरो पीये ले पानी मांगलकी । मालकीन छे छेली गुस्साय के पानी देलकी । लक्ष्मी जी पानी पीय के लोटा मालकिन केरा हाथऽ में दे देलकी, लोटा देखी के चौंकी गेली लोटा सोना केरऽ होय गेलऽ छेले । मालकीन लक्ष्मी जी केरऽ गोड़ परगिर गेली, आरो अपनऽ धडर लै आनलकी आदर सत्कार के साथ राखी लेलकी । धीरे- धीरे ई बात चारऽ तरफ फैली गेलऽ पूरा नगर केरऽ लोग लक्ष्मी के अपना घरऽ में नौता देबे लागलऽ । कथा सत्संग में भीड़ कम होय लागलऽ । आठवां दिन सेठ भी लक्ष्मी के नौता भेजलकऽ । लक्ष्मी जी कहल की तोरा धडर जे साधु रहे छों, वू जहाँ रहे छै हम्में वहाँ नांय जाय छी। सेठ ने साधु से कहलकऽ, तोहें कोय दोसरऽ इन्तजाम करी ले अबे हम्में तोरा नांय राखै ले पारभों । आखिर भगवान के वहाँ से जाय ले पड़ले छे । कहानी व्यक्तिगत छे, एकर अर्थ छै कि भगवान के जाते ही नगर में पाप, अत्याचार केरऽ बोलवाल होय गेले । नारायण केरऽ अर्थ छै ऊ गुण जेकरा में सत्य, दया, क्षमा, प्रेम, अक्रोस आदि मिललऽ होय छै । ई गुण जहाँ होय छै वहीं वास्तविक लक्ष्मी होय हथीन ।

13- अपन विचार, दोसरा के लेलऽ शिक्षा
कुछ महान लो गअपनऽ सही उपयोग करी के दुनिया के एक बाड़ेऽ समाचार दै छथीन । हुन्कऽ साधारण काम व्यवहार आबे वाला पीढ़ी के लेलऽ स्मरणीय हो जाय छै । बहुत समय पहिले केए बात छिके, एक बेर महात्मा गाँधी भाषण लेबे ले इंग्लैंड गेलऽ छेलात । हुन्का वहाँ अध्यक्ष बनी के भाषण दे ले छल्हें । एकरा से पहिले वहाँ कुछ लोगऽ के खिलाबे-पिलाबे केरऽ इन्तजाम छेले । गाँधी जी सब करेऽ खैलऽ पिलऽ थरिया- गिलास धोवे लागलात । आए व्यवस्था केर एक हिस्सा काम अपनऽ हाथऽ में लै लेलका । लोगे सनी वहाँ गाँधी जी के गंदा साफ करते देखलके ते सोचे लागले कोय नौकर-तौकर होते । लेकिन सब बात सुनला के बाद भी गाँधी जी अपनऽ काम में लगाये के करते रही गेलात । थोड़ऽ देरी के बाद जूठऽ धोवेवाला आदमी के मंच पर अध्यक्ष बनी के भाषण देते सुनलके सभी अचरजऽ में पड़ गेले । अंग्रेज सब भी हुन्कऽ स्वभाव पर चकित रही गेले । गाँधी जी अपनऽ जादू चलाय छै देलऽ छलथीन । गाँधी जी चेहरा केरऽ जो अपनऽ जादू चलाय देलऽ छलथीन । गाँधी जी चेहरा केरऽ जादू गर छेलथीन । बिल्कूल वहे रंऽ, जेरंऽ भगवान श्री कृष्णा छेलथीन युधिष्ठिर जबे यज्ञ करलऽ छेला, ऊ यज्ञ में श्री कृष्णा भी अतिथि के जूठऽ मांजलऽ छेलात । आरो सभे केरऽ सेवा भी करलऽ छेलात । काम खतम भेला पर पूजा व्यक्ति के पूजा करै केरऽ समय ऐले ते पाण्डव ने श्रीकृष्ण के आसन पर बैठाय के पूजा करलऽ छेला । श्रीकृष्णा आरऽ गाँधी जी, जाने छेला कि ई सबसे जोड़ऽ काम नांय छिकऽ कि हम्में करी रहलऽ छीये । सब से बोड़ऽ काम ऐही छिके कि कैसे कारी रहलऽ छीये । सेवा ई बातऽ केरऽ संदेश दे रहलऽ छै कि कोय काम बाड़ेऽ या छोड़ऽ नांय होय छै । हम्में की नीयत से आरो की भाव से ओकरा करी रहलऽ छिये ऐहे महत्व पूर्ण होय छै ।

14- गरीब केरऽ गुहार भगवान सुने छथीन
जिन्दगी केरऽ परेशानी से पस्त होलऽ एकरा जनानी किराना दुकान पर पहुँचली । दोकनदारऽ से एकदम दीन-हीन होय के बोलले हमरऽ पति केरऽ तवियत बहुत खराब छै । जों तो हें कुच्छु उधार देतल्हे, ते हम्में अपनऽ पति आरो बच्चा के कुच्छु खिलैतीये । पति केरऽ तबियत ठीकह होते काम पर जाय लागबऽ पैसा मिलते ही सबसे पहिले तोई कर्जा उतारबऽ । वहे दोकानऽ पर एकरा गंहकी ऊजानानी केरऽ बात सुनी रहलऽ छेले । दोकनदारऽ से कहलके एकरऽ जरूरत केरऽ सामान दै दहऽ । पैसा हम्में दै देभों । दोकनदार जनानी से पुछलके तोरा पास सामान केरऽ चिट्ठा ते होथों ने ? जनानी कहलके हों चिट्ठा छै । दोकनदार एकरा चिट्ठा बराबर सामान दे देबो । कत्ते होवे करते ? अपनऽ जरूरत वाला सामान के चिट्ठा तराजू पर चढ़ाबऽ जेत्ते भारी चिट्ठा होथों ओतने सामान दे देभों । जनानी कहलकी हे भगवान चिट्ठा कत्ते भारी होते ? मन हताश करी के चिट्ठा तराजू पर चढ़ैलकी । झोला हाथऽ में पकड़ी के खड़ी छेली । चिट्ठा बराबर एक मुठ्ठी कुच्छु मिलतऽ । भगवान केरऽ एन्हऽ माया तराजू केरऽ एक पल्ला एक दम धरती में सटी गेले । ओकरऽ जरूरत केरऽ जेते सामान छेले, जबे सबकुछ दोकनदारें तराजू पर चढ़ैलके, तबे तराजू केरऽ पलना बराबर होले । ई देखी के दोकनदार चिढ़ै लागले, माय गे माय ई चिट्ठा छिके कि की छिके, जल्दी से उठाय कै चिट्ठा देखे लागले, चिट्ठा में लिखलऽ छेले, हे भगवान हमरा की जरूरत छे, तोहें जाने छऽ । हम्में तोरे भरोसे चिट्ठा तराजू पर चढ़ाय रहलऽ छिये । अचरजऽ से दोकनदार केरऽ माथऽ ठनके लागले । सब सासमान निकाली के दे लागले । जनानी भगवान के गोड़ लागी के सब सामान झोला में भई लागली गहंकी ने छेले ओकरऽ रकम पुछलके आरो दोकनदारऽ के पैसा देते हुवे कहलके हमरऽ पैसा आज ई कामऽ में लागी के, हम्में धन्य होय गेलां । आज प्रत्यक्ष देखे ले मिललऽ कि प्रार्थना सच्ची होय छै ते भगवान जरूर सुनै छथीन गरीब लाचार केरऽ मदद करै ले सब समय तैयार रहे छथीन ।

15- पाप छुपैला से नांय छुपे छै ।
पाप छुपैला से नांय छुपे छै । कोय न कोय रूपऽ में सामने आइये जाय छै वहे तरह छल- कपट वाला देखार होइये जाय छै । जबे समुद्र मंथन होय रहल छेले, वेहे बीचऽ में राहुऽ छल कपट केरऽ नियत से देवता केऽ बीचऽ में ढुकी के बैठी गेलज । देवता सनी राहु के नांय देखे ले पारलका समुद्र मंथन में चौदहरत्न निकललऽ छेले । जेमे अमृत भी निकललऽ छेलै । विष्णु भगवान देवता सभी के अमृत पिलाय रहलऽ छेलात । राहु भी देवता सनी के पंगती में बैठी के अमृत पी लेलकऽ । मने- मने खूब खुश छेलऽ, हमरा से छुपाय के अपने सब अमृत पीये छेला । आज हम्में भी अमृत पी लेलां । अबे हमरा कोय नांय मारे ले पारतऽ । धोखे बाज राहु के सूर्य आरो चन्द्रमा ने राहु के अमृत पीते देखी लेलकात । तुरंत ई बात विष्णु के कहलका, राहु धोखा से हमरा सनी के साथे अमृत पीलेल छै । भगवान विष्णु गुस्सा में आबी गेला आरो अपनऽ चक्र से राहु केरऽ माथऽ देहऽ से अलग करी देलका । तब तक राहु अमृत पी चुकलऽ छेले । तही से राहु नायं मरले । ओकरऽ माथऽ वाला भाग राहु, आरो देहऽ वाला भाग केतु बनी के प्रकट होय गेलऽ । भगवान सबके साथ लड़ा ये शुरू करी देलकऽ । अरे धोखेवाज धोखा से अमृत पीबी के लड़ाये करते लाज नांय लागे छऽ । सूर्य आरो चन्द्रमा से बैर राखै छें ? राहु चुपचाप सुनते रहलऽ । समय ऐला पर राहु सूर्य- चन्द्रमा के ग्रसीये ले छै । काहे कि अमृत के असर राहुवऽ के छेले । ऐसे से कहलऽ गेलऽ छै कि छल- कपट वाला आदमी से दूरे रहना चाहिवऽ । काहे कि जे ई अपनऽ कुमति व्यवहार में सफल होय गेलऽ एकरऽ दुष्ट करनी केरऽ प्रभाव, ग्रहण आरो आदमी पर पड़बे करै छै ।

16- भेद भाव से लक्ष्य कमजोर होय जाय छै ।
ताड़का नाम केरऽ एक राक्षसनी छेली, ओकरऽ बेटा मारीच, विश्वामित्र मुनि के बहुत परेशान करै छेलऽ । महर्षि विश्वामित्र यज्ञ- जाप पूजा- पाठ नायं करै ले पारे छेलात । राक्षस केरऽ व्यवहार से ऊबी गेलऽ छेला । एक दिन राजा दशरथ के पास अयोध्या गेलात, आरो श्री राम, लक्ष्मण के माँगलका । हम्में राक्षस केरऽ उपद्रब से यज्ञ नांय करे ले पारे छी । राम- लक्ष्मण दोनों भाय ताड़का केरऽ बधकरी देता, हम्में निशि्ंचत होयेके यज्ञ करबऽ । दशरथ राम- लक्ष्मण के विश्वामित्र के पास आश्रम में भेजी देलकात । राम- लक्ष्मण आश्रम केरऽ रक्षा आरो मुनि केरऽ सेवा में तत्पर रहे लागला । ताड़का आश्रम पर आक्रमण करलकी । श्री राम युद्ध करै ले तैयार होय गेलात । ई दशा देखी के विश्वामित्र राम से बोल, तोहे दोनों राजकुमार क्षत्रीय छिक्खऽ, क्षत्रीय जनानी पर प्रहार नांय करे छै । जे उद्देश्य से अपने आलऽ छऽ, ओकरऽ शुरू भी होप रहल छै । आज अपने दोनों भाय पहली बार कोय राक्षस के मारभऽ । आरो वो हो एक जनानी के ? एन्हऽ करते कहीं अपने भ्रमित ते नांय होय जेभऽ । राम जबाब देलकात प्रश्न- ई नांय छिके कि जनानी छिकी कि मरदाना । प्रश्न ई छिके कि दुष्टता कहाँ बसे छै । हमरा दुष्टता केरऽ जड़ऽ पर प्रहार करना छै । आरो योद्धा के एकरऽ भेद-भाव नांय होना चाहीवऽ यदि पुराणऽ बात पर रही के सामने केरऽ व्याख्यानां करलऽ जाय ते फल अच्छा नांय ऐते । श्री राम ताड़का केरऽ बधकरी देलकात । एहो एक संयोग केरऽ बात छिके । श्री राम आरो श्री कृष्ण अवतार राक्षस के संहार केरऽ शुरू जनानी राक्षसणी के मारी कैकरलऽ छेलाता । श्री राम ने ताड़का के मारल छेला । आरो श्री कृष्णा ने पूतना के मारी के अपनऽ काम करेऽ जय गणेश करलऽ छेला । दोनों करऽ मत छै कि अनुचित कैसनऽ हुवे ऊ क्षंमा योग्य नांय छै । भेद भाव केरऽ फेरा में लक्ष्य कमजोर पड़ी जाय छै । सही रूप में एहे कहलऽ जाय सके छै कि जबे आदमी के सामने लक्ष्य बोड़ऽ होय ते अपनऽ नियम में सही देखाबे ले पड़े छै । परंपरा के देश, काल, समय केरऽ अनुसार नया दृष्टि से देखे केरऽ समझ भी जरूरी हो जाय छै ।

17- अपनऽ कमाई से मिलै छै गृहस्थि केरऽ सुख
एक बहुत वृद्ध आदमी लोगऽ के धरम्- करम केरऽ शिक्षा दे छेला । हुन्हीं ज्यादे करी के स्वाब लम्बी केरऽ बात करे छेलात । हुन्सऽ दोस्त केरऽ मृत्यु होय गेल्हें । हुन्हीं जाने छेला कि दोस्त केरऽ बेटा अवारा आरो आलसी छै । वें बाप केरऽ बचलऽ- खुचलऽ धन दुरपयोग करतऽ, आरेा सब धन खतम करी देतऽ । अपने गरीब होय जाता, पुरे परिवार के दरिद्र बनाय देतऽ चिन्ता से बेचेन वृद्ध आदमी अपन दोस्त केरऽ धडर गेलात । दोस्त केरऽ बेटा जाने छेलऽ हुन्खा आदर- सत्कार के साथ बैठलकऽ, आरो नेवता देलकऽ कुछ दिनऽ के बाद दशहरा पर्व (परब) आबी रहलऽ छै । अपने दशहरा में भोजन करैल जरूर अइहऽ । वृद्ध आदमी मनऽ में कुछ सोचलकाऽ हों, करी देलक दशहरा के दिन मरलऽ दोस्त के घऽर पहुँचला । दोस्त केरऽ बेटा धन उड़ाय रहलऽ छेलऽ । वृद्ध आदमी के सामने बढि़यां- बढि़यां खाना परोसलकऽ, बहुत तरह केरऽ इन्ताजाम करलऽ छेलऽ । पहिला कौर उठैलका, ई ते वासी खाना छिका ? दोस्त केरऽ बेटा चौंकी गेले, कहलके खाना अखनी तैयार होलऽ छै । वासी किए रहते । वृद्ध जबाब देलका हमरा ते पच्चीस साल पहिले केरऽ गंध आबी रहलऽ छौ । लड़का इशारा में कहलऽ गेलऽ बात समझी गेले, पिता केरऽ दोस्त ई कहे ले चाही रहल छय कि ई खाना जे बनैलऽ छें तोरऽ पिता केरऽ अरजलऽ छिकौ । तोरऽ अरजलऽ नांय छिकौ । जे दिन अपनऽ कमाई केरऽ खाना खिलैबे ओकरऽ जाता स्वाद अलग होतौ । सच बात छै अपनऽ परिश्रम से जे धन कमाबे छै । ओकरऽ कीमत होय छै । पुरखा केरऽ अरजलऽ धन मिलना सौभाग्य केरऽ बात छिकै । ओकरा में वृद्धि करना आरऽ सही ढंग से उपयोग करना पुरूषार्थ छिकै ।

18- विवेक केरऽ व्यवहार से काम पूरा होय छै
पुराणऽ केरऽ एक कथा छिके, एक बेर स्वर्ग में अचानक गीड़ भरे लागते । जेउरा देखऽ वह स्वर्ग आय रहलऽ छै । स्वर्ग केरऽ अधिकारी के चिन्ता भेले कि एते लोगऽ के लेलऽ जग्धऽ यहाँ नांय छै । मनऽ में विचार करल का आखिर ई सब की कारण से स्वर्ग केरऽ योगा बनी रहलऽ छै ? पता लगले कि जे लोग सोमनाथ केरऽ यात्र छै, चाहे कितनो पापी दुष्ट रहे, स्वर्ग केरऽ हकदार हो ही जाना छै हेरंऽ वहाँ आदमी केरऽ संख्या ज्यादे हुव ेलागले । तबे देवता सनी अकबकाबे लागला, अबे की करलऽ जाय । इन्द्र भगवान कहलकात चलऽ भगवानशंकर केरऽ पास । जाय के कहलकात हे भोले नाथ अपने कोय उपाय करऽ नांप ते हेरंऽ स्वर्ग अस्त- व्यस्त होय जेतऽ । शिव जी पार्वती के तरफ देखलका, पार्वती शिवजी केरऽ मनऽ के बात समझी गेली । गणेश जी केरऽ रचना करलकी आरो गणेश जी के आज्ञा देल की कि सोमनाथ केरऽ रास्ता में बाधा पहुँचाब, जेमे लोगऽ केरऽ यात्र सफल नांय होवे पारे । गणेशजी रास्ता में काम आरऽ मोह जेन्हऽ दुर्गुन उत्पन्न करी देलका । लोगऽ में भ्रम फैली गेले । आरो एकरा से स्वर्ग जाय बाला केरऽ भीड़ कम होय लागले । एहे से गणेश जी के विघ्न करे केरऽ कारण हिनकऽ नाम विध्नेश्वर कहलऽ गेलऽ छै । जे हुकऽ पूजा मनऽ से करे छै, जोकरऽ विघ्नहर छथीन । ई घटना केरऽ पीछे एहे संदेश छै कि गणेश जी बुद्धि आरो विवेक केरऽ देवता हथीन । सब काम में वाधा ते एबे करे छै काहे कि प्रकृति हमरऽ परीक्षा ले छै । जो हम्में अपनऽ बुद्धि आरेा साहस केरऽ पूजा करबे, ओकरऽ अनुसार काम करथे ते अपनऽ जग्हाऽ पर आसानी से पहुंची जेबे । के बेर लोगऽ के लागे छै कि अबे हम्में सही रास्ता पर चले छी तइयो बहुत बाधा आबे छे । ई सामान्य विचार बनी गेलऽ छै कि अच्छा लोगऽ के अच्छा काम करे में बहुत मुश्किल केरऽ सामना करे ले पड़ै छै । एकरा पीछे भी भगवान केरऽ एक विधान छै ।
19- अच्छा विचार जहाँ मिले, लेना चाहीव ।
अच्छा बात जहाँ से मिले, जरूर लेना चाहीव आरे शब्द के जमाकरी के औकरे (दस्तावेज) बनाना चाहीव । काहे कि समय बीतलऽ जाय रहलऽ छै । आबे वाला पीढ़ी के ऐही से पता चलते कि उच्च विचार एन्हऽ होय छै । एक विद्वान छेलात, हुन्खा एकरा में रूचि नाय छेले कि हुनकऽ साहित्य छपे । जे राज्य में हुन्हीं रहे छेला, वहाँ केरऽ राजा बार- बार हुनखा पर जोर डाले छेला कि तोरऽ साहित्य के छपना जरूरी छै । विद्वान जे छेला, राज्य छोड़े केरऽ विचार बनाय लेलका । राजां ने हुन्खा जाय केरऽ बचन दै देलका, लेकिन एकरा शर्त लभाय देलका कि तोहें राज्य छोड़ी के जाभे ते कियाली (चुंकी) चुकाबे ले पड़थों । कियाली के रूपऽ में अपनऽ साहित्य हमरा छपबाबे के लेलऽ दे ले पड़थों । ऐहे रंऽ एक घटना एक दोसरऽ विद्वान के साथ घटले । हुन्का पास एक दोसरऽ विद्वान पहुंचला हुन्हीं बहुत अच्छा शहित्य लिखलऽ छेलात । ओकरऽ अंग्रेजी में अनुवाद भेलऽ छेलेऽ आरऽ लेदन केरऽ एक प्रकाशन ओकरा छावलऽ छेले । एक दिन रचना केरऽ संग्रह मांगलका । पढ़ला केरऽ बाद हुन्खा लागल्हें कि ऊ विद्वान केरऽ बराबरी में, हमरऽ साहित्य कुछ भी नांय छै । विद्वानऽ से निवेदन करलका कि अपने जे अनुवाद करलऽ छऽ बहुत सुन्दर छै । हमरा अपनऽ काम पर लाज लागी रहलऽ छै । कृपा करी के एकरा छपबाबऽ । विद्वान बोललात ई शब्द हम्में छपबाबे ले नांय लिखलऽ छिये । विद्वान आत्म प्रचार से विमूख हथ । पहला विद्वान जे छेलात, दोसरऽ विद्वान के तैयार नांय करे ले पारलका । आरे हुन्ख अमूल्य साहित्य बिना छपले रही गेल जो आज ई साहित्य प्राप्त होतल ते जरूर नयी पीढ़ी के बहुत बोड़ऽ काम करेऽ चीज होतले ऐही से अच्छा विचारऽ के जमा करी के छपबाबे में सख्ती से निबेदन करै ले पड़े तो भी करना चाहीव । काहे कि ई भी एक धरोहर छिकै ।
20- रंगरूप नांय योग्यता देखलऽ जाय छै ।
देह केरऽ बड़ाई वाला ई संसार में सुन्दरता केरऽ आँख से रंग-रूप केरऽ बहुत विशेषता छै । गोरऽ चकड़ी आरो कारऽ चमड़ी ले के बहुत देराऽ में सामाजिक युद्ध तक होय चुकलऽ छै । गोरऽ रंग कत्ते आदमी के लेलऽ घमंड केरऽ कारण बनी जाय छै । एकरऽ विपरीत कत्ते आदमी सांबर रंग के कारण हीन भावना से घिरी जाय छै । जे अदमी के पास योग्यता छै ते देहऽ के रंग छिपी जाय छै । संसार के लोग जेकरा वेद व्यास केरऽ नाम से जानै छै । हुन्ही वेदऽ केरऽ संपादब करल छेलात । गुरू पुर्णिमा भी हुन्खें नामऽ से जानलऽ जाय छै । वेद व्यास केरऽ असली नाम द्वैपायन छेलहें । कोहकि हुन्खऽ जनम नदी केरऽ बीच टापू पर होलऽ छेल्हें । सांवर या कारऽ रंग होला के कारण कृष्णा भी कहाबै छेलात । द्वैपायन ने खाली वेद केरऽ संपादन नांय बल्कि पुराण, भागवत आरो महाभारत केरऽ कळाा भी लिखलऽ छथीन । ऐहे से हुन्खा व्यास चाहे वेद व्यास कहलऽ जाय छै । हुन्हीं बहुत बोड़ऽ विद्वान छेलात, अपनऽ साहित्य करेऽ जे संपादन करलऽ छथ, ओकरा में ज्ञान केरऽ प्रमुखाता देलऽ छथीन वल्कि जानकारी केरऽ संकलन भी करलऽ छथीन । हुन्खऽ महाभारत में जो सब छै, ऊ सब ई संसार में भी नांय छै । वेद व्या केरऽ समूचे चरित्र से ई स्पष्ट सूचना मिले छै कि देह केरऽ रंग रूप से आदमी केरऽ गुण आरो योंग्यता के अन्दाज नांय करलऽ जाय सके छै । देह के भीतर एक आत्मा छै, असल में हृदय आरऽ बुद्धि केरऽ संतुलन जे बात से होप छै, ओकरा लेलऽ देह एक माध्यम छै कारण नांय । ऐहे से चमड़ी केए रंग पर नांय जाय के आदमी केरऽ योग्यता आरो गुणऽ पर ध्यान देना चाहीव । ऐही सही मूल्यांकन होतै ।
21- भाव दूषित भेला से साधना वेकार
एक संत छेलात, हुन्खऽ भक्तिमय जीवन केरऽ बड़ी नाम छेल्हें । हुन्हीं नियम से जप- तप करे छेला आरेा मंदिर में भगवान केर दर्शन करे ले जाय छेला । एक दिन सपना देखलका कि हमरऽ मृत्यु होय गेलऽ छे । हुन्हीं देव दूत केरऽ सामने खड़ा हथ । देवदूत सभे मरलऽ लोगऽ से पुछी रहलऽ छथ कि तो हें की शुभ- अशुभ करलऽ छऽ । अपनऽ जीवन केरऽ हिसाब- किताब दहऽ कुछ देरी के बाद संत जी केरऽ पारी ऐल्हें, हुखा से भी पुछलऽ गेलऽ तो हें बताब अपनऽ जीवन में की कुछ काम करलऽ छऽ जेकरा से तोरा कुछ पुण्य मिललऽ होय ? संत जी सोचऽ में पड़ी गेला, हमरऽ ते सारा जीवन पुण्य कामऽ में बितलऽ छे । हम्में कौन एक काम बतैये । हम्ें पांच बेर देश केरऽ तीर्थ यात्र करी चुकलऽ छिये । देव दूत बोलले, तोहें तीर्थ यात्र से करल्हे, लेकिन अपनऽ बड़ाये हर आदमी के सुनाबे छेल्हऽ, ऐहे से तोरऽ सब पुण्य नस्ट होय गेल्हे । एकरऽ अलाबे कोय दोसरऽ पुण्य करलऽ छऽ ते बताबऽ ? संतजी के भारी ग्लानि होय लागल्हें, कुछ देरी मुंह बनाय के खड़ा रहला । हिम्मत करी के बोलला, हम्में रोज दिन भगवान केए नाम जपे छेलां ध्यान में भगवान के ही राखै छेलां । देवदूत कहलके जबे तोहें भगवान केरऽ ध्यान करै छेल्हऽ आरो वहाँ कोय दोसरऽ आदमी आबे छेल्हों तेा तोहें कुछ देरी आरऽ जप करे छेल्हऽ ? एतना सुनते संत जी केरऽ हृदय कांपे लागल्हें । हुन्खा लागे लागल्हें कि हमरऽ अबतक केरऽ सब तपस्या वेकार गेलऽ । देवदूत बोलले तोहे आरो कोय दोसरऽ पुण्य करेऽ काम बताबऽ ? संत जी के कोय एन्हऽ काम याद नांय आबे लागल्हें । ऐतने में हुन्कऽ नींद खुली गेल्हें । सपना केरऽ घटना से पश्चाताप केरऽ आंखी से लोर गिरै लागल्हें । सपना केरऽ घटना से मन केरऽ कमजोरी समझे केरऽ मौका मिलल्हें, संतजी वेहे दिनऽ से सबसे मिलना- जुलना प्रवचन आदि छोड़ी देलकात । आरो मन लगाय के भक्ति- भाव में जुटी गेला । कर्म आरऽ ध्यान स्तर पर करलऽ गेलऽ, कभी-कभी दिखावा नाम, आरो यश आदि दुनियां के कामना से ओझरालऽ होय छै । जों एकरा प्रति सचेत नांय रहलऽ जाय ते ई हमरऽ प्रगति के रोकी सकै छै ।
22- शिक्षा सब से प्रभावी
संत तिरूवलरवर जोल्हा छेला, हुन्हीं रोज अपनऽ बुनलऽ कपड़ा बाजार ले के जाय छेला । कपड़ा बेची के अपनऽ बाल- बच्चा पोषे छेला । एक दिन बाजार में एक आदमी संत जी के पास पहुँचलऽ, हुन्कऽ नम्रतापूर्वक बात सुनी के साधु केरऽ ढोंग समझी के हुन्काऽ परीक्षा लेबे केरऽ सोचलकऽ एक साड़ी उठाय के दाम पुछलकऽ । संतजी एक टाका बतैलका, आदमी ने साड़ी के दु टुकरा करी के दाम पुछलक, संत जी आठ आना बतैलका । आदमी फेरू दु टुकरा करी के दाम पुछलकऽ संतजी एकदम शांत होय के चार आना बतैलका । ई तरह से ऊ आदमी साड़ी के टुकरा- टुकरा करते गेलऽ आरऽ दाम पुछते गेलऽ साड़ी केऽ दाम खतम होय गेलऽ । सेत जी चुपचार देखते रही गेलात आदमी अपनऽ धन केरऽ घमंड देखाते होलऽ दु टाका संत जी के देते हुवे कहलकऽ ई धिक्खों तोरऽ साड़ी केरऽ दाम । संत जी केरऽ आँखो से लोर चुवे लागल्हें । भाय जबे तोहें साड़ी किनबे नांय करल्हऽ हम्में साड़ी केरऽ दाम किरंऽ लेबै ? आदमी के भी पछतावा होवे लागले । तबे संत जी बोलला, बेटा, साड़ी केरऽ मेहनत केरऽ दाम दै सके छऽ ? एकरा लेलऽ किसान सालभर खेत में पसीना बहाबे छै, हमरऽ कनियाय सूत काटै छै आरो बुनै में रात- दिन लागलऽ रहे छै । हमरऽ बेटी सूतऽ रंगे में आरऽ हम्में ताना- बाना करी के साड़ी केरऽ रूप दै छिये । ओकरऽ बाद बाजार में लाये के बेचै छिये, तबे हमरासनी के रोटी मिले छै । एतना सुनते- सुनते ऊ आदमी के आँखी से लोर छलके लागले । संतजी से क्षमा मांगलकऽ आरो भविष्य में केकरो साथ हैरंऽ व्यवहार नांय करे केरऽ किरिया खेलकऽ । ऊ आदमी संतजी से पुछलकऽ तोहें पहिले ही रोकी के ई बात कही सके छेल्हऽ फेरू हैरंऽ काहे नांय करल्हऽ ? संतजी कहलका जो तोरा हम्में पहिले ही रोकी देतिहों ते तोरऽ संशय पूरा तरह से नष्ट नांय होति हों । आरो तोहें शिक्षा के आत्म शांति नांय करै ले पारतिहऽ । दया आरो क्षमा के साथ देलऽ गेलऽ शिक्षा आदमी के बदली के राखी दै छै । आगे ओकरऽ प्रभाव अचूक होय छै ।
23- राखी केरऽ नाता
बात धरम केरऽ भाय- बहीन केरऽ छिके । हमरऽ माय दिल्ली अस्पताल में भरती छेली, पेट केरऽ आपरेशन होय वाला छेल्हें । हम्में बड़ी चिन्ता में छेलां । डॉक्टर की कहतऽ माय बचती की नांय ? ऐहे सब सोचे छेनां, नर्स आबी के कहलकी खून केरऽ व्यवस्था जल्दी करऽ, तोरऽ माय केरऽ हालत खराब छोंड । देहऽ में खून एकदम नांय छोड । हम्में कहलिये ई अस्पतालऽ में खून नांय मिलतै ? नर्स कहलकी तोरऽ माय के सात यूनिट खून केरऽ जरूरत छै । यहाँ ते दुइये यूनिट खून छै । पांच यूनिट खून केरऽ व्यवस्था करऽ । हमरबाबू आर हमरऽ बहनोये (जीजा) दोनों अपनऽ- अपनऽ साथी- संगी से आग्रह करी के थकी गेला । कहीं कोय ग्रुप केरऽ खून नांय मिललऽ । ठीक राखी केरऽ दिन हम्में पीसीओ पर सब परिवार से ओ ग्रुप केरऽ खून के बारे में फोन पर पुछी रहलऽ छेलिये । सब जग्छऽ से नांय केरऽ जबाब आबी रहलऽ छेले । हमरऽ चिन्ता के मारे हालत खराब छेलऽ । अबे माय केरऽ की होतऽ । वहीं बाहर एकरा जनानी हमरऽ बात सुनी रहलऽ छेली । हम्में फोन रखी के बाहर ऐलिय, वें हमरा से पुछल की केकरा खून केरऽ जरूरत छै । हम्में कहलिये हमरऽ माय के ओ ग्रुप केरऽ खून तुरंत जरूरत छै । जनानी ठेा कहलकी तोहें तुरंत हमरा साथे चलऽ, हमरऽ खून ओ ग्रुप छै । ई सुनी के हमरऽ खुशी केरऽ ठिकानऽ नांय रहलऽ । ओकरा लै के तुरंत खून निकलवाबे गेलिये । खून गेनेसन केरऽ काम शुरू होय गेले । हमरऽ जानऽ में जान ऐलऽ, अबे माय बची जेती । माय करेऽ इलाज शुरू होय गेले, खून चढ़े लागले । खून देला के बाद हम्में दोनों बातचीत करे लागलिये, पता चलले कि हुन्क नाम शांति छै । आरऽ हुन्हीं एक प्रतिष्ठित संस्थानऽ में काम करे छै । हम्में पुछलि हें कि तोरा कोय भाय छोंऽ ? हुन्खऽ मोन दुखी होय गेल्हें, आँख? में लोर भरी के कहलकी नांय । हम्में तुरंत राखी देखाय के कहलिहें, हमरऽ बहीन ससुरार से भेजलऽ छेली, ले ई खारी हमरऽ हाथऽ में बांधी के आज से हमरा अपनऽ सहोदर भाय समझऽ । शान्ति ने तुरंत हमरऽ हाथऽ में राखी बांधी देलकी । शान्ति के खुशी केरऽ ठिकानऽ नांय छै, कि आज हमरा भायं मिललऽ । शान्ति दिल्ली में रहै छै, फोन पर हमेशेर बात- चीत होते रहै छै । रक्षा सूत्र केरऽ हम्ेमं हार्दिक स्वागत करै छी । आरो, शान्ति बहीन के हृदय से सम्मान करे छिहेन, धन्यवाद दै छिहेंन कि देवदूत बनी के ऐली आरो हमरऽ माप केरऽ जान बचैलकी ।
24- सिद्धांत आरऽ व्यवहार दोनों जरूरी छै ।
बात त्रेता युग केरऽ छिके । राजा दशरथ अपनऽ चारऽ बेटा के मूनि केरऽ आश्रम में भेजलऽ छेलात विद्या अर्जन करै वास्ते । राजा दशरथ चाहतला ते चारो के राज महल में शिक्षा दिलवाय सके छेलात, लेकिन आश्रम में सबके साथ ही के जे ज्ञान आरऽ अनुशासन, व्यवहार सीखता से घरऽ में रही के नांय होय ले पारते । चारऽ राज कुमार सामान्य विद्यार्थी के साथ रही के पढ़ै छेला । विद्या ग्रहण करे में अनुशासन केरऽ महत्व बहुत बोड़ऽ छै । आश्रम में जे तरह से मेहनत करालऽ जाय छैले राज महलऽ में नांय होय ले पारतले । जबे चारो राजकुमार पढ़ी के राजमहल लौटला, तबे एक आरो घटना घटलऽ, विश्वामित्र नाम केरऽ मुनि राजा दशरथ केरऽ पास ऐला । कहलकात वनऽ में हमरऽ आश्रम छै, ओकरा राक्षस बर्बाद करी रहलऽ छै । बहुत परेशानी छी यज्ञ में बाधा पहुँचाबे छै । सभे ट्टषि मूनि के परेशान करी रहलऽ छै । संस्कृति के बचाबे ले आरो यज्ञ सम्पनन करे ले अपने हमरा राम- लक्ष्मण के यज्ञ केरऽ रक्षा करै ले दे । दशरथ ई बात के लेलऽ तैयार नांय छेला । हुन्कऽ कहना छेले कि राज कुमार ज्ञान प्रापत करी लेलऽ हथ, आरो राज महल में रही के आगे केरऽ ज्ञान प्राप्त करी लेता । लेकिन हुन्कऽ गुरू वशिष्ठ ने कहलका, राम- लक्ष्मण के विश्वामित्र के साथ जाय ले दहऽ । काहे कि व्यवहार, ज्ञान हिन्के से मिलते राम- लक्ष्मण विश्वामित्र के साथ वन चलऽ गेला । वनऽ में रही के यज्ञ करेऽ रक्षा करलकात । राक्षस के मारी-मारी के संहार करलका ट्टषि- मूनि केरऽ यज्ञ सकुशल संपन्न होल्हें । राम- लक्ष्मण मूनि के साथ जनकपुर गेला । धनूष यज्ञ में शामिल होय के गुरू केरऽ आज्ञा पाय के धनूष तोड़लका, आरऽ अपनऽ पुरूषार्थ दुनियां के देखैलका, राम केरऽ बीहा सीता के साथ, लक्ष्मण केरऽ उर्मिला के साथ, भरत केरऽ मांडवी केरऽ साथ आरो शत्रुधन केरऽ सुतिकृति के केरऽ होय गोलऽ । बीहा करी के अयोध्या लौटला, वेहे समय राम जीवन केरऽ यर्थात पक्ष जानलका, मतलब ई मेले कि जैते लालन- पालन में बच्चा के सिद्धांत केरऽ आरो शिक्ष केरऽ महत्व छै, ओतने महत्व व्यवहार शिक्षा केरऽ भी छै । आज के समय में शिक्षा के रोजगारऽ से जोड़ी के नया- नया प्रयोग होय रहलऽ छे अबे ई माजी लेलऽ गेलऽ छै कि जीवन में वे है विद्यार्थी सफल होते जे सिद्धांत, केरऽ शिक्षा के साथ जीवन संघर्ष केरऽ जानकारी भी प्राप्त करते । विद्यार्थी के लेलऽ अपनऽ जीवन में किताबी ज्ञान केर अलावा, व्यवहार केरऽ ज्ञान भी बहुत जरूरी छै ।
25- जीवन केरऽ ज्ञान शिक्षा से मिले छे ।
शिक्षा हमरा, ज्ञान आरो जानकारी ही नांय दे छै, बल्कि कौन तरह से जीन चाहीवऽ एकरऽ संकेत भी दे छै । सब प्राणी केरऽ भीतर परमात्मा केरऽ वास होय छै । जनम होला केरऽ बाद कोय भी जो केरऽ होवे ओकरा भीतरा भगवान केरऽ प्राण तत्व छै । एकरा में कोय फरक नांय छै । हिन्दू छिके, सिख छिके, या मुसलमान, ईसाई छिके जेकरा जीव केरऽ भीतर देखे केरऽ कला आबी जाय छै, ओकरा लेलऽ इंसानियत केरऽ अर्थ बदली जाय छै । लेकिन कुछ लोग केवल शरीरऽ पर रूकल रहे छै । राजा जनक के दरबार में अष्टाबक आठऽ अंगऽ से टेढ़ऽ मेढ़ऽ बालक वहाँ पहुँचला । जनक केरऽ दरवार में जेत्ते विद्वान सब बैठल छेलात, अव्यवक्र के देखी के हहाय के हँसे लागला । निडर अष्टावक्र बालक अपनऽ विश्वास के साथ, राजा जनक से कहलकऽ । हम्में ते सुनलऽ छेलिये कि अपने केरऽ दरवार में विद्वानऽ के बोलैलऽ आरऽ बैठलऽ जाय छै । लेकिन हम्में ते देखी रहलऽ छिपे कि यहाँ रूप आरो देहऽ केरऽ सौदागर बैठलऽ छै । राजा जनक चौंकी गेला । अष्टावक्र से पुछलका, अपने के यहाँ कोय विद्वान नांय देखावे छै ? अष्टावक्र बोलला नांय । जनक पुछलका काहे ? अष्टावक्र कहलका, हमरऽ अष्टवक्र शरीर देखी के हँसी देलकर, हमरऽ आत्मा केरऽ भीतर जे ? ईश्वर छथ, हुन्का देखलऽ छथ ? हुन्हीं हमरऽ अन्दर केरऽ ज्ञान के किरंऽ पहचानता । लोग विद्वान ज्ञानी नांय होय सके छै । राजा जनक अष्टावक्र के क्षमा मांगलका आरऽ हुन्का आदर के साथ बैठेलका । एक समय में बहुत बोड़ऽ धनी मानी व्यापारी से पुछलके कि तोरऽ काम करे केरऽ राज की छिवखंड ? प्रश्न करे वाला व्यापारी ने प्रश्न करल हम्में जे कुर्सी पर बैठलऽ छिये ओकरऽ पीछु तोरा की देखाय रहल छोड ? प्रश्न करै वाला कहलके तोरऽ कुर्सी के पीछु दिवाल छै । व्यापारी हंसी के बोल्ले बस ऐहे फर्क छै । तोहें हमरऽ पीछु दिवाल देखे हम्में दिवाल के पीछु देखे छिपे, जे याद रहे छै । ई नांय देखे दिये जे याद नांय रहे । जे देखाय रहलऽ छै ओकरा समय रहल देखी लेना सफलता केरऽ मार्ग छिकै ।
26- प्रकृति परमात्मा केरऽ रूप छिके ।
एक सजन्न छेला, बहुत बोड़ धनी मानी आदमी हुन्खा आगु बढ़ै केरऽ बिचार छेल्हें । बहुत कल- कारखाना तकनीकी व्यवस्था करलऽ छेला । छुन्कऽ पोता विदेश से ऊँचऽ प्रबन्धन केरऽ शिक्षा लै के अपनऽ बाप-दाना केरऽ व्यापार में जुटी भेलऽ छेलऽ । एक नया कारखाना खोले वास्ते भूमि पूजन केरऽ आयोजन करलऽ गेलऽ छेले । जबे पूजा करेऽ तैयारी होय रहलऽ छेले, पोतां ने अपनऽ दादा से पुछलके, कारखाना हम्में बनवाय रहलऽ छी व्यापार केरऽ जेत्ते नियम कानून छै सभे में हम्में खरचकरी रहलऽ छी, ते फेरू ई भूमि पूजन काहे ? माटी में अक्षत चन्दन समय काहे बर्बाद करबऽ । समझी गेला, नया युग केरऽ छौंडा सनी विज्ञान आरो मशीन केरऽ बात एकरऽ माथा में ढुकलऽ छै । प्रकृति केरऽ अर्थनांद जानी रहलऽ छै । दादा ने पोता के समझे का, जों तोरऽ गला में फूलऽ केरऽ माला पें हेलऽ जाय ते तोरा केन्हऽ लगतो ? पोता कहलके अच्छा लागते । दादा ने फेरू कहलके जो तोरा गला में चट्टी चप्पल केरऽ माला पेन्हलऽ जाय तबे किरंऽ लागतो ? पोतां ने कहलके खराब लागते । अच्छा आरे खराब तोरऽ गला में लागतो कि आत्मा में ? पोतां ने कहलके ीाीतर आत्मा में लागते । तबे दादा बोलला ऐहे बात धरती के साथ छै । तोहें धरती केरऽ आदर करभऽ तबे धरती प्रसन्न होती । अपमान करे से धरती नाराज होय जेती । हुन्का दुःखी रखी के तोहें सुखी कैसे रहे ले पारभऽ धरती जड़ नांय चैतन्य छै, धरती अपने कहे छथीन कि हमरा नदी, तालाब, पहाड़ ईसब केरऽ बोझऽ नांय मालूम पड़े छै । जबे हमरा ऊपर उपद्रव करे छै हमरऽ नियम केरऽ प्रतिकूल चलै वाला जनम लै छै, तबे हमरा ओकरऽ भार ज्यादे मालूम पड़ै छै । भूमि पूजन खाली कर्म काण्ड नांय बल्कि सब दिन चलते रहना चाहीव । कभी वृक्षा-रोपन केरऽ सूपऽ में, कभी पर्यावरण केरऽ रूप में । तोहें प्रकृति केरऽ मान करमऽ, तबे तोरा सम्मान देती । प्रकृति एक परमात्मा केरऽ रूप छिकी । पर्यावरण आरऽ प्रदूषण के सही रूपऽ में सम्मान छै, ते पहिले प्रकृति के आदरणीय रूपऽ में देखे ले होतै ।
27- घर गृहस्ती तपस्या से कम नांय छै ।
जीवन में सुख आरो दुःख दु पहिया छिके, जीवन में सुख- दुःख लागले रहे छै । एकरऽ रूप बदलते रहे छै । हमरऽ देशऽ में गृहस्थ, वानप्रस्थ, ब्रह्मचर्य आरो सन्यास ई चारो जीवन शैली बतैलऽ गेलऽ छै । लेकिन कहलऽ गेलऽ छै कि ई चारो में सबसे बोड़ऽ चुनौती गृहस्थ केरऽ छिके । परिवार केरऽ साथ जीवन पालन करना संघर्ष केरऽ अवस्था छिके । एक बेर साधु आरो गृहस्थ में ई अवस्था पर बहुत अच्छा बातचीत होले । एक संयासी बैठलऽ होलऽ छेले, एक गृहस्थ पुछलके कत्ते दिन होल्हों । संयास लेला । तोरा पास कोय सिद्धि केरऽ प्रमाण छोंऽ । साधु चौंकी के कहलका तोरा सिद्धि से की मतलब ? गृहस्थ कहलके हम्में बताबे दिहोंऽ । थोड़ऽ दूर पर एक लोटा पानी भरीके रखी देलके, आरो कहलके देखिहऽ हम्में वहाँ नांय जाबे आरो भरलऽ लोटा पानी हमरा पास आबी जेत्ते । कमाल केरऽ बात होते ने ? संयासी अचरजऽ में पड़ी गेलात एन्हऽ करी के देखाबऽ ते ? गृहस्थ अपनऽ बच्चा के हंकाय के कहलके लोटा वाला पानी लेलें आबें । एक छोड़ऽ सन बच्चा एक लोटा पानी लेके आनी देलके । संयासी हँसी के बोलले ई की कमाल केरऽ बात छिके । हम्में भी केाय बच्चा से पानी माँगबे ते लोटा उठाय के आनी देते । गृहस्थ कहलके होंऽ ई होय सके छै, लेकिन तोरऽ बेटा नांय कहे थोंऽ ? ई हमर संतान छिके हम्में आज्ञा देलिये आरो वें मानलके, पारिवारिक जीवन में ई सब से बोड़ऽ सिद्धि छिके । परिवार केरऽ आदमी विशेष करी के अपनऽ संतान जबे माय- बाप या पालक केरऽ बात माने ई सबसे बोड़ऽ तपस्या छिके । बच्चा पोसे में माय-बाप जेतना कष्ट उठावे छै, अपने कष्ट सही के बच्चा के सुख पहुँचाबे छै, दोसरा केरऽ बच्चा एक बेर बात मानी लेते, हर घड़ी नांय मानते । अपनऽ अपने होय छै । समझ में कुछ ऐल्हों । संयासी गृहस्थ केरऽ बात समझी गेले, गृहस्थी में सब से बोड़ऽ चुनौती होय छै । रीति-रिबाज केरऽ पीढ़ी दर पीढ़ी जिलाये के रखना । जे भाषण सत्संग आरो किताबऽ से नांय आबे छै, बल्कि आचरणऽ से आने ले पड़े छै ।
28- मूल उद्देश्य जानना जरूरी छै ।
परोपकारी, दया जन्हऽ गुणकारी कभी-कभी एते महीन होय छै कि बाहरी दुनियां देखे पर समझ नांय आबे छै । एकरा जाने के लेलऽ, घटना केरऽ पीछे मूल उद्देश्य समझना जरूरी छै । एक जैन मुनि वनऽ में एक गाछी तर ध्यान लगाये के तपस्या करी रहलऽ छेलता । ठीक हुन्कऽ पीछु में एक गुफा छेले । जेकरा में एक भेडि़या रहे छेले । वहे वनऽ में एकरा शेर भी रहे छेले । मुनि केरऽ तपस्या से पुरे वनऽ केरऽ वातावरण भक्तिमय होय गेले । मूनि केरऽ सात्विक आरो धार्मिक व्यवहार से पुरे वन सात्विक होय गेले । गुफा में बैठलऽ भेडिया के ई वातावरण अच्छा लागे लागले । बाहर निकली के मूनि केरऽ सेवा में लागी गेलऽ । मूनि आँख बन्द करी के ध्यान करे अवस्था में छेलात । भेडि़या सोची रहलऽ छेले, हमरा से हिन्कऽ कुछ सेवा होय जाय ते हम्में धन्य होय जेतलां । वहे समय वहां से एकरा शेर पार होले । शेर सोचे लागलऽ अच्छा भोजन तैयार छै, मुनि केरऽ माँस खाय में बड़ा आनन्द ऐतऽ । देर करना ठीक नांय छै, अभी आंख बन्द करी के बैठलऽ छय । शेर आरो भेडि़या में लड़ाय होय लागलऽ, दोनों एक देसरा से भिड़ी गेलऽ । शेर भक्षण के लेलऽ आरऽ भेडि़या रक्षण के लेलऽ । दोनों लड़ते- लड=ते मरी गेलऽ, मुनि के नांय शेर करेऽ गुण देखैलऽ नांय भेडि़या केरऽ । ध्यान मग्न तपस्या में छेलात । हुन्कऽ वीतराग भाव बनल छेल्हें । कहलऽ जाय छै कि ई तीनों केरऽ अपनऽ- अपनऽ देह छोड़ला केरऽ बाद जबे मोक्ष मिले केरऽ समय ऐले तबे मोक्ष केवल मुनि के मिलले । एकरा पीछु दर्शन ई छेले कि भेडि़या केरऽ इरादा शुद्ध छेले, लेकिन कहीं न कहीं ओकरा में हिंसा अपनऽ काम करी रहलऽ छेले । शेर ते हिंसक छेबे करलऽ । मुनि केरऽ स्थिति दोनों से ऊपर छेलऽ । ऊपर ऐ से छेल्हें कि नांय ते हुन्हीं अहिंसा के प्रति छेला, नांय ते हिंसा के प्रति । हुन्हीं संतुलित होय के वीतरागी छेलात दोनों लड़ते- लड़ते मरी गेलऽ मुनि जी अपनऽ तपस्या भंग नांय करलकाा ऐही महत्वपूर्ण छिके ।
29- एन्हऽ होय छै पड़प्पन
जीवन में कभी-कभी एन्हऽ घटना हो जाय छै, जो हमेशा याद रहे छै । बल्कि एकरा से प्रेरणा मिले छै । बात ऊ दिन कैरऽ छिके, जबे हम्में रोज काम पर पटना से भागलपुर जाय छेलिये । लेकिन ऐना ज्यादे दिन नांय चलले । हम्में नौकरी छोड़ी देलिये । आवे- जाय केरऽ दौरानऽ में एक घटना जे देखलिये, आज भी हमरऽ जीवन में याद एकदम ताजा छै । होले ई कि एक दिन पटना स्टेशनऽ पर उतर लिये आरो भीड़ऽ के साथ रेलवे स्टेशन से बाहर आबे लगलिये, देखे छी कि एसीकोच से एक भलऽ आदमी अच्छा सूट- बूट पेन्हलऽ बैग हाथऽ में लेलऽ उतरले अपनऽ बैग प्लेटफॉर्म पर राखी के आस- पास जेत्ते छिटलऽ फेंकैलऽ कागज, चिप्स केरऽ पन्नी, केला करेऽ छिलका सब उठाय के कूड़ादानऽ में फेंकै लागले ईदेखी के हम्में हैरान होय गेलिये । काहे कि यात्र करेऽ दौरान हुन्का से बात-चीत होलऽ छेले । हुन्हीं सरकारी कंपनी में बाड़ेऽ अफसर छथ । हुन्का ई तरह से काम करते देखी के हम्में रूकी गेलिये । लेकिन एकरऽ बाद भी नांय ते हम्में नांय ते हुन्कऽ साथे जे ऊ कोच में बैठलऽ छेले, कोय हाथ बँटाना उचित नांय समझलके । काहे कि संकोच लागी रहलऽ छेले । जान- पहचान वाला देखतऽ सगरे हल्का करतऽ । हुन्हीं आँख उठाय के हमरा देखलके, जबे सबय कचरा, हुरऽ भाँखऽ कूड़ा दानऽ में फेंकी देलके, हम्में हुन्कऽ महानता देखी के लजाये गेलिये । हुन्का जहाँ जाय ले हेल्हें अपनऽ कार पर बैठाय के वहाँ पहुँचाबे केरऽ आग्रह करलिहें, हुन्का लेबै वास्ते ड्राइवर कार लेके खड़ा छेल्हें । अपनऽ कार लौटाय देलका, हमर आग्रह मानी के हमरा साथे चलैले तैयार होय गेला । रास्ता में बातचीत केरऽ दौरान पता चलले कि हुन्हीं केन्द्र सरकार केरऽ एक उपक्रम केरऽ बोड़ऽ आफिसर छथ । हुन्कऽ कहना छै कि अपनऽ साथे दोसरा केरऽ सुविधा के लेलऽ काम करै मैं शर्म केन्हऽ ? साफ- सफाई करना धर्म केरऽ काम छिके, ई विचारऽ से हम्में बड़ी प्रभावित होलिये, एकरा से अपन आरऽ दोसरा केरऽ हित के लेलऽ काम करै केरऽ प्रेरणा भी मिलले । सब कोय एन्हऽ सोचे ते कहीं गन्दगी नांय रहे ।
30- महान होय छै, जन्मऽ से नांय कर्मऽ से
आदमी केरऽ योग्यता खाली ओकरऽ देखे वाला लक्ष्णऽ से नांय होय छै । जे सुयोग्य केरऽ काम करे छै, वहे योगय मानलऽ जाय छै । भीतर छिपलऽ गुण के जाने केरऽ क्षमता भी होना चाहीवऽ । गौतम बुद्ध हमेशा ई बात केर पक्ष में छेला । हुन्कऽ कहना छेले कि आदमी केरऽ सामाजिक दर्जा ई बात के प्रमाण नांय दै सके छै कि ऊ केतना योग्य छै । भीतर केरऽ शक्ति पहचान के लेलऽ केकरो भीतर जाय ले पड़ते । हुन्कऽ एक चेला छेले सुणीत ओकरा महान दर्जा मिललऽ छेले । बुद्ध केए चेला ने बुद्ध से पुछलके सुणीत एतना महान कैसें होय ले । बुद्ध ने अपनऽ चेला केए एक खिस्सा सुनैलका । सुणीत पहले राजमहल में सफाई केरऽ काम करे छेले । लोगे सनी हुरऽ-मांसऽ चारो तरफ गंदगी फैलाय दे छेले, सुणीत सफाई करे छेले वेहे में ओकरऽ जिन्दगी चले छेले । एक समय बुद्ध जब भीगमंगा के साथे भिक्षाटन के लेलऽ निकलला ते ऊ समय सुणीत कचरा साफ करी रहलऽ छेले, बुद्ध के आते देखी के ऊ डरी गेले, आरो नुकाबै केरऽ जग्घऽ खोजे लागले । काहे कि ओकरऽ मानना छेले कि ऊ नीच कामऽ से जुड़लऽ होलऽ छै । छुआछुत केरऽ जमाना छेले । बुद्ध केरऽ नजर ओकरा पर पड़लऽ, हुन्हीं सोचे लागला कि ई आदमी में जरूर कोय बात छै । भले ऊ सफाई केरऽ काम करी रहलऽ छै । हमरा देखी के नुकैले कथिले, एकरा से बात करलऽ जाय । बुद्ध ने ओकरा से एक बात पुछलकात कि तो हें संघ में प्रविष्ट हेाय सके छऽ । सुणीत के मनऽ में बार-बार ऐहे प्रश्न उठी रहलऽ छेले कि हम्में ते अशुद्ध आदमी छिकां, की हम्में ई योग्य होबऽ ? बुद्ध ने सुणीत केरऽ बातऽ के सही करलका कि संयम आरऽ दमन से आदमी शुद्ध होय जाय छै । सुणीत हुन्कऽ महान चेला में शामिल हो गेलऽ । बुद्ध केरऽ सही कहना छेले कि शुद्धि-अशुद्धि ऐन्हऽ विषय नांय छै । जेकरा से जाति- आरो समाजऽ के दर्जा में जोड़ी के देखलऽ जाय । आदमी कहीं भी जन्म लै, ऊ अपनऽ कर्मोऽ से श्रेष्ठ चाहे निकृष्ट बनते ।
31- दोसरा केरऽ मदद करना ही जीवन छिकै
अपना लेलऽ जीना कोय जीना छिके । आदत्मियता ऐसे में छै, जब तक जीवन रहे जेतना होय सके दोसरा केरऽ से पीछु नांय हटना चाहीवऽ । हमरा नजरऽ में में एकरा से बोड़ऽ पुण्य केरऽ काम कोय दोसरऽ नांय छै । हमरा अपनऽ पति केरऽ परोपकारी स्वभाव से बहुत कुछ प्रेरणा मिललऽ छै । हुन्हीं बिल्कूल साधारण परिवार केरऽ छिका अपनऽ प्रतिभा आरो मेहनत के बल पर एन्हऽ स्थिति में पहुँचला कि थोड़ऽ बहुत मदद केकरो भी करी सके छथ । कुछ साल पहले केरऽ बात छिके । जबे हुन्हीं देवघर केरऽ नजदीक जसीडी औद्योगिक परिक्षेत्र में कार्यरत छेला । एक दिन जबे हुन्हीं काम पर से घडर ऐला, ते हुन्कऽ साथे एकय दीन-हीन आदमी छेले । ओकरा साथ में बैठाय के खाना खिलैलका । आरो कपड़ा पका दै ले कहलक चलऽ- हम्में सामने में पुछना ठीक नांय समझलिये । ई के छिकै ऐत खुशामद कथिले करी रहलऽ हथ । तुरंत ओकरा आफिस लै गेला । सांझ के जबे आफिस से ऐला, तबे पुछलिहें के छेले कथी से ऐलऽ छेले । लड़का हमरऽ कोय परिचित नांय छिके । एक दिन एकरा दोकानऽ पर मिललऽ छेले, पुछला पर बतैल के हम्में बी-ए- पास छी । बचपन में बीहा होय गेलऽ, अबे बाल- बच्चा केरऽ भी बोझऽ छै माथा पर नौकरी-चाचकरी नांय मिललऽ, यही से जहाँ जे काम मिली जाय दै, वेहे काम करी लै छी । आज ओकरा हम्में एकटा फैक्ट्री में काम दिलवाय देलिये । ओकरऽ आँखऽ केरऽ चमक बताबे छेले कि वें जरूर कुछ तरक्की करते । वू लड़का कहाँ गेल कि भेलऽ एलऽ गेलऽ बात खतम भेलऽ । एक दिन हम्में सपरिवार जसीडी से लौटी रहलऽ छेलिये । त देवघर में एकटा घरऽ में रूकलिये जैसे ही हम्में सब गाड़ी से उतरिलिये, वह लड़का अपनऽ कनियाय आरो बचचा-बुतरू के साथ आदर से हमरऽ पति केरऽ गोड़ऽ पर माथऽ झुकाय ढेलके । बाद में पता चलले कि ओकरऽ मेहनत आरो प्रतिभा के देखते होलऽ ओकरऽ ऊँचऽ पद पर तरर्क होय गेलऽ छै । उन्नीस साल बाद केरऽ बात छिके सोचे छी की केकरो के अपनऽ पद या प्रभाव केरऽ उपयोग करे ते हरंऽ करे । जेकरा से केकरो जीवन सम्भरि जाय ।
32- विश्वास आदमी केरऽ ताकत छिकै ।
कहलऽ जाय छै कि दुनियाँ विश्वास पर टिकलऽ होलऽ छै । विश्वास केए शुरू यहीं से होलऽ छै कि कोय न कोय ई दुनियाँ के चलावे वाला छै । आए वेहे ताकत ई दुनियां केरऽ मालिक छिके । जे नजरऽ में नांय देखावे छै । लेकिन पुरे दुनियां केरऽ फैसला अन्तिम हुन्के हाथऽ में छै । एकक विकेरऽ कहे मुताविक एक बेर एक विद्वान केए एक नास्तिक आदमी से बहस होय गेले । नास्तिक कही रहलऽ छेले कि ई दुनियां बनावे वाला या पैदा करे वाला कोय नांय छै । कवि बहस वाला जगह पर देरी से ऐला । वहाँ केरऽ लोगे हुन्का से पुछलके एतमा देरी कहाँ लागी गेल्हों ? तबे हुन्हीं कहलका हम्में एकरा अजीब घटना सुनाबे ले चाहे छिये । हम्में आनी रहलऽ छे लिये, देखलिये कि नदी किनारा एकरा गाछ अपने गिरी गेले, देखते- देखते पटरा चिराय गेले, ओकरा से एक नाँव तैयार होय गेले, आरो नाव पर चढ़ी के लोग आना- जाना करे लागले । अबे बताबऽ हमर बातऽ पर विश्वास करभऽ । वास्तिक जोर- जोर ठढाय के हँसे लागले आरो कहलके तोरा हेनऽ विद्वान भी झूठ बोले छऽ । भला एन्हऽ काम अपने- अपने किरंऽ होते ? कवि कहलका कमाल छै, ई जमीन, आकाश, चाँद, सुरज, तारा, पहाड़, पर्वत, नदी आरो सबसे बोड़ऽ बात आदमी ई सब भगवान के बीना तैयार होय गेले ? नाव अपने- अपने बनना झूठ छै ? नास्तिक ई सुनी के अचरजऽ में पड़ी गेले । वें विश्वास करी लेलके कि आदमी केरऽ किस्मत कोय दोसरे मालिक केरऽ हाथऽ में छै, जे ई दुनियाँ के चलाय रहलऽ छै । एकरे नाम विश्वास छिकै । जे विश्वास पर टिकलऽ छै । ओकरे पास ताकत छै, दुनियाँ में सही रास्ता पर चले के लेलऽ ।
33- बिना मतलब चीगऽ के पीछु नांय भागऽ
सभी मनुष्य केरऽ पास ओकए अपनऽ अन्तरात्मा होय छै । आरोऽ वे जबे गलत विचार लै लै छै, तबे आदमी अपनऽ रास्ता से भटकी जाय छै । सतत् अभ्यास से आत्मा के चेतावनी दे ले पड़े छै । कि व्यर्थ केरऽ चीजऽ के पीछु नांय भागे, एकरा से समय आरो ऊर्जा खतम नांय होय छै बल्कि परिणाम में सफलता हाथ लगे छै । बोड़ऽ- बोड़ऽ आदमी समझदार ई चक्कर में पड़ी जाय छै । ई विषय पर जैन मूनि केरऽ एक कथा छै । वनऽ में गाछी पर बन्दर बैठल होलऽ छेले । ओकरऽ पर छाई जमीन पर पड़ी रहलऽ छेले । आरो वेहे समय वहाँ से एकरा भूखलऽ शेर जाय रहलऽ छेले । भूखके मारे शेर केए सोचे- समझे केरऽ शक्ति खतम होय गेलऽ छेले । ऐहे से कहलऽ गेलऽ छै कि भूख जाए भोजन पर नियंत्रण जरूरी छै । नहीं ते बुद्धि काम करना बन्द करी दे छै । शेर के साथ भी ऐहे भेले । वे बन्दर केरऽ परछाई पर पंजा मारलकऽ आरो सोचलकऽ कि बन्दरबे के खाय जाय छी । गाछी पर बैठलऽ बान्दर हंसे लागलऽ, शेर के समझैलकऽ शेर राजा, ई हमरऽ परछाई छिके, हम्में तोरा से दूर हिंऽ ई परछाई के पकड़ै में जेते मेहनत करमे, ओतने थकी जेभे । आरो हाथ कुछ नांय लागथोंऽ । लेकिन शेर अपनऽ विवेक खतम करी चुकलऽ छेलऽ । अंत में वेहे होले थकी गेलऽ निराश होय के पड़ी गेलऽ । जैन मूनि केरऽ कहना छै कि हम्में भी राजा केरऽ समान बाहरी चीजऽ पर उलझी जाय छी । जीव बिषय, विलास केए स्थिति पर झपटा मारे छै । फेरऽ दुःखी होय जाय छै । ओकरा समझना चाहीव कि सुख आत्मा में ही बसलऽ होलऽ छै । छाया केरऽ समान शरीर में सुख नांय छै । बाहरी चीजऽ के पावै के प्रयत्न अंत में झूठ साबित होते ऐहे से जागरूक आत्मा जाने छै कि सुख पावे में ऊर्जा आरो समय केरऽ कहाँ उपयोग करना आरो असली सुख कहाँ मिलतऽ वही झपट मारना चाहीव ।
34- संत के लेलऽ भौतिक चीज तुच्छ छै ।
दु चार ठो लड़का एक संत केरऽ पास दर्शन करे के उद्देश्य से पहुँचलऽ । संत ने पुछल का तोरासनी यहाँ कथिले ऐलऽ छऽ । लड़का सभी बोलले, लम्बा समय से अपने केरऽ दर्शन केरऽ अच्छा छेले । संत बोले हमरा की चाहैछ लड़का बोलले हमरा सनी विनय भाव से अपने केरऽ दर्शन करे ले ऐलऽ छी, सोचे छेलां अपने केरऽ दर्शन मिली जाय ते हमरा सनी धन्य होय जेब । संत मुस्कुराय के बोलला तोरा सनी, हमरा की दै सके छऽ ? जों होहें हमरा कुच्छु दै सके छऽ ते हम्में तोरा बहुत कुछ दै देभों । बोलऽ की दै सके छऽ ? लड़का सनी अचरजऽ में पड़ी गेले, सोचे लागले अपनऽ हस्ती आरो श्रद्धा से जे सकबे दै देबे । संत से कहलके कहलके केतना टाका चाहीव महाराज ? संत फेरू मुस्कुराय के कहलका टाका नांय चाहीब । आज चलऽ जा । कल्ह फेरू ऐहऽ । ई बीचऽ में मनऽ में सोची लिहऽ कि धन आरो टाका कोय वस्तु छोड़ी के हमरा की दै सके छऽ । लड़काते हैरानऽ में पड़ी गेले । सोंसे दिन सोचे-बिचारे में रही गेलऽ । धन वस्तु छोड़ी के ई महात्मा के की देलऽ जाय सके छे । हमरा कुछ समझ में नांय आय रहलऽ छे । दोसरऽ दिन संत करेऽ पास पहुँचलऽ संत बोलला की आनलऽ छऽ हमरा वास्ते ? महाराज हमरा समझ में नांय जाय रहलऽ छै अपने केरऽ बुझौवल । संत बतैल का, हमरा तोरा से बचन चाहीव । बुराई छोड़ै केरऽ आरऽ भलाई अपनाबे केरऽ । तोहें हमरा कुछ दै ले चाहे छेल्हऽ ने ? हमरा वास्ते ऐहे कीमती छै तोरऽ बचन ? ऐहे से कहलऽ गेलऽ छै संत महात्मा के पास जाए ते खाली हािा नांय जाय । कुछ न कुछ देना चाहीव । आरेा दै केरऽ अर्थ भौतिक वस्तु नांय बल्कि जी वन में अच्छा काम करै केरऽ संकल्प । तभी हुन्कऽ दर्शन सार्थक छै । संत महात्मा केरऽ संगत में जे कुछ मिले छै ओकरा प्रेम पूर्वक स्वीकार करना चाहीव ।
35- नैतिकता आरऽ मूल्य केरऽ पक्ष धर
एक आदमी के दु ठो बेटी छेले । लड़की बेटी केरऽ बीहा एकथ किसान संग भेले, छोटकी बेटी केरऽ बीहा एकरा कुम्हारऽ संग भेले । दोनों अपनऽ -अपनऽ ससुरार चलऽ गेली । कुछ दिनऽ के बाद बाप सोचलकऽ चलों, बेटी के देखी आबे छी किरंऽ जीप खाय छै । बड़की बेटी केरऽ धऽर गेलऽ, खेती किसानी वाला घऽर छेले, बेटी कहलके बाबू बहुत दिनऽ से पानी नांय पड़ी रहलऽ छै । तोहें भगवान से मनाय दे खूब पानी पड़े, भगवान तोरऽ बात माने छय, तोहें खूब पूजा-पाठ करे छऽ । भगवान तोरऽ बात जरूर सुनता । पानी पड़ते तबे ने फसल अच्छा होते । पिता ने कहलके हम्में जरूर एन्हऽ करबे । दोसरऽ दिन छोटकी बेटी केए घऽर गेल छोटकी बेटी कहलके बाबू हमरऽ माटी केरऽ बर्तन बनाबे केरऽ कार बार बढि़याँ चली रहलऽ छै । लेकिन जों वर्षा आबी जेतऽ पानी पड़े लागतऽ हमरऽ काम धंधा रूकी जेतऽ । बाबूजी तोहे भगवान केर भक्त दिखऽ हमर खातिर भगवान से प्रार्थना करीहऽ कि ई साल बर्षा नांय होवे । पिता- सोचऽ में पड़ी गेलां, दोनों बेटी से बराबर प्यार करे छेला । अबे केकरा लेलऽ की मनाता भगवानऽ से ? यहीं से हुन्कऽ दुविधा शुरू होय गेलऽ दोनों बेटी के आश्वासन दै के चलऽ ऐला । आरो अपनऽ गुरू केए पास गेला । अपनऽ समस्या बतैलका, गुरू ने कहलका तोरऽ काम छोंऽ प्रार्थना करना ईमानदारी से करऽ । फल देना भगवान केरऽ कृपा पर होते । भगवान परालब्ध केरऽ अनुसार सबके फल दै छथीन । तोहें प्रार्थना में पक्षपात ने करऽ । तोहें अपनऽ काम करऽ, भगवान के अपना काम करे ले दहऽ । ईश्वर केरऽ लीला में बाधा नांय पहुँचाबऽ । असल में आदमी के जीवन में अनेक बार एन्हऽ अवसर आबे छै । जबे सही निर्णय लैके भी भ्रम में पड़ी जाय छै । तबे तय करना मुश्किल हो जाय छै कि ई समय सही की छिकै ? जहाँ नैतिकता आरो मूल्य हो आदमी के वही तरफ टिकना चाहीव । ईमानदारी से अपनऽ काम करे आरो परिणाम प्रकृति भगवान पर छोड़ी देना चाहीव ।
36- जबे मृत्यु तै छै ते उल्लास से वरणकरऽ
मृत्यु रोज दिन नजदीक आयी रहलऽ छै, आरो जिन्दगी रोज दिन घटी रहलऽ छै । ऐहे से मृत्यु केरऽ भय नांय करऽ । ओकरऽ स्वागत केरऽ तैयारी करऽ । सजग होय के अपनऽ जीवन के देखना एक कला छै । ई प्रक्रिया में अपने- आप समाधि लागी जाय छै । एक एन्हऽ समाधि जेकरा में आदमी के स्वयं केरऽ बोध होय जाय छै । आरो संसार केरऽ फालतू बात छुटी जाय छै । संसार केरऽ जे अनर्गल छै, वहे हमरा भाई बनाय दे छै । जबे हम्में दूर खड़ा होय के नजदीक भाव से अपने ही जीवन के देखे छी ते सब कुछ हलका होय जाय छै । सुकरात केरऽ जीवन कथा छै । जबे हुन्कऽ अंतिम समय आबी गेलऽ, हुन्कऽ चेला सब कान्दे लागलऽ । सुकरात ने कहलका कान्दबऽ बन्द करऽ । हमरऽ शरीर शिथिल होय रहलऽ छै, लेकिन हम्में लगातर ई प्रयास करी रहलऽ छी कि हम्में अपनऽ मृत्यु होश- हवाश में देखंऽ । अबे सब कुछ छुटी रहलऽ छै । जेतना छुटतऽ, ओतने हमरऽ बची जातऽ जगत केरऽ बोध खतम होय जातऽ आए अपनऽ बोध जागे लागतऽ । सुकरात ने कहल का आज हमरो मृत्यु नांय होय रहलऽ छै । सिर्फ ई देखी रहलऽ छिपे कि मरना की छिकै ? ई मौका आज मिललऽ छै । ऐही से तोरा सनी कान्दी के हमरऽ समाधि में स्यवधान नांय करऽ । सचमुच में सुकरात बचते गेला, मृत्यु होते चलऽ गेले । हुन्हीं संदेश दे गेला, मृत्यु रोज दिन निकट आय रहलऽ छै । आरेा जीवन रोज दिन घटी रहलऽ छै । ऐहे से मृत्यु केरऽ भय नांय करऽ । ओकरऽ स्वागत केरऽ तैयारी करऽ । सूखलऽ नारियर अपनऽ खोलऽ के भीतर पाकी जाय छै । फोड़ला पर पूरा के पूरा बाहर आबी जाय छै । जे गीला नारियर होय छै, ओकरा फोड़ला पर अपनऽ खोलऽ में सटलऽ रहै । निकाले में टुकरा-टुकरा होय जाय छै । आत्मा आरो शरीर के साथ ऐहे बात छै । अपनऽ शरीर से अलग होय जाना मानऽ पाकलऽ अपनऽ आत्म भाव में पहुँची जाना । आरो शरीर से चिपकलऽ मृत्यु होय केरऽ माने गिला खोल के तरह चिपकी जाना । टुकरा- टुकरा होय के पिलपिले होना । ऐसे लेलऽ शान्ती आरो आनन्द से जीवन में एकरऽ बोध के लाना बड़ा उपयोगी होय छै ।
37- क्रोध केरऽ आग के धैर्य से बुझाा चाहीव ।
गुस्सा पर धैर्य केरऽ माने ई नांय छिके कि क्रोध त्यागी देलऽ जाय । एकरऽ माने ईछिके कि जबे उचित लगे तबे हमरा क्रोध आबे जाए हमरे नियंत्रण से चलऽ जाय । अधिकांश मोका पर गुस्सा अपनऽ इच्छा पर आबे छै । आरेा चलऽ जाय छै । जबे कि गुस्सा करे वाला ओकरा सामने असहाय होय जाय छै । जैन मूने एक कथा सुनैलथीन, दु पड़ोसी केए बात । दोनों पड़ोसी में बातऽ बात में लड़ाय होते रहे छेले । दोनों अशान्त रहे छेले । एक दिन एक पड़ोसी कुछ ज्यादे गुस्सा में आय के दोसरऽ पड़ोसी करेऽ छप्परऽ पर जलते मोढ़ी फेंकी के भावी गेलऽ । पड़ोसी केरऽ धऽर जरे लागले । ई पड़ोसी जरते मोढ़ी फेंकते देख्ाी लेलके, हिन्ने धऽर जरी रहलऽ छै, हुन्ने जराबे वाला के पीछु दौड़ी रहलऽ छै दौड़ते दौड़ते बहुत दूर निकली गेलऽ हिन्ने दोनों पड़ोसी केरऽ घऽर जरी के स्वाहा होय गे दोनों लड़ी-झगड़ी के घुरलऽ घर देखी के माथ पकड़ी के बैठी गेलऽ । तबे ओकरा ज्ञान भेले घऽर केरऽ आग शान्त होय सके छेले जों हम्में अपनऽ भीतर केरऽ क्रोधाग्नि शांत करी लेतलां, ते आज ई दशा नांय होतलऽ ओकरऽ पीछु नांय दौड़तलां आरो आग बुझाबै में लागी जातलो आज घऽर नांय जरतलऽ । घरऽ केरऽ जरना ते एक प्रतीक घटना छै । हम्में बहुत मौका पर बाहर घटी रहलऽ घटना से अपनऽ भीतर केरऽ क्रोधाग्नि भड़काबे छिपै । केरू ज्वाला बनी के हमरऽ व्यक्तित्व के, हमरऽ सफलता के झुलसावे छै । क्रोध केरऽ अग्नि के धैर्य आरो त्याग केरऽ पानी शांत करी सके छै । ई क्रोधाग्नि पर जेकरऽ नियंत्रण छै वहे बलवान छै, अपनऽ व्यक्तित्व केरऽ मालिक छै ।
38- गाढ़े वक्त में हुनर काम आवे छे ।
एक बादशाह छेला, हुन्हीं वेश बदली के प्रजा केरऽ हाल- जाने ले सगरऽ घुमे छेला । एक दिन घुमते- घुमते बहुत दूर निकली गेला, वहाँ गरीब केरऽ बस्ती छेले, जहाँ मजदूर चरवाहा रहे छेले । वहाँ बादशाह के एक सुन्दर कन्या नजर एलहेन । बादशाह कन्य के बारे में पता लगेलका आरेा ओकरऽ भाय के खबर भेजबैलका कि हुन्हीं ओकर बहीन से बीहा करे ले चाहे छय । चरवावहा खबर भेजबेलके कि हम्ें अपनऽ बहीन केरऽ बीहा ऊ आदमी से करबऽ, जेकरा पास कुछ हुनर होते । जो बादशाह के पास कुछ हुनर दैन तो बतावें । अपन बहीन केरऽ बीहा बादशाह संगकरी देवे । बादशा बहुत सोच- विचार में पड़ी गेलात । हुन्का पास कोय एन्हऽ हुनर नांय छेल्हे । जे कन्या केरऽ भाय के संतुष्ट करी सके छेलात । चरवाहा से पुछलक केन्हऽ हुनर से तोहे संतुष्ट होबे । चरवाहा कहलके तोहें कालीन बनाबे ले जाने छ अपनऽ बहीन केरऽ बीहा तोरा संग करी देवे । बादशाह ओकरऽ बात मानी लेलका, आरो कालीन बनाबे केरऽ काम सीखे लागला । बादशाह एकरा सुन्दर कालीन बनैल का आरो चरवाहा के भेजी देलका । चरवाहा के हुन्कऽ कला पर विश्वाास होय गेले, कभी मुसीबत पड़ला पर अपनऽ साथ-साथ हमरऽ बहीन केरऽ भी निर्वाह करी लेता । अपनऽ बहीन केरऽ बीहा बादशाह केरऽ साथ करी देलकऽ । ओकर बहीन बादशाह केरऽ बेगम बनी गेली । बादशाह बेगम से कहलका कालीन में एक जगह अपनऽ नाम लिखलऽ लिखी देलऽ छथ, बादशाह के अलावा बेगम ही जाने छथ आरो पढ़ी सके छथ । कुछ दिनऽ के बाद बादशाह प्रजा केरऽ हाल-चाल जाने ले निकलले रास्ता में एक जगह डाकू पकड़ी लेलकऽ डाकू केए काम छेले, जेकरा कोय हुनर नांय आबे छेले सब के बलि चढ़ाय दै छेले । बादशाह कहल का हमरा कालीन बनाबे ले आबे छे । डाकू केरऽ सरकार बादशाह से कालीन बनबैलकऽ । बादशाह कालीन में एक कोना में अपनऽ नाम लिखी देलऽ छेलात । डाकू व्यापारी बनी के हुन्के राजमहल में कालीन बेचे ले गेलऽ । बेगम देखलकी कालीन चिन्ही गेली । ई कालीन ते बादशाह केरऽ बनालऽ छिके । तुरंत डाकू सरकार के गिरफ्रतार करी लेलकी । आरो बादशाह के छोड़वाय लेलकी, बादशाह भी हुनर केरऽ महत्व जानी गेला ।
39- शरीर आरऽ आत्मा केरऽ अलग-अलग महत्व
दुनियाँ केरऽ उद्देश्य में देह केरऽ महत्व बढ़ी जाय छै । लेकिन आध्यात्मिक उद्देश्य में आत्मा देहऽ से ज्यादे महत्वपूर्ण छै । बुद्ध के भिक्षुणि संघ में प्रकृति नाम केरऽ एक भिक्षुणी छेली । गौतम बुद्ध ने देहऽ केरऽ सुन्दरता पर बोलते होल प्रकृति केरऽ उदाहरण देलऽ छलथीन हुन्हीं एक घटना सुनैलथीन एक बार भिक्षु आनन्द कही जाय रहलऽ छेला । हुन्का प्यास लागलऽ । एक लड़की के नदी से पानी ले जाते देखलका, ओकरा से पानी मांगलक ऊ लड़की कहलके हम्में अछूत जाति केरऽ छिको । पानी किंर दिहंऽ । हमरऽ छुवलऽ पानी पिमे ते जाब चलऽ जेवें । आनन्द ने कहलके हमरा पानी चाहिव तोरऽ जात नांय । ऊ लड़की आनन्द से एत्ते प्रभावित होय गेली कि हुन्का से बीहा करे केरऽ मोन होय लागले । प्रकृति अपनऽ माय से कहलकी हम्में बीहा एहे लड़का संग करबऽ । माय समझैलके ऊ बौद्ध शिष्य ब्रह्मचारी छिके, वे बीहा नांय करे केरऽ संकल्प लेलऽ छै । लेकिन बेटी अड़ी गेली, माय के कहलकी ऊ लड़का के अपनऽ घरऽ में बोल के कुछ जादू मंतर करी के ओकरा संग बीहा कराय दे । माय अपनऽ बेटी केरऽ बात मानी के जादू मंतर कर लकी, लेकिन आनन्द के प्रभावित नांय कई सकलकी । जबे बात बहुत बढ़ी गेलऽ तबे आनन्द ने बुद्ध से सब बात बतैलकऽ । बुद्ध ने ऊ लड़की के बोलैलक आरो पुछलका, तोहें आनन्द से बीहा करे ले कहो चाहे छें ? तोरा ओकरऽ कौन अंग ज्यादे पसंद छऽ । लड़की ने कहलके हमरा हुन्कऽ चेहरा पर आंख, कान, आरो नाक पसंद छै । बुद्ध ने कहलका, आँख में आँसू छै, कान- नाक में मैल छै, केवल देह से प्रेम कई छें, ते ई वें संयम से अर्जित करलऽ छै । ई ढाँचा अंततः खत्म हो जाय छै । बुद्ध केरऽ बातऽ पर लड़की विचार करलकी ओकरा लागले कि हम्में आनन्द केरऽ देहऽ पर ही आर्वित होल छी । तबे ऊ लड़की आत्मा केरऽ बारे में जानलकी, आरऽ भिक्षुणी बनी गेली । असल में देहऽ केरऽ उपयोग ते छै लेकिन देह अंतिम लक्ष्य नांय होय सके छै । समूचा व्यक्तित्व केरऽ विकास करे ले छै ते देहऽ के संग आत्मा के भी जानै ले होतै ।
40- कजरी
हरि- हरि सावन में कजरिया खेले नइहरवा जेबे हो पियवा- 2
1- कारी कारी बदरिया, घिरी- घिरी ऐले, झमाझम बरसे बूंद मनमा हुलसे हो पियवा । हरि- हरि सावन में ———–
2- चारो ओर हरिअर – हरिअर जैसे लागे विछावल, मखमल खेत कियारी भरी गेले, दा पुर शब्द लागे सुहावन हो पियवा, हरि- हरि सावन में ————-
3- दादा से बड़का दादा ऐलऽ छथिन विदागररी करावे ।श्
डोलिया सजा दऽ ओहार लगा दा हरिअर चुन्दरी मंबादऽ होवियव हरि- हरि सावन में————–
4- सखी सहेली सब देखते होती डगरिया –
बहिनपा ऐती सावन में कजरिया खेले हो पियवा ।
हरि- हरि सावन में कजरिया खेले नइहरवा जेबे हो पियवा ।
41- भाय- बहीन केरऽ त्योहार राखी
हमरऽ भारतीय संस्कृति केरऽ केत्ते बोड़ऽ विशेषता छै कि आदमी सब देवी- देवता गाछ-बिरिछ, वन, पर्वत, नदी, सागर, गुरू, माता, पिता केरऽ पूजा ते करवे कई छै । राखी पुर्णिमा के दिन भाय केरऽ पूजा करे छै आरऽ आशीर्वाद के रूपऽ में भाय केरऽ प्रेम, विश्वास आरो भरोसा पावे छै । सावन पुर्णिमा केर बहुत बोड़ऽ महत्व करे दिन छिके । सब भाय बहीन हर्ष उल्लास के साथ प्रेम पूर्वक राखी केए त्योहार मनाबे छै । भाय-बहीन केरऽ पातरऽ रेशम डोरी में प्रेम आरो विश्वास समैलऽ रहे छै । रेशम डोरी भाय- बहीन केरऽ रिश्ता के मजबूत बनाबे छै । दोनों केरऽ बीच एक सेतू से कम नांय होय छै । राखी केरऽ त्योहार सबसे पहले द्रौपदी शुरू करलऽ छेली । जबे भगवान श्री कृष्ण शिशुपाल के बध करलऽ छेलात, सुदर्शन चक्र से अंगूरी कटी के लहु बहे लागलऽ छेल्हें । ई देखी के द्रौपदी अपनऽ साड़ी फाड़ी के श्री कृष्ण केरऽ हाथऽ में बांधी देलऽ छेली । वेहे दिनऽ से राखी केरऽ चलन शुरू होय गेलऽ छै । राखी केरऽ त्योहार सही मायने में एक दोसरा केरऽ फिकर करना । राखी बांधी के बहीन सब भाय से रक्षा केरऽ वचन लै छै । भाय राखी बँधाय के सब तरह से रक्षा केरऽ वचन दे छै । शहरी करन होय से रोजगार केए खातिर, काम- धंधा नौकरीचाकरी के चलते एक दोसरा से दूर होय गेलऽ छै । केतनो दूर खाई होय गेलऽ छै, लेकिन राखी अपनापन करेऽ पुल से कम नांय छै । बहीन दूर देशऽ में रहे छै, अपनऽ भाय के वास्ते राखी लिफाफ में भरी के भेजे छै । आजकल ते ईमेल द्वारा भी संदेश भेजे छै । चांद सूरज के अपनऽ संदेश वाहक केरऽ रूपऽ में प्रयोग करे छै । चाँद सुरज के साक्षी मानी के कहे छै, तोहें दुनियां सब जगह घुमे छऽ । गाँव- गाँव गली- गली फेरा लगाबे छऽ, हे चन्दा मामा हमरऽ भाय से कही दिहऽ, तोरऽ बहीन याद करलऽ छोंऽ संदेश भेजलऽ छोंऽ । हमरऽ भाय हमेशा खुश रहे । हम्में तोरा आशीर्वाद दै छि होऽ, तोहें युग-युग चमकते रहिहऽ । हैरंऽ कही के बहीन अपनऽ मनऽ में ढाढ़स बँधाबे छै । एतना माया रहे छै माय आए बहीन केए बीचऽ में । सावन पुर्णिमा केए एक आरो महत्व छै, इन्द्र राक्षस केरऽ अत्याचार से देवता सब के मुक्त करैल छेलात । सावन पुर्णिमा के दिन ट्टषि-मुनि वेद पुराण केरऽ पठन- पाठन शुरू करलऽ छेलात । वेद- पुराण केरऽ पूजा भी होय छै । नया जनेऊ धारण कर केरऽ परम्परा भी छै । गुरू अपनऽ शिष्य केरऽ हाथऽ में रक्षा सूत्र बाँधे छै । ब्राह्मण सब अपनऽ जजमान केए हाथऽ में रक्षा सूत्र बांधी के आशीर्वाद दै छै । गाँव- गाँव शहर-शहर सब जगह राखी केरऽ त्योहार मनैलऽ जाय छै ।
42- दुश्मन के गुस्सा से नांय नम्रता से जीतऽ
दोसरा केरऽ बातऽ के सहन करना आरो दोसरा के सम्मान देना, ई दु एन्हऽ शस्त्र छै, जे प्रबलतम दुश्मन के भी दोस्त बनाय ले सम्मान पावे केरऽ एके रास्ता छै, दोसरा के सम्मान देना आरऽ ओका तीतऽ बोली सहन करना। एक बेर केर बात छिके कोय शहर में एक व्यापारी रहे छेले व्यापार केरऽ नाम पर प्रसिद्ध छेले कि ऊ बेइमान आरो अहंकारी छेले । वास्तव में ऊ व्यापारी एन्हऽ नांय छेले । ओकरा में एके अवगुण छेले, कि ऊ गुस्सेल छेले, तुरंत अपने से बाहर होय जाय छेले, आए छोटऽ- छोटऽ बातऽ पर गुस्सा करे लागे छेले । ऐसे कारण से बाजार में ओकरऽ साख गिरी गेल छेले । आरो सब व्यापारी वर्ग से अलग होय गेलऽ छेलऽ । एक बेर अपनऽ गुरू केरऽ पास गेलऽ, गुरू ने पुछलकऽ गुरूदेव, जों कोई दुश्मन सामने छे ते ओकरा से लड़लऽ जाय सके छै, लेकिन हमरऽ पीछे से वार करतै तबे ओकरा कैसे लड़लऽ आय सके छै ? गुरूजी कहलका तु हुं पीछु से लड़ें । गुरूजी पीछु से किरेऽ देखबे जे लड़बै । गुरू जी कहलका तोहें व्यापारी छिके, चतुर छें, तइयो हैरंऽ प्रश्न करे छें ? तोहें व्यापार जगत केरऽ समे नियम जाने छें, ओकरा बाद भी तोए व्यापार ठप पड़ी जाय छै । एकरऽ कारण तोरऽ तुरंत गुस्सा होना छिकौ । व्यापारी ने कहलके गुरूदेव अपने हमरा कोय एन्हऽ रास्ता बताबऽ जेकरा पर चली के हमरऽ गुस्सा शांत होय जाय । आरऽ हमरऽ जीवन शान्ति पूर्वक चले । गुरूदेव कहलक हम्में तोरा यु बात बताना चाहबऽ, एक छौ दोसरा केरऽ बातऽ के सहन करना आये दोसरऽ बात छौ, दोसरा के इज्जत करना । ऐहे दोनों एन्हऽ शस्त्र छिके ने दुश्मन के भी मित्र बनाय लै छै । व्यापारी ने ई बातऽ के गांठ बांधी लेबे के, आरो अपनऽ व्यापार में परिवर्तन करते होलऽ संयम आचरण अपनाय ले लके । जेकरा चलते व्यापार जगत में प्रसिद्ध होय गेले ।
43- दया साव से दुश्मन भी बदली जाय छै ।
संघमित्र अपनऽ पिता अशोक के तरह बौद्ध धर्म केरऽ दीक्षा लेलऽ छेली, हुन्ही धर्म केरऽ प्रचार करे ले लंका गेलऽ छेली, हुन्कऽ धर्मप्रचार से वहाँ केरऽ लोग बहुत प्रभावित होलै । बहुत लोग हुन्का से बौद्ध धर्म केरऽ दीक्षा लेबे लागले । धीरे- धाीरे वहाँ बौद्ध धर्म केरऽ प्रचार बढ़ी गेले । संघ मित्र केरऽ ई काम केरऽ वजह से कुछ दुष्ट आदमी हुन्कऽ दुश्मन भी बनी गेले । संघमित्र दुश्मन केरऽ बात पर ध्यान नांय रखते होलऽ अपनऽ काम करते रहली । दुश्मन एक दिन एक हत्यारा के भेजलकऽ, संघमित्र के मारे ले । हत्यारऽ संघमित्र केरऽ पीछु- पीछु रहलऽ छेले, मौका केरऽ ताकऽ में । रास्ता में संघमित्र देखलकी एक गाय कराही रहलऽ छै । गाय केरऽ पास जय के देखलकी, गाय केरऽ एक गोड़ऽ में जख्म होय गेलऽ छै । जेकरा से लगातार लहु बही रहलऽ छै । संघमित्र तुरंत अपनऽ कपड़ा फाड़ी के गाय केरऽ गोड़ऽ में पट्टी बांधी देलकी, ज्यादा लहु नांय बहे, गाय के पास बैठी के देखे लागली गाय के कुच्छु राहत मिली रहलऽ छै । सेवा केरऽ भाव से हुन्कऽ चेहरा पर आए तेजी आबी गेल्हें । ई देखी के हत्यारा संघमित्र केरऽ पास ऐले । आरो हुन्क गोड़ पकड़ी के कान्दे लागले । संघमित्र आश्चर्य से देखते रही गेली । कुछ देरी के बाद हत्यरबा कहल्के देवी हमरा माफ करी दे । हम्में बहुत बोड़ पापी छिकां । संघमित्र कहलकी तोहें की पास करलऽ छें ? हत्यारा कहलके कुछ आदमी हमरा अपने के मारे ले कहलऽ छें ? हत्यारा कहलके कुछ आदमी हमरा अपने के मारे ले कहलऽ छेले । ऐसे से तोरऽ पीछु पीछु चली रहलऽ छेलिये । मौका पाय के अपने केरऽ हत्या करी देबे । लेकिन अपने केरऽ दया भाव देखी के लागे छै कि हम्में केत्ते बोड़ऽ पापी छी । अपेन मानव केर कभी भी नुकसान नांय पहुंचाबे वाली छऽ । हम्में दोसरा केरऽ बातऽ में कर्त्तबो पाप करै ले जाय रहलऽ छेलां । हमरा माफ करी दे आरो अपनऽ शरण में ले ले । संघमित्र ओकरा अपनऽ संघ में लै लेलकी । संघ केरऽ आदमी के साथे शामिल होय के बौद्ध धर्म केरऽ प्रचार में लागी गेलऽ दया से दया केरऽ जन्म होय छै । दुष्ट व्यक्ति केरऽ अन्दर भी दया भाव होता छै । केवल प्रकट होय केरऽ स्थिति केरऽ इन्तजार करै छै । बौद्ध धर्म केरऽ दीक्षा लै के हत्यारऽ से दयावान बनी गेलऽ ।
44- धरम केरऽ अनुसार आचरण करै वाला सुखी रहै छै ।
धर्म आरो आद्यात्म केरऽ सब से सही शिक्षा आदमी के परिवारऽ में ही मिले छै । जों परिवार केरऽ कुछ आदमी, एकरऽ सही अर्थ समझी लै ते अन्य आदमी पर भी एकरऽ प्रभाव पड़ै छै । संत महात्म आरो विद्वान केरऽ परिवार में धर्म केरऽ प्रयोग करे छै, ते पहिले योग्य सदस्य के चुनी ले छै । गौतम बुद्ध ने एक बेर ऐहे रंऽ करलऽ छेलाता । पर्वत प्रदेश में रहे छेला । वहाँ 122 लोगऽ केरऽ संघ में रहे छेला ऊ सब केरऽ काम छेले, जानवरऽ के मारी के खाय जाय छेले । मौका देखते लूट-पाट करी लै छेले । जबे प्रदेश केरऽ लोग शिकार पर निकली जाय, तबे बुद्ध ऊ सब केरऽ अनुपस्थिति में ओकरऽ जग्घऽ पर जाय कें जनानी सब के धर्म केरऽ शिक्षा दै छेला । बुद्ध असली के समझाबै छेला, कि जेकरा में दया भाव रहे छै, ऊ दोसरऽ कोय प्राणी के हत्या नांय करी सके छै । धर्म अमर छै आरो जे धर्मनुसार आचरण करे छै, ओकरा जीवन में बिपत्ति केरऽ सामना नांय करे लें पड़े छै । भलऽ लोगऽ केर लक्षण होय छै कि ऊ नम्र होय छै, क्रोध नांय करे छै । आरऽ हमेशा ऐहे प्रयास करे छै कि हम्में केकरऽ कष्ट नांय पहुँचैरे । बुद्ध केरऽ प्रवचन से प्रभावित होय के जनानी सब बुद्ध से दीक्षा लै लेलकी, ई बात जबे ओकरऽ मरदाना सब पता चलले, ते पहले बुद्ध पर बहुत गुस होले । जनानी सब रोकलके, आरो अपनऽ पारिवारिक जीवन में बदलाव केरऽ जानकारी देलके । अपनऽ जनानी केरऽ दबाव में आय के सब मरदाना बुद्ध केरऽ शरण में गेले । बुद्ध ने सब के समझै नका कि जे सबके प्रति दयालु रहे छै, ओकरा जीवन में बहुत लाभ मिले छै । शरीर स्वस्थ रहे छै, चित्त एकाग्र होय छै, देवता ओकरऽ रक्षा करे छथीन । सब केरऽ प्रिय होय जाय छै । हमेशा सफल रहे छै । आरेा मरला पर स्वर्ग जाय छै । मरदाना सब बुद्ध केरऽ बातऽ से प्रभावित होले आरो सही रास्ता पर चलै केरऽ निश्चय करलके । धर्म भी समझदारी से ही जीवन में प्रवेश करे छै । सीधे केकरो जीवन में धर्म नांय उतारलऽ जाय सके छै ।
45- पीड़ा केरऽ पहचान में छिपलऽ छै शांति केरऽ मार्ग
दुनियां में समे सुख मिली जाय, जरूरी नांय छै कि शांति भी मिली जाय, दोनों अलग- अलग बात छै । मनऽ केरऽ शांति दोसरा केरऽ दुःख के दूर करी के भी प्राप्त करलऽ जाय सके छै । ई संबंध में एक खिस्सा छै, एक छेल राजा हुन्हीं अशांत रहे छेला । हुन्ऽ नगर में एक भिखमंगा ऐले भीख माँगे उद्देश्य से राजा बहुत प्रभावित भेला । हुन्हीं भिखमंगा से पुछलका अपने केरऽ चेहरा पर जे दिव्य शांति देखय रहलऽ छै की अशांति हमरा भी प्राप्त होय सके छै ? जों होय सके छै ते हमरा की करे ले पड़ते ? हम्में राजा छिकां हमरऽ मन अशांक छै । भिखमंगा ने जबाब देलके, जरूर शांति प्राप्त होय सके छै । एकरा लेलऽ तोरा अकेले में बैठी के चिंतन करे ले होथोंऽ दोसरऽ दिन राजा राज महल में अपनऽ आसन जमैलका । अपनऽ घरऽ में बैठी गेला, कुछ देर बैठलऽ रहला, अकेलऽ में परेशान होय गेला । तभिये हुन्कऽ राजमहल केरऽ एक कर्मचारी हुन्दे सफाई के लेलऽ ऐले । राजा ओकरा से बात करे लागला कर्मचारी केरऽ दुख सुनी के, हुन्कऽ मन दुखी होय गेल्हें । कुछ समय के बाद राजा चिन्तन करते होलऽ राजमहल मे टहले लागला । टहले- टहले राजा अपन राज महल केरऽ सब कर्मचारी केरऽ दुःख केरऽ बारे में जानलका । दुःख केरऽ मूल कारण खाय के लेलऽ अन्न पीं है के लेलऽ कपड़ा छै । राजा अपनऽ कर्मचारी सबके दरमाहा बढ़ाय देलका । सभी के कपड़ा बाँटलका, शाम के फेरू भिखमंगा से मिले वास्ते गेला । भिखमंगा पुछलके राजन अपने के कुछ शांति मिलल्होंऽ, राजां ने कहलका नांय महात्माजी, हमरा कुछ शांति नांय मिललऽ । अशांति थोड़ऽ – थोड़ऽ जरूर कुछ कम होलऽ जबे हम्में मनुष्य केरऽ बारे में जानलिये । ओकरऽ दुःख से मन अशांत होय गेलऽ । भिखमंगा कहलके राजा वास्तव में अपने शांति केरऽ मार्ग खोली लेल्हऽ । बस वेहे मार्ग पर आगु बढ़ते जा । राजा तभिये प्रसन्न आरो शांत रही सके छऽ । जबे तोरऽ प्रजा प्रसन्न रहे ।
46- भैया, हमरा कुछ कहे ले छै ।
हमरऽ प्यारऽ भैया,
तोहें सुखी, स्वस्थ आरो दीर्घायु छऽ, ऐहे हमरऽ कामना छै । हम्में की सब बहीन अपनऽ भाय के लेलऽ सदेव मंगल कामना ही करे छै । भैया हम्में हर ससाल तोरा राखी बाँधे छी । बदला में हम्में तोरा से एकवचन ही चाहे छी कि तोहें सदैव हमरऽ रक्षा करभे । तोहें एन्हऽ करे भी छऽ । राखी केरऽ बाद पत्र लिखी के हम्में तोरा कुछ बताबे ले चाहे छी । तोरा से कुछ मांगे ले चाहे छी । देखऽ इंकार नांय करीहऽ भैया, जबे हम्में सड़कऽ पर कहीं जाय रहलऽ होय छिये, कालेज, से लौटी रहलऽ होय छिये या देर रात आफिस से निकले छिये, तोहें ते वहाँ हमेशा नांय रहभऽ । वहाँ हमरा मिले छै, इंसान केरऽ खाल ओढ़लऽ वू नर पिशाच, जेस्त्री केरऽ अस्मिता केरऽ तार- तार कई ले बेताब दिखाबे छै । वोहऽ ते केकरऽ भाईये होतो पर दोसरऽ के बहीन पर कुदृष्टि केरऽ कृत्य बेखौफ करी गुजरै छै । तोहें अपनऽ बहीन के सकुशल घर लौटी आबे केरऽ संतोष केरऽ सांस लै के निशि्ंचत होय जाते होभऽ । हालांकि एन्हऽ बात रोज घटे छै । जेकरा हम्में चुपचाप सही लै छिये । ताकि बातऽ केरऽ बतंगड़ नांय बनै, तो हें परेशान नांय होय जा, कहीं हमरऽ पाँख नांय कतरी देलऽ जाय । कहीं समाज में बदनाम नांय होय जांबऽ । ऐहे सब सोची के हम्में चुप रही जाय छिये । जबे कि हमरऽ को गलती नांय रहे छै । आज हम्में तोरा ई पत्र केरऽ माध्यम से बताबे ले चाहे छी कि जबे हम्में या हमर जेन्हऽ आए कोय लड़की या जनानी बाहर निकले छै ते केनहऽ नजर केरऽ सामना सामना करी के घर लौटे छै । होंऽ तोहें आरो समें नही केरऽ भाय के ई सब जरूर जानना चाहीवऽ । अबे हम सब बहीन केरऽ कर्त्तव्य होय गेलऽ छै कि भाय के हकीकत केरऽ ऐना देखैलऽ जाय । रास्ता, दुकान, स्कूल, कालेज, मॉल यहाँ तक की घरऽ में भी लड़की सुरक्षित नांय छै । तो हें बेटा होय के कारण, बेटी से हर मामला में उच्चऽ छऽ । ई तरह केरऽ परवरिश केरऽ दुष्परिणाम कोय जनानी ही भोगे छै । होना ते ऐहे चाहीवऽ कि मांएं आपनऽ समे बच्चा के ई संस्कार छै कि लड़का आरो लड़की बराबर छै कि आरो व्यवहार में भी जाहिर करे । भैया, जबे घरऽ से निकले छिपै, नुक्कड़ऽ पर खड़ा अवारा सब सिटी बजाय के अभद्र टिप्पणि करे छै । जबे आटो में बैठे छिये ते बेवजह सटी के बैठे केरऽ कोशिश करे छे । कहां तक गिनै होंऽ । अखबार ते पढ़ते होभऽ । भैया, दूूधमुंहऽ बच्चा के संग साठ साल केरऽ बृद्ध केरऽ जिक्र रहे छै । बू कौन भड़काऊ कपड़ा पेन्हे छै, देर रात तक घुमे छै । भैया हम्में तोरा ई कथा व्यथा ऐ हे से सुनाय रहलऽ छिहोंऽ ताकि तोहें दोसरा केरऽ बहीन सम्मान दृष्टि से देखिहऽ । जों सब भाय ऐहे सोच रखते, ते हम्में बहीन सब केत्तं सुकुन से ई जग में सुरक्षित रहबे । ई पत्र केरऽ माध्यम से सब लम्पट मरदाना के चेतावनी भी देना चाहे छिपे कि एतना भी नांय सताबऽ कि डरे खतम होय जाय । जबे जनानी विद्रोहिणी होय लागती ते सामाजिक ढांचा चरमराबे लागते दुर्गा, काली, चंडी के पुजलऽ ही नांय छिहें, वल्कि आत्मसात भी करलऽ छिहें । हम्में सभे बहीन भाय सबसे ऐहे आश्वासन आरो राखी केरऽ भेंट चाहे छी की हमरा इंसान केरऽ रूपऽ में देखे, अपनऽ- अपनऽ नजरऽ के साफ रखऽ हमरऽ भाय । हमरऽ राखी केरऽ मोल तोहें एतना जरूर चुकैहऽ । जगत केरऽ सभे खुशिया तोरे चरण चुमे ।
47- सच्चा दोस्त
एक आदमी के तीन दोस्त छेले । वू पहला दोस्त के बहुत चाहे छेले, आरो माने भी छेले । दोसरऽ दोस्त के थोड़ऽ कम चाहे छेलऽ । तीसरा दोसरऽ के तरफ कम ध्यान दै छेलऽ । एक बेर ओकरऽ समय खराब होय गेले, ओकरऽ सब कुछ खतम होय गेले । ई बात राजा के पत्ता लगल्हें, हुन्हीं अपनऽ सिपाही द्वारा इ आदमी के राज महल में पुँचे केरऽ आदेश देलका । इ आदमी डरी गेलऽ कि राजा केरऽ बुलाहट कथिले ऐलऽ छै । अपनऽ तीनऽ दोस्तऽ के सब बात बतैलकऽ आरो मदद मांगलकऽ । इ पहला दोस्ता के कहलकऽ की, तोहें हमरा साथ राज दरवार में चलभऽ ? ई सुनी के पहला दोस्त साफ इंकार करी देलके । आदमी के बड़ा दुख भेले कि ओकरऽ सब से अच्छा दोस्त ओकरऽ सहायता नांय करी रहलऽ छै । आदमी के दोसरऽ दोस्त से पुछलके, की, तोहें हमरा साथ दरवार तक चलबे ? ई सुनी के दोसरऽ दोस्त कहलके हम्में सिर्फ इतरी तक तोरऽ साथ चलभोंऽ । आगे तोरा अकेले जाय जांय ले जड़थोंऽ । आदमी फेरू निराश होय के तीसर का दोस्त केरऽ तरफ मुड़लऽ, जेकरा वे पसंद नांय करे छेलऽ वू अब तक सब केरऽ बात सुनी रहलऽ छेले । फेरऽ बोलने, हम्में चलभों तोरऽ साथ आरो जरूरत पड़ला पर तोरऽ रक्षा भी करभोंऽ । ई सुनी के आदमी के हैरानी होले कि जेकरा हम्में कभी महत्व ही नांय समझलिये, वेहे मदद करी रहलऽ छै । जेकरा अपनऽ समझलिये ऊ छोड़ी के चलऽ गेलऽ । अबे तोरा बताय दै छिहों कि ऊ आदमी केरऽ तीन दोस्त कौन छेले । पहला दोस्त- जेकरा इ सबसे ज्यादा चाहे छेलऽ, इ छेली ओकरऽ दौलत, जे ओकरऽ मुसीबत के समय ओकरऽ मदद नांय करे सकलकी । दोसरऽ दोस्त- जेकरा इ कम चाहे छेलऽ इ छेले ओकरऽ घरऽ- परिवार वाला, जे केवल थोड़े समय तक ओकर साथ दै सके छेले । तीसरका दोस्त- जेकरा पर ओकरऽ बिल्कुल ध्यान नांय छेले, ऊ छेले ओकरऽ सत्कर्म । (पुण्य) जे हमेशा साथ रहले आरो वक्त पर मदद भी करलके ।
48- संकल्प केरऽ दृढ़ता में छिपलऽ छै सफलता ।
वैसे ते हठ ठीक नांय मानलऽ जाय छै । लेकि ग्लानि वश हठ होय आरो एकरऽ पूर्ति के उद्देश्य सही होय ते हठ भी गुणऽ में बदली जाय छै । राजा उत्तानपाद के दु कनिपाय छेल्हें, सुनीति आरऽ सुरूचि । राजा के दोनों कनियाय से दु बेटा छेल्हें । ध्रुव आरो उत्तम, एक दिन राजा सिंहान पर बैठलऽ छेला, हुन्कऽ गोदी में उत्तम बैठलऽ छेले । ध्रुव भी राजा केरऽ गोदी में बैठे ले चाहलके । ई देखी के ध्रुव केरऽ विमाता सौतेली माय ताना मारते होलऽ कहलकी, तोहे तपस्या करी के हमरऽ कोखी में जनम ले, तभिये तोहें राजा केरऽ गोदी में बैठी सके छें । ई सुनी के ध्रुव के बहुत अपमान लागले । ध्रुव केरऽ पिता राजा उत्तानपाद, रानी सुरूचि के ज्यादे माने छेलाऽ ऐहे से राजा चुपचाप रही गेला । ध्रुव घर छोड़ी के चलऽ गेलऽ । नारद मुनि से प्रेरणा लै के, पाँच साल केरऽ उमर में यमुना तट पर मधुवन में तपस्या करे लागलऽ । हुन्कऽ तपस्या से प्रसन्न होय के विष्णु ने ध्रुव के वरदान देलका, ई सब लोक से ग्रहऽ नक्षत्रऽ से उपर आधार बनी के स्थित रहता । ऐसे से हुन्कऽ स्थान ध्रुवलोक कहाबै छै । तपस्या केरऽ बाद ध्रुव अपनऽ राज्य में धुरी ऐला । आरो राजय प्राप्त करलका । इतिहास बताबै छे कि ध्रुव ने कई सालऽ तक बहुत ही अच्छा शासन करलऽ छेला । तभी से हुनका तभी से ई बातऽ केरऽ आदर्श मानलऽ गेलऽ छेलात कि राजा तपस्वी होय ते राज्य केरऽ नीति भी आदर्श होते आरऽ प्रजा सुखी रहते । तप केरऽ पीछु जब-तक हठ नाय होते, तप पूरा नांय होते । कहलऽ गेलऽ छै कि अच्छा उद्देश्य केरऽ पीछु केरऽ हठ दृढ़ संकल्प कहाबै छै । पचास प्रतिशत सफलता संकल्प केरऽ दृढ़ता में ही छिपलऽ रहे छै । ऐहे से कोय भी संकल्प लै के ओकरा पूरा करै के लेलऽ दृढ़ संकल्पित रहना चाहीव ।
49- परमात्मा के समर्पित कला ही सर्वश्रेष्ठ ।
एक बार तानसेन से महात्मा हरिदास केरऽ गायन केरऽ प्रशंसा सुनी के बादशाह अकबर ने हुन्कऽ गाना सुनै केरऽ निश्चय करलका । हरिदास त्यागी संत छेना । दिल्ली दरबार में जाय के हुन्कऽ द्वारा गाबै केरऽ प्रश्न ही नांय छेले, ई भी मुश्किल छेले कि इन्हीं बादशाह केरऽ सामने गाये केरऽ हिम्मत करता ऐहे से अकबर आरो तानसेन ने बृन्दावन जाय के संगीताचार्य हरिदास केरऽ गाना सुने केरऽ सोचलका । जबे हुन्हीं बृन्दावन पहुंचला ते अकबर के ई जानी के बड़ी आश्चर्य भेले कि हरिदास एक छोटऽ सन कुटिया बनाय के रहे हथ । अकबर कुटिया केरऽ बाहर नुकाय रहला । तानसेन हरिदास केरऽ कुटिया में ढुकला । हरिदास तानसेन केरऽ गुरू छेा । तानसेन वहाँ गाना शुरू करलक हुन्हीं जानी बुझी के गलती करे लागला । शिष्य केरऽ भूल सुधारै के लेलऽ हरिदास कई ढंग से गाय के दिखाबे लागला । बादशाह केरऽ इच्छा पूरा होय गेल्हें । दिल्ली पहुंचला पर बादशाह ने तानसेन से वेहे रंऽ गाना गाय के सुनाबे ले कहलका, तानसेन कहलके, गुरूजी केरऽ स्वर में जे सुन्दरता छेले ओकरा हम्में नांय प्रकटकरी सके छिये । तानसेन अपने श्रेष्ठ गायक छेला, हुन्कऽ मुंहऽ से ई शब्द सुनी के आश्चर्य होल्हें । अकबर कारण पुछलका । तानसेन कहलके हम्में गुरूदेव केरऽ तरह ऐले से नांय गाबे सके छिये कि हम्में दिल्ली केरऽ बादशाह के लेलऽ गाबे छिये । आरो हमरऽ गुरूदेव ई जगत केरऽ मालिक के लेलऽ गावे छथ । कला में श्रेष्ठ उँचाई के पाबे के लेलऽ ई जरूरी छै कि कला केरऽ प्रदर्शन केकरऽ भी सांसारिक लक्ष्य के लेलऽ नांय होय के परमात्मा के लेलऽ होय । एकरऽ कारण ई छै कि हमरऽ उद्देश्य ही कला क्षेत्र में प्राप्ति केरऽ सीमा तै करे छै । जों ई धन-दौलत नाम आरो यश केरऽ लक्ष्य बनाय के चले छी, ते हम्में सृजन केरऽ सर्वोच्च संभावना के पाबे केरऽ जग्घ ओकरा से मिले वाला अन्य वस्तु में ही भटकी जाय छै । अनन्त परमेश्वर के लेलऽ समर्पित कला ही अपनऽ पूर्णत केरऽ प्राप्ति करी सके छै ।
50- मौक्ष केरऽ अर्थ छिकै मनुष्य केरऽ उच्चऽ स्थिति
समय केरऽ सदुपयोग करे में सब से महत्वपूर्ण बात छै, जे समय में जे करना चाहिवऽ ओकरा करे समय सावधान रहे । दुनियाँ में सब चीज पुनः प्राप्त करलऽ जाय सके छै । सिर्फ बिजलऽ समय के छोड़ी के । कुछ धार्मिक व्यवस्था पूर्व जन्म में विश्वास रखै छै । पूर्व जन्म में विश्वास केरऽ अर्थ छै, वर्तमान के प्रति ज्यादे सावधान रहे केरऽ काम छै । आदमी के अनेक जन्म होते रहे छै, लेकिन जे अपनऽ काम करेऽ सद्पयोग करे छै, ओकरे मोक्ष प्राप्त होय छै । मोक्ष केरऽ सीधा सन अर्थ छै उच्चऽ स्थिति । ऐकरा खाली जन्म मृत्यु से जोड़ी के नांय देखलऽ जाय । रोज दिन आदमी जनम लै रहलऽ छै । यानि दिन भर काम करी रहलऽ छै । रात के सुते छै, बिहार होतें उठी के कामऽ में लागी जाय छै । ई तरह से जहाँ चुकी गेलऽ, वहीं असफलता हाथ लागते । जैन मुनि एक किाा सुनैलका एक बेर एक मनुष्य के शिव नगर जाय ले छेले । वहाँ एक बहुत बोड़ऽ किला छेले । आरो किला में एकेरा दरबाजा छेले । ऊ आदमी आँधरऽ छेले, कोय दयालु ने ओकरा समझैल के कि तोहें दिवार छुतें-छुतें जो, जहाँ दरवाजा मिलतौ भीतर ढुकी जइहें, लेकिन ध्यान रखिहें कि दीवार छुःके चलते समय कोय प्रमाद, आलस्य या कोय दोसरऽ गति विधि में नांय पडि़हे । ऊ आदमी चलते रहलऽ बीच में पानी पीये कभी माथऽ नोंचे, ई तरह से अपनऽ गतिविधि करते गेलऽ । नतीजा ई भेले कि संयोग से जे समय दरबाजा सामने ऐले दीवारऽ से हाथ हटाय के कुच्छु आरो काम करे लागलऽ, दरवाजा में नांय ढुकै ले पारलकर किला केरऽ चक्कर काटते रही गेलऽ । अधिकांश लोगऽ के साथ एहे रंऽ होय छै । सबदिन परिश्रम करते रहे छै, जबे कुच्छु उपलब्धि केरऽ बेरा आबै छै, रास्ता भटकी जाय छै । आलस्य या लापरवाही के कारण । एकरे नाम असफलता छिकै । ऐहे सावधानी केरऽ अर्थ छिकै अपनऽ ई जन्म के सुधारऽ एही उद्देश्य से पूर्व जन्म केरऽ व्यवस्था छिकै ।
51- जीवन – मृत्यु शाश्वत छै तैमय कथिल
मानलऽ जाय छै कि बुढ़ापा अभिशाप छै, लेकिन ई निर्भर करे छै कि बुढ़ापा कौन तरह से जिलऽ जाय । जीवन केरऽ ई अवस्था सामान्यतः मृत्यु केरऽ निकट मानलऽ जाय छै । आरो मन केरऽ स्वभाव होय छै कि उ मृत्यु केरऽ बारे में सोचबे नांय करे छै । एक सज्जन छेला जीवन भर तपस्वी के तरह रहे छेला । सब से बोड़ऽ आश्चर्य होले कि ई सज्जन बुढ़ापा में ऐत्ते उदास आरो निराश काहे रहे हथ । वृद्धावस्था में हुन्कऽ भेंट एक जवान संत से होल्हें । हुन्ही अपनऽ गुरू बनाय लेलका । एक दिन अपनऽ समस्या गुरू के सुनैलका कि हम्में बुढ़ापा में जेत्ते शरीर से नांय थकलऽ छी, मनऽ से थकी गेलं । ई उमर केरऽ ऊ दौर छै जबे जीवन आरऽ मृत्यु में कोय अन्तर नांय रहना चाहीवऽ । लेकिन अभी भी जीवन केरऽ बारे में सोचते-सोचते मृत्यु पर आय के अटकी जाय छै, तबे गुरू हुन्का सकझैलका नांय हम्में जीवन के समझै छियै नांय मृत्यु के । बस समय काटना ही जीवन मानी लै छिये । जबे जीवन सही रूपऽ में समझ में नांय आबे छै, तभिये आदमी के मृत्यु केरऽ भय सताबे छै । मृत्यु जबे ऐत्ते, तबे ऐत्ते लेकिन भय जीवन में सभे दिनऽ के लेलऽ आबी जाय छै । जे घड़ी से हम्मेमं इच्छा पर नांय, बल्कि स्वाभाविक तौर पर सरलता पूर्वक जीवन जिये लागे छियै, वह घड़ी से भय चलऽ जाय छै । आरो मृत्यु केरऽ दूरी कम होय जाय छै । एन्ह में इच्छा केरऽ जग्घऽ सरलता केरऽ जीवन जीलऽ जाय जेकरा कहे छै, समर्पण । बुढ़ापा में अनेक प्रकार केरऽ इच्छा फेरू से पैदा होय केरऽ कोशिश करे छै । लेकिन समर्पण सहजता छै, ते हम्में ओकरा नियंत्रण करी सके छिपे । आरऽ मृत्यु के ठीक से स्वागत करी सके छिये । एकरा बाद ऊ सज्जन केरऽ चेहरा फेरू कहियो परेशानी नांय देखैले । जे तरह से बचपन, जवानी में अभ्यास जरूरी छै, वेहे वृद्धावस्था में भी जरूरी छै ।
52- करजा केरऽ बोझऽ ऐहे जनमऽ में उतारी देना चाहिवऽ
एक व्यापारी के व्यापार में एते घाटा होलै कि ओकरा अपनऽ सबकुछ धन संपत्ति बेची के चुकाबे ले पड़ले । फेरू से व्यापार करे ले सबसे कर्जा मांगलकऽ । कोय ओकरा कजा्र दै ले तैयार नांय होले । अंत में राजा केरऽ पास गेलऽ, राजां ने पुछलका तोहें ई कर्जा कौन तरह से चुकाबे ? व्यापारी कहलके महाराज जेतना ई जनम में चुकाबे सकबै चुकाय देबै । राजां कुछ देर सोचला के बाद, ओकरा कर्जा दे केरऽ आज्ञा दे देलका, कोषाध्यक्ष कागजऽ पर लिखवाय के कर्जा दै देलके । व्यापारी कर्जा लै के चललऽ । जाते-जाते सांझ होय गेले, व्यापारी एक आदमी केरऽ घर रूकी गेलऽ, ओकरा पास धन छेले चिन्ता में नींद नांय आबे छेले, सुती जेबऽ कोय चोराय लेतऽ । व्यापारी पशु- पक्षी केरऽ भाषा जाने छेलै । रात में पशु- पक्षी अपन भाषा में कुछ- कुछ बतिया छेले । व्यापारी पशु- पक्षी केरऽ भाषा सुने लागलऽ । घरवाला केरऽ बरद अपनऽ साथी के बताबे छेले माय हम्में पहिला जनम में एकरा से कर्जा बोलऽ छेलिये, कर्जा लगभग खतम होय चुकलऽ छै । बिहान कुच्छु देरी काम करला पर कर्जा खतम होय जाते । फेरू हम्में कर्जा से मुक्त होय जाबऽ । दोसरऽ बरद बोलले ई ते बड़ी खुशी केरऽ बात छै । अभी हमरा पर एक लाख टाका केरऽ कर्जा बांकी छै । एकरा चुकाबै केरऽ एक रास्ता छै, जो ई आदमी राजा केरऽ बरद से हमर बरद केरऽ प्रतियोगिता रखबाबै आरऽ एक लाख टाक केरऽ शर्त राखै ते हम्में जरूर जीती जाबे । आरो ओकरऽ कर्जा से मुक्त होय जाबऽ बिहान व्यापारी ओकरे घरऽ रूकी रूकी गेले । पहला बरद कुछ देर काम करी के मरी गेले । व्यापारी रात्री केरऽ बात सब ओकरा से बतालकऽ ऊ आदमी राजा केरऽ बरद से अपनऽ बरद के साथ प्रतियोगिता रखबैलकऽ आरो एक लाख टाका केरऽ शर्त भी । राजा आदेश दे देलका, दोनों केरऽ बरद अखाड़ा में ऐलऽ । दोनों में लड़ाई शुरू होय गेले । कुछ देर केरऽ बाद राजा केरऽ बरद हारी गेलऽ ई आदमी केरऽ बरद जीती गेल । एक लाख टाका मिली गेले । कुछ देरी के बाद बरद मरी गेले । ई देखी के व्यापारी राजा केरऽ कर्जा कोषाध्यक्ष घुराते होलऽ कहलके कि ई जनम केरऽ कर्जा पूरा नांय भेल पर दोसरऽ जनम में चुकाबै ले पड़े छै । ऐहे से आदमी के कर्जा ऐसे जनम में चुकाय देना चाहिवऽ ।
53- काँसी पफ़ूल देखी के बुझाय लागे छै वर्षा बुढ़ाप गेले ।
जैसहीं मौसम बदले लागे छै, ओकरऽ हिसाब से प्रकृति में भी बदलाव होय लागे छै । प्रकृति केरऽ बदलाव देखी के अन्दाज लागै- लागे छै, अबे वर्षा ट्टतु आबी गेले, वर्षा ट्टतु में जबे एक दु आढ़त बढि़या पानी गिरी जाय छै, खेत- कियारी डबरा- डबरी भरी जाय छै, चाराऽ तरफ बेंग टर्र- टर्राय लागे छै । खेत बाड़ी हरा- भरा देखाय लागे छै । आरी- डगारी से बिना मतलब घास जमीं जाय छै । चोरांटऽ, कटेया, कोथुवा, आरी पर चलना मुश्किल होय जाय छै । बरसात में भादौ केरऽ अँधरिया रात भगजोगनी (जूगनू) हिन्ने- हिन्ने जगमगाय लागे छै, देखे में बहुत सुन्दर लागे छै, बरसात में पाचन शक्ति कमजोर होय जाय छै । वासी एकदम नांय खाना चाहीव । ताजा, गरम खाना आरऽ सुपाच्य खाना, खाना चाहिव गरिष्ठ खना पचे में दिक्कत होय छै । बर्षा खतम होते ही शरद ट्टतु केरऽ प्रकृति संकेत दै लागे छै । राम चरित मानस में तुलसी दास, वर्षा केरऽ बाद शरद ट्टतु केरऽ आगमन बतैलऽ छथिन ।
बरसा बिगत शरद रितु आई ।
लछिमन देख हू परम सुहाई ।।
फूले कांस सकल माहि छाई ।
जनु बरसा कृत प्रगट बुढ़ाई ।।
सब केरऽ कहना छै, कांसी फूली गेले बर्षा बुढ़ाय गेले । कुंवार केरऽ पानी के कहे छै बुढ़वा बर्षात । कुंवार केरऽ पानी जुवारे गुवार, कुंवार में एक बेरा पानी पड़बे करे छै । कुंवार में दोद (धूप) केत्ते तेज लागे छै, गरमी के मारे हालत खराब होय जाय छै ई महीना में सर्दी, खांसी (खोंखी) ज्वर, बुखार, पेट खराब, मौसम बदलते होय लागे छै । ऐहे रौद (धूप) जाड़ा में कर्त्त सुहाय छै । प्रतिृ (पितरी) पक्ष समाप्त होते नवरात्र केरऽ परब दशहरा शुरू होय जाय छै । शरद पूर्णिमा केरऽ चन्द से अमृत केरऽ बर्षा होय छै, खीर बनाय के रात में सीतऽ में राखी देलऽ जाय छै । सुबह (बिहाने) परसाद के रूप में खाय छै । शरद पुर्णिमा के दिन इन्जोरिया चकाचक रहे छै । शरद ट्टतु जाते ही जाड़ा आबी जाय छै, दिन छोटऽ होय लागे छै । सूर्य भगवान भी देरी से उगे हथ, डुबे में जल्दी डुबी जाय छथ । नदी तालाब केरऽ पानी ठंढा होय जाय छै । ऐहे छिकै प्रकृति केरऽ नियम, जाड़ा, गर्मी, बर्षात होते रहे छै । ऐहे में जिन्दगी बीति जाय छै, एक दिन सब से मुक्ति मिली जाय छै ।
54- ईश्वर के समझऽ मिलथों शान्ति
ई दौर में जे तेजी से दुनियाँ बदली रहलऽ छै, शायद पहले नांय बदललऽ छेले । जेकरा कल्ह देखलऽ छेलिये, वू आज वेहे नांय छै आरो जेकरा देखी रहलऽ छिये बू कब बदली जते पता नांय ? हमरऽ वू परम शक्ति से एन्हऽ होप कि जे कुछ होप रहलऽ दै, वू कमाल केरऽ छै आरो तों हे जे करी रहलऽ छऽ हमर (हम्में) यानि अहंकार गिरी जेथों, पिछला दिन हवाई सफल में जैसे ही प्लेन टेक- आफ करे लागले, हम्में परमात्मा के हाथ जोड़ी के स्मरण कर लिये । पास में बैठलऽ पढ़लऽ- लिखलऽ समझदार आदमी छेले, हमरा से पुछलके तोरा डऽर लागी रहलऽ छ कि ? भगवान के प्रति आभार व्यक्त करी रहलऽ छऽ । कहलके एकरा में आभार केरऽ की बात छै ? हमरा वू आदमी के कहे ले पउ़ले कि जेंए भगवान ई संसार के बनैलऽ छै, जों तोहे ई बात के मानी ले ते तोरा भी आभार व्यक्त करै ले ही पड़थों । सब इंसान एक दोसरा से अलग छै । आदमी के ऐत्ते बोड़ऽ आदर परमात्मा ने देलऽ छै कि तोहें अपने आप में अलग छऽ । तोरऽ जेन्हऽ कोय नांय । परमात्मा केरऽ आभार वयक्त करे से मन शान्त होय छै । आए एक बेफिक्री जेन्हऽ आय जाय छै । हमरा लागे छै, हम्में करी रहलऽ छिये । एकरा में केकरऽ पकी लेना- देना हमर ‘‘हम्मेमं’’ एन्हऽ हस्तक्षेप बनी जाय छै । जे हमरा अशांत करे छै । करी हम्हीं रहलऽ छिये, लेकिन ई भाव से करऽ कि कुछ होय रहलऽ छै । आए हम्में करी रहलऽ छिपं । तबे होय रहलऽ छै । बस यहीं से अशान्ति आप जाप छै । ई बोझ के बहुत ज्यादे नांय उठाबऽ कि जे कुछ करलिये, जे कुछ करबे हम्हीं करबै ई बोझ तोरा अशान्त करी देथों । हलका होय खातिर एतना ही सोचना काफी छै कि करे वाला कोय आए छै । करबाबै के लेलऽ आदमी के रूपऽ में हमरऽ नियुिक्त करे छै । भगवान से बोड़ऽ कोय नांय छै । तोहें मानऽ चाहे नांय मानऽ ।
55- प्रगति में बाधक होय छै अपनऽ प्रशंसा अपने करै में ।
जे आदमी महान होय छै, वू आदमी हमेशा सावधान रहे छै, वू कभी केकरो मोका पर अपनऽ प्रशंसा में रूचि नांय लेबे लागी जाय । जवानी में नेपोलियन साहित्य में ज्यादे रूचि राखे छेला, बू समय- समय पर लेख भी लिखे छेला । एक वार नगर केरऽ विद्वानऽ ने वहाँ केरऽ नागरिक से लेख आमंत्रित करलऽ छेला । सर्व श्रेष्ठ लेख पर इनाम केरऽ भी घोषणा करलऽ गेलऽ छेले । एकरा में अनेक लेख जमा गेेले । एक लेख नेपोलियन केरऽ भी छेले । नेपोलियन केरऽ ही लेख सर्वश्रेष्ठ घोषित करलऽ गेले । कुछ समय केरऽ बाद नेपोलियन सम्राट बनी गेलऽ, कई बातऽ के लगभग भूली चुकलऽ छेलऽ । नेपोलियन केरऽ मंत्री के ई बातऽ केरऽ जानकारी कहीं से मिलले कि सम्राट नेपोलियन ने, कभी एक लेख लिखलऽ छेले । जे पुरस्कृत भेलऽ छेले । मंत्री अपनऽ आदमी के भेजी के लेख केरऽ मूल प्रति मंगवाय लेलकऽ । एक दिन मंत्री लेख केरऽ प्रति सम्राट के सामने रखते होलऽ हँसी के पुछलके, ई लेख केरऽ लेखक के तोहें जानै छऽ ? सम्राट नेपोलियन लेख देखी के कुछ सोचे लगला । मंत्री सम्राट केरऽ मुद्रा देखी के मोनऽ में सोचे लागलऽ कि सम्राट खुश होय के कुछ ईनाम देता । कुछ देरी के बाद सम्राट लेख हाथऽ में कै लेलका, आरो ऊ घरऽ में गेला जहाँ बोरसी में आग जरी रहलऽ छेले । कुछ देरी लेख के देखते रहला बोरसी में आग धधकी रहलऽ छेले । लेख के जराय देलका । लेख जरी के छारऽ होय गेल । नेपोलियन केरऽ जवाब छेले, ई लेख हमरऽ एक समय केरऽ उपलब्धी छेले । आज के लेलऽ कोय महत्व नांय छै । हम्में आज कोय लेख लिखिये ते शायद वू सबसे निकृषृ होते । ऐहे से हम्में ई लेख के जराय देलिये । देशकाल परिस्थिति में चिन्तन केरऽ नया स्वरूप देते रहना चाहिवऽ । न कि पुरानऽ प्रशंसा में डुबलऽ रहना चाहिवऽ ।
56- भगवान भी कर्मठ आदमी केरऽ मदद करै छथ ।
कहलऽ गेलऽ छै कि भगवान भी तेलगरे के माथा में तेल दै छथिन । जे खूद अपनऽ सहायता करे छै, यानि अपनऽ काम पूरा करे के लेलऽ परिश्रम करे छै । अपनऽ सब काम भगवाने केरऽ भरोसा छोड़ी दिये, ते भगवान भी शायदे मदद करथीन । एक आदमी हनुमान जी केरऽ भक्त छेलऽ एक दिन बैलगाड़ी से कहीं जय रहलऽ छेलऽ, रास्ता में एक नाला पड़लै_ बैलगाड़ी केरऽ पहिया नाला में धंसी गेले । वू आदमी बैलगाड़ी से उतरी के धरती पर बैठी गेलऽ आरऽ हनुमान जी के पुकारै लागलऽ । ओकरऽ श्रद्धा- भक्ति प्रार्थना पर हनुमान जी प्रगट होय गेला । हनुमान जी पुछलका हमरा कथीले याद करलऽ छें ? वू कहलके भगवान हमरऽ बैलगाड़ी नाला में धंसी गेलऽ छै, तोहें मदद करी के निकाली दे । हनुमान जी कहलका अरे भले आदमी, कोय देवता काहे ने होवे कोय आलसी बेरोजगार करेऽ मदद नांय करे हथ । हेरंऽ समे केरऽ मदद करे लागता, आदमी निकम्मा आलसी होय के बैठी रहतऽ । मौका पड़ला पर भगवान के पुकारते रहतऽ । आदमी कहलके हम्में फिरंऽ गाड़ी निकालबऽ ? हमरा नांय लागे छे कि हमरा ऐत्ते बल छे जे बैल गाड़ी निकालै पारबऽ । हनुमान जी ने कहलका भले आदमी दैवी मदद के लेलऽ श्रद्धा के साथ श्रम भी करना चाहीवऽ । तोहे बरदऽ के ललकारें आरो कादऽ में ढकी के पुरी शक्ति से ढेल । हमरऽ शक्ति तोरऽ देहऽ में ढ़की के तोर मदद करतौ । आदमी हनुमान जी केरऽ बतैलऽ अनुसार करलक ओकरऽ बैलगाड़ी नाला से निकली गेले । अबे आदमी के समझ में ऐले कि भगवान केरऽ नाम लै के कोय काम करलऽ जाय ते सब काम सफल होय जातै । परमात्मा आत्म विश्वास आरऽ शारीरिक बल के रूप में सहायता करै छथ ।
57- दर्पण साफ रहला पर देखाबै छै साफ चेहरा
जीवन के समझे बिना दुःख दूर नांय होय सके छै । जीवन में घटना केरऽ घटबऽ अलग बात छै । आरे दुःख केरऽ आना अलग मामला छै । घटना केरऽ पीयु प्रारब्ध आरऽ संयोग होय छै । लेकिन दुःख मन से जोड़लऽ होलऽ छै । एक सज्जन विमार होय के पड़लऽ छेला । डाक्टर हुन्का वजन कम करे केरऽ सलाह देलखें । जों हुन्कऽ वजन कम होय जाय ते हुन्हीं स्वस्थ होय जैता । ई बात हुन्का समझाय देलऽ गेल्हेन । हुन्हीं वजन भी कम करलका, जेतना होना चाहीवऽ ओतना नांय होल्हेंन । हमेशा दुखी रहे लागला कि हम्में ऐत्ते व्यायाम (एक्सर साईज) करे छी तइयो वजन नांय घटलऽ हुन्कऽ जीवन में एक दुर्घटना घटलऽ । हुन्कऽ जवान बेटा दुर्घटना में मरी गेल्हेंन । हुन्का पर दुःखऽ केरऽ पहाड़ टुटी पड़लऽ । आरो हुन्ही देखते देखते शरीर से झटकी गेला । बहुत दुबराय गेला । पहले दुबरऽ होय ले चाहे छेला, स्वस्थ होय ले । अबे दुबरऽ होय के अस्वस्थ होय गेला । बहुत परेशान रहे लागला । तबे हनकऽ गुरू समझैलका जो जीवन ढंग से समझ में आबी जय ते घटना के भोग में परिश्रम कम लागे छै । आरऽ पीड़ा भी कम होय छै । काहे कि घटना केरऽ दुःखऽ से कोय ताल्लुक नांय छै । जीवन केरऽ समग्र रूपऽ के समझऽ घुट घुट के जीये केरऽ अर्थ छिके घटना के सही रूपऽ में नांय लेलऽ जाय रहलऽ छै । जीवन हमेशा से पूरा होलऽ छै ? केकरे रहला से या नांय रहना से ऊ संषित होय छै, जीवन करेऽ कोय भी उद्देश्य हो, जीवन से बाहर नांय छै । ऐसे से शरीर केरऽ दुबरऽ पातरऽ होना, घटना से दुःखी सुखी हेाय केरऽ अर्थ संपूर्ण जीवन से जोड़लऽ नांय जाय सके छै । जे दर्पण साफ आरो शुद्ध छै ते चेहरा स्पष्ट देखाबै छै । ऐहे तरह से हृदय शुद्ध आरऽ निर्मल छै ते जीवन केरऽ स्वरूप स्पष्ट देखाबे लगते । हृदय पर कौन बातऽ केरऽ केतना लेलऽ जाय ई समझदारी आरऽ विवेक जेकरा में आय गेले वू बाड़ेऽ से बाड़े दुःख के भी आसानी से झेली लेते ।
58- बीज केरऽ मूल स्वरूप बनाय रखना जरूरी छै ।
आज के समय में लोग अपनऽ असली जीवन छिपाय लै छै । आरो नकली जीवन के प्रचारित करत रहे छै । दिखावा एते बढ़ी गेलऽ छै कि जे वास्तविक छै से छुपी जाय छै । बीज बनाबै वाला एक कम्पनी केरऽ मालिक अपनऽ प्रबन्धकऽ केरऽ बैठकी बैठलका । हुन्हीं अपनऽ भाषण में सब से मांग करलका कि हम्में जे बीज बनाबै छी, ओकरा में सिर्फ ऐहे ध्यान राखै छी कि ई बीज से गाछ जमे आरो एकरे बैज्ञानिक क्रिया अपनालऽ जाय छै । कंपनी केरऽ मालिक ने कहलकै हम्मेमं सोचे छी बीज में एक मौलिक सम्भावन छुपलऽ रहे छै । वू बीज केरऽ जे भी गाछ बनै छै, ओकरा में ऊ मौलिकता नांय रहे छै । हुन्कऽ बात बड़ी दार्शनिक छेलहेन । कुछ लोगऽ केरऽ मसझमें आलै कि जेकरऽ बीज छै, वहे गाछ जमतै । लेकिन ऊ सज्जन केरऽ कहना छेलै कि एकरऽ अलाबे गाछ पर, ऊ बीज केरऽ कुछ मौलिक देखभाल खाद आरो भूमि केरऽ प्रभाव के कारण कम या ज्यादा हो जाय छै । ई वारीक तनय छै । हुन्खऽ कहना छैले कि जीवन में भी ऐन्हे होय छै । हमरऽ जीवन केरऽ समगुता बीज रूप में भीतर मौजूद होय छै । आरऽ जीवन भर हम्में ओकरा समझी नांय पावै छिपै । ऐहे से मनुष्य बाहरी रूपऽ से मनुष्यते देखावै छै लेकिन आरेा भी बहुत कुछ बनै छै । लेकिन ओकरऽ जे मूल बीज छै मानवता केरऽ ओकरऽ प्रभाव शक्तित्व में नांय देखाबै छै । वू डाक्टर इंजीनियर, राजनेता आदि बनी जाय छै लेकिन बीज केरऽ मूल स्वभाव मानवता ओकरऽ जीवन से गायब होय जाय छै । ऐहे से बीज स्वरूप बनाय रखना आवश्यक छै । बीज बनाबै वाली कंपनी केरऽ मालिक केरऽ बात इंसानऽ पर लागू होय छै । परमात्मा ने मूल रूपऽ से जे बीज हमरऽ भीतर बुनलऽ हथ, हमरऽ जीवन में ओकरऽ मौलिकता बनलऽ रहना चाहिवऽ फेरऽ हम्में कोय भी पद पर हैऽ या कोय व्यवसाय से संबंधित रहँऽ फरक नांय पड़ना चाहीवऽ ।
59- जेन्हऽ मिलै छै शिक्षा वहे रंऽ बनै छै चरित
स्वामी विवेकानन्द (नरेन्द्र) केरऽ बचपन केरऽ घटना छिकै । हुन्ही वू समय छऽ साल केरऽ लगभग छेला । जबे अपनऽ मित्र के साथ चैत संक्रान्ति में होय वाला शिव पूजा केरऽ उत्सव देखै ले गेलऽ छेला । मेला से माटी केरऽ बनलऽ मूर्ति महादेव केरऽ लै के आय रहलऽ छेला । साँझ होय वाला छेले, अंधार होप गेलऽ छेले । नरेन्द्र आगु छेला आरो मित्र पीछु छेले, तभिये पीछु से तेज गति में घोड़ा गाड़ी आबी रहलऽ छेले । मित्र के कोय ध्यान नांय छेले मस्ती में आबी हरलऽ छेलै । जबे पीछु घुरी के नरेन्द्र देखलका घोड़ा केरऽ गौड़ मित्र केरऽ देहऽ पर पड़हीं वाला छेलै, रास्ता में जाय वाला राहगीर जोड़ से चिलैले, तइयो केकरे समझ में नांय आबी रहलऽ छेले कि की करलऽ जाय नरेन्द्र केरऽ हाथऽ में शिव केरऽ मूर्ति छेल्हें, तुरंत मूर्ति के नीचे राखलका आरो तेजी से दौड़ी के पकड़लका मित्र हक्का बक्का देखे लागलऽ । घोड़ा गाड़ी तेजी से पार होय गेले । सड़कऽ पर बहुत आदमी जमा गेले, आरो नरेन्द्र के धन्यवाद दिये लागले । आरेऽ हुन्कऽ तारीफ करे लागलै । आज अपनऽ मित्र केरऽ जान बचाय लेल्हऽ नरेन्द्र के तारीफ केर कोय असर नांय पड़ल्हेन, हुन्हीं शिव केरऽ मूर्ति उठाय के अनजान सरीखे अपनऽ घऽर चलऽ गेला । रोज अपनऽ माय के दिन भर केरऽ घटना सुनाबै छेला । माय भी ध्यान सुनै छेली । आज वाला घटना भी सुनैलका, बेटा तोहें जे काम करले भले आदमी केरऽ काम छिकै । तोहें अपनऽ जीवन में भलाई केरऽ काम करै केरऽ कोशिश करीहे । माय केरऽ शिक्षा से नरेन्द्र करेऽ जीवन में जबरदस्त प्रभाव पड़ लेन्ह । आगे चली के स्वामी विवेकानन्द के रूप में विश्व में प्रसिद्ध भेला । स्वामी जी परवर्ती काल में जे ज्ञान मिल लेनह ज्ञान केरऽ भंडार अपनऽ माय केरऽ शिक्षा देलऽ मानै छथ, माय हुन्का रोज धर्म, भलाई आरऽ उपकार केरऽ शिक्षा दै छेली । वर्तमान में सफलता कमाबै के लेलऽ किताबी ज्ञान केरऽ महत्व ज्यादा महसूस करलऽ जाय रहलऽ छै । लेकिन ई बात भी ध्यान में रखै के छै कि पढ़ाई अपनऽ उपयोगिता छै । व्यवहारिक रूप में मानव जीवन केरऽ गढ़ छै । ओकरऽ महत्व बहुत ज्यादे छै । एन्हऽ शिक्षा में व्यक्ति जीवन में सफल होबे करै छै । आरो समाज केरऽ एक नया रास्ता भी बनै छै ।
60- जीतै के वास्ते वीर समझौता नांय करै छै ।
महाभारत युद्ध केरऽ बात छिकै । कौरव- पांडव में घमासान युद्ध चली रहलऽ छेलै । कर्ण अर्जुन के मारे के लेलऽ किरिया खाय के बैठलऽ छेलै । कर्ण वाण पर वाण चलाय रहलऽ छेलऽ । एक वाण अर्जुन के तरफ आलै, श्रीकृष्ण ने रथ के नीचे झुकाय देलका वाण अर्जुन केरऽ मुकुट केरऽ उपरला भाग कारते होलऽ पार होय गेलऽ । ई देखी के कर्ण के अचरज भेलै, वाण धुरी के कर्ण केरऽ तरकस में आबी गेले । बोललैं कर्ण तोहें अबकी बार बढि़यां से निशाना लगैहऽ जो हम्में सही निशाना पर गेलियै ते तोरऽ शत्रु के कोय नांय बचाबै ले पारतै । ई बेर पूरा कोशिश करऽ तोहें जरूर विजय प्राप्त करभे। तोरऽ प्रतीज्ञा भी पूरा होय जेथोंऽ कर्ण केरऽ अचरज आरेा बढ़ी गेलै । वाण से पुछलकै अपने हमरा अपनऽ परिचय दे । कि की कारण छै, अर्जुन के मारै में एत्ते सूचि छोड़ वाण में एकरा सौंप छेलै । प्रकट होय के बोललै हे महावीर हमरा कोय साधारण वाण नांय समझऽ, हम्में महर्षि अश्वसेन छिकां । अर्जुन ने एक समय में खांग्व वन के आग में जराय देलऽ छेलै । हमरऽ पूरा परिवार जरी के मरी गेलऽ । हम्में अर्जुन से बदला लेबैलि चाहे छी । अबे हमरऽ बदला पूरा होतऽ, एन्हऽ बुझाय छै । कर्ण ने हाथ जोड़ी के अश्वसेन से कहलकऽ । मित्र हम्में तोरऽ भावना केरऽ आदर करै छी । लेकिन हम्में अपनऽ पुरूषार्थ से नीति पूर्वक युद्ध जीतना चाहै छी । अनीति केरऽ जीत के मुकाबला में नीति केरऽ साथ लड़ते होलऽ मरी जाना अच्छा समझबै । अश्वसेन कर्ण केरऽ प्रशंसा करी के बोलला, हे कर्ण तोहें वास्तव में धर्म केरऽ इज्जत करै छऽ । तोरऽ करनी उज्जवल छोंऽ । कर्ण आरो धर्म केरऽ धुरी ही वेहे गुण छै । जे हुन्का महा पुरूष केरऽ दर्जा दिलाबै छै । इच्छा के पूरा करै के लेलऽ, कृत संकल्प होय के बावजूद धर्म केरऽ साथ समझौता नांय करना सच्ची वीरता केरऽ पहचान छिकै । एन्हऽ वीर ही दुनियाँ के रास्ता देरवावय छै ।
61- श्रेय लेबे केरऽ छोड़ में, एकता के काटी दै छै ।
एक शिकारी ने चिडिया फंसाबै के लेलऽ जाल बिछैलकऽ, संयोग से दुइयेरा चिडि़या फंसलै । दोनों चिडि़या बिचार करलकी एक होय के दोनों पूरा ताकत के साथ जाल लेले उड़ी गेली । शिकारी देखलकऽ चिडि़या जाल लेले उड़ी रहलऽ छै । शिकारी पीछु- पीछु दौड़ लागलऽ ई तमाशा एकरा साधु देखी रहलऽ छेला । शिकारी से कहलका काहे बेकारऽ में दौड़ी रहलऽ छें ? चिडि़या जाल लैके उड़ी रहलऽ छै । कब तक एकरऽ पीछु दौड़ते रहबे । शिकारी साधु से कहलकै, बात ते अपने केरऽ ठीक छै, लेकिन हम्में ई उम्मीद में दौड़ी रहलऽ छिपै कि कुछ समय केरऽ बाद दोनों जाल लै के नीचे गिरबे करतै । साधु के बहुत आश्चर्य भेल्हेंन, शिकारी से कारण पुछलका चिडि़या के पीछु काहे दौड़ी रहलऽ छें ? शिकारी कहलकै हमरा ई बात केरऽ भरोसा छे कि जे एकता से हमरऽ जाल लैके उड़लऽ छै, दोनों केरऽ एकता ज्यादे समय तक नांय रहतै । दोनों चिडि़या ऐके जाति केरऽ छिकै । जाति केरऽ संघर्ष की होय छै, हम्में जानै छियै । आरऽ सचमुच में आकाश में एनाही होलै । उड़ते- उड़ते दोनों चिडि़या थकी गेली, दोनों एक दोसरा पर परिश्रम केरऽ भार जोड़ ज्यादा देब लागली, यहीं से दोनों में संघर्ष शुरू होय गेलऽ दोनों में वहस शुरू होय गेलऽ कि हमरे चलते तोरऽ जान बचलौ । झगड़ा केरऽ नतीजा ई होलऽ कि दोनों केरऽ ताकत खतम हुवे लागलऽ । ओकरऽ पांख थकै लागलऽ । दोनों लड़खड़ाय के जाल सहित जमीन पर गिरी गेली । शिकारी केरऽ काम बनी गेलऽ । ऐ हे से कहलऽ गेलऽ छै कि श्रेय लेबे केरऽ होड़ एकता के खंडित करी दै छै । जे सफलता एक मत होय के पैलऽ जाय छै, ओकरा श्रेय लेबे केरऽ वृत्ति आरो निज हित से बचाना चाहीवऽ एकता में ताकत आरो बल निहित छै । एकता केरऽ बल पर कठीन से कठीन काम संभव होय जाय छै ।
62- जेन्हऽ काम, तेन्हऽ पहनावा
जे रात सिद्धार्थ ने बुद्ध बने केरऽ तैयारी में महल छोड़लका, हुन्कऽ साथ बचपन केरऽ साथी सहायता करै वाला चन्ना छेल्हेंन । सिद्धार्थ आरो चला दु घोड़ा पर सवार होय के शाक्य राज्य केरऽ सीमा तक पहुँचल । वहाँ पहुँची के सिद्धार्थ ने पहले तलवार से अपनऽ लम्बा केश काटलका फेरू चन्ना के वापस घुरै केरऽ आदेश देलका । एकरऽ बाद सिद्धार्थ वन प्रदेश में पहुँचला । रास्ता में एक शिकारी आते होलऽ देखालत सिद्धार्थ ने शिकारी के बुलाय के एक प्रस्ताब रखलका । सिद्धार्थ बोलेला हम्में अपनऽ कपड़ा से तोरऽ कपड़ा बदलैले चाहे छी । शिकारी देखलकऽ हिन्कऽ कपड़ा राजसी ठाठ वाला छै, बदलैले तुरंत तैयार होय गेलऽ । सिद्धार्थ ने ओकर मृगाकेरऽ छाल से बनलऽ कपड़ा बदली लेलका । सिद्धार्थ शिकारी वाला कपड़ा िपन्हीं लेलका । शिकारी बतैलखें कि ई कपड़ा से तोरा बहुत फैदा होऽ होंऽ । वन प्राणी तोरा बाहरी नांय समझथे । अपने परिवार केरऽ समझी के कोय खतरा भी नांय करहोंऽ । ई सुनी के सिद्धार्थ आरऽ खुश होय गेला । जैसहीं जाय ले सिद्धार्थ पीठ पीछु करलका कि शिकारी कहलकै महारजा कपड़ा केरऽ लेन-देनते होय गेलऽ लेकिन हम्में समझैले नांय पार लिये कि अपने एन्हऽ काहे करल्हऽ । सिद्धार्थ कहलका मित्र, हम्में अबे संयासकेरऽ तरफ बढ़ी रहलऽ छी । जेन्हऽ काम छै, तेन्हऽ कपड़ा भी धारण करना चाहिक सामान्य कपड़ा हमरा हर घड़ी साधारणता केरऽ भान कराते रहतऽ, शिकारी से अनुरोध करते होलऽ कहलका, तोहें राजसी कपड़ा बेची के धन कमाय सके छऽ । कोय दोसरऽ काम करी के जीवन निर्वाह करीहऽ, पशु के हत्या करी के जीवन चलाना अच्छा काम नांय छिकै । शिकारी सिद्धार्थ केरऽ प्रेरणा से जीव हत्या वाला काम छोड़ी देलकऽ । आदमी के लेलऽ कपड़ा केरऽ बड़ा महत्व छै । हम्ें जे काम करै छी ओकरऽ अनुरूप हमरऽ कपड़ा होना चाहीवऽ । एकरा से हमरऽ मन मस्तिष्क पर भी अनुकूल प्रभाव पड़ै छै ।
63- प्रेमचन्द केरऽ बात
प्रेमचन्द केरऽ याद करते होलऽ, ई बात केरऽ गर्व होय रहलऽ छै कि हुन्ही साहित्य जगत केरऽ प्रसिद्ध कथाकार छेलात । लेकिन ई बात केरऽ दुःख होय रहलऽ छै आज हुन्ही नांय रहला । सत्तर साल बाद आज भी प्रेमचन्द केरऽ बतैलऽ बात जस के तस छै । हुनकऽ माधव, धीसू, आरो होरी जेन्हऽ पात्र आज भी वेहे समाजऽ में संघर्षरत छै । प्रेमचन्द केरऽ समय में जे किसान केरऽ हालत छेले, आज भी किसान केरऽ वेहे दशा छै । सूदखोरी, में जकड़लऽ आरो महाजन केरऽ शिकंजा में फंसलऽ, कहीं कुछ भी बदललऽ नांय । नजर आबी रहलऽ छै । होंऽ पात्र केरऽ रूप जरूर बदली गेलऽ छै । नया ढंग केरऽ संस्कृति बढ़ी गेलऽ छै । प्रेमचन्द ने मध्यम वर्ग केरऽ जे संघर्ष अपनऽ कथा में लिखलऽ छेला, आज भी वेहे संघर्ष जारी छै । अंधविश्वास, रूढ़ीवादी, कुरीति, आरऽ अधर्म केरऽ परंपरा जय के तस छै । होंऽ प्रेमचन्द ने अपनऽ कथा पात्र में जे मानवीय मूल्य केरऽ स्थापना करलऽ छेला, चाहे मंत्र केरऽ कथा होय या पंच परमेश्वर, समाज में आज वू मूल्य केरऽ लगभग अलोप होलऽ जाय रहलऽ छै । पश्चिम केरऽ पूंजीपती व्यवस्था आरो संस्कृति केरऽ बारे में लगैला छेला, आज सब सही होते देखाबै छै । प्रेमचन्द केरऽ चिन्तन सबसे बोड़ऽ केन्द्र ग्रामीण भारत आरो किसान केरऽ दशा छिकै । आज सत्तर साल केरऽ बाद भी कहीं कोय सुधार नजर नांय आय रहलऽ छै । किसान दुखी छै, करजा में डुबलऽ छै । बाजार से दबलऽ छै । ओकरा कोय सुनैवाला नांय छै । आत्महत्या करी रहलऽ छै । समाज में छुआछुत, जाति भेद गैर बराबरी दूर होय के बजाय आरऽ बेसी बढ़ी । गेलऽ छै । सत्तर साल में ई स्थिति बदली जाना छेले । आज भी प्रेमचन्द केरऽ प्रसंगिका होना दुःख करेऽ बिषय छै । इतिहास में चलऽ जाना छेले, ई विडंवना ही छै कि समाज ने प्रेमचन्द केरऽ लिखलऽ किताब पढ़लकै बहुत पर हुन्कऽ एकोरा बात (नसीहत) नांय मानल कै ।
64- मोह माया छोड़ी के सद्भाव पूर्ण जीवऽ
अनार केर केरऽ एक व्यापारी अपनऽ दुकानऽ पर बैठलऽ छेलऽ । अनाज केरऽ ढेर दुकान केरऽ सामने राखलऽ छेलऽ । एकरा बकरा ऐले आरो अनाज के देरी में मुँह मारलकै, एक गाल अनाज लै ले पारू कि व्यापारी लोहाकेरऽ छड़ से घुमाय मारलकै, बकरा छटपटाते भागलऽ । ओकरा बड़ी जोर से चोट लागलऽ छेले । एक महात्मा वेहे दै के जाय रहलऽ । अपनऽ शिष्य के साथ छेला । ई दृश्य देखी के महात्मा मुस्करैला, हुन्कऽ शिष्य पुछल्खें, अपने मुस्कुरावै छिपै, एकरऽ अलाबे कुच्छु आरो भी देखलहक कि ? महात्मा जबाब देलका, व्यापारी ने बकरा के मारलकै, वू जनम मे एकरऽ बाल छेले । अनाज केरऽ दुकान ओकरऽ बाप चलाबै छेले । लेकिन बड़ी कंजुस छेले, एक- एक दाना केरऽ हिसाब रखै छेले । अपनऽ दुकान आरो अनाज से ऐत्ते मोह छेले कि अपनऽ बेटा पर भी विश्वास नांय करै छेले । लक्ष्मी केरऽ सही उपयोग नांय करै से लक्ष्मी अप्रत्यक्ष फल दै हथीन । व्यापारी मरी के बकरा बनलऽ हम्में देखलियै कि जे अनाज खातिर जिन्दगी भर वितैलकऽ, भरी पेट खाना नांय खैलकऽ, आज अनाज में मुँ लगैला पर अपने बेटा से मार खैलकऽ । ऐहे से समय रहते आदमी के सोचना, समझना, आरऽ सही ढंग से जीवन बिताना चाहीवऽ । धन केरऽ स्वामी बनलऽ रहला से अच्छा छै, धन केरऽ सही उपयोग करना, भारती संस्कृति में पूर्वजन्म में विश्वास रखै छै । एकरऽ मतलब अंध विश्वास नांय छै, बल्कि भविष्य केरऽ चिन्ता रखते होलऽ वर्तमान केरऽ जीवन के सही ढंग से जीना, पुनर्जनम केरऽ छिकै कि जे कुछ आज हमरऽ छिकै कल्ह केकरो दोसरा केरऽ होय जैते । जेकरा पर आज हमरऽ मोह माया छै, कल्ह हमरऽ नांय होते । ऐ हे से आज सद्भव आरो सदुपयोग केरऽ जिन्दगी जीना चाहिवऽ ।
65- आजादी केरऽ रोटी श्रेष्ठ होय छै ।
वन में एक भेडि़या बहुत दिनऽ से खाना करेऽ बड़ी दिक्कत महसूस करी रहलऽ छेलऽ अपनऽ साथी से कहलकऽ कि हम्में वन छोड़ी के शहर जाय रहलऽ छी । साथी सनी मना करलकै, भेडि़या साथी केरऽ कहलऽ नांय मानलकऽ शहर पहुंची गेलऽ । भेडि़या देखलकऽ एकरा मोटरऽ- झोटऽ कुकुर अपनऽ मालिक केरऽ घर केरऽ बाहर घुमी रहलऽ छै । भेडि़या कुकुर से बातचीत करलकऽ की हाल चाल छों, तोरऽ मालिक केरऽ कुकुर बतैलकै हमरऽ मालिक बहुत बढि़या खाना दै छथ । देखऽ हम्में कुकुर होय के भी पहलवान छी, तोहें भेडि़या होय के भी कमजोर छऽ । तोन्हें चाहऽ ते तोरा खातिर भी बढि़या खाना केरऽ व्यवस्था करी सकै छी । रात के मालिक घरऽ में पहला दै ले पड़थों ? भेडि़या कुकुर केरऽ साथें जाय लागलऽ अचानक भेडि़या केरऽ नजर कुकुर केरऽ गला पर पड़लै, कहलकै तोरऽ गला में पट्टा बांधलऽ छों ? हमरऽ मालिक रोज दिन में गला में पट्टा बांधी दै छथ, आरऽ कुकुर सनी के सामने ई हमरऽ चिन्ह छिकै, हम्में मालिक केरऽ कुकुर छिकिये। रात के पट्टा खोली दे छथ। आगु-आगु कुकुर जाय रहल छेलऽ पिछु पिछु भेडि़या जाय रहलऽ छेलऽ । कुमरा पीछु धुरी के देखलकऽ ते अचरजऽ में पड़ी गेलऽ। भेडि़या वन के तरफ जाय रहलऽ छै । बढि़या खाना केरऽ फेरा में शहर आलऽ छेलऽ । भेडि़या वन जाते7 जाते कहलकै, बन्धन में बंधी के अच्छा खाना से अच्छा छै आजाद रही के एक टुकड़ा खाय के रही जाना । दर असल सेवा भाव आरो दास भाव में थोड़ फरक होय छै । सेवक केरऽ सम्मान आरऽ दा केरऽ सम्मान में भी फरक होय छै । सेवा में ई बात केरऽ स्वतंत्रता छै कि सेवक अपनऽ सवामी के अपनऽ मोन से काम करै छै । दा ते पूरा स्वामीय केरऽ मोनऽ पर निर्भर रहे छै । दास भाव केरऽ सबे बोड़ऽ बिपत्ति ऐहे छै कि ओकरऽ स्वतंत्रता पुरी तरह से खतम होय जाय छै । सेवक केरऽ स्वतंत्रता फिर भी बनलऽ रहै छै । आरऽ स्वतंत्रता बहुमूल्य होय छै । जे आजाद नांय छै, समझऽ कि घोर पीड़ा उठाय रहलऽ छै ।
66- जहाँ धर्म छै, वहीं विजय ।
एक धर्मात्मा राजा छेलात, एक दिन हुन्का पास एक फकीर पहुँचलऽ । फकीर दानी राजा से कहलकऽ अपने 12 बारह साल के लेलऽ राज्य दे दे, चाहे अपन धर्म दे दे । राजां ने कहलका, धर्म ते नांय देभों । राज्य हमरऽ लै ले । राजा अपनऽ राज पाट फकीर के दै देलका । अपने वनऽ में चलऽ गेला । वहाँ हुनका एकरा जनानी मिलल्हे, राजा के बतैलकी हम्में राज कुमारी छिंका । शत्रु हमरऽ पिता के मारी देलकऽ राज कुमारी के कहै से राजा दोसरऽ राजा केरऽ नगर में रहना पसंद करलका जब भी राजा के कोय चीज केरऽ कमी होय छेल्हें राजकुमारी पूरा करी दै छेली । दोसरऽ राजय केरं राजा, ई राजा से मिललऽ दोनऽ में मित्रता होय गेलऽ । एक दिन त्यागी राजा ने राज्य करै वाला से कहलका कि अपने आरो अपने केरऽ हमरा घऽर खाना केरऽ न्योता छोंऽ सभे अचरजऽ मं पड़ी गेलं । वेमाय, जेकरा पास कुच्छु नांय छै, वू आदमी राज दरवार में न्योता देलऽ छै । की खिलैते ? राज कुमारी कहलकी अपने न्योता ते दै देलऽ छऽ व्यवस्था होय जैथों । सब व्यवस्था होता गेला । सेना सब भरी भरी पेट खैलकऽ । राजा सहभोज करवाल का त्यागी राजा के बड़ा आश्चर्य भेलेन्ह, राजकुमारी से पुछलका तोहें सब व्यवस्था कैसे करल्हुऽ ? राजकुमारी कहलकी अपने हिसाब लगाय के देखी लहऽ, तोरऽ दान दै केरऽ समय पूरा होय गेलै, आज 12, बारह साल पूरा होय गेल्हों अबे अपनऽ राज्य जाय के सम्भालऽ । राजा ने कहल का हम्में तोरा साथ लैके जाबऽ । तोहे संकट के समय में मदद करलऽ छऽ । राज कुमारी कहलकी, तोहें अपनऽ राजय सम्भालऽ, हम्में जनानी नांय छिकां, हम्में धरम छिकियै । एक दिन तोहें अपनऽ राज पाट छोड़ी के हमरा बचालऽ छेल्हऽ । ऐसे से हम्में भी तोरा मदद करलिहोंऽ । जे धर्म केरऽ रक्षा करै छै । वेहे विजय भी होय छै । एकरा वास्तें धर्म के गहराई से देखै ले पड़ते ।
67- धार्मिक होय के साथ, धर्म के जानना जरूरी छै ।
एक राजा बड़ी धार्मिक छेला, हुन्का धार्मिक होय केरऽ बड़ी घमंड छेल्हें । कोय विद्वान से या साधु संत से मिलै छेला ते एकेरा प्रश्न करै छेला, धर्म की छिकै ? काहे कि हुन्हीं धार्मिक छेला । प्रश्न केरऽ भूमिका भी बनाबै छेलान कि हम्में धार्मिक छिकां । सबसे धर्म केरऽ सही अर्थ जानै ले चाहै छी । हमरा आज तक केकरो उत्तर से संतोष नांय मिललऽ । एक दिन राजा केरऽ भेंट एक फकीर से होलऽ । राजां ने प्रश्न पुछलका धर्म की छिकै ? फकीर ने भी प्रश्न करलकै, कौन धर्म जेकरा से धार्मिकता आबै छै, वू धर्म की जेकरा से खुद के जानलऽ जाय सकै छै । वू धर्म कौन धर्म के लेलऽ पुछी रहलऽ छऽ ? राजा चौंकी गेला । पुछलता धर्म भी अलग अलग छै ? फकीर ने कहलकै सबाल अलग- अलगहुबे केर ऽ नांय छै । सवाल अपने केरऽ उपयुक्त होना चाहिवऽ भाषा केरऽ धर्म छै धारण करना, संत केरऽ धर्म छै खुद के जानना, संसारी केरऽ धर्म छै मनोवांछित के पुरा करना अपने कौन धर्म के जानै ले चाहै छऽ राजा ? अबे राजा भ्रम में पड़ी गेला । हुन्हीं फकीर से कहलका, तोहें हमरा उलझाबे नांय, सीधा बात करें । फकीर ने कहलकै सबके लेलऽ ओकरऽ धर्म वेह छिकै, जेकरा वू जानी सकै धार्मिक होय से अपने सत्य नांय पाय सकै छऽ । होंऽ अपनऽ धर्म में होवे से सत्य पाय सके छऽ । धर्म में होना आरऽ धार्मिक होना एकरा में फर्क होय छै । धर्म एक स्वाद आरो धार्मिक होना भोजन जेन्हऽ छै । धार्मिक एक कर्म काण्ड आरो धर्म एक अनुमति छै । राजा के अबे समझ एल्हेन कि खाली धार्मिक आचरण जानै से धर्म जीवन में नांय आबे सकै छै । धर्म के लेलऽ थोड़ऽ अकेला होय के अपने जानै ले पड़तै, तभिये धर्म केरऽ सही स्वरूप समझ में ऐते ।
68- छोटऽ छोटऽ बात भी बड़ी समझ केरऽ होय छै ।
एक महिला संत छेली, हुन्हीं इराक शहर केरऽ रहै वाली छेली । राबिया बसरी केरऽ नाम से मशहुर छेली । ओकरऽ रोज केरऽ नियम छेले, कबूतर के दाना खिलाना । वू शहर केरऽ कोय बगीचा में झोला भरी दाना लै के जाय छेली, कबूतरऽ के दाना खिलाबै छेली । बाँकी समय में अपनऽ पढ़ाई करै छेली । अपनऽ समय अध्यात्म चर्चा में गुजारै छेली । एक दिन बगीचा में कबूतरऽ के दाना खिलाबै छेली, वहाँ चार पाँच लड़का सुन्दर नौजवान टहलते होलऽ बगीचा में पहुँचलऽ । राबिया के देखलकऽ मनऽ में बदमाशी सुझलै, ओकरा पास खड़ा होय गेलऽ कुछ देरी केरऽ बाद राबिया केरऽ नजर लड़का पर पड़लै, पहले ते मुस्कुरैलकी, बाद में हहाय के हँसे लागली । लड़का सब हँसी केरऽ अर्थ समझै ले नांय पारल कै । एकठो लड़का हँसी केरऽ कारण पुछलकै । लड़की कहलकै हम्में ई खातिर हंसलिये कि जे धरती पर तोरा सनी जेन्हऽ जवान छऽ, बू धरती केत्ते सौभाग्यशाली छै, हमरऽ हँसी असर में भगवान के प्रति आभार छै । लड़का सनी वहीं खड़ा रहलै । लड़की कबूतर के दाना खिलाबै लागली । थोड़ऽ देरी के बाद लड़की कान्दे लागली, हँसी तकते लड़का सनी के कोय अड़चन नांय छेले । लड़की केरऽ कान्दबऽ देखी के अचरजऽ में पड़ी गेले । एकरा लड़का हिम्मत करी के पुछलकै, हँसी केरऽ कारण ते बतैल्हऽ लेकिन कान्दे केरऽ कारण नांय समझे ले पार लियै । तबे लड़की कहलकी पहले हम्में हंसलऽ छे लियै ई देखी के कि ई धरती पर केर्त्त लड़का छे । अबे हम्में ई देखी के कान्हे छी कि लड़का सब सेवा भाव से दूर छै । तू अपनऽ शक्ति सदुपयोग सेवा भाव केरऽ कामऽ में लगैतले । लड़का सनी के सेवा भाव से दूर पाबै छिपै । ऐहे सोची के आँखी से लोर चुवै लागलऽ । लड़का सनी के कहलकी बोड़ऽ बोड़ऽ काम नांय करै ले पारै छऽ, ते व्यासल के पानी पिदाबऽ चिडि़या के दाना खिलाबऽ आरो मिठऽ बोली के आदमी के संतोष दहऽ । बस इतने प्रार्थना तोरा सनी से करै छिहोंऽ ।
69- संतोष में सच्चा सुख छै ।
एक नगर में धनपत नाम केरऽ आदमी रहै छेले । ओकरऽ बेटा केरऽ नाम छेले कुमार । एक दिन सेठ केरऽ द्वारी पर नट अपनऽ कला देखाबै ले ऐले । तमाशा देखाबै में नट केरऽ बेटी भी छेले । देखे में बहुत सुन्दर छेले । कुमार नट केरऽ बेटी के देखी के रि झि गेला । ओकरा संगे बीहा करै केरऽ जिदकरी देलका । सेठ नट से अपनऽ बेटी केरऽ बीहा कुमार करै केरऽ प्रस्ताव राखलका । नट राजी नांय होले, बहुत कहला सुनला पर एकटा शर्त राखलकै । जों कुमार हमरा साथ रही के नट कला सीखता आरो कोय राजा हुन्कऽ कला से प्रसन्न होय के इनाम देता, वेहे दिन अपनऽ बेटी संग बीहा करी देबै । कुमार तुरंत राजी होय गेला । अपनऽ परिवार से आज्ञा लैके नटकला सीखे ले चलऽ गेला । कठीन परिश्रम कर्री के हुन्हीं नटकला में सफल होय गेला । एक दिन कुमार नट कला देखाबै ले बनारस राजा केरऽ सामने गेला । नट कला देखी के राजा बहुत खुश होला । कुमार से कहलका जे इच्छा होय माँगऽ । वू समय कुमार ऊँचऽ महल में बैठलऽ छेला । जहाँ एक मुनि भिक्षा के लेलऽ खड़ा छेला । कुमार देखलका राज महल से एक सुन्दर जनानी भीख लैके आली । लेकिन मुनि बहुत थोड़ऽ भीख लेलका । आरो मुस्कुरैते होलऽ चलऽ गेला । वेहे घड़ी राजा केरऽ आवाज सुनैले बोलऽ नट कुमार की इच्छा छै । मुनि के देखी के कुमार करेऽ मोन बदली गेले । मुनि केए सामने ऐत्ते भीख ऐला मुनि थोड़ सन लै के हँसते चलऽ गेला । कुमार के ज्ञान भेल्हें, अपनऽ धन, दौलत, इज्जत छोड़ी के नट कुमारी केरऽ क्षण भंगुर सुन्दरता में पड़ी के ऐत्ते बोड़ऽ पतित होय गेले । सेठ से नट कुमार कहाय लागलां । कुमार राजा से क्षमा माँगलका इनाम लै से मना करी देलका । आरो मुनि से ज्ञान लै के चलऽ गेला । हम्में अपनऽ शक्ति आरो साहस भूली के क्षण भंगुर पर आकर्षित होय गेलां सब ई ध्यान रखै कि हमरऽ गरिमा ते भंग नांय होय रहलऽ छै ।
70- सहनशील बड़ी (बोड़ा) बात
भगवान बुद्ध केरऽ पुर्व जन्म केरऽ केत्ते कथा छै । बौद्ध अनुयायि में प्रसिद्ध छथ । मानलऽ गेलऽ छै । भगवान बुद्ध एक योनि में भैंस छेला । जंगली होला केरऽ बावजूद भी शांत स्वभाव केरऽ छेला, रोज दिन अपना खास वास्ते हरा- हरा घास जमा करे छेला । आरो बाँकी समय में पानी केरऽ पास बैठना बहुत पसंद छेल्हें । शांत स्वभाव केरऽ कारण वनऽ केरऽ पशु पक्षी तंग करै छेल्हें । कोय पीठऽ पर बैठी जाय । कोय पुंछड़ी पकड़ी के घीची दै छेल्हें । तइयो भगवान बुद्ध बदला केरऽ भावना नांय राखै छेला । वनऽ में एकरा बन्दर ऐत्ते बदमाश छेले कि हुन्कऽ पीठ पर चढ़ी के कुदै छेले । कभी सींग पकड़ी के हिलाय दै छेले । कभी कभी ते ऐत्ते जोड़ऽ से पुछड़ी घीची दै छेल्हें कि बुद्ध कंहरै लागै छेला । केतने बेर ते बदमाश बन्दर आंखऽ में ओं गरी भोंकी दै छेल्हें । तइयो बुद्ध कुछ नांय करै छेला । स्वर्ग से देवता लोग ई सब तमाशा देखी रहलऽ छेला । एक दिन अपनऽ दूत के भेजलका, दूत बुद्ध से पुछलकै, हे शांत मूर्ति, बन्दर दंड केरऽ योग्य छै । अपने ऐकरऽ उपद्रव सहन करी रहलऽ छऽ कि तोहे एकरऽ हाथऽ में बिकी गेलऽ छऽ । एकरा से डराबै छऽ । अपने एकरा दंड काहे नांय दे रहलऽ छऽ । बुद्ध कहलका नांय हम्में एकरा से डरै छी, नांय हम्में एकरऽ हाथऽ में विकलऽ छी । हम्में चाहिये ते एक घुंसा में धरती पर पटकी के सींग से घायल करी दिये । एकरऽ उदंडता से परिचित छियै । हम्में ऐकरऽ अपराध क्षमा करै छिपै । असल में अपने से बलवान केरऽ अपराध सभे क्षमा करै छै । सहनशीलता ते ऐहे छि के कि अपने से निर्बल केरऽ अपराध, खुशी आरो शांत भाव से सहन करलऽ जाया ऐहे सहन शीलता आरो सच्चा धैर्य छिकै ।
71- छोटऽ आदमी से भी शिक्षा मिलै छै ।
संत केरऽ स्वभाव छेल्हें कि वू अपनऽ आबै वाला शिष्य आरो आगन्तुक केरऽ परीक्षा लै छेला । वू एन्हऽ एन्हऽ प्रश्न करै छेला, जे में उत्तर दै में थोड़ऽ अड़चन होय छेले । आरो फेरू संत ओकरऽ प्रश्न केरऽ समाधान करै छेला । एकरऽ पीछु संत केरऽ मतलब पर उपकार, आरऽ लोक हित केरऽ संदेश दै छेला । एक दिन संत अपनऽ ठिकानऽ से वन जाय रहलऽ छेला । रास्ता में एकरा चरवाहा मिललेन, जे बकरी चराय रहलऽ छेले । संत ओकरऽ परीक्षा लै वास्ते मनऽ में ठानलका । हुन्हीं ओकरा पास गेला आरो कहलका तोरऽ ऐत्ते बकरी में सब से छोटऽ बकरी हमरा दै दे ? चरवाहा कहलकै बिना मालिक से पुछे बकरी नांय देभोंऽ । संत कहलका ऐत्ते बकरी में एकरा कम होय जैतो ते मालिक के की पता चलते । लेकिन चरवाहा इस से मस नांय भेले । कहलकै मालिक ते नांय देखी रहलऽ छै । जे मालिक सोंसे दुनियाँ देखी रहलऽ हथ, बूते हमरा देखी रहलऽ छथ । हम्मे एकथ बकरी अपने के दै देबऽ । हमरऽ मालिक के पता नांय चलतै । बड़ऽ मालिक के पता चलिये जैते । फेरू हमरा ऊपर हुन्कऽ विश्वास केरऽ की हो तै ? अपने हमरा माफ करऽ । पाप नांय कर बाबऽ । संत प्रसन्न होय गेला । परीक्षा में चरवाहा सौ प्रतिशत खरऽ उतरलऽ । संत ओकरा लै के ओकरऽ मालिक पास पहुंचलऽ । संत मालिक से सब बात बतालका चरवाहा गुलाम छेलऽ । संत ने ओकरऽ मालिक से कहलका, तोहे भगवान केरऽ बन्दा के गुलाम बनालऽ छऽ, बहुत बोड़ऽ अपराध करलऽ छऽ । लाख कहला पर सौ बकरी में एक बकरी दैले तैयार नांय होलै । ऐत्ते ऐत्ते बोड़ऽ ईमानदार के प्रणाम कर नाचा हीवऽ संत केरऽ कहला पर मालिक चरवाहा के गुलामी से मुक्ति करी देलका, आरो हजारऽ असर्फी इनाम देलका । संत के लेलऽ ई बोड़ऽ दिन छेले । हुन्कऽ परोपकार केरऽ लक्ष्य पूरा होल्हें । एक छोटऽ आदमी से बोड़ऽ शिक्षा मिललऽ ।
72- जे लालच में पड़लऽ ओकरऽ पतन छै ।
एक व्यापारी के दु बेटा छेले । जहाज यात्र के दौरान एक बेर दोनों भाय फंसी गेलऽ । एकरा द्वीप पर पहुँचलऽ । द्वीप पर एक यक्षिणी रहै छेली । दोनों भाय के अपनऽ घऽर लै गेली, वहाँ खूब स्वागत बात करलकी । दोनों भाय एक दिन घुमै ले निकलला । एक व्यापारी घायल हालत में एकरा गाछी तर पड़लऽ छेलऽ । पुछला पर व्यापारी बतैलके हमरऽ भी जहाज क्षतिग्रस्त होय गेलऽ । रास्ता भूली के ऐहे द्वीप पर आबी गेलऽ छी । यक्षिणी पहिले खूब स्वागत करलकी, लेकिन करी टा अपराध होय गेलऽ । नाराज होय के ई दशा करी देलकी । घायल व्यापारी बतैलके द्वीप पर कोय निश्चित तिथि के दिन यक्ष घोड़ा लै के आबै छै । आरो पुकारै छै केकरा समुद्र पार जाना छै । प्रार्थना करला से समुद्र पार करी दै छै । लेकिन ओकरऽ पीठ पर बैठलऽ आदमी पिछु धुरी के देखै छै, ओकरा समुद्र में गिराय दै छै । दोनों भाय व्यापारी केरऽ समझैला पर ध्यान दे के द्वीप से सुरक्षित निकलै केरऽ उपाय सोचै लागलऽ । निश्चित तिथि पर, यक्ष घोड़ा केरऽ रूप धरी के ऐलऽ आरो पुकारै लागहाऽ केकरा समुद्र पार करै ले छै । संयोग से इ घड़ी यक्षिणी वहां नांय छेली । दोनों भाय अश्वरूपी यक्ष केरऽ पास जायके हाथ जोड़ी के कहलकऽ हमरा समुद्र पार करी दे । जैसे ही दोनों भाय घोड़ा केरऽ पीठ पर बैठलऽ कि हुन्ने से यक्षिणी देखली दोनों भाय भागी रहलऽ छै । सुन्दर रूप बनाय के पुकारै लागली । अरे हमरा छोड़ी के कहाँ जाय रहलऽ छें । दोनों भाय में एकठो केरऽ मोब विचलित होय गेलऽ, तबे बड़का भाय कहलकै, घायल व्यापारी की समझैलऽ छेलो ? पीछु धुरी के देखबे ते समुद्र में गिराय देतौ । मरी जैबे । छोटका भाय पीछु धुरी के यक्षिणी के देखी लेलकऽ । अश्वरूपी यक्ष ने समुद्र में गिराय देलकऽ आरो यक्षिणी ओकरऽ हत्या करी देलकी, अपनऽ संयम से बड़का भाय रहलऽ ते आराम से समुद्र पार होय गेलऽ आरो अपनऽ मातृभूमि पहुचलऽ छोटका माय यक्षिणी केरऽ सुन्दर रूप देखी के प्राण गमैलकऽ ।
73- उल्लू के बीच हंस
एक समय केरऽ बात छिकै कि एक गाछी पर उल्लू केरऽ वास छेलै संयोग से एक हंस वेहे गाछी पर आय के बैठलऽ । दिन केरऽ समय छेलै हंस कहलकै आज बड़ी गर्मी छै । आज सूर्य देवता अपनऽ प्रचंड रूप छथिन । एतना सुनना कि उल्लू अपनऽ समाव व्यक्त करलकै कि गर्मी से सूर्य के की लेना- देना ? गर्मी सूर्य केरऽ नांय अंधकार केरऽ परिणाम हित्थे । हंस उल्लू के समझैल्कै कि सूर्य देवता छथिन हिनी सोंसे दुनियाँ के प्रकाश दै छथिन आगे गर्मी भी दै छथिन । उल्लू हंसी के उत्तर देलकै है हंस, तोहें ई नया बात कहाँ से लै आनल्हऽ प्रकाश की होय छै ? रहलै बात गर्मी केरऽ ऊते अंधकर से होय छै । दोनों में बात बढ़ै लागलै, ते उल्लू कहलकै हमर शंका केरऽ निवारण के लेलऽ चलऽ एक गाछ देखाते होलऽ कहलकै वही हमार पूरा परिवार रहै छै । वहीं बातऽ केरऽ समाधान होतऽ । हंस तैयार होय गेलऽ । वहाँ कोय ते समझदार होतऽ । उल्लू केरऽ समाजऽ में एकरा अंस बैठलऽ । एकरा उल्लू बोलले, हंस कही रहलऽ छै । सूर्य प्रकाश दै छथिन आरो गर्मी भी । उल्लू सब ठठाय के हंसे लागलऽ । हंस बोललै तोहे सब मूर्खतापूर्ण बात बन्द कर । हंस के समझैला पर उल्लू सब सकुचाय लागलै । कहाँ से ई पागल आलऽ छै । सूर्य सूर्य हल्ला करी रहलऽ छै । एकरा दोसरा से पुछे लागलऽ । सूर्य दखलऽ छें । नांय हमरा एने सूर्य नांय जानै छिये । हंस सोचलकऽ उल्लू डी कहीं रहलऽ छै । दिन में ते एकरा सुझै छै नांय, करि जालतऽ सूर्य । हंस वहां से जान बचाय के भागलऽ । जाते जाते हंस कहलकै, प्रकाश आरो अंधकार छोड़ऽ लेकिन हमरा एक बात केरऽ समझे उदाबी । गलै कि सत्य केरऽ बहुमत नांय भी होतै, तब भी सत्य सत्य छै । जों बहुमत उल्लू केरऽ पक्ष होय, तो भी समझदार के कभी भी मतलब रूप में सत्य केरऽ नांय करना कहीवऽ । जो जीवन में सत्य केरऽ अनुभूति हो जाय तो भी ई बात केरऽ ध्यान रखना चाहीवऽ । कि ओकरऽ विचार समझदार आदमी केरऽ बीच में करलऽ जाय बिना मतलब आदमी के सामने सत्य केरा बात करै से शक्ति भी नष्ट होतऽ आरो कुछ फल भी नांय मिलतऽ ।
74- भोजन केरऽ आनन्द तभीये छै, जबे स्वाद लैके खैलऽ जाय ।
कथा सिद्धार्थ केरऽ छिकै, जबे हुन्का बुद्धत्व प्राप्त नांय होलऽ छेल्देन । निरंजना नदी केरऽ किनारां वनऽ में पीपर केरऽ गाछी तर ध्यान करै छेला । सिद्धार्थ केरऽ नियम छेल्हें, ध्यान से मुक्त होय के, आस- पास केरऽ गाँव, बस्ती में जाय छेला आरो भीख मांगै छेला, कुछ दिनऽ के बाद भीख मांगना छोड़ी देलका । गाँव केरऽ प्रधान केरऽ बेटी हुन्का वास्ते खाना लै के पीपर गाछी तर जहाँ हुन्ही साधना करै छेला, रोज आवै लायली । लड़की केरऽ नाम छलै सुजाता ? वू रोज सिद्धार्थ के लेलऽ भात लै के रआबै छेली । वेहे गाँव केरऽ एकरा चरवाहा छेले जकरऽ नाम छेले स्वाति । सिद्धार्थ से प्रभावित होय के रोज हुन्का पास आबै लागलऽ । एक दिन स्वाति सिद्धार्थ के पास बैठलऽ छेलऽ तभीये सुजाता भात लै के ऐली । एकरा से पहले सिद्धार्थ स्वाति से बात करी रहलऽ छेला । जैस ही हुन्ही भोजन शुरू करलका, बात करना बंद करी देलका । जब तक सिद्धार्थ खाना खाते रहला, एक दम वातावरण सुनसान होय गेले । सुजाता आरो स्वाति एक दोसर के दिखते रही गेला । स्वाति के कुछ समझ नांय ऐले सिद्धार्थ एका एक चुप कथीले होय गेला । सिद्धार्थ के भोजन करला के बाद स्वाति पुछै हे गुरू महाराज हमरा से बात करै छेलह । भोजन करते समय एकदम चुप होय गेल्हऽ एकरऽ रहस्य हम्में नांय समझे पार लिये । सिद्धार्थ कहलका भोजन बड़ी कठीन से तैयार होय छै, किसान पहिले धान बुनै छै, खेत केरऽ रखवाली करै छै । चार- पाँच महीना लागी जाय छै अनाज तैयार होय में । ओकरऽ बाद घऽर वाला बड़ी जतन से भोजन केरऽ योग्य बनाबै छै । ऐते कठीन से भोजन तैयार केरऽ स्वाद तभीये होय छै । भोजन केरऽ समय एकदम शांत भाव से भोजन करना चाहीवऽ । भोजन जीवन केरऽ महत्वपूर्ण छिकै । स्वाति आरो सुजाता के सिद्धार्थ केरऽ भोजन के समय चुपचाप मौन रहै केरऽ रहस्य समझमें ऐले ।
75- कम में काम चली जाय, ते बेसी जमा करे केरऽ जरूरत नांय छै ।
भगवान बुद्ध एक बेर, बौद्ध भिक्षुअऽ के साथ लैके कहीं दूर जाय रहल छेला । हुन्कऽ यात्र राजगृह से शुरू होय के, बैशाली केरऽ रास्ता पर छेल्हें । बुद्ध आगु- आगु चली रहलऽ छेलात, आरो हुन्कऽ पीछु भिक्षुअऽ केरऽ दल । बुद्ध जबे पिछु धुरी के देखलका, अचरजऽ में पड़ी गेला । राजगृह से चलै समय राजा के तरफ से भिक्षुअऽ के बहुत चीज उपहारऽ मिललऽ छेलै । बुद्ध देखलका सब भिक्षुअऽ केरऽ माथा पर बोड़ बोड़ मोटरी छै । कुछ एन्हऽ भी छेलं जेकरा पास एक से भी ज्याद मोटरी छेले, कुछ माथा पर लादलऽ छेलऽ कुछ गंड़ा पर लादलऽ छेलऽ । बोझऽ के मारे लथपथ होय कै चली रहलऽ छेलऽ । भिक्षुअऽ केरऽ जोगाय वाला काम बुद्ध के भारी चिन्ता में डाली देल्हें । सांझ भेलऽ जाय रहलऽ छेले । बुद्ध तय करलका, ऐहे वनऽ में रात वितालऽ जाय । जाड़ा केरऽ रात छेले । सभे अपनऽ अपनऽ कपड़ा बिछाय के सुती रहलऽ । बुद्ध भी एकरा कपड़ा बिछाय के सुती रहला । शीत केरऽ प्रभाव से बचै के लेलऽ ओढ़ना ओढ़ी लेलका, आधी रात केरऽ बाद शीत खुबे पड़ै लागलऽ । बुद्ध एकरा कपड़ा शरो ओढ़ी लेलका । लेकिन बुद्ध के भिक्षुअऽ केरऽ जोगाय वाला कामऽ से चिन्ता में रात भर नींद नांय ऐल्हें, करवट बदलते रही गेला । बिहान भेलऽ हुन्हीं भिक्षुअऽ के ठंढ से बचै केरऽ उपाय बताबे लागला । हम्में रात में अंदाज लगैलीय कि एक आदमी के तीन कपड़ा केरऽ जरूरत छै । एकरा से ज्यादा समान जोगाबे से कोय मतलब नांय छौऽ । ओतने समान लै के चल जेतना केरऽ जरूरत होय । ज्यादा समान जमा करभे चिन्ता लागलऽ रहथों, कोए चोराय नै ले । रात में नीन्द नांय पड़थों । नीन्द नांय पड़ला से कत्ते रोग सामने आबी जाय छै । आदमी बिमार पड़ी जाय छै । लाख दवाय केरऽ दवाय छिकै नीन्द । ऐहे से भगवान बुद्ध केरऽ जान लेना जरूरी छै । कम से कम चली जाय ते ज्यादा जमा करे केरऽ की जरूरत ।
76- पल भर केरऽ सत्संग में भी लाभ मिलै छै ।
राजगृह नगर में रोहिणेय नाम केरऽ चोर रहै छेले । ओकरऽ बाप मरते समय समझैल कै, तोरा जोंऽ अपनऽ कामऽ में सफल थाबै ले छऽ ते कोय कथा वार्ता भजन कीर्तन में नांय जैहें । यहाँ तक कि कोय मंदिर के सामने से पार होइहें ते कान ओंगरी से बंद करी लिहें । एक दिन रोहिणेय घरऽ से निकललऽ, रास्ता में महावीर स्वामी केरऽ प्रवचन होय रहलऽ छेले । बाप केरऽ बात याद आबी बेल, रोहिणय कान बंद करी लेलकऽ वेहे समय ओकरऽ गोड़ऽ में कांटऽ गड़ी गेले । कांटऽ निकाले ले कान पर से हाथ हटाबै ले पड़लै । तभी येमहाबीर जी केरऽ उपदेश ओकरऽ कानऽ में पड़ी गेले । महावीर जी ने कहलका देवता केरऽ छाया शरीर पर नांय पड़े छै । हुन्कऽ चरण धरती पर नांय पड़ी के चार अंगूरी ऊपर रहै छै । रोहिणेय जल्दी वहाँ दूर हटी गेलऽ । कुछ दिन केरऽ बाद वू चोरी केरऽ अपराध में पकड़ाय गेलऽ । ओकरा जानै- पहचानै ले राजा केरऽ आदमी ओकरा एन्हऽ दवाय देलकै कि रोहिणेय मुरछाय गलऽ । जबे ओकरा होश ऐले देखै छै, एक मणि जड़लऽ मंडबा में छे । छोंड़ी सब ओकरा आगु नाची- गाबी रहलऽ छै । छोड़ी सब रोहिणेय के बतैलकै तोहे स्वर्ग में आबी गेलऽ छऽ । ओकरा से पुछलकै मृत्यु लोक में तोरऽ की नाम छेल्हो ? रोहिणेय के ओकरऽ बात पर विश्वास नांय भेले ओकरा महाबीर स्वामी केरऽ वचन याद आबी गेले कि देवता केरऽ छाया नांय पड़ै छै । छोंड़ी सभी केरऽ छाया भी पड़ी रहलऽ छै । आरो गोड़ भी धरती पर छे । तबे रोहिणेय ने सही कहलके, हम्में चोर छिको हमरऽ नाम रोहिणेय छिकऽ । हम्में स्वर्ग में नांय छी हम्में जानी रहलऽ छी । अपने जे चाह दण्ड दै सकैछऽ हम्में दंड सहेले तैयार छी । राजा केरऽ आदमी राजा केरऽ पास ले गेले ओकरऽ विचार जानी के राजा ने ओकरा दंड से मुक्त करी देलका । तबे रोहिणेय के समझ में ऐले कि सत्संग केरऽ एक पल केतना कीमती होय छै । झूठ से बची गेलऽ, दंड से भी मुक्ती मिली गेलऽ ।
77- परोपकार के लेलऽ नियम तोड़ना अपराध नांय छै
पांचऽ पाण्डव केरऽ एके कनिय छेली द्रोपदी । महर्षि व्यास केरऽ आज्ञा से पांचऽ भाई केरऽ बीच नियम बनैलऽ गेलऽ छेला कि जबे एक भाय द्रौपदी केरऽ साथ रहता त समय दोसरऽ भाय वहाँ नांय जाता । एक समय केरऽ बात छै, युधिष्ठिर द्रौपदी केरऽ साथ आराम करी रहलऽ छेलात । बाहर अर्जुन बैठलऽ छेला । एकरा ब्राह्मण केरऽ करूण पुकार सुनाई पड़ल्हें, कुछ लुटेरा ब्राह्मण केरऽ गो धन लुटी के भागलऽ जाय रहलऽ छेलै । ब्राह्मण ने अर्जुन से सहायता मांगलका । अर्जुन सांप छुछुन्दर के भांति में पड़ी गेल । सोचै लागला, ब्राह्मण के किरेऽ मदद करलऽ जाय दुविधा में छेला कि हुन्कऽ धनुष बाण वेहे घरऽ में छेले । जहाँ द्रौपदी आरो युधिष्ठिर आराम करी रहलऽ छेले । अर्जुन के कुछ नांय सुझी रहलऽ छेल्हें । हिन्ने लुटेरा आंखी से ओझल होय रहलऽ छेले । अर्जुन हारी- पारी के नियम तोड़ै केरऽ सोचलका । आरो धीरे से घरऽ केरऽ किवाड़ी खोललक, जहाँ युधिष्ठिर आरो द्रौपदी बैठलऽ छेली । अर्जुन धनूष बाण लैके चोरऽ के पीछु दौड़ला, चोर देखलक अबे हम्में पकड़ाय जाबऽ, गौधन छोड़ी के भागलऽ । अर्जुन ब्राह्मण के गौधन सही सलामत जिम्मा लगाय देलका । अर्जुन युधिष्ठिर से नियम भंग केरऽ बात बताने होलऽ क्षमा मांगलका । नियम केरऽ अनुसार दंड केरऽ रूपऽ में बारह बारस राज्य से बाहर जाय केरऽ आज्ञा मांगलका । युधिष्ठिर ई सुनी के एकदम व्याकुल होय गेला । अर्जुन से कहलका, हे अर्जुन माने छी तोहें नियम तोड़ी देल्हऽ अपनऽ स्वार्थ के लेलऽ नांय बल्कि परोपकार के लेलऽ । ब्राह्मण केरऽ गौधन बचाय के तोहें पुजा से मिलै वाला अपयश से हमरा बचाय लेल्हऽ यदि परोपकार के लेलऽ नियम तोड़ै ले पड़ते अपराध नांय मानलऽ जाय छै । तोहें दंड केरऽ नांय बल्कि यश केरऽ पात्र छिक्हऽ ।
78- ऊँट केरऽ लम्बा गर्दन
महा भारत केरऽ शांति पर्व में एक कथा छै कि एक ऊँट तपस्या करी के ब्रह्मा जी के प्रसन्न करी लेलकऽ । ब्रह्मा जी कहलका तोहे जे चाहें वरदान मांगी सकै छें । ऊँट ते तपस्या करलके लेकिन अपनऽ आदत से लाचार छेलऽ, आलसी नम्बर वन छेलऽ । तपस्या केरऽ फल से अपनऽ आलस के बढ़ाबै ले अर्पित करी देलकऽ । ब्रह्माजी से कहलकऽ हमरऽ गर्दन सौ गज लम्बा होय जातलऽ आरो हममें बैठल बैठलऽ बहुत दूर केरऽ घास चरी लेतलां । ब्रह्मा जी मने- मने मुस्कुरालका, आरो विचार करै लागला, तप के पीछु जे मलीन छै, फल कभी अच्छा नांय होय छै । तपस्या बढि़यो काम के लेलऽ विकास के लेलऽ होना चाहिवऽ नांय कि अपनऽ स्वार्थ के लेलऽ । तप से फुर्ती के जग्घऽ पर आलस प्राप्त करलऽ जाय ते जीवन बेकार छै । ब्रह्माजी ने तथास्तु कहलका आरो वहाँ चलऽ गेला । ऊँट जेरऽ चाहै छेलऽ ओकरऽ जिन्दगी वेहे रंऽ होय गेला । हिन्ने हुन्ने घुमै छेलऽ आरो एक जग्घऽ बैठी के दूर तक केरऽ घास चरी के अपनऽ भूख मेटाय लै देलऽ । एक दिन बहुत आंधी पानी ऐलै, ऊँट के सामने अपनऽ लम्बा गर्दन बचाबै के केरऽ समस्या आबी गेले । वू अपनऽ लम्बा र्गन एकरा खोह में डाली देलकऽ निश्चिंत होय के बैठी रहलऽ । आंधी पानी से बचै के लेलऽ एकरा गीदर अपनऽ परिवार के साथ वहे खोह में ढुकलऽ । गीदर परिवार के लागलै खोह में बढि़या खाना राखलऽ छै । पूरा परिवार खाय में टुटी पड़लऽ । जब तक ऊँट कुछ सोचतलऽ समझतलऽ, तब तक गीदर परिवार सहित पूरा सूंढ़ खाय के खतम करी देलकऽ । ऊँट छटपटय के रही गेलऽ । अपन लम्बा गर्दन खाहे से निकालै ले नांप पारलक ऊँट मरी गेलऽ । तप से हैरंऽ वरदान मांगल बऽ । अपने प्राण देलकऽ । सावधान नांय रहला से बोडऽ से बोड़ऽ केरऽ अंत होय जाप छै । ऐहे से भगवान केरऽ वरदान महान होय छै सोची समझी के वरदान मांगना चाहीवऽ ।
79- एक होय के खुले छै सफलता केरऽ द्वार
गाँव में एक किसान रहे छेले, हर साल ओकरऽ खेतऽ में आरो सनी केरऽ खेतऽ से फसल बढि़या होय छेलै । ओकरऽ खेतऽ में बढि़या फसल कई साल से होय रहलऽ छेले । गांव ववाला केनांय सोहाय छेले । फसल देखी के जरै छेले । राजा के पास दरखास्त देलके किसान जादू टोना जाने छै । तही से एकरऽ फसल हर साल बढि़याँ होय छै । किसान के राज दरबार में पेशी भेले । राजां ने दोसरऽ किसान सनी से पुछलका सही जादू- टोना जाने छै । सभे किसान केह बातऽ के दोहरैलके, होंऽ सही में जादू टोना जाने छै । एकरऽ फसल कहियो नांय खराब होय छै । राजा ने किसान से कहलका तोहें अपनऽ कैफियत सुनाबे । किसान अपना साथे चले केरऽ आग्रह राजा से करलके । राजा के साथ सभा केरऽ सब कोय निकलले । बाहर निकलला पर किसान हऽर बरद केर जोड़ी अपनऽ बेटी आरो कुदाल खुर्पी अपनऽ औजार के साथ खाद्य बीहन (बीज) देखाते होलऽ बोलले महारजा ऐहे छिकै हमरऽ जादू टोना । हम्में समय पर खेत जोते छिये, समय पर खाद्य बीहन आरो पानी पटाबे छिये, हमरऽ बेटी बरद के अपनऽ परिवार सरिखे ध्यान दै छै । समय पर भरी पेट खाना दै छै । चारा घास सानी पानी नादी भरी के खिलाबे छै । हमरऽ बरद सोंसे गांव में सबसे मजबूत आरो स्वस्थ निरोग छै । समय- समय पर खेतऽ में दवाय छींटते रहे छिये । घास फूस निकालते रहे छिये । चिर चुनमुनी आरो जानवर से खेत में लागलऽ फसल के बचाबे छिये । एक न एक आदमी खेतऽ में लागले रहे छिये । ऐहे सब जादू- टोना हमरऽ छिकऽ । ऐहे से हमरऽ फसल बढि़यां होय छै । एकरा में अचरजऽ केरऽ की बात छै । किसानऽ केरऽ बात सूनी के राजा कहलका किसान ठीक कही रहलऽ छै कि ये जादू जाने छै, अच्छा ऐहे होवे कि किसानऽ वाला जादू सभे कोय के सीखना चाहीवऽ । दोसरा केरऽ उन्नती देखी के नांय जरें । सब कोय अपन अपनऽ खेतऽ में मेहनत करें जीवन मजबूत बनाबें । सफलता के लेलऽ कम समय में विश्वास करे वाला लोग दोसरा केरऽ उन्नती या अपना के कमजोर समझे वाला आलसी ऐ हे सब केरऽ कारण जादू- टोना खोजे छै, दोसरा केरऽ उन्नती देखी के जरे छै । असलियत ते ई छै कि सही ढंग से काम करे वाला ही उन्नती करी सके छै । मन लगाय के जे काम करे छै वेहे असली जादू छिके । वेहे सफलता केरऽ द्वार खोले छे ।
80- अपनऽ परिश्रम केरऽ कमाई श्रेष्ठ होय छै ।
एक बार भगवान महावीर, एक गांव केरऽ सीमा पर प्रातः काल ध्यान करी रहलऽ छेलाता तभिये एकठो ग्बारऽ पहुँचलऽ । ध्यान मग्न महावीर जी से कहलकऽ, हे साधु महात्मा तोहें छऽ ते हमरऽ गाय भैंस पर ध्यान रखिहऽ । कही के ग्वारऽ चलऽ गेलऽ । कुछ देरी के बाद घुरलऽ ते देखै छै एकटो गाय भैंस वहाँ नांय छै । ग्वारऽ महावीर जी से पूछे लागलऽ हमरऽ गाय भैंस कहाँ छै ? महावीर जी ध्यान मग्न कुछ नांय बोलला । ग्वार गुस्सा में ध्यान मग्न महावीर जी के गारी दै लागलऽ तोहें चोर छिक्खऽ, हमरऽ गाय भैंस कहाँ बेची देल्हऽ ? गेंठा उठाय के मारे ले दौड़लऽ कि भगवान इन्द्र प्रकट होय के ग्वारऽ से कहलका, तोहें जेकरा चोर कही रहलऽ छें । वू महावीर स्वामी छिका । आत्म साधन के लेलऽ कठोर तप करी रहलऽ छथ । तोहें केत्ते बोड़ऽ पाप करले, स्वामी जी पर हाथ उठाले । ग्वारऽ अपनऽ अज्ञानता से जे भूल भेले, उकरा खातिर महावीर जी से आरो इन्द्र जी से क्षमा मांगलकऽ दोनों के प्रणाम करी के चलऽ गेलऽ । महावीर जी केरऽ ध्यान समाप्त भेल्हेन, तबे इन्द्र ने महावीर जी से कहलका, हे भगवन अपने केरऽ साधना काल लम्बा होय छै । साधना काल केरऽ अवधि में ग्वारऽ जेन्हऽ बहुत अज्ञात से अड़चन आय सके छै । अपने केरऽ सेवा में रहे केरऽ इच्छा छै हमरऽ । एन्हऽ एन्हऽ संकट के टारते रहबै । महावीर जी कहलका हे इन्द्र आज तक आत्म शधना केरऽ इतिहास में नांय कभी भेलऽ छै, नांय होते । मुक्ति, मोक्ष, या संबोधित दोसरे केरऽ बल पर दोसरे केरऽ सहायता पर होलऽ छै ? आत्म साधक, अपने बल पर, श्रम आरो शक्ति पर जीवित रहै छै । आरो रहते । अपने केरऽ प्रस्ताव पर आभारी छिये ? लेकिन एहे कहै ले चाहे छिये । कि उपलब्धि ते वेहे छिके जे अपनऽ बल पर हासिल करलऽ जाय । दोसरा केरऽ कमाई अपन नांय होय सके छै । अपनऽ परिश्रम केरऽ कमाई ही श्रेष्ठ होय छै ।
81- प्रायश्चित
आज घनू धऽर आर्द्रा पूजा केरऽ बड़ी धूम धाम छै । दाल भरलऽ सोन्हऽ सोन्हऽ पुड़ी, शुद्ध दूध केरऽ काजू, किसमिस, केशर डाललऽ खीर, पक्का आम, पाकलऽ कटहल केरऽ कोवा, जामुन भी छेले । पूजा पाठ करी के सब कोय खेलकऽ पिपलकऽ । एकटा बड़का फुलहा कटोरा में भरी के खीर छन्नू के माय अलमारी पर राखी देलकी । बिलैया ऐले एन्हों झपटा मारलके, कटोरा गिरि के चकनाचूर होय गेले । बिलैया खीर चाटे लागली । धन्नू के माय, गुस्सा में पीढा उठाय के मारलकी, बिलैया मरी गेली । घरऽ में कुहराम मची गेलऽ । आस पास केएऽ जनानी सब जमा हो गेली । कोय कुछ, कोय कुछ बोले लागली । छन्नू के दादी पुतोहू पर गरजे लागली हत्यारिन कहीं की बिलाय मारलकी ? सभे कहे लागले अबे कि देखे छऽ पंडित बोलाबऽ, जे निर्णय देता प्रायश्चित ते करे ले पड़थोंऽ । पंडित सुखराम ऐला । खुब मोटऽ मोटऽ आदमी माथा पर एक बोझऽ टिकी कपारऽ में मोटऽ मोटऽ तीन लकीर वाला चन्दन आय के बैठला । सभे जनानी घेरी के बैठली । छन्नू की दादी पंडित जी से हाथ जोड़ी के बोलली, छन्नू माय के हाथऽ से बिलाय मरी गेले । की करलो जाय पंडित जी ? पंडित जी अपनऽ पोथी पतरा निकालका, हिन्ने हुन्ने पतरा देखी के बोलला बिलाय मारै से बड़ी भारी पाप लागे छै । एकरा खातिर होम जाम, पूजा पाठ सोना केरऽ बिलाय दान करै ले पड़थोंऽ । छन्नू केरऽ दादी बोलली ई सब करे में केत्ते खर्च पड़ते पंडित जी ? पहले ते छन्नू माय के गंगा नहाय ले पड़तै । पंडित जी लिस्ट लिखबाबे लागला, पांच किलो जौ, पांच किलो तील, पांच किलो गुड़, पांच किलो घी, पांच किलो चावल, पांच किलो धूप, भगवान पर चढ़ाबे वास्ते धोती, चारद । पंच बेला पांच तरह केरऽ फल, आरो बिलाय बराबर सोना केरऽ बिलाय धन्नू की दादी माथऽ पकड़ी के बैठी गेली । बाप रे ऐत्ते खरचा कहाँ से पुरैबऽ । पंडितजी कुछ कम खरचा वाला उपाय बताबऽ । पंडित बोलला आरऽ सब ते वेहे रहथोंऽ पांच किलो के जग्धऽ पर सावा किलो करी दहऽ । पंडित जी मनेमन खूब खुश छेला आज जजमान हाथ लागलऽ छै । छन्नू माय गंगा नहाय के ऐती, तबे ने कुछ होतऽ । बनारस जाय केरऽ व्यवस्था करे लागली । ऐतने में छन्नू आय के कहलके दादी- दादी बिलैया ते भागी गेले । घऽर वाला के प्राणऽ में प्राण ऐले । पंडित जी मुँह बनैलऽ घऽर गेला ।
82- स्वर्ग से अच्छा संसार
जों आदमी केरऽ मनऽ में अहंकार रहितहोय के दान आरो सेवा केरऽ माव आबी जाय, ते धरती स्वर्ग बनी जाय । ई भाव वाला के लेलऽ स्वर्ग से भी अच्छा संसार बनी के छै । कुरू क्षेत्र में मुदुल नामक ट्टषि रहे छेला । हुनी धर्मात्मा, सत्यनिष्ठ आरेा ईर्ष्या, क्रोध से रहित छेला । हुनी खेतऽ में गिरलऽ पड़लऽ अन्न चुनी के अपनऽ आरो परिवार केरऽ पेट भरे छेला, कोय द्वारी पर भिमंगा, अतिथि, साधु संत, या कोय कुटुम्ब आबी जाय ते बेहे बिछलऽ- चुनलऽ अन्न से सबके यथा शक्ति भोजन कराय छेला । मुदल ट्टषि केरऽ महिमा सुनी के एक दिन दुर्वासा ट्टषि मुदुल ट्ठषि के परीक्षा लेवे वास्ते पहुँचला । हुन्का पास थोड़ऽ सन अन्न छेल्हें । हुन्हीं बड़ी आदर केरऽ साथ दुर्वासा के अर्पित करी देलका । कुछ दिनऽ के बाद दुर्वासा ट्टषि फेरऽ पहुँचला । मुदुल ट्टषि सत्कार केरऽ साथ दुर्वासा ट्टषि के भोजन करालका । मुदुल अपनऽ परिवार केरऽ साथ भूखलऽ रही के छऽ पखवारा तक दुर्वास केरऽ सेवा करलका, दुर्वासा छऽ पखवारा तक आते रही गेला । आरो मुदुल केरऽ अन्न ग्रहण करते रहला । मुदुल केरऽ परिवार छऽ पखवारा तक अन्न केरऽ मुंह नांय देखलका । तइयो मुदुल आरो हुन्कऽ परिवार केरऽ मुंह मलीन नांय भल्हें । दुर्वासा केरऽ इज्जत सम्मान करते रहला । मुदुल केरऽ परीक्षा केरऽ घड़ी समाप्त भेल्हेंन, दुर्वासा स्वर्ग जाय केरऽ आशीर्वाद देलका । दुर्वासा केरऽ वरदान पूरा भेलऽ मुदुल केरऽ शरीर ले जाय वास्ते देवदूत विमान लैके प्रकट भेला । मुदुल कहलका हम्में यही अच्छा छी । जे स्वर्ग में तृप्ति नांय ? परस्पर प्रतिस्पर्धा आरो असुरऽ केरऽ आक्रमण से नित्य पुण्य क्षीण होवे केरऽ भय लागलऽ रहतऽ । ओकरा से ते संसार अच्छा छै, जहाँ अहंकार रहित होय के दान पुण्य आरो सेवा कई केरऽ भाव आवे ते स्वर्ग जाय केरऽ कामना कथीले होतऽ । मुदुल केरऽ बातऽ से दुर्वासा बहुत खुश भेला । मुदुल के यशस्वी होय केरऽ आशीर्वाद देलका । देवदूत प्रणाम करी के विमान लैके स्वर्ग लौटी गेला । असल में अहंकार रहित होय के दान- पुण्य सेवा भाव होय ते धरती स्वर्ग बनी जाय । एन्हऽ भाव वाला के लेलऽ संसार स्वर्ग से भी अच्छा होय सके छै । एन्हऽ भाव सब कोय पैदा करऽ ऐहे हमरऽ अनुरोध छै ।
83- सत्संग से भी जीवन बदली जाय छै ।
प्राचीन काल केरऽ बात छिके, एक अशिक्षित ब्राह्मण क्रुर डाकू बनी गेला । अपनऽ परिवार केरऽ भरण-पोषण केरऽ वास्ते यात्रि के लूट पटक हत्या जेन्हऽ अपराध करे केरऽ रास्ता अपनालका, एक दिन देवर्षि नारद, डाकू केरऽ पल्ला में पड़ी गेला । डाकू नारद के लुटे वास्ते रास्ता रोकलकऽ । नारद डाकू से कहलका, जे परिवार के वास्ते तोहें पाप कम करी रहलऽ छऽ । तोरऽ पाप कर्म केरऽ भागी तोरऽ परिवार बनथोंऽ । डाकू आश्चर्य चकित होय गेले, हैरंऽ प्रश्न हमरा से पहली बार कोय करलऽ छै । डाकू कहलके हमरा तोहें बेबकूफ बनाय रहलऽ छऽ । हम्में परिवार से पूछे ले जाबऽ । तोहें हिन्ने पार । नारद जी कहलका नांय नांय हमरा तोहें एकरा गाछी में रस्सी से बांधी के जा । हम्में तोरऽ भलाइ केरऽ बात करी रहलऽ छिहोंऽ । एकरा गाछी में नारद जी के बांधी के अपन परिवार से पुछे ले गेला । पहले अपनऽ पिता से पुछलकऽ हम्में जे पाप कर्म करी के आने छियै । पाप केरऽ भागीदारी बनभऽ ने ? पिता उत्तर देलका, हम्में तोरा पाली पोषी के बोड़ऽ बनालियो । अबे तोरऽ कर्त्तव्य छिको हमरां पोषे केरऽ । तोहें कहाँ से आनबे की करबे एकरा में हमरा कोय सरोकार नांय छै । पिता केरऽ बात सुनी के डाकू केरऽ गोड़ऽ तर से माटी खिसकी गेले । एक एक करी के सब से पुछलकऽ माय, कनियाय, भाय, बहीन, बेटा सभे ओकरऽ पाप केरऽ भागी से इंकार करी देलके । डाकू नारद केरऽ गोड़ऽ में गिरि के क्षमा मांगलकऽ । नारद के बन्धन मुक्त करी देलकऽ । अपने हमरऽ ज्ञान खोली देल्हे । डाकू नारद केरऽ प्रेरणा से डाकू वाला काम छोड़ी देलकऽ । भगवान केरऽ भक्ति में लागी गेलऽ । डाकू केरऽ नाम छेले रत्नाकर । नारद केरऽ प्रेरणा आरो सत्संग से कुछ दिनऽ केरऽ बाद वेहे डाकू वाल्मिकी केरऽ नामऽ से विख्यात भेला । संत जन कहे छथ जीवन में सत्संग केरऽ अवसर आते रहै छै । हम्में यदि हुन्का तरफ पीठ करी के खड़ा होवे ते सत्संग केरऽ लाभ नांय मिलते । जो हम्में सत्संग में साथ देना शुरू करी दिये ते कुछ दिनऽ में जीवन केरऽ दिशा बदली जाय, सत्संग में जुड़ते रहना चाहीवऽ ।
84- ज्ञान केरऽ माता
वेद माता ज्ञान केरऽ जननी छथीन । गायत्री महामंत्र में समाहित चौबीस अक्षर केरऽ परम संवाहक छथीन । ज्ञान केरऽ आधार गायत्री महामंत्र छिकै ।
ओम भूभुर्वः स्वः तत्स वितुर्व रेण्यं भगो ।
देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात ।
ओम दिव्य आवाज केरऽ परम संगीत शब्द सृष्टि आरऽ बीज छिकै । ओमकार सभे मंत्र केरऽ प्राण स्वरूप छिकै । देहऽ के ब्रह्मा मानलऽ गेलऽ छै । जिहवा के सरस्वती आरो हृदय में उठे वाली तरंग देह आरो जिहवा से मिली के स्वर में प्रकट होय हथीन । गायत्री ऐहे महामंत्र केरऽ भाषार्थ छिकै । दुःख नाशक सुख दायिनी तेजस्वी देवस्वरूप गायत्री माता के शत्-शत् नमन करे छिहेन । जे हमरऽ बुद्धि केरऽ सन्मार्ग प्रेरित करथ । आज केरऽ दौर में ज्ञान पुंजी छिकै । जेकरऽ ताकत से सब प्रकार केरऽ उपलब्धि हो जाय छै । भारत अपनऽ प्राचीन युग केरऽ परंपरा के अन्तर्गत ज्ञान केरऽ पक्षधर छिकै । दार्शनिक चिन्तन आरो वैज्ञानिक सोच केरऽ माटी से पले- बढ़े छिये । ई भारत तहिया से छै, जहिया से विश्व केरऽ सामान्य आचरण आरो सभ्यता केरऽ ज्ञान नांय छेले । हमरऽ पूर्वजऽ ने ज्ञान केरऽ साथ-साथ प्रसारित करै केरऽ तौर तरीका बतैलथीन । तीर्थाटन वन गमन, सत्संग ई सब केरऽ ऐके उद्देश्य छेले, सब जगह ज्ञान बढ़ै । सुख- शान्ति मिले । ज्ञान केरऽ जननी वेद माता गायत्री केरऽ महिमा केरऽ प्रभाव छिके । स्पष्ट छै ज्ञान केरऽ मुख्य आधार गायत्री महामंत्र केरऽ परम शिक्षाछिकै । गायत्री ज्ञान जननी मानवीय अवतार भेलऽ छथीन । ऐहे ज्ञान समाज केरऽ मुख्य आधार छिकै ।
85- अपनऽ प्रसंशा पुण्य के नष्ट करी दै छै ।
दीर्घकाल तक राज्य करै के उपरान्त, महाराज ययाति ने अपनऽ राज्य पुत्र के दै देलका, आरो अपने वनऽ में जाप के तप करे लागला । कठोर तप के फल स्वरूप हुन्हीं स्वर्ग पहुंची गेला । कभी देवता सब के साथे बैठे छेला, कभी ब्रह्मलोग पहुंची जाय छेला । ययाति केरऽ मान बुहत बढ़ी गेलऽ छेल्हें । ई सब देखी के देवता भी ईर्ष्या करे लागला । इन्द्र केरऽ सभा में जाय छेला, ते हुन्कऽ तप केरऽ कारण इन्द्र के अपने से नीचे बैठाबे केरऽ हिम्मत नांय होय छेहें । इन्द्र ने अपनऽ आसन पर साथे बैठाबे ले पड़े छेल्हें । ई बात इन्द्र के नांय सोहाय छेल्हें । देवता भी मृत्युलोक केरऽ कोय जीव के सिंहासन पर बैठलऽ नांय देखे ले पारे छेला । इन्द्र देव केरऽ भावना से सब देवता परिचित छेला । एक दिन ययाति से पुछलका अपने केरऽ पुण्य तीनऽ लोकऽ में विख्यात छै । अपने केरऽ बराबरी, भला कौन करे ले पारते । हमरा ई जानै केरऽ इच्छा होय रहलऽ छै कि अपने कौन एन्हऽ तप करन्हो जे ब्रह्मलोक में इच्छानुसार रही रहलऽ छऽ । अपनऽ प्रसांशा सुनी के ययाति, इन्द्र केरऽ वाणी जाल में फंसी गेला । ययाति इन्द्र से कहलका, हे इन्द्र देवता । हमरऽ समान मनुष्य, गंधर्ब, ट्टषि में से कोय एन्हऽ नांय छै, जे हमरऽ बराबरा तपस्या करलऽ होता । एतना सुनते इन्द्र केरऽ स्वर कठोर भय गेल्हे । यथाति के डपटी के कहलका, हमरऽ सिंहासन से उठी जा । अपनऽ प्रसंशा अपने मुँहऽ से करी के सब पुण्य खतम करी लेल्हे । तोहें ई जानला बिना कि मनुष्य, गर्धव, ट्टषि मुनि सब देवता केरऽ तुलना करे लागल्हे । सब केरऽ तिरस्कार करे लागल्हे । अबे तोहें स्वर्ग से नीचे गिरी जाभे । आत्म प्रसंशा से ययाति केरऽ तप फल खतम होय गेलऽ । स्वर्ग से नीचे गिराय देलऽ गेल्हेंन । ऐहे से कहलऽ गेलऽ छै । प्रसंशा दुसरे केरऽ मुंहऽ से हुवे ते अच्छा छै । अपनऽ प्रसंशा अपने करे से आदमी केरऽ मान- सम्मान खतम होय जाय छै । अपनऽ प्रसंशा दोसरे के मुँहऽ से अच्छा लागै छै ।
86- विद्या पढ़ला से आबै छै, हठ से नांय ।
विद्या के लेलऽ केरऽ आशीर्वाद जरूरी छै । कोय अपनऽ जिद पर अपने से विद्या, पढ़े केरऽ कोशिश करे छै, ओकरऽ ज्ञान अधूरे रहे छै, कनखल केरऽ पास गंगा किनारां, महर्षि भारद्वाज आरो महर्षि रेम्य केरऽ आश्रम छेले । दोनऽ में बड़ी मित्रता छेल्हें, रैम्य आरऽ हुन्कऽ दोनऽ पुत्र विद्वान छेला । समाजऽ में सम्मानित छेला । भारद्वाज तपस्वी छेला, हुन्का पढ़ै में रूचि नांय छेल्हें । भारद्वाज केरऽ पुत्र यवकीत अपनऽ पिता के समान पढ़ै से दूर रहे छेला । जबे रैम्य आरो हुन्का पुत्र केरऽ ख्याति देखलका, ते वैदिक ज्ञान प्राप्त करे केरऽ कामना से उग्र तप करे लागला । देवराज इन्द्र प्रकट होय के, कठिन तप केरऽ कारण पुछल का यवक्रीत कहलका गुरू केरऽ मुंह से वेदऽ केरऽ सभे ज्ञान नांय मिले छै । तही से हम्में कठोर तप केरऽ बल से शास्त्र ज्ञान पाना चाहे छी । इन्द्र सलाह देलका ई तोरऽ उलटा मार्ग छिक्खों, तोहें योग्य गुरू केरऽ साथ रहिके शास्त्र ज्ञान प्राप्त करऽ । इन्द्र चलऽ गेला । यवक्रीत कठोर तप करते रही गेला । एक दिन इन्द्र बृद्ध ब्राह्मण केरऽ वेशऽ में पहुँचला । जहाँ से यवक्रीत गंगा नहाय ले उतरे छेला, ब्राह्मण वहीं बैठी के मुठ्ठी में भरी भरी के बालू गंगा में फेंके लागला । यवक्रीत देखलका, ई बुढ़ऽ ब्राह्मण मुठ्ठी भरी भरी के गंगा में फेंकी रहलऽ छै । यवक्रीत पुछलका ई की करी रहलऽ छऽ । ब्राह्मण कहलका गंगा उपार जाय में आदमी के बड़ी तकलीफ होय छै । हम्में गंगा में बालू भरी के बाँध बाँधी देबै, सभे के आबे- जाय में सुविधा होते । यवक्रीत कहलका, हे महाराज तोहें ई निरर्थक प्रयास करी रहलऽ छऽ ऐत्ते बोड़ऽ गंगा के धार बालू से किरंऽ बंधाते, यवक्रीत से ब्राह्मण कहलका जे रंऽ तोहें बिना गुरू केरऽ, तपकेरऽ बल पर वैदिक ज्ञान प्राप्त करे ले चाहे छऽ । यवक्रीत ब्राह्मण के पहचानी गेला । इन्द्र से क्षमा मांगलका, आरेा ई स्वीकार करलका कि बिना गुरू केरऽ ज्ञान अधूरा रही जाय छै । मनऽ में जिद, अहंकार आबी जाय ते ज्ञान कभी नांय होय सके छै । विद्या के लेलऽ । गुरू केरऽ आशीर्वाद आरो अनवरत पढ़ना जरूरी छै । गुरू केरऽ कृपा अनदेखी नांय करना चाहीवऽ ।
87- जागऽ मोर किसनमा
अपनऽ भारत भूमि के खातिर, देबै परनमा !
जागऽ मोर किसनमा । अपने ——————-
देश के रक्षा करबे, भारत माता के मान बढ़ैबे !
जिनकऽ आंचल के छाया में, जिये दै परनमा ।
जागऽ मोर किसनमा µ
जोतबे- कोड़बे उपजैबे, मकई मंडुवा गेहू धनमा ।
जागऽ मोर किसनमा – अपन – ————
भाई – भाई मिलके रहबै, आपस में कभी न फुटबे दुनियां कहैबै –
नेक इंसनमा (इनसनमा)
जागऽ मोर किसनमा । अपनऽ ———————-
जों कोई लेबे ऐता, जों कोई छिने ऐता लईये लेमेन
हुन्कऽ परनमा ।
जागऽ मोर किसनमा ।
अपनऽ भारत भूमि खातिर देबै परनमा, जाग मोर किसनमा –
88- आशा रहिये गेले मोर
सोच ही रे सखि भै गेले भोर, नाऐ ला नन्द किशोर- 2
1- फूलवा वो चुनी – चुनी सेजिया लगा पेलां,
मन धन कैलां इन्जोर ।
सोच हीरे सखि भै गेले भोर । ना ऐ ला नन्द किशोर
2- सोलहो सिंगार करी बैठलां अंगनमा,
पंथ हेरैते बहे लोर ।
सोच हीरे सखि भै गेल भोर, ना ऐला नन्द किशोर ।
3- सांची सुगंध दय बिरबा लगाय ऐलां ।
फूलबा गूंथलाँ बिना डोर ।
सोच हीं रे सखि भै गेल भोर, ना ऐ ला नन्द किशोर ।
4- बिरह विकल भय सोचती अग्जन,
आशा रहिये गेल मोर- 1
सोच हीं रे सखि भै गेल भोर, नाऐला नन्द किशोर ।
89- हरि शपनी एकादशी केरऽ महत्व ।
नीन्द केरऽ एन्हऽ जरूरत छै, जेकरा बिना कोय नांय रही करेऽ छै । हिन्दू धर्म में नीन्द के बहुत सुन्दर दर्शन से जोड़लऽ गेलऽ छै । आज आज केरऽ तिथि हरि शयनी एकादशी कहाबे छै । आषाढ़ शुक्ल पक्ष में होय छै । आज से भगवान विष्णु जी चार महीना के लेलऽ सुती जैता । विष्णु सात्विक भाव केरऽ प्रतीक छिका, आरेा जबे सत्व भाव चार महीना नीन्द में छथ ते हमरऽ जिम्मेदारी आरो बढ़ी जातऽ । ई चार महीना में कोय एन्हऽ संकल्प ले, जे भीतर केरऽ सात्विक भाव के बनैलऽ रक्खे । जबे विष्णु सुती जायहश्र, तबे वेद हमरऽ मार्ग दर्शन बनी जाय छै । जे वेद नांय पढ़ै लेवारे छै, वू एन्हऽ शास्त्र पढ़ै, जेकरा में वेद केरऽ निचोड़ होय । एन्हऽ शास्त्र छै, राम चरित्र मानस । ई चार महीना में राम चरित्र मानस से संदेश लेलऽ जाय सके छै कि किरंऽ परम पिता अपने आप के आराम में रही के संदेश दै छथ कि आराम केरऽ अर्थ ऊर्जा केरऽ पुनः आचरण । लंका काण्ड में रावण भोग विलास में डुबलऽ होलऽ छेले आरो राम जी सेना लै के लंका पहुँची चुकलऽ छेलात यहाँ राम जी के बैठे के वास्ते, लक्ष्मण गाछी से कोमल- कोमल पत्ता अपनऽ हाथऽ से तोड़ी के आसन बिछाय देलका । जेकरा पर कृपालु श्रीराम जी विराजमान छेलात । यहाँ राम जी किरंऽ बैठलऽ छथ बतैलऽ गेलऽ छै । ई वेहे दृश्य छिके कि नीन्द केरऽ समाप्ती के नीन्द कहे छिये । असल में होना ई चाहीवऽ कि नीन्द भी आबे आरो होश भी रहे । राम वू समय पुरा होश में छेलात । आरो रावण जागते होलऽ भी सुतलऽ छेलऽ । ऐहे स्थिति ओकरऽ पतन केरऽ कारण बनलऽ छेले । हम्में भी चातुर्मास से संदेश लिये कि ई चार महीना में अपनऽ भीतर केरऽ सद्गुण, संकल्प बहुत अच्छा से जीवन से जोड़बे । आज से चातुर्मास शुरू होय गेले । अबे चार महीना कोय शुभ काम नांय होवै छै । मुंडन, जनेऊ, बीहा, गृह प्रवेश आदि कोय शुभ काम के लेलऽ देवोत्थान एकादशी केरऽ प्रतीक्षा रहे छै । देवोत्थान एकादशी के बाद सब शुभ काम शुरू होय जाय छै ।
90- महाकाली
सरल, सुशील, शांत दयालु आदि ऐसे शब्दऽ में हम्में जनानी के उपमा दै छिये । जननी कभी अत्याचार केरऽ खिलाफ लड़े छै नांय । बल्कि ओकरा सहे छै । युगऽ से दुराचारी आरो अत्याचारी ऐहे सोचऽ के जनानी केरऽ पहचान मानलऽ आदा रहलऽ छै । एक दौर एन्हऽ ऐले, जबे असुर ने देवलोक आरो कैलाश पर विहवंस मचाय देलके लेकिन ई सब देखी के भगवान शिव क्रोधित नांय होला, बल्कि अंतर्मन में से हुन्हीं अति प्रसन्न छेला, काहे कि होय वाला प्रलय से हुन्हीं अवगत छेला । ई विपत्ति केरऽ घड़ी में पार्वती अति विचलित छेली । असुर केरऽ अत्याचार चरम सीमा पर छेले । महाकाल ने एकरऽ निराकरण केरऽ जिम्मेदारी साधारण आरो सौम्य पार्वती के दै देलका । युद्ध भूमि में खड़ी पार्वती ई सब देखी के अपनऽ क्रोध के नियंत्रित नांय करे ले पारलकी । युद्ध भूमि में निकली के एक हुंकार, जेकरा सुनी के असुर केरऽ देह काँपी गेले । सौम्य सी दिखे वाली पार्वती केरऽ बिकराल महाकाली रूप सब के सामने अवतरित होय चुकलऽ छेली । रूद्र आरो प्रचंड, समय मृत्यु केरऽ देवी, जेकरऽ हुंकार में ही संहार, पहिलऽ बेर कोय जनानी केरऽ एन्हऽ अवतार सबके सामने ऐले । ई भयानक रूप के बावजूद भी हम्में सब माय कही के पुकारे छिहेंन । देवी छिकी महाकाली, महाकाली केरऽ एक मात्र उद्देश्य सर्वनाश छैन । लेकिन ई उद्देश्य केरऽ पीछु छिपलऽ सोच सही प्रेरणा दायक छै । हुन्कऽ कहना छै कि जबे पाप केरऽ अंत होते तभिये एक नया आरंभ होते । महाकाली शक्ति केरऽ प्रतीक छिकी । आरो कहलऽ जाय छै कि शक्ति केरऽ बिना शिव भी शव समान हथिन । सीमा तोड़ी के अत्याचार केरऽ सर्वनाश करऽ, पाप के सामने अपनऽ माथऽ नांय झुकाबऽ । ई प्रेरणा हमरा महाकाली से मिले छै । हुन्कऽ नाम सुनते ही हमरऽ सामने मुंऽ केरऽ माला, असुरऽ केरऽ माथऽ रक्त रंजित धड़ आरेा एन्हऽ ही कै ठो नाकारात्मक दृश्य उभरे छै । लेकिन ई सब केरऽ पीछु छिपलऽ छै, साकारात्मक दृष्टिकोण से आज भी हम्में सब अनजान छिये आज के दौर में समाज आरो आस- पास एन्हऽ कत्ते जनानी छै जे अत्याचार केरऽ खिलाफ सिर्फ खड़ी नांय रहे छै । बल्कि ओकरा से लड़े छै । एन्हऽ जनानी केरऽ कई ठो उदाहरण छै । ई कहानी नांय, एक प्रेरणा छै कि तोहें भी अत्याचार केरऽ खिलाफ खड़ा होवऽ । आरो महा काली केरऽ पथ पर चलऽ । तोहें भी अपनऽ बुराई के त्यागी के ओकरऽ अंत करी दहऽ ।
91- भाय – बहीन केरऽ प्रेम
घरऽ केरऽ काम खतम करी के बाजार जाय ले सोची रहलऽ छेलिये । कल राखी छै न । कुछ खरीदारी करे ले छेले । हमरऽ बेटी केरऽ खास भाय के लेलऽ एकरा सुन्दर राखी लेना छेले । हमरऽ अपनऽ भाय याद आबी गेलऽ । कत्ते दिन होय गेलऽ नेहरा गेला । काम खतम करी के सोचिये रहलऽ छेलिये कि फोन बजले, मोबाइल केरऽ स्क्रीन पर देखलिये ते नया नम्बर देखी के सोचऽ में पड़ी गेलिये, न जाने केकरऽ फोन छिके । फोन उठैलिये ते हुन्ने से आवाज ऐले दीदी प्रणाम, हम्में बोली रहलऽ छिहों । हम्में पुछलिये तोहें कौन बोली रहलऽ छऽ ? फोन नैकी भौजी केरऽ छिके । हम्में सोचऽ में पड़ी गेलिये, भौजी किरंऽ फोन करलकी, भाय केरऽ फोन ते आय तक नांय ऐले । फेरू अचानक भौजी केरऽ फोन । मनऽ में कै तरह केरऽ बिचार आबे लगले । काहे कि हमरऽ भाय केरऽ दोसरकी कनियाय छेली । पहिलकी कनियाय के तलाक दै देलऽ छेले । वहिलकी भौजाय केरऽ सोच बड़ी खराब छेल्हें । वू नेहरा से सोचिये के ऐलऽ छेली कि ससुरार परिवार केरऽ केकरऽ से संबंध नांय बनाना छै । माय- बाबू जी आरो से कहियो नांय जुड़ली हमेशा मुँह बनले रहे छेल्हें । हमरा सब से दूरी बनाईये के रखलकी माय के एतना परेशान करे छेली कि माय के फरक करी के दम लेलके दिनऽ दिन दूर होते चलऽ गेली, हमरऽ बीहा में थोड़ऽ अनबन कि होऽ गेलऽ आग में घी पड़ी गेलऽ । हमरा भाय बहीन केरऽ बीचऽ में कहिवे नांय पार्ट वाला गढ़ा बनाय देलकी । भाय छेली ते रिश्ता केरऽ बीच में कड़ी केरऽ काम करे छेली । भाय के मरला के बाद सब खतम होय गेलऽ । हम्में अपनऽ भाय के राखी बांधना छोड़ी देलां । भाय केरऽ बाद भौजी होय छै, जे रिश्ता नाता के जोड़ी के रखे छै । लेकिन वू भौजाय से भगवान बचाबथ । आत्म सम्मान के रोकी लेलीये बिना बोलले किरंऽ जैबऽ । अचानक ध्यान टुटले देखे छिये वू हैलो हैलो करी रहल छै । हम्में कहलिये होंऽ कहऽ की कही रहलऽ छऽ । भौजी कहलकी कल्ह राखी केरऽ त्योहार छैन ? हमरा सब तरफ राखी में बेटी के नैहरा बुलाबे केरऽ परंपरा छै । ऐ हे से तोरा न्योता दै रहलऽ छिहों । कल्ह जरूर से जरूर अईहऽ हम्में कुछ नांय बोले पार लिये हमरऽ खामोसी समझते होलऽ बोलली, दीदी, जे होले से होले वू सब बात भूली जाहऽ पहिले केरऽ कडुवऽ बात याद करी के मनऽ में कडुवाहट ही आबे छै । हम्में अपनऽ रिश्ता नाता केरऽ नया शुरूआत करबे । हमरा अपने केरऽ इंतजार रहते । बेटी राखी के दिन नैहरा में ही अच्छा लागे छै । ई कहते होलऽ फोन काटी देलकी । हुन्कऽ ई बात से हमरा सच में बहुत खुशी लागलऽ । हमरऽ मालिक (पति) सांझ के घऽर ऐला, सब बात बतैलिहें, हुन्हीं कहलका जबे नैहरा से ऐते प्रेम आदर से बोलैलऽ छोंऽ ते जरूर जाना चाहीवऽ । कत्ते साल केरऽ बाद हम्में भाय के लेलऽ राखी खरीदलां । मन बहुत प्रसन्न होय रहलऽ छेलऽ । वहाँ जाय में झिझक भी होय रहलऽ छेलऽ, अपने के सम्भारत होलऽ वहाँ गेलिये । देखे छिये भाय भौजाय दोनों हमरऽ इन्तजार करी रहलऽ छै । जैसे हीं द्वारी पर पहुंचलिये भौजाय गला लगाय के हमरऽ स्वागत करलकी, घऽर भीतर लै गेली, खानायीन । बहुत अच्छा से खियलकी । भाय केरऽ माथा पर टीका लगाय के राखी बांधलिये, भाय गौर से राखी के देखलके आरो फफकी के कान्दे लागले । कत्ते दिनऽ के बाद तोहें राखी बाँधल्हऽ, ओकरा कान्दे देखी के हमहुं कान्दे लागलिये । भाय बहीन गला लगी के खूब कान्दलिये, बरसऽ केरऽ बाद जे मिललऽ छेलिये । भौजी दूर खड़ी धीरे- धीरे मुस्कुराय रहलऽ छेली । हम्में भौजी के पास गेलिये से गला लगलिये । हमरा हुन्हीं हमरऽ पूरा नैहरा जे वाप देलऽ छेली ।
92- पार्वती केरऽ रौद्र अवतार ।
जबे पाप केरऽ अंधकार संसार के ढकी दै छै, तबे एक अनोखा शक्ति प्रकट होय के अंधकार के नष्ट करी दै छै, लेकिन एक दौर ऐन्हऽ भी ऐलऽ छेले, जबे अंधकार के नष्ट करे में सब शक्ति नाकाम साबित होले । तबे अवतार लेलकी मृत्यु आरऽ अंधकार केरऽ देवी । हुन्हीं पाप के जड़ से उखाड़ी के फेंकलकी, ई छेले माय पार्वती केरऽ रौद्र अवतार, महाकाली केरऽ नाम सुनते ही हमरऽ मस्तिश्क में क्रोध, मुड़ केरऽ माला, त्रिशूल, प्रलय आरो लहु से रंगलऽ धरा केरऽ चित्र आबी जाय छै । काहे दयालु माय पार्वती ने लेलकी, निर्दयी महाकाली केरऽ अवतार ? असुरऽ केरऽ अत्याचार देखी मन हीमन प्रसन्न होय रहलऽ छैलात भगवान शंकर । एन्हऽ के सवाल केरऽ जवाब देतै ई कथा । महाकाली अंत ही आरंभ छै । असुर सम्राट शुंभ, माय पार्वती केरऽ सुन्दरता पर मुग्ध होय गेलऽ आरो वू अपनऽ दूत सुग्रीव के द्वारा माय पार्वती के असुर लोक आबे केरऽ न्योता भेजलकऽ । माय पार्वती केरऽ मना करला पर असुर ने देव लोक में अत्याचार केरऽ सीमा पार करी देलकऽ । ई संकट केरऽ घड़ी में विचलित होय के पार्वती महाकाली केरऽ अवतार लेलकी । ई अवतार से शुंभ- निशुंभ, चन्ड – मुन्ड हेन्हऽ असुर के बध करी के ओकरऽ लहु से अपनऽ तृष्णा शांत करलकी । महा काली केरऽ एक मात्र उद्देश्य पाप केरऽ सर्वनाश करना आरो ई उद्देश्य केरऽ पीछु छिपलऽ प्रेरणादायक धारण जबे पाप केरऽ अंत होतै, तभिये एक नया आरंभ होय केरऽ स्रोत छिका भगवान शंकर । भगवान शंकर ने पार्वती के हुन्कऽ आंतरिक शक्ति के परिचित करबैलका आरेा तबे महाकाली ने अवतार लेलकी अन्य कथा में हमेशा भगवान शंकर के रूद्र अवतार दर्शेलऽ छै । लेकिन ई कथा में महाकाली केरऽ रूप ऐत्ते भयंकर होतै कि तोहें दोनों तुलना में भगवान शंकर के शांत आरो स्थिर पैभऽ । आज केरऽ दौर में जनानी पुरी तरह से सशक्त आरो सजग छै । लेकिन कहीं न कहीं तू अपनऽ शक्ति से अन जान छै । जब तक ओकर विरूद्ध अत्याचार केरऽ घैला भरी नांय जेते, तब तक ओकरा अपनऽ क्षमता आरो शक्ति केरऽ अहसास नांय होतै । महाकाली केरऽ ई अनोखा कथा छै ।
93- बेटी पीहु
हम्में सब खुश छेलिये, लेकिन बाबूजी नारजा होय रहलऽ छेलात । आबे वाला मुसीबतऽ के समझी रहलऽ छेलाता । बेटी पीहु के साठ (60) हजार महीना दरमाहा आरो गाड़ी मिली रहलऽ छेले । केन्हऽ बाप छऽ खुश होय केरऽ जग्धऽ पर नाराज होय रहलऽ छऽ ? हम्में पुछलिहें। हुन्हीं गुस्सा में बोले लागला, पीहु कोय विदेश से पढ़ी के नांय ऐलऽ छै । नांय कोय एन्हऽ योग्यता छै । ई सब जे मिललऽ छै । ओकरऽ रूप के कारण, बाबू जी केरऽ गुस्सा देखी के पीहु भी सहमी गेले । हमरऽ समर्थन मिलला के कारण, वू काम पर जाय लगले । आज सुबह पीहु ने कहलके माय हमरा एक पार्टी में जाना छै । आबे में देर होय सके छै, तोहें चिन्ता नांय करी हें । बाबूजी बोले जग्धऽ बताय दे, हम्में लेबे जाय जेबो । हमरा हुन्कऽ बातऽ पर गुस्सा आबी गेले, अरे अबे पीहु कोय बच्चा थोड़े ने छै । फेरू वहाँ ओकरऽ बॉस रहथीन ने ? वू छोड़ी देथीन । रात केरऽ एक बजी गेले, पीहु नांय ऐली, पुोन भी बंद आरो केकरो नम्बर भी नांय छेले । बाबू जी घरऽ में चक्कर लगाय रहलऽ छेलात । हम्में हुन्का से कहलिहें बैठी जा न ? हमरा से भी सुतलऽ बैठलऽ नांय जाय रहलऽ छेलऽ । हम्में थकी के कुर्सी पर बैठी गेलिये । रात ढलान पर छेले । ऐतने में पीहु आबी गेले, हम्में चैन केरऽ सांस लेलिये । वू अपनऽ घरऽ में जाय के सुती रहले । सुबह पीहु पास जाय के बोलले माय, बाबू जी केरऽ बात सही छेले । हम्में घबड़ाय गेलिये, पीहु से पुछलिये तोहें ठीकते छें न ? पीहु बोलले बिल्कूल, एकदम ठीक, तोरऽ बेटी ऐते भी कमजोर नांय छै । लेकिन अबे ई नौकरी एकदम नांय । दुनियाँ में बहुत काम छै । हम्में देखलिये, पीहु केरऽ बाबूजी अखबार पढ़ते होलऽ मुस्कुराय रहलऽ छथिन ।
94- उद्देश्य
काशी में गंगा किनारों एक संत केरऽ आश्रम छेले । आश्रम में कइठो शिष्य शिक्षा लै रहलऽ छेले । आखिर वू दिन आबी गेले, जाबे शिक्षा पुरी होला पर गुरू जी शिष्य के अपनऽ आशीर्वाद दे के विदा करे वाला छेलात । सुबह गंगा स्नान केरऽ बाद गुरू शिष्य पूजा करे ले बैठलात । सभे ध्यान मग्न छेला, कि एक बच्चा केरऽ आवाज सुनैले, बचावऽ बचावऽ बच्चा नदी में डुबलऽ जाय रहलऽ छेले । आवाज सुनी के गुरू देव केरऽ आँख खुली गेल्हें । गुरू जी देखलक कि एक शिष्य पूजा छोड़ी के बच्चा के बचाबे के लेलऽ नदी में कुर्दा पड़ले, बड़ी मशक्त करी के बच्चा के बचाय ललके । आरेा सभी शिष्य आंख बंद करी के ध्यान मग्न बैठलऽ रहले । पूजा समाप्त होला पर गुरू जी शिष्य सब से पुछलका, तोरा सनी डुबते होलऽ बच्चा केरऽ आवाज सुनैलऽ छेलऽ । शिष्य सनी कहलके, होंऽ गुरू जी सुनैलऽ ते छेले, गुरूजी पुछलका तंबे तोर मनऽ में की बिचार उठलौ ? शिष्य कहलके भगवान करेऽ पूजा में ध्यान मग्न छेलिये, लेकिन तोरऽ एक मित्र पूजा छोड़ी के नदी में कुदी पड़ले । शिष्य कहलके वें पूजा के अधर्म करलऽ छै । गुरू जी बोले अधर्म वे नांय, अधर्म तोरा सनी करलऽ छें ? पूजा पाठ कर्म धर्म केरऽ एके उद्देश्य छै प्राणियों केरऽ रक्षा करना । तोहें सब विद्या में पारंगत भेले लेकिन धर्म केरऽ सार नांय समझे पारले । परोपकार आरो संकट में फंसलऽ दोसरा केरऽ सहायता से बढ़ी के कोय धर्म नांय छै ।
95- त्याग
त्याग हुवे ते एन्हऽ जे तीसरका बेटा ने करलके । एकरा से ओकरा सम्मान भी मिलले आरेा पिता केरऽ आशीर्वाद भी । माय केरऽ मरला तीसरा दिन छेले घरऽ में दुःख केरऽ माहौल छेले । परंपरा केरऽ अनुसार मृतक केरऽ वंशज के स्मृति में अपनऽ प्रिय वस्तु केरऽ त्याग करे ले पड़े छै । बड़का बेटा बोलले हम्में आज से बैगनी रंग केरऽ कपड़ा नांय पेंहबऽ । वेसें भी जे ऊँचऽ ओहदा पर छै, ओकरा शाप दे कभी बैगनी रंग पें हे ले पड़तले । तइयो सभे तारीफ करलके । मंझला बोलले हम्मेमं जिन्दगी भर गुड़ नांय खैबऽ ई जानते होलऽ कि ओकरा गुड़ऽ से एलर्जी छै ंपिात सांत्वना केरऽ साँस छोड़लका अबे सब केरऽ ध्यान छोटका पर छेले । वू शांत होय के माय केरऽ फोटो देखी रहलऽ छेले । तीनों बेटा अपनऽ माय केरऽ अंतिम समय में नांय पहुँचे ले पारलऽ छेले । सब कुछ जबे पिता करी चुकलऽ छेलात तबे तीनों बेटा पहुँचलऽ छेलऽ । माय ओकरऽ माय बोले छेली, तीन बेटा एक पति चारो केरऽ कंधा पर चढ़ी के शमशान जेबऽ । हम्में कत्ते भाग्यशाली छी । माय केरऽ गर्व भरलऽ ई बात कत्ते बेर सुनल छेलिये । आज माय केरऽ अरमान पूरा नांय हुवे पारले । बोलऽ समीर जी (छोटका केरऽ नाम समीर छेले ।) पंडित जी केरऽ आवाज से ओकरऽ तंद्रा भंग भेले । तोहें कौन वस्तु केरऽ त्याग करभऽ । अपनऽ माय के वास्ते ? समीर बोलले पंडित जी, हम्में थोड़ऽ काम केरऽ त्याग करबे, थोड़ऽ समय बचैबे आरो अपनऽ पिता जी के अपनऽ साथ ले जैबे । एतना सुनते ही पिता केरऽ आँखऽ से लोर बहे लागल्हें । अपनऽ बेटा के छाती से लगाय लेलका आरों आशीर्वाद केरऽ हाथ ओकरऽ माथा पर फेरे का गला ।
96- पिता केरऽ हाथ
एक पिता ने अपनऽ बेटा केरऽ अच्छ । परवरिश करलऽ छेला । भगवान कृपा से बेटा एक अच्छा इंसान आरऽ बड़ी कम्पनी केरऽ सी ई ओ बनी गेले । एक दिन पिता अपनऽ बेटा से मिले वास्ते ओकरऽ आफिस में पहुंचला, बेटा केरऽ शानदार दफ्रतर, नौकर चाकर सैकड़ऽ कर्मचारी ठाट- बाट देखी के पिता केरऽ सीना गर्व से फुली गल्हें । तबे हुन्हीं बेटा केरऽ कंधा पर हाथ धरी के एकटा सवाल पुछलका ई दुनियां में सबसे शक्तिशाली इंसान कौन छै ? बेटा ने जवाब देलके, हमरऽ अलावा आरो कौन होय सके छै पिता जी ? पिता केरऽ आशा छेल्हें कि बेटा हमरे शक्तिशाली बतैतऽ । हम्हीं ई मुकाम पर पहुँचै केरऽ लायक बनैलऽ छिये । लेकिन जवाब सुनी के पिता केरऽ आँख छलछलाय गेल्हें । वू चेम्बर से जाय लागला । तबे हुन्हीं एक बार फेरू मुड़ी के वेहे सवाल पुछलका बेटा ने ई बेर पिता जी के सबसे दुनियां केरऽ शक्तिशाली इंसान बतैलके, पिता जी अचरजऽ में पड़ी गेला, एकरऽ दिमाग कैसें बदली गेले । बेटा ने हंसते होलऽ कहलके, पिताजी वू समय तोरऽ हाथ हमरऽ कंधा पर छेले । आरो जे बेटा केरऽ कंधा पर पिता केरऽ हाथ हुवे वू बेटा ही सब से शक्तिशाली इंसान होय छै । बोलऽ पिताजी ? तोहें हमरा लायक बनैल्हऽ तबे ने आज हम्में ऐते बोड़ऽ दफ्रतर केरऽ मालिक छिये । पिता केरऽ आँख भरी गेल्हें, हुन्हीं अपनऽ बेटा के कसी के गला लगाय लेलका । आज हमरऽ माथध ऊँचऽ होय गेलऽ । रिश्ता नाता केरऽ ऐ हे रंऽ संतुलित बनलऽ रहे छै ।
97- अमानत
माय केरऽ मरला पाँच साल होय गेलऽ छेले । माय केरऽ बक्शा खोललऽ गेले । ते ओकरा में गहना केरऽ भरमार छेले । बाबूजी एक एक चीज उठाय के ओकरऽ पीछु केरऽ कहानी बतैते जाय रहलऽ छेला, एकरा सिकड़ी गला केरऽ उठाय के बाबूजी हँसते होलऽ बोलला ई सिकड़ी तोरऽ माय ने हमरा से छुपाय के पड़ोसिन के साथ जायके बनबैलऽ छेली । एतना टाका कहाँ से पैलकी, बच्चा सिनी बोलले पहले सोना ऐत्ते मंहगऽ कहाँ छेले । बहुत सस्तऽ छेले । एक हजार भरी (तोला) छेले । हमरे जेबऽ से टाका निकाले छेली । तोरऽ माय के लगे छेलो, हमरा पते नांय चले छेले । हुन्क खुशी के लेलऽ हम्में अनजान ही बनलऽ रहे छेलिये । बहुत धुपैल की ई सिकड़ी हमरा से लेकिन कोय चीज छुपलऽ रही सके छै भला ? तभिये बेटी केरऽ नजर पड़ले झुमका पर, बाबू जी, माय ऐते बाड़ेऽ झुमका पेन्हें छेली की ? अचरजऽ से झुमका के हाथऽ में लै के बोलली, ई झुमका ते सोना केरऽ नांय लागी रहलऽ छै । बाबू जी देखऽ केत्ते चमकी रहलऽ छै । तोरऽ माय नकली चीज ते पसंद नांय करे छेली । फेरू ई बक्शा में किरंऽ ऐले, बाबूजी कहलका ई बक्सा में छेले ते सोना ही होते तभिये छोटका बेटा बोलले बाबू जी लाबऽ एकरा सोनार के देखाय दै छिये । बड़का भाय केरऽ नजर पड़ले दोसरऽ झुमका के हाथऽ में उठाय लेलके, बाबू जी कल्ह हम्में सोनार के देखाय के लानी देभोंऽ दोनों भाय केरऽ हाथ झुमका केरऽ जोड़ा अलग अलग होय के । चमक खतम होय चुकलऽ छेले । बेटा केरऽ नजर के भापे में बाबू जी के देर नायं लगल्हें, बाबु जी ने झट से झुमका वापस ले लेलका आरो कहलका बेटी बन्द करी दे अमानत वर्ना ई बिखरी जयतौ ।
98- मानसून केरऽ इन्तजार
किसान वर्षा केरऽ प्रतीक्षा में रहे छै । मानसून केरऽ प्रतीक्षा बड़ी वेकरारी से करे छै । पहिले धरती माय केरऽ पूजा करे छै, तबे खेतऽ में हर जोते ले जाय छै । गीत गाय के धरती माय केरऽ स्वागत करे छै । गीत केरऽ बोल छिके ।
भैया किसनमा हो, चलऽ चढ़ैबे फूलऽ के हार ।
धरती माय छथिन सबके पालन हार- भैया —————–
1- गर्मी में तपलऽ प्यासलऽ रहे छथिन,
करे छथिन मानसून केरऽ इन्तजार ।
भैया किसनमा हो चलऽ चढ़ैबे फूलऽ के हार
धरती माय छथिन सब के पालन हार – भैया ———–
2- ऐले मानसून बरसले पानी,
प्यास बुझैलथीन धरती माय ।
भैया किसनमा हो चलऽ चढ़बे फूल के हार
धरती माय छथिन सब के पालन हार – भैया ————-
3- मरलं खेत कियारी, नदी नाला में ऐले उफान
चारो ओर बही चलले पानी के धार ।
भैया किसनमा हो चलऽ चढ़ैबे फूल के हार ।
धरती माय छथिन सबके पालन हार – भैया ————-
4- माथा मुरे ठबा बांधे किसनमा,
कांधा पर धरे कुदाल ।
बनाबे चलले खेत आर ।
भैया किसनमा हो चलऽ चढ़ैबे फूलऽ के हार ।
धरती माय छथिन सबके पालन हार – भैया ———–
5- रोपनी से रोपा लगाबे, खुशी मनाबे
सब मिली गाबे गीत मल्हार ।
भैया किसनमा हो चलऽ चढ़ैबे फुल के हार ।
धरती माय छथिन सबके पालन हार – भैया ———–
99- खेती करै तो सरकार
भैया किसनमा हो तोरा से खेती करे तौ सरकार – 2
1- हिन्ने – हिन्ने बैठलऽ रहबे, घुमनऽ चुरबे, डिंग हांकबे अपार –
भैया किसनमा हो तोरा से खेती करै तौ सरकार – 1
2- खाद्य देतौ – बीहन दै तौ, दे तौ सब इन्तजाम
खेती करे ले टाका पैसा दे तौ उधार ।
भैया किसनमा हो ———-
3- हऽर बनैबे, पैना बनैबे, बनैबे खेत आर ।
खेत जोते ले देतौ बैल जोड़ी सरकार ।
भैया किसनमा हो —————
4- धान उजैबे, बच्चा बुतरू पोसवे –
धानऽ से भरिहे भंडार –
भैया किसनमा हो —————
5- खैबे- पिबे स्वस्थ रहबे, हंसी खुशी दिन बितैबे –
कहियो नांय पड़बे विमार – 2
भैया किसनमा हो —————
6- हाथऽ में रहता टाका पैसा, घरऽ में हो तो खुशहाल ।
सर समाज में बैठबे, मनऽ में हो तो खुशी अपार ।
भैया किसनमा हो तोरा से खेती करै तो सरकार ।
100- बेटा केरऽ फोन
शहर केरऽ नजदीक, नदी किनारां बसलऽ एकटा गांव में मिस्त्री केरऽ काम करे वाला आदमी रहे छेले । ओकरऽ नाम छेले सुदेश्वर पैसा कमाबे के लेलऽ शहर जाय के दिन रात मेहनत करी के परिवार पोसे छेलऽ । फेरू बुढ़ापा में जिन्दगी केरऽ आखिरी समय में अपनऽ कनियाय के साथ दिन गुजारै लागलऽ । जैसे- तैसे करी के एकरा छोटऽ सन घऽर बनाय लेलऽ छेलऽ । अपनऽ इकलौता बेटा रमेश के पढ़ाय लिखाय के काबिल बनाबे के लेलऽ, सुदेश्वर 12 से 14 घंटा तक दिन रात मेहनत करे छेले । अपने छुछऽ रूखऽ खाय आरो फटलऽ पुरानऽ कपड़ा पिन्ही के जिन्दगी गुजारै छेलऽ । नजदीक केरऽ शहर में रही के जबे रमेश बी- ए- सी- केरऽ परीक्षा पास करी लेलकऽ तबे सुदेश्वर बेटा के बी एड भी करवाय देलकऽ वेहे समय सरकारी अध्यापक केरऽ भर्ती निकलले, रमेश परीक्षा दै के पास होय गेलऽ । नौकरी लगी गेले, ओकरऽ नौकरी जीला केरऽ गांव में ही लगी गेले । सुदेश्वर ने बेटा केरऽ नौकरी लगला केरऽ खुशी में समाज आरो मोहल्ला वाला के 50- 60 हजार टाका खरजा करी के खिलान- पिलान करलकऽ । दोनों प्राणी खूब खुश छेला । कुछ महीना केरऽ बाद, धूम धाम से रमेश केरऽ एक पढ़लऽ लिखल लड़की से बीहा करी देलका, वू भी सरकारी इसकूलऽ में अध्यापिता छेली । दोनों अपनऽ- अपनऽ नियुक्ति आस- पास केरऽ इसकूलऽ में करवाय लेलकऽ दोनों साथ साथ नौकरी पर जाय लागलऽ । शुरू- शुरू में बीहा केरऽ बाद रमेश अपनऽ कनियाय के साथ दु- चार महीना में बुढ़ऽ माय- बाप से मिले वास्ते आबी जाय छेलऽ । लेकिन धीरे- धीरे ओकरऽ आना- जाना बन्द हुवे लागले । अबे होली दिवाली में अकेले माप बाप से मिले ले । आबे छेलऽ । कुछ समय बितला केरऽ बाद बेटा केरऽ भी आना जाना बंद होय गेले । कभी कभार माय-बाप केरऽ हाल चाल पूछे ले फ़ोन आबी जाय छेले । सुदेश्वर केरऽ पास फोन नांय छेले । पड़ोसी राम भाय केरऽ घऽर जाय के बेटा पुतोहु से टेली फोन पर बात करे ले पड़े छेले । सुदेश्वर आरेा कनियाय भी कभी कभार, बिना बुलैलऽ बेटा पुतोहु से मिलैले चलऽ जाय छेली । ई तरह से आठ दस साल बिती गेले, अबे माय बाप केरऽ हाल चाल पुछे के बजाय, माय के अपना पास बुलाबे के लेलऽ फोन आबे लागले । एक दु दिन केरऽ बाद हमेशे रमेश केरऽ फोन आबे लागले । राम भाय केरऽ बेटी दौड़लऽ होलऽ आय के कहलके बाबा हो, रमेश चचा केरऽ फोन ऐलऽ छोंऽ । सुदेश्वर दौड़ते पहुंचलऽ मन में सोचते जाय छेला रमेश केरऽ आवाज सुनैतऽ । हुन्ने से रमेश बोलले, बाबू जी, हम्में दोनों बड़ी परेशान छी । हमरा घरऽ से दूर नौकरी करे ले जाय ले पड़ै छै । (सुबह) बिहाने चाय नास्ता खाना बनाबे में तोरऽ पुतोहु के बड़ी दिक्कत होय छै । तोहें भाय के यहाँ भेजी दहऽ । बेचारा सुदेश्वर बेआ के की जवाब देतऽ । हों बेटा तोरऽ भाय से पुछी के भेजवाय देबौ । एकरऽ बाद ते रमेश केरऽ फोन रोजे आबे लागले । बाबू जी मायके कबे भेजवाय रहलऽ छऽ । कहऽते हम्हीं लेबे ले आय जड़होंऽ बच्चा के इसकूल भेजना, घरऽ केरऽ साफ- सफाई झाडू पोछा करे के वजह से हम्में दोनों समय पर इसकूल नांय पहुंचे ले पोर छिये, बेटा से होलऽ बात चीत आरो ओकरऽ परेशानी सब बात कनियाय से बतैलकऽ दोनों सोचऽ में पड़ी गेलऽ की करलऽ जाय । बुढ़ापा में दोनों अलग रहना नांय चाहे छेलऽ । दोनों एक साथ बेटा- पुतोह के साथ रहे केरऽ फैसला लेलकऽ । एक दिन फेरू फोन ऐले । राम भाय सुदेश्वर के आवाज दै के बोलैलके जैसे ही सुदेश्वर फोन उठैलगे, रमेश कहे लागले, बाबूजी तोहें अब तक माय के नांय भेजल्हऽ की बात छै ? सुदेश्वर झिझकते होलऽ बोलले, अरे बेटा ? तोहें ते जानै छै, तोरऽ माय बिमार रहे छै आरो हमरा खाना बनावे ले भी नांय आबे छै । माय के चलऽ गेला पर, हमरऽ खाय- पीये, देख रेख केरऽ परेशानी आय जेतऽ । हम्मेमं दोनों ही तोरा पास आय जैबो ते ठीक रहतौ ने ? ई सुनी के रमेश बिना कुछ कहले फोन काटी देलके, कुछ दिनऽ के बाद रात मतें फेरू फोन ऐले, राम भाय आय के कहलके दादा, रमेश् केरऽ फोन एलऽ छोंऽ । जल्दी आबऽ वहाँ जाय के जैस ही सुदेश्वर फोन कान में लगैलके हुन्ने से रमेश केरऽ नाराजगी भरलऽ आवाज ऐले । की बाबूजी तोहें अभियो तक माय के नांय भेजे सकल्हऽ । तोरा ते हमर परेशानी केरऽ चिन्ता नांय छोंऽ । तोहें हमरा लेलऽ एतना भी नांय करी सके छऽ की ? बार- बार बेटा केरऽ फोन आरो हर बार माय के अकेले बुलाबे केरऽ बात सुनी के सुदेश्वर के गुस्सा आबी गेले, अपने आप के नांय रोके ले पारलके, रमेश बेटा ? बच्चा केरऽ देख भाल, चाय नास्ता खाना घरऽ केरऽ सफाई झाडू- पोछा के लेलऽ तोहें माय के बोलाय रहलऽ छें की नौकरानी के ? ई बुढ़ापा में तोरा से ई उम्मीद नांय छेलऽ की तोहें ऐत्ते बोड़ऽ नालायक निकलबे । बुढ़ापा में हमरा काहे अलग करी रहलऽ छें ? तोहें हैरंऽ कर बेटा ? एक अच्छा नौकरानी खोजी ले । तोरा तोरऽ माय केरऽ जरूरत नांय, नौकरानी केरऽ जरूरत छे । हमरऽ बांकी जिन्दगी साथ रहे ले दे बेटा ? एकरऽ आगु सुदेश्वर कुच्छु नांय बोले ले पारलकऽ गला भरी गेले आँखे से लोर चुवे लागले । फुटी- फुटी के कान्दे लागले । तभिये राम भाय सुदेश्वर केरऽ हाथऽ से फोन लै के काटी देलके ।
101- सौ टाका केरऽ नोट ।
एक आदमी केरऽ बेटा बहुत दिनऽ से विमार छेले, वैद्यजी बतैलऽ छेले कि बकरी केरऽ दूध फैदा करते । वू आदमी बकरी केरऽ तलाश में निकल कैठो परिचित से बकरी केरऽ वारे में कही के रखलऽ छेलऽ । अपने भी पता लगाते रहे छेलऽ । एक दिन काम पर जाय रहलऽ छेलऽ कि अचानक दु आदमी के बकरी आरो ओकरऽ मेमना लै के सड़कऽ पर जाते देखलकऽ । लपकी के ओकरा पास पहुंचलऽ । बकरी आरो मेमना केरऽ दर- भाव करे लागलऽ । थोड़ऽ देरी में सौदा पटी गेले, आदमी के काम पर जाना जरूरी छेले । ऐहे से बकरी वाला के कहलके हम्में परचा पर पता लिखी के दै दे छिहोंऽ, वहाँ जाय के बकरी आरो मेमना दै छिहऽ, आरो अपनऽ टाका मांगी लिहऽ ? अबे परचा लिखे केरऽ दरवार पड़ले, नांय कागज एकरा पास नांय बकरी वाला के पास, आस- पास कागज मिले केरऽ कोय जुगाड़ भी नजर नांय ऐले । अपनऽ जेबऽ में नोट छेले टटोरे लागलऽ ते 100 टाका से कम केरऽ कोय नोट नांय छेले । हारी- पारी के एकटा सौ 100 टाका केरऽ नोटऽ पर लिखलकऽ बकरी वाला जाय रहलऽ छै, सौ 100 टाका कम करी के बांकी पैसा दै दिहा । बकरी आरो मेमना रखी लिहऽ । शाम के खुशी- खुशी घऽर ऐलऽ, अबे हमरऽ बेटा ठीक होय जैतऽ । बकरी केरऽ दूध पीके ताकतवर होय जैतऽ । अबे हमरा कोय चिन्ता नांय रहतऽ । कामऽ पर जाय छेलां बेटा पर चिन्ता लगलऽ रहे छेलऽ । लेकिन यहाँ ते नांय बकरी नांय मेमना, पता चललऽ यहाँ ते कोय नांय ऐलऽ छै । वू आदमी केरऽ ध्यान टुटले, जबे 100, सौ टाका केरऽ नोट पाय के बकरी वाला कथिले पता ढुंढतऽ ? बकरी मेमना दोसरऽ जग्घऽ नांय बेची लेतऽ ? बेचारा छटपटाय के रही गेलऽ । हिन्ने कनियायो चार बात सुनाबे लागले, तोरऽ दिमागऽ में भूसऽ भरलऽ रहे छोंऽ । हमरऽ संयोगे बिगड़लऽ छै ।
102- पितर के प्रति श्रद्धा ही श्राद्ध छै ।
भादौ शुक्ल पुर्णिमा से लै के आश्विन कृष्णा पक्ष से सोलह (16) दिन सनातन धर्म में पितरऽ केरऽ दिन मानलऽ जाय छै । ई पख में पितर लोक केरऽ द्वारा खुली जाय छै । आरो पितर लोग अपनऽ संतानऽ के देखे केरऽ लालसा में पृथ्वी लोक पर घुमे लागे छथ । दुनियां केरऽ प्राय सभे देशऽ में पूर्वजऽ के अपनऽ- अपनऽ रिवाजऽ के अनुसार पुजलऽ जाय छै । हिन्दू धर्म माय- बाप के आरो मातृ- पितृ पूर्वजऽ के देवता से भी ऊँचऽ स्थान देलऽ गेलऽ छै । संतानऽ केरऽ हृदय में अपनऽ पूर्वजऽ के प्रति स्नेह भरलऽ होय छै । ते एन्हऽ संतान केरऽ प्रार्थना से देवता प्रसन्न होय जाय छथ । सभे संतान माय- बाप केरऽ ट्टणि छै । केवल जीतऽ माय- बाप केरऽ सेवा से नांय, मरलऽ पूर्वजऽ केरऽ उपासना करी के पितृ ट्टण से धीरे- धीरे उ ट्टण होय के लेलऽ ही श्राद्ध करलऽ जाय छै । वैदिक दर्शन मरला केरऽ बाद पूर्व जन्म केरऽ साथ विकसित होलऽ छै । आरेा वू कोय योनि के भी प्राप्त करी सके छै । पितर पख केरऽ सोलह दिनऽ में केवल पूर्वज आरो निराश्रित, मित्र, ब्रह्मा से लेके सभे जीवऽ के जलदान करे केरऽ विधान छै । जेकरा कर्मकाण्ड केरऽ भाषा में तर्पण कहलऽ जाय छै । धर्मशास्त्र में कोय भी उपवास केरऽ नियम तीन लोगऽ पर लागू नांय होय छै । बच्चा पर, बिमार लोगऽ पर आरो एकदम बुढ़ऽ पर । जेकरऽ बाप जीतऽ छै, ओकरा पितृ केरऽ काम करना मना छै । श्राद्ध में श्रद्धा केरऽ महत्व छै । श्रद्धा से करलऽ गेलऽ श्राद्ध पितर लोक के प्राप्त होय छै । नाम, गोत्र, मंत्र के द्वारा पितरऽ के निमित ढेलऽ जाय वाला चीज पितरऽ के ठीक वेहे रंऽ खोजी लै छै, जेरंऽ बछड़ा अपनऽ भाय के खोजी लै छै । श्राद्ध में चीजऽ केरऽ प्रधान नांय छै । श्रद्धा ही प्रधान छै । ऐ हे से कहलऽ गेलऽ छै कि जेकरा पा कुच्छु भी चीज नांय छै, वू अपनऽ दोनों हाथ आकाश के तरफ उठाय के ऊँचऽ आवाज में कह ना चाहिवऽ कि सही प्रयत्न के बावजूद हम्में अपनऽ पितर केरऽ श्राद्ध के वास्ते सामान नांय जुटाबे पारलां, पितर लोग हमरा पर प्रसन्न रहिहऽ । श्राद्ध तीन पीढ़ी के एक सूत्र में बांधलऽ राखे केरऽ काम शताब्दी से चलऽ आय रहलऽ छै । माय पक्ष आरो बाप पक्ष केरऽ तीन पीढ़ी के स्मरण करी के पानी देलऽ जाय छै । एकरा से पानी दै वाला के पचाच सौ साल पहले केरऽ अपनऽ पूर्वज परिवार केरऽ जानकारी रहे छै ।
103- क्रोध की अग्नि
बहुत समय पहले केरऽ बात छिके, शंकराचार्य आरो मंडनमिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रर्थ चलले । शास्त्रर्थ केरऽ निर्णायक छेली मंडनमिश्र केरऽ धरम पत्नी देवी भारती । हार जीत केरऽ निर्णय होना बांकी छेले । वेहे बीच में देवी भारती के आवश्यक काम से कुछ समय के लेलऽ बाहर जाय ले पडि़ गेल्हें । लेकिन जाय से पहले देवी भारती ने दोनों विद्वानऽ केरऽ गला में एक- एकऽ फूल केरऽ माला डालले होलऽ कहलकी, ई दोनों माला हमरऽ अनुपस्थिति में तोरऽ हार जीत केरऽ फैसला करते । ई कही के देवी भारती वहाँ से चलऽ गेली, शास्त्रर्थ केरऽ प्रक्रिया आगे चलते रहले । कुछ देर बाद देवी भारती ऐली, हुन्हीं अपनऽ निर्णायक नजरऽ से शंकराचार्य आरो मंडनमिश्र के देखलकी, बारी- बारी से देखते होलऽ अपनऽ निर्णय सुनैलकी । हुन्कऽ फैसला के अनुसार शंकराचार्य विजयी घोषित करलऽ गेला । आरो हुन्कऽ पति मंडन मिश्र पराजय होला । सभे दर्शक हैरान होय गेले कि बिना कोय आधार केरऽ इ विदूषी अपनऽ पति के ही पराजित घोषित करी देलकी । एक विद्वान ने देवी भारती से नम्रता पूर्वक पुछलके की हे देवी तोहें ते शास्त्रर्थ केरऽ बीचऽ में ही चलऽ गेलऽ छेलहऽ, फेरू वापस लौटते ही अपनऽ एन्हऽ फैसला किरंऽ दै देल्हऽ ? देवी भारती ने मुस्कुराय के जवाब देलकी, जब भी कोय विद्वान शास्त्रर्थ में पराजित होय लागे छै, आरो ओकरा जबे हार केरऽ झलक देखाबै लागे छै ते वू क्रुद्ध हो उठे छै । हमरऽ पति केरऽ गला केरऽ माला हुन्कऽ क्रोध से सुखी चुकल छै, शंकराचार्य जी केरऽ माला केरऽ फूल अभी भी पहले जेन्हऽ ताजा छै ।
104- दोसरा केरऽ करलऽ प्रार्थना काम नांय आबे छै ।
आचार्य तरूण जी महाराज कहे छथिन कि तोरऽ वजह से जीत जी केकरो आखऽ में लोर आबी जाय ते इ सब से बोड़ऽ पाप छै । लोग मरला के बाद तोरा लेलऽ कान्दे, ते सब से बोड़ऽ पुण्य छै । ऐहे से जिन्दगी में एन्हऽ काम करऽ कि मरला के बाद तोरऽ आत्मा के शान्ति के लेलऽ केकरो प्रार्थना नांय करे ले पड़े । काहे कि जैसे कोय दोसरा के खाना खाय से तोर पेट भरी जैते ? वैसे ही दोसरा के द्वारा करलऽ गेलऽ प्रार्थना कोय काम केरऽ नांय होय छै । हुन्हीं कहलका कि इंसान नर्वस होय जाय छै । जबे कि गुलाब काँटऽ में भी मुस्कुराबे छै । तोहें भी प्रतिकूलता में मुस्कुराबेऽ ते लोग तोरा से भी दोस्ती (प्रेम) करते, याद रखिहो कि जिन्दा आदमी ही मुस्कुराबे छै । मुर्दा कभी नांय मुस्कुराबे छै । आरो कुत्ता चाह के भी नांय मुस्कुराय सकते, ई सौभाग्य सिर्फ मनुष्य के ही छै । ऐहे से जीवन में सुख आबे तो भी हंसी लिहऽ आरो दुख आबे तो हंसी में उड़ाय दिहऽ हुन्ही कहे छथ कि एक आदमी भगवान से पुछलके तोरा से प्रेम आरो मानवीय प्रेम में की अन्तर छै ? भगवान बोले आसमान में उड़ते पंछी हमरऽ प्रेम छिके, आरो पिंजड़ा में कैद पंछी मानवीय प्रेम छिके । प्रेम में अद्भूत शक्ति छै । केकरो के जीतना छै ते ओकरा तोहें तलवार से नांय जीती सके छऽ । तलवार से केकरो, हरैलऽ जाय सके छै । जीतलऽ जांय जाय सके छै जब भी जिन्दगी में संकट आबै छै, ते सहन शक्ति पैदा करऽ । जे सहे छै, वेहे रहे छै । जीवन परिवर्तन के लेलऽ सुने केरऽ आदल डालऽ सुनना भी एक साधना छै । चिन्तन बदलऽ ते सब कुछ बदली जैते ।
105- दिलऽ केरऽ दूरी आरऽ प्रेम ।
एक बार एक गुरू अपनऽ शिष्यऽ के साथ बैठलऽ छेलाता सभे शिष्यऽ से अचानक एक सवाल पुछलका । बताबऽ जबे दु आदमी एक दोसरा पर गुस्सा करे छौ, ते जोर- जोर से चिल्लाबै काहे छै ? शिष्य कुछ देरी सोचलकऽ आरो सनी उत्तर देलके, हम्में अपनऽ शान्ति खतम करी चुकलऽ रहे छिये, ऐहे से चिल्लाबै लागे छिये । गुरू जी मुस्कुराते होलऽ कहलका, दोनों लोग एक दोसरा केरऽ नजदीके रहे छै, फेरू धीरे- धीरे भी ते बात होय सके छै । फेरू वू चिल्लाबै काहे छै । कुछ आरो शिष्य ने जबाव देलके, लेकिन गुरू उत्तर सुनी के संतुष्ट नांय होला । हुन्हीं अपने उत्तर देना शुरू करलका, बोले जबे दु लोग एक दोसरा से नाराज होय छै, ते ओकरऽ दिलऽ में दूरी बढ़ी जाय छै । जबे दिलऽ में दूरी बढ़ी जाय छै, ते आवाज पहुँचाबे के लेलऽ ओकरऽ तेज होना जरूरी छै । दूरी जेते ज्यादा होते ओतने तेज चिल्लावै ले पड़ते । दिलऽ केरऽ ई दूरी ही ते गुस्सैलऽ लोग के चिल्लावै पर लाचार करी दै छै । गुरू जी आगे बोले जबे दु लोगऽ में प्रेम होय छै ते वू एक दोसरा से बड़ी आराम से आरो धीरे- धीरे बात करै छै । प्रेम दिलऽ के नजदीक लाबे छै आरो नजदीक तक आवाज पहुँचाबे के लेलऽ चिल्लावै केरऽ जरूरत नांय पड़े छै । जबे दु लोग में आरो ज्यादे प्रेम होय जाय छै, ते वू फुसफुसाय के भी एक दोसरा तक अपनऽ अपनऽ बात पहुंचाय ले छै । एकरऽ बाद प्रेम केरऽ एक अवस्था एन्हऽ भी आबी जाय छै कि फुसफुसाय केरऽ भी जरूरत नांय पड़े छै । एक दोसरा केरऽ आँखऽ में देखी के ही समझ में आबी जाय छै । की कही रहलऽ छै । गुरू जी शिष्य के तरफ देखते होलऽ बोलला, जब भी बहस करऽ ते दिलऽ केरऽ दूरी नांय से नांय बढ़ै लेहिहऽ ।
106- जमीन पर खजाना
एक शहर में एक भिखारी सड़क किनारे बैठी के बीस- पच्चीस साल से भीख मांगी रहलऽ छेले । एक दिन मरी गेलऽ । जीवन भर ऐहे कामना छेले कि, हम्में भी सम्राट बने ले पार तलां कौन भिखारी एन्हऽ छै जे सम्राट होय केरऽ कामना नांय करे छै । जीवन भर हाथ पसारी के रास्ता पर खड़ा रहलऽ, लेकिन हाथ पसारी के एक- एक पैसा मांगी के कोय सम्राट होलऽ छै ? भीख मांगे वाला कभी सम्राट होलऽ छै ? मांगे केरऽ आदत जत्ते बढ़े छै, ओतने बोड़ऽ भिखारी भिखारी बनी जाय छै । सम्राट कैसे बनी जैतऽ ? जे पच्चीस साल पहले छोटऽ भिखारी छेलऽ पच्चीस सालऽ के बाद पूरे सहरऽ में प्रसिद्ध भिखारी होय गेलऽ छेलक लेकिन सम्राट नांय हुवे पारलऽ । फेरू मरी गेलऽ । मौत केाय फिक्र नांय करे छै । मौत सम्राट के भी आबी जाय छै, आरऽ भिखारी के भी आबी जाय छै । सच्चाई शायद ऐहे छै कि सम्राट थोड़ऽ बोड़ऽ भिखारी होय छै_ भिखारी थोड़ऽ छोटऽ सम्राट होय छै । आरो की फरक होते, वू मरी गेल, भिखारी के गाँव वाला सब ओकरऽ मुर्दा के उठ वाय के फेंकवाय ढेलके, आदमी सब के लागले कि पच्चीस सालऽ से एके जग्घऽ पर बैठी के भीख मांगे छेलऽ ओकरऽ चेथरा गोंदरा, टीन- टप्पर, बर्तन वासन फेंकी देलऽ गेले । फेरऽ मनऽ में ख्याल ऐले कि पच्चीस सालऽ में जमीन भी गंदा करी देलऽ होते । जमीन केरऽ माटी भी कोड़वाय के फेंकी देलऽ गेले । साफ- सुथरा करी के पवित्र बनैलऽ गेले । ऐहे रंऽ सबके साथे व्यवहार होय छै मरी गेला पर । भिखारी के साथ ही हैरंऽ होय छै, एन्हऽ बात नांय छै । जेकरा अपनऽ प्रेमी कहे छै, ओकरा साथ भी ऐहे व्यवहार होय छै । मरी गेला पर मुर्दा कहाबे छै । घर- द्वार जमीन खजाना सब यही रही जाय छै ।
107- भगवान बुद्ध केरऽ उपदेश
भगवान बुद्ध अपनऽ आर्थिक आरऽ राजनीतिक विचार केरऽ सिंहनाद करलऽ छेलाता चोरी, हिंसा, नफरत, निर्दयता जेन्हऽ अपराध केरऽ कारण गरीबी छै । सजा दै क नांय रोकलऽ जाप सके छै, गांव में भोजन करला केरऽ बाद गौतम बुद्ध केरऽ उपदेश होय वाला छेले कि एक किसान भूखलऽ- पियासलऽ वहां पहुँचलऽ भगवान बुद्ध ने कहलका पहले एकरा खाना खिलाबऽ । ओकरऽ बाद उपदेश शुरू होते । भगवान बुद्ध कहलका भूखले आदमी के उपदेश सुने में मन नांय लागते ? भूख से बोड़ कोय दुःख नांय होय छै । भूख हमरऽ शरीर केरऽ ताकत कमकरी दै छै । जेकरा से हमरऽ खुशी, शान्ति, स्वास्थ्य सभे समाप्त होय जाय छै । हमरा भूखलऽ लोगऽ के नांय भूलना चाहीवऽ । अगर हमरा एक सांझ खाना नांय मिले ते हम्में परेशान होय लागे छिये । वू लोगऽ के कष्ट केरऽ कल्पना करऽ जेकरा दिन केकहे हफ्रतों तक बराबर खाना नांय मिले छै । हमरा एन्हऽ इंतजाम करना चाहीवऽ कि दुनियां में एक भी आदमी भूखलऽ नांय रहेले पड़े । उपदेश देते होलऽ भगवान बुद्ध ने कहलका, राज्य केरऽ अर्थ व्यवस्था आरोऽ न्याय प्रणाली सुधारऽ । सजा देना, जेल भेजना, शारीरिक दंड देला से अपराध पर काबू नांय पैलऽ जाय सके छै । अपराध आरऽ हिंसा ने भूख आरऽ गरीबी केर परिणाम होय छै । जनता केरऽ सहायता ओकरऽ सुरक्षा केरऽ सर्वोत्तम उपाय के लेलऽ ध्यान देना उचित होते । गरीब किसानऽ के भोजन बीज आरो खाद पर तब-तक आर्थिक सहायता देलऽ जाय जब-तक वू आत्म निर्भर नांय होय जाय । छोटऽ व्यापारी के पुंजी उधार देलऽ जाय, सरकारी कर्मचारी के पर्याप्त वेतन देलऽ जाय, लोग, के अपनऽ व्यवसाय धंधा चुने केरऽ अवसर देलऽ जाय । लोक जे काम करना चाहे ओकरऽ तकनीकी शिक्षा केरऽ इन्तजाम करलऽ जाय जबे लोग अपनऽ- अपनऽ काम- धंधा लगी जैते, कोय एक दोसरा के परेशान नांय करते । भगवान बुद्ध कहलका भय आरो दंऽकेर सहारा नांय लै के लोगऽ केरऽ समस्या समझी के ओकरा सुलझाबे ले कहलका । जेकरा से समस्या केरऽ जड़ के समाप्त करलऽ जाय सके । आज भारतवर्ष में काश्मीर से लैके उत्तर पूर्व करेऽ विभिन्न राज्य में हिंसा आरो आतंकवाद से जुझी रहलऽ छै । रकार के चाहीवऽ एकरा पर ठोस कदम उठाये के आतंकवाद के खतम करलऽ जाय । तभिये यहां के लोग सुख चैन से रहे ले पारते ।
108- सिंपल खाना दाल – भात
कुछ लोग दाल- भात के ऐर्त्त शोकिन होय छै कि वू रोज दिन कम से कम एक बेर खाना में दाल भात जरूर खाय छै । वहीं कुछ लोग एन्हऽ भी होय छै, दाल भात खाना बिल्कुल नांय पसंद करे छै । ओकरा ई खाना बोरिंग लगे छै । तोरा दाल भात खाना पसंद लगे या नांय लगे, दाल भात खाना शरीर के लेलऽ बहुत फायदा मंद होय छै । जानै छऽ एकरऽ पाँच फैदा केरऽ बारे में, पहिलऽ फैदां दाल भात बनाबै में आरो खाय में दोनों में बहुत आसान काम छै । जबे तोहें कामऽ पर से थकी के आबै छऽ तुरंत दाल – भात बनाय के खाय सके छऽ आरो दाल- भात मुलायम होय छै पेटऽ में जाते आत्म के तृप्ति करी दै छै । आरो ओकरा में थोड़ऽ सन घी पड़ी जाय ते ओकरऽ स्वाद कै गुना बढ़ी जाय छै । दोसरऽ फैदा पाचन क्रिया के आराम दै छै । कुल्थी (कुरथी) दाल या मूंगदाल पचाबै में आसान होय छै । एकरऽ अन्दर केरऽ प्रोटिन के शरीर आसानी से तोड़ी लै छै, भात पचै में आसान होय छै । तीसरा फैदा- जे लोग शाकाहारी छे ओकरा लेलऽ दाल प्रोटीन केरऽ बहुत अच्छा स्रोत छै, दाल आरो भात में अलग- अलग प्रकार केरऽ प्रोटीन होय छै । ऐहे से जबे दोनों के मिलाय के खेलऽ जाय छै ते प्रोटीन केरऽ अच्छा स्रोत साबित होय छै । चौथा फैदा- दाल आरो भात दोनों में बहुत मात्र में फाइबर होय छै, ऐहे से पाचन तंत्र सही से चबै में मददगार होय छै । फाइबर डायबिटीज जेन्हऽ बीमारी से भी बचाबै छै आरो ब्लड सुगर केवल कंट्रोल में रखे छै । पांचवा फैदा- अक्सर कहलऽ जाय छै कि वजन घटावे ले छोंऽ ते भात नांय खा, हमरऽ आहार विशेषज्ञ कहलऽ छै कि तोरऽ वजन पर निर्भर करे छै । अगर तोरऽ वजन कम करे ले छोंऽ ते हफ्रता में दु दिन भात खा, साथऽ में तरकारी जरूर खा । दाल भात खाय में स्वाद नांय लगे छोंऽ ते एकरऽ स्वाद बढ़ावे के लेलऽ थोड़ऽ अंचार पापड़ भी लै सके छऽ । पर ध्यान रहे अंचार पापड़ जरूरत से ज्यादा नांय लिहऽ ।
109- रक्त दान
रक्तदान, जीवन दान, तोहें ई ते बहुत सुनलऽ होभऽ, पढ़लऽ भी होभऽ लेकिन कहियो खून दान करे के बारे में सोचलऽ छऽ ? या कहियो खून दान करलऽ भी छऽ ? हैरंग आदमी के लागे छै कि खून दान करे से कमजोरी बढ़ी जाय छै लेकिन एन्हऽ नांय होय छै । कमजोरी ते होय छै लेकिन वू कुछुवे घंटा में दूर होय जाय छै । खून दान करे से सामाजिक सेवा छिके, बल्कि एकरा से कुछ व्यक्तिगत फैदा भी छै । खूनदान करै से तीन फैदा के बारे में तोहें सुनलऽ होभऽ, दिल से जोड़लऽ बिमारी होय केरऽ खतरा कम होय जाय छै । अगर तोहें हमेशे खून दान करै छऽ ते शरीर में आयरन केरऽ संतुलित मात्र में बनलऽ रहे छै । जे तरह से शरीर में आयरन केरऽ मात्र कम होना खतरनाक होय छै, वेहे तरह एकरऽ ज्यादा होना भी नुकसान देह छै । हमेशा खून दान करे से दिलऽ से जोड़लऽ बिमारी के होय केरऽ खतरा भी कम होय जाय छै । एकरा से हार्ट अटैक आबे केरऽ आशंका भी कम होय जाय छै । हमेशे खूनदान करै वाला के कैंसर होय केरऽ खतरा बहुत कम होय छै । खून दान करै वाला के वजन भी नियंत्रित रहे छै । हालांकि बहुत जल्दी- जल्दी खूनदान नांय करना चाहिवऽ । एक स्वस्थ आदमी के तीन महीना पर खून दान करना चाहीवऽ ।
110- पत्थर केरऽ जीवन कथा
एक छोटऽ सन कहानी हमरऽ बड़ी प्रिय छै कि महल केरऽ निकट कुछ बच्चा सनी खेली रहलऽ छेले, खेल- खेल में पथल केरऽ ढेरी से एकटा पथल उठाय के राजमहल केरऽ झरोड़ा के तरफ फेंकी देलके, पथल जबे उठै लागलऽ, ते वें नीचे पड़लऽ होलऽ पथलऽ से कहलकऽ दोस्त, हम्में आकाश केरऽ यात्र पर जाय रहलऽ छी, नीचे पड़लऽ पथल चुपचाप डाह (ईर्ष्या) में सुनते रहलऽ, करतलऽ भी की ? निशि्ंचत जाय रहलऽ छेलऽ वू पथल बहुत ऊपर जाय ले चाहे, छेलऽ लेकिन ओकरा पास पांख नांय छेले । आरो वू कहियो उड़ैले नांय पार तलऽ । लेकिन आज ओकरऽ ढेरी केरऽ एक पथल बिना पांख केरऽ उपर जाय रहलऽ छेलऽ । फेंकलऽ गेलऽ वू पथल, लेकिन वे कहलकऽ कि हम्में आकाश यात्र पर जाय रहलऽ छी । ऊपर गेलऽ आरो महल केरऽ झरोखा से टकरैलऽ आरो काँच चकनाचूर होय गेलऽ पथल कहलकऽ हम्में केते बेर मना करलऽ होवे कि हमर रास्ता में कोय नांय आवें, नांय ते हम्में चकनाचूर करी देबौ । अबे देखें चकनाचूर होय के पड़लऽ रहें ? काँच टुकरा होय के कान्दी रहलऽ छेले । पथल भीतर गेलऽ आरो कालीन पर गिरी पड़लऽ गिरते ही कहलकऽ बहुत थकी गलां, एक शत्रु के भी नाश करलां । बड़ी दूर से एलऽ छी थोड़ऽ आराम करी ले छी । पथल कहलकऽ केतना अच्छा लाये छै रे महल लागे छै हमरऽ आबै केरऽ खबर पहिले ही मिली गेलऽ छेले, मकान मालिक कत्ते भलऽ आदमी छै, कालीन बिछाय के रखलऽ छेले, स्वागत केरऽ पूरा इन्तजाम करी के राखलऽ छेले, कत्ते अच्छा लोग छै, अतिथि प्रेमी ? पहिले से ही व्यवस्था करी के रखलऽ छेले, शायद पता चली गेलऽ छेले कि हम्में आबे वाला छिये । आखिर हम्में कोय छोटऽ मोटऽ पथल ते नांय छियै, हम्में विशिष्ट छिये, साधारण पथ जमीन पर पड़लऽ रहे छै । जे महापुरूष होय छै पथलऽ में, वेहे आकाश केरऽ यात्र करे छै । हमरऽ स्वागत में इन्तजाम करलऽ छै ते ठीके छै । तभिये महल केरऽ नौकर काँच टुटे केरऽ आवाज सुनलके, दौड़लऽ होलऽ वहाँ पहुँचलऽ । पथल के हाथऽ में उठाय लेलकऽ, पथल ने अपन मनऽ में कहे लागलऽ कत्ते प्यारऽ लोग छै, धन्यवाद- धन्यवाद ओकरऽ हृदय में उठले । घऽर केरऽ मालिक कत्ते अद्भूत छै अपनऽ विशेष प्रतिनिधि के भेजलऽ छै । ताकि वू हमरऽ स्वागत करे ताकि अपनऽ हाथऽ में उठाबे आरो प्रेम करे । नौकर ने वू पथल के वापस खिड़की से नीचे फेंकी देलकऽ पथल लौटते वक्त कहलकऽ अबे चलों अपनऽ घऽर, दोस्ती सनी केरऽ बहुत याद आबी रहलऽ छै । वू वापस पथल केरऽ ढेरी में गिरलऽ नीचे आरो पथल सनी टकटकी लगाय के ओकरा देखी रहलऽ छेले । नीचे गिरते ही कहलकऽ दोस्त तोरा सनी केरऽ बहुत याद आबे छेलऽ माने छिये कि हम्में जमीन पर खुला में पड़लऽ रहे छी, आरो वहाँ हमरा महल केरऽ स्वागत मिललऽ लेकिन हम्में ठोकर मारी देलिये । करी देलिये त्याग वू महल केर अपनऽ घऽर अपनऽ घऽर छै । पराया घऽर पराया घऽर छै । ई बात आरेा छै तोरा सब के साथ जीना आरो रहना, महल केरऽ मालिक ते हाथऽ में उठाय के प्यार करे लागला । लेकिन हम्में हुन्कऽ मोहऽ में नांय पड़लां । हम्में कहलिहें हम्में ते घऽर जेबऽ बड़ी मुश्किल से आबे ले देलका । हुन्हीं ते हाथ से पकड़लऽ होलऽ छेला, लेकिन हम्में चलऽ ऐलिये । बड़ीयाद आवे छेलऽ तोरासनी केरऽ सब पथल ओकरऽ बात गौर से सुनी रहलऽ छेलऽ । आरो वें कहलकऽ एन्हऽ कभी नांय होलऽ छै हमरा वंशऽ में, इति हास में ई घटना मुश्किल से कभी- कभी घटे छै कि हमरा में से कोय आकाश केरऽ यात्र करे छै ।
111- अपनऽ भीतर भक्ति के बनाय रक्खऽ
पहले पारिवारिक जीवन में कोय एक बोड़ऽ उम्र केरऽ आदमी घरऽ केरऽ मुखिया होय छेले । वू जे बोले छेले आदेश बनी जाय छेले, आरो ओकरा माने ले पड़े छेले । समाज आरो राष्ट्र केरऽ जीवन में भी ऐहे छेले कि नेतृत्व आरो निर्णय कुछ ही लोगऽ केरऽ हाथऽ में होय छेले । धीरे- धीरे समय बदलले आरो परिवारऽ में शक्ति निर्णय केरऽ बहुत केन्द्र बनी गेले । परिवारऽ में जेत्ते सदस्य छै सब केरऽ अपनऽ अपनऽ राय महत्वपूर्ण होय गेले । आरो परिणाम में कलह (झगड़ा) हाथ लगले । ऐहे लेलऽ कलह (झगड़ा) पैदा होय रहलऽ होवे ते एक काम करते रहिहऽ आरो वू छै विकल्प केरऽ प्रयोग । जों तोरा कोय निर्णय लेना होवे ते ई नांय मानऽ कि तोहें जे कही देल्हऽ, वेहे होय जाय । विकल्प खुले रखिहऽ, ई समझिहऽ कि एन्हऽ होना चाहिवऽ । लेकिन, होय सके छै कि ओकरा से सभे सहमत नांय हुवे । जबे एन्हऽ माने छऽ कि हम्में विकल्प पर टिकलऽ रहबऽते हमरा अहंकार बाधा पहुँचाबै छै । सामने वाला अपनऽ अहंकार केरऽ कारण तोरऽ राय मानी रहलऽ होथों । अहंकार टकराबे से ही कलह (झगड़ा) शुरू होय जाय छै । ऐहे से पारिवारिक जीवन में भक्ति बनैलऽ रखऽ । हम्में हमेशा ऐहे कहे छिहों कि व्यवसायिक जीवन में भी भीतर केरऽ भक्ति के खतम नांय होवे ले दे । तोहें केतनो बोड़ऽ अधिकारी होय जा उचऽ पदऽ पर होवऽ । अपनऽ भीतर भक्ति बनैलऽ रखऽ जे भक्ति करे छै वेहे हमेशा अपनऽ ऊपर एक शक्ति के मानै छै । भक्ति केरऽ शुरूआत होय छै । तोहें छें, हम्में कहीं भी नांय ऐहे छिकै भक्ति केरऽ अर्थ । एकरा से समापन होय छै । नांय तोहें छै, नांय हम्में छी । जों कोय तोरऽ बात नांय माने या तोरऽ मन पसंद काम नांय हुवे, तबे तोहें मानी लै छऽ कि संभवतः भगवान के ऐ हे मंजूर छेन । ऐहे आत्म स्वीकृति तोरऽ अहंकार के गलाय के जीवन के कलह मुक्त करी दै छै ।
112- जीवन में दुर्गुणों केरऽ प्रवेश छै आत्म घात
ऊपर वाला अपनऽ ढंग से सबके जन्म दै छथिन आरो जीवन केरऽ समापन भी कर बाबै छथिन । हमरऽ हाथऽ में जे कुछ भी छै, वू बीच केरऽ मामला छै नांय हम्में जन्म केरऽ चयन करी सके छिये । आरो नांय मृगु अपनऽ ढंग से प्राप्तकरी सके छिपै । लेकिन भगवान ओकरा अपराधी माने छथिन । जे दोसरा के जीवन पर बिना मतलब प्रहार करे छै । आतंकी घटनाओं के साथ, हमरऽ परिचय एक नया ढंग केरऽ मृत्यु आत्मघाती हमला से होलऽ छै । हैरंऽ हमला से पूरे दुनियां कांपी रहलऽ छै । आतंक ऐहे से बढ़ी रहलऽ छै । काहे कि लोग मानव जीवन केरऽ महत्व के समझै ले नांय पारी रहलऽ छै । मनुष्य केरऽ शरीर मिललऽ छै ते हम्में अध्यात्म से जुड़ी के एकरऽ महत्व समझाबे ले होते । शांति प्राप्त करना आरो धर्म के सही रूपऽ में समझाना होय ते अध्यात्म से जुड़े । समझ में आय जाय छै कि जे आदमी केरऽ जीवन में दुर्गुण केरऽ प्रवेश होय ते समझी ले वू आत्म घात केरऽ तैयारी करी रहलऽ छै । जीवन में भी जबे काम, क्रोध मद, मोह आरो लोभ हावी होय जाय छै ते हम्में आत्मघाती कदम ही उठावे छिये । जे आतंकी सामूहिक हत्या कांडकरी रहलऽ छै । बूते अपराधी छेबे करे, लेकिन दुर्गुणऽ के भीतर स्थान दै के स्वयं के भी आत्मघाती के हम्में भी कुछ अदृश्य हत्या करी रहलऽ छिये । कभी केकरो भावना के कभी केकरो चरित्र के, आरो कभी अपनऽ कर्त्तव्य के प्रति उदासीन होय के जीवन जिये केरऽ । ई सब आत्मघाती कदम छै, ऐ हे से आतंकियों के घिनौना अपराध से सीखें कि हमरऽ भीतर दुर्गुण्ऽ केरऽ प्रवेश नांय हुवे, आरो हमरा से कभी- कभी कोय एन्हऽ काम नांय हुवे जे वू मानव जीवन या प्राणी जीवन के विरूद्ध हुवे । जे परमात्मा के देलऽ छै, वरणा कोय भी दिन अवसर मिलला पर ई दुर्गुण हमरा से भी गलत काम करवाय लेते । आरो बादऽ में हमरा पास सिवाय पछताबे केरऽ अलावा कुछ नांय रहते ।
113- कौवा – मैना
जाड़ा केरऽ दिन छेले, आरो साँझ होय रहलऽ छेले । आकाशऽ में बदरी घेरी लेलऽ छेले । एक नीम गाछ पर, बहुत सनी कौवा बैठलऽ छेले । काँव- काँव करी रहलऽ छेले । आरो लड़ी रहलऽ छेले । ऐहे बीच में एकटा मैना वहाँ आबी गेली, आरो वेहे नीम केरऽ गाछ पर बैठ ली । मैना के देखत ही, कौवा- सनी ओकरा पर टुटी पड़ले । बेचारी मैना कहलकी, बदरी घेरलऽ छै, ऐहे से जल्दी अँधार होय गेलऽ छै, हम्में अपनऽ खोंता भूली गेलऽ छी । रात भर यहाँ बैठे ले दे । कौवा कहलके ई गाछी पर हमरा सनी केरऽ डेरा छिके, तोहें यहाँ से भागी जो । नांय ते मारते- मारते मारीय देबो, मैना बोलली गाछ ते तोरऽ लगालऽ नांय छिको, सबते भगवान केरऽ दिके । ई सरदी में जों वर्षा हुवे आरो पथल पड़े ते भगवाने हमरा सनी के बचाय वाला छथ । हम्में बहुत छोटऽ छी तोरऽ बहीन छिहों । हमरा पर दया करऽ । आरो हमरा यहाँ बैठे ले दे । कौवा कहलके हमरा तोरऽ जेन्हऽ बहीन नांय चालीवऽ । तोहें बड़ी भगवान केरऽ नाम लै छें, भगवान केरऽ भरोसा यहाँ से चली जो ? तोहें यहाँ से नांय जांबे ते हमरा सनी तोरा मारबौ । कौवा ते लड़ाकू होबे करे छै । साँझ के जबे गाछी पर बैठे लागे छै, ते आपस में लड़ला बिना ओकरा चैन नांय आबे छै । एक दोसरा के मारै छै, आरो काँव- काँव करी के लड़ै छै । कौन कौवा कहाँ बैठतऽ कौन डारी पर बैठतऽ । ई फैसला जल्दी नांय करै ले पारे छै । ओकरा सनी के घड़ी घड़ी लड़ाय होते रहे छै । दोसरऽ चिडि़या के अपना संग कि रंग बैठे ले देतऽ । मैना के मारे ले दौड़ले । कौवा के अपना तरफ झपटते देखी के मैना बेचारी वहां से भागली । उड़ते होलऽ एकरा आम गाछी पर जाय के बैठ ली । रात आंधी- पानी ऐले आरो बदरी गरजे लागले, बोड़ऽ- बोड़ पथलऽ गिरे लागलऽ । तड़तड़ बन्दूक केरऽ गोली जेन्हऽ आवाज हुवे लागले कौवा सनी कांव- कांव करी के चिल्लाबे लागलऽ हिन्ने- से हुन्न दौड़े उड़े लागलऽ पथल केरऽ मार से सब घायल होय के धरती पर गिरे लागलऽ । कुच्छु ते मरियो गेलऽ । मैना जे गाछ पर बैठलऽ छेली ओकरऽ मोटऽ डार आंधी में टुटी गेलऽ डार भितरे भितर खोखलऽ होय गेलऽ छेले । डार टुटला पर ओकरऽ जड़ऽ में ढ़ोढर होय गेले, मैना ओकरे में ढुकी केर बैठी गेली, पानी पथल से बची गेली । भगवान केरऽ कृपा से वू सुरक्षित छेली, बीघन भेलऽ दु घड़ी दिन चढ़ी गेलऽ । एकदम चमचमालऽ रौद निकललऽ मैना ढोंढ़र से निकलली पाँख पसारी के चहके लागली, भगवान के प्रणाम करलकी, वहाँ से उड़ली । धरती पर पड़ल होलऽ कौवा ने मैना के उड़ते देखी के बड़ी कष्ट से बोललऽ मैना बहीन रात में तोहें कहाँ रहें ? तोहें पथलऽ के मार से केना बची गेले । मैना बोलली, हम्में आम केरऽ गाछ पर ए सकरे बैठलऽ छेलिये आरो भगवान केरऽ प्रार्थना करी रहलऽ छेलिये । पुरवऽ में पड़लऽ असहाय जीव केरऽ भगवान केरऽ अलावा आरो कौन बचावे वाला छै । भगवान पर जे भरोसा करे छै, ओकरा भगवान आपत्ति- विपत्ति में जरूर सहाय होय छथिन, आरो ओकरऽ रक्षा करे छथिन ।
114- बेंग
वर्षा केरऽ दिन छेले, पोखर- तालाव लबालब भरलऽ छेले । बेंग सब किनारो बैठी के एक स्वर में टर्र- टर्र करी रहलऽ छेलऽ । कुछ लड़का सनी बहाय वास्ते पानी में कुदलऽ, आरो पोखरी में पैरे लागलऽ । एक लड़का ने पथल उठाय के बेंग के जोड़ऽ से मारलके बेंग उछली के पानी में चलऽ गेलऽ । बेंग के कुदते देखी के लड़का के बड़ी बढि़याँ लागले । वू बार- बार बेंग के मारे आरो ओकराऽ छलते देखी के हँसे । पथल केरऽ मार से बेचारा बेंगऽ के चोट लागे छेले, ओकरा जों आदमी केरऽ भाषा बोले ले आतले ते वू जरूर लड़का से प्रार्थना कर तले आरेा नांय मानला पर गरियो देवले । लेकिन बेचारा कि तरतलऽ चोट लागे छेले, प्राण बचाबे के लेलऽ पानी जाय छेल अपनऽ पीड़ा सहे के अलावा दोसरऽ कोय उपाय भी ते नांय छेले । लड़का के ई पता नांय छेले कि ई तरह से खेलऽ में पथल मारना बेंगऽ के कत्ते दरद होते, होतै ? कीड़ा- मकोड़ा के तंग करना या कोय जीव केरऽ दरद होते, होतै ? कीड़ा- मकोड़ा के तंग करना या कोय जीव केरऽ प्राण लेना, कत्ते बोड़ऽ पाप होय छै । जे पाप करे छै, ओकरा बहुत दुःख भोग ले पड़े छै । आरो मरला के बाद यमदूत पकड़ी के नरक में लै जाय छै । वहाँ बहुत कष्ट भोगे ले पड़े छै । बेंगऽ के बार- बार पथलऽ मारना ओकरा खेल बुझाय छेले । एकरा पकड़ी के लै चल । लड़का ई सुनी के पीछु धुरी के देखलकऽ, तीन ठो यमदूत खड़ा छै । कारऽ- कारऽ यमदूत लाल- लाल आंख, बोड़ऽ बोड़ऽ दांत, टेढ़ों मेढ़ों नाक । हाथऽ में मोटऽ मोटऽ डंटा आरो डोरी, लड़का ओकरा देखतहीं डरी गेलऽ, साथी सनी हंकाबे लागलऽ । वहाँ कोय नांय छेलऽ सब भागी गेलऽ छेले । अपने बेंगऽ के मारै में लागलऽ छेलऽ । एक यमदूते कहलके पकड़ी ले एकरा । दोसरका यमदूते कहलके ई ते गोबरैलऽ जेन्हऽ घिनैलऽ देखावे छै । हम्में एकरा नांय छुबऽ । ई ते बड़ी नीच छै । हमरऽ हाथ मैलऽ होय जातऽ । तीसरा कहलके एकरा फंदा लगाय के बांधी ले, आरो घसीटते लै चल । लड़का ई सुनी के मानऽ ओकरऽप्राण निकली रहलऽ छेले । बड़ी साहस करी के पुछलके हमरा कहां ले जेभऽ ? नरकऽ में जहां पापी सनी के जीते जी तैलऽ में पकैलऽ जाय छै । पकौड़ी के समान । लड़का अपनऽ माय के पकौड़ी बनाते देखलऽ छेलऽ । बाप रे हमरा पकौड़ी एन्हऽ पकैतऽ । लड़का कहलके हम्में तोरऽ की बिगाड़लऽ छिहों, हमारा छोड़ी दे । हाथ जोड़ी के घिघियाबे लागले । गोड़े गिरे दिहों, हमरा नांय पकाबऽ । तोहें पापी छें, महा अधम छें । तोहे किरिया खो अबे पाप नांय करबऽ तबे तोरा छोड़बो । यमदूत कहलके कोय प्राणी के बिना मतलब कष्ट पहुंचेबे नरक में ले जेबो आरो वहां लोहा धिपाय के मारबो । लड़का कहलके हम्में किरिया खाय छी । कोहयो पाप नांय करबऽ, दोनों कान पकड़ी के उठ बैठ करे लागलऽ । यमदूत वहां से अर्न्तध्यान होय गेले । लड़का भागलऽ भागलऽ घऽर आलऽ माय के सब बात बताबे लागलऽ । हम्में की पाप करलऽ छिये । माय कहलकी तोहें निरपराध बेंगऽ के मारे छेलहीं, कोय भी निरपराध जीव के सताना महा पाप होय छै । जीव के नांय सताना चाहीवऽ ।
115- भैंस आरो घोड़ा
भैंस आरो घोड़ा दोनों एके वन में रहे छेले, साथे साथे चरे छेले, एके रास्त से आना जाना, एके झरना में पानी पिना, दोनों में बड़ी दोस्ती छेले । एक दिन दोनों लड़ाई होय गेलऽ । भैंस ने सींग से मारी मारी के घोड़ा केरऽ हालत खराब करी देलकी । घोड़ा देखलऽ हम्में भैंस से जीते लेथंय पारवऽ । वहाँ से भागलऽ भागी के गांव मे ंआबी गेलऽ । आदमी के पास पहुंची के सहायता मांगलकऽ । आदमी कहलके भैंस के बोड़ऽ बोड़ऽ सींग होय छै । भैंस बहुत ताकतवर होय छै, जबे तोहें घोड़ा होय के नांय जीते ले पारले ते हम्में किरंग जीते ले पारबऽ । घोड़ा समझैल के तोहें हमरऽ पीठऽ पर बैठी जा, एकटा मोटऽ सन लाठी लै ले । हम्में जल्दी जल्दी दौड़ते रहबऽ, तोहें डंटा से मारते जारहो, भैंस जबे अधमरऽ होय जाती, फेरू डोरी से बांधी लिहऽ आरो घऽर लै आनीहऽ । आदमी कहलके हम्में ओकरा बांधी के भला की करबऽ ? घोड़ा बतैलके भैंस बड़ी मिट्ठऽ दूध दै छे । तोहें दूध पी के ताकतवर बनी जेभे । आदमी घोड़ा केरऽ बात मानी लेलकऽ । भैंस बेचारी पिटाते पिटाते गिरी पउ़ली, तबे आदमी डोरी से बांधी के घऽर लै आनलकऽ । काम पूरा होला पर घोड़ा कहलके अबे हमरा छोड़ी दे । हम्में अबे चरे- बुलैले जाबऽ । आदमी जोर- जोर हंसे लागलऽ, हमरा जेन्हऽ बुद्ध दुनियां में आरो कोय होते । हम्में तोरा छोड़ी दिहोंऽ । तोरो बांधी के राखी लै छिये । दोनों साथे रहभे । भैंस केरऽ मिट्ठऽ दूध पीबऽ, आरो तोरऽ पीठ पर बैठी के सैर करबऽ । घोड़ा कान्दे लागलऽ अबे हम्में की करी सकेछी । घोडत्र पछताबे लागलऽ । भैंस के संग जेरंग करलां, वेहे फल हमरा खुद भोगे ले पडलऽ । वेहे दिनऽ से भैस आरो घोड़ा गांव में रहे लागलऽ । दोसरा के लेलऽ जे गढ़ा खने छै, अपने वे हे में गिरे छै ।
115- वन देवता
एक ब्राह्मण देवता छेलात, बड़ी गरीब आरो सीधा साधा आदमी छेलात । देश में अकाल पड़ी गेले । अबे भला ब्राह्मण से कौन पूजा पाठ करबातऽ आरो दान दक्षिणा देतऽ । सब ते भूखे मरे छेलऽ ब्राह्मण कै दिनऽ से भोजन नांय करलऽ छेलात । ब्राह्मण सोचल का भूखऽ से मरे से अच्छा छै प्राण दै देना । मरे केरऽ विचार से वनऽ में गेला, पहले शुद्ध हृदय से भगवान के प्रणाम करलका, भगवान केरऽ नाम जपलका, आँख खोललाका ते देखे छथ एकटा शेर आबी रहलऽ छै । ब्राह्मण कहलका तोहें हमरा झट पट खाय जा । ब्राह्मण केरऽ बात सुनी के वन देवता के दया आबी गेले, ब्राह्मण से कहलका तोरा डर नांय लागे छोंन । हम्में शेर छिकिये ब्राह्मण कहलका हम्में ते मरे वास्ते आले छिये । वन देवता शेर बनी के आलऽ छेलात, ब्राह्मण के पांच सौ असर्फी देते होलऽ कहल का घर जा, अपनऽ बाल- बच्चा के देखऽ । आत्म हत्या बहुत बोड़ पाप छिके । ब्राह्मण घर घुरी के आला । बिहाने एकरा असर्फी लैके बनियां केर दोकान पर गेला, आटा, दाल, चावल लै के वास्ते । बनियां पुछलके पंडित जी असर्फी कहाँ से पैल्हे ? ब्राह्मण सब बात सच सच बताय देलका । पंडितजी आटा, दाल, लै के घऽर आला, अपनऽ परिवार के साथ आराम से रहे लागला । बनियां के रात भर नींद नांय पउ़ले । लालच जान मारी रहलऽ छेले । असर्फी के लालच में वनऽ में जाय के भगवान से प्रार्थना कई लागलऽ आंख खोली के देखलकऽ एकरा शेर आबी रहले छै । मने- मने बहुत खुश भेलऽ अबे हमरऽ पांच सौ असर्फी मिली जातऽ । बनियां कहलके हमरा झटपट खाय के अपनऽ पेट भरी ले । शेर कहलके हम्में तोर जेन्हऽ लोभी के जरूर खाय जैतलिये, लेकिन कोय बहाना से तो हें भी भगवान केरऽ नाम लेलऽ छें । ऐहे संतोरा खाबों के नांय, दंड जरूर देबो । शेर एक पंजा मारलकऽ बनियां केरऽ कान चिथड़ा- चिथड़ा होय गेले, एक आंख भी फुटी गेले । लोग केरऽ ऐ हे पुरस्कार मिलले ।
116- रीछ (भालू)
बाप अपनऽ बेटा केरऽ नाम शुभ राखल छेलऽ । शुभ केरऽ बाप शिकारी छेले, रीछ फँसाना, हरिण मारना आरेा ओकर चमड़ा बेची के अपनऽ जीविका चलाना । ऐहे ओकरऽ रोजगार छेले । एक दिन बाप शुभ के गाछ के नीचे बैठाय ढेलकऽ अपने बंदूक लै के वनऽ में गेलऽ । घरऽ में नांय माय छेले नांय वहीन छेले, ऐहे से ओकरा सूना घरऽ मन नांय लाये छेले । गुरूजी केरऽ बेंतऽ के डर से इसकूल भी नांय जाय छेलऽ । आरेा लड़का सनी पढ़ै ले चल जाय छेले । वू गांव में केकरा संग खेलतलऽ । बाप के वन जाय लागलऽ । कभी चिडि़या उड़ातलऽ, कभी खरगोस केरऽ पीछु दौड़तलऽ, कभी- कभी करौंदा, झड़बेरी भी खाय ले मिली जाय छेले । ओकरा अकेले वनऽ में हिन्ने- हुन्ने घुमै में डार नांय लागे छेले। शिकारी केरऽ बेटा जे छेले ? एक दिन अकेले वनऽ में घुरी रहलऽ छेलऽ, खों- खों केरऽ आवाज आलै । देखे ले दौड़लऽ, देखे छे एकटा बोड़ सन भालू काँटऽ केरऽ झोंझ में फंसी के छटपटाय रहलऽ छै । ओकरऽ बोड़ऽ बोड़ बाल कांटऽ में ओझराय गेलऽ छै । शुभ के दया आबी गेले । पास जाय के कांटऽ से भालू के छोड़ाय देलके, भालू जोड़ से चिलैले शुभ डर से बिलबिलाय लागलऽ । डरी रहलऽ छैलऽ कहीं हमरा खाय नांय जाय । थोड़ऽ देरी के बाद भालू अपने वहाँ से भागी गेले । शुभ के जान में जान आले । भालू चिढ़ै छै ते बड़ा भयानक हमला करे छै । शत्रु के ते गाछी पर चढ़ी के नोची लै छै । केकरो पर खुश होलऽ ते दोस्त भी अच्छा बनी जाय छै । ओकरऽ उपकार जे करे छै, ओकरा भूले छै नांय । उपकार करे वाला के बहुत याद रखे छै । जे आदमी दोसरा के दया आरेा उपकार करे छै । ओकरा बहुत फल मिले छै । संसार में बहुत प्राणी आदमी केरऽ उपकार केरऽ बदला बड़ी सुन्दर से उपकार करी चुकाबै छै । शुभ रीछ केरऽ भाषा नांय समझे ले पाई छेलऽ रीक्ष ओकरा से कहे छेले, हम्में तेरऽ मित्र छिकिहों, तोरा वास्ते मिठ्ठऽ फल लै के आबे छिहों । शुभ वहाँ से भागे ले चाहे छेलऽ । वू दौड़लऽ जाय रहलऽ छेलऽ रीछ फेरू ओकरा सामने आबी गेले । अबकी बार रीछ, सुन्दर सुन्दर फल आनी के देलके । शुभ हाथऽ में लै लेलकऽ । खाय के देखलकऽ बहुत मिठ्ठऽ फल छेले । शुभ आरो रीछ में दोस्ती होय गेले । दोनों एक दोसरा के बहुत चाहै लागलऽ ।
117- माँ लक्ष्मी आरेा कमल केरऽ फूल
महालक्ष्मी केरऽ फोटो आरो प्रतिमा में हुन्का कमल केरऽ फूलऽ पर बैठलऽ देखलऽ होभऽ ? एकरऽ पीछु धार्मिक कारण ते छै साथ में कमल फूलऽ पर बैठलऽ लक्ष्मी जीवन प्रबंधन केरऽ महत्व पूर्ण संदेश भी दै छथिन । लक्ष्मी धन केरऽ देवी छथिन । हिन्का धन से संबंध रहे छैन ं। एकरऽ नशा सबसे यादे दुष्प्रभाव छै वाली छथिन । धन, मोह, माया में गले वाला छै । आरेा जबे धन केकरो पर हाबी होय जाय छै ते वू आदमी गलत रास्ता पर चले लागे छै । एकरऽ जाल में फंसे वाला आदमी केरऽ पतन निश्चित छै । वेहे कमल अपनऽ सुन्दरता, निर्मलता आरो गुणऽ के लेलऽ भानलऽ जाय छै । कमल कीचड़ में ही फुले छै, लेकिन ओकरऽ गंदगी से अलगे रहे छै । ओकरा पर गंदगी हाबी नांय होय ले पारे छै । जे आदमी के पास ज्यादे धन छै, ओकरा कमल फूलऽ के तरह ही धर्म के बनाय के रखना चाहिीवऽ । जे रंऽ लक्ष्मी अपने कमले फूलऽ बैठलऽ होल । पर भी घमंड नांय होऽ छैने हुन्ही सहज ही रहे छथिन । ऐहे से धनवान आदमी कभी सहज रहना चाहीवऽ । ओकरा पर लक्ष्मी हमेशा प्रसन्न रहे छथिन । धन केरऽ देवी माय लक्ष्मी के मनैलऽ जाय छै । माय लक्ष्मी के, अगर पूरे विश्व में मनैलऽ जाय छै ते वू छिके भारत । लक्ष्मी हंसी खुशी वाला जग्घऽ में रहे छथिन । जे घरऽ में साफ सफाई, हंसी- खुशी केरऽ कमी रहे छै, नियम- निष्ठा केरऽ पालन नांय होय छै, वहाँ धन केरऽ प्रवाह रूकी जाय छै । नीरसता, उदासी आरो गंदगी से माय लक्ष्मी दूर भागी जाय छथिन । जे घरऽ केरऽ क्रियाशील पुरूष या जनानी निरूत्साहित भाव से काम करे छै, वू घरऽ केरऽ निश्चित रूप से धन केरऽ प्रवाह रूकी जाय छै । माय लक्ष्मी के चंचला मानलऽ जाय छै । अपनऽ ऐहे चंचल स्वभाव के कारण आदमी के पलभ में धनी या गरीब बनाय दै छथिन । घरऽ में धन संचित होय के लेलऽ लक्ष्मी के लजाना ही सर्वश्रेष्ठ छै । चूंकि लक्ष्मी शक्ति स्वरूपा भी छथिन ओरा ई शक्ति ब्रह्मांड से लै के आदमी विशेष केरऽ भीतर तक समैलऽ छथिन । चंचल मन पर नियंत्रण करना ही लक्ष्मी के रोकलऽ जाय सके छै । आदमी में ई शक्ति असीम धैर्य विकसित करै से आबे छै आरो जनानी में ई शक्ति मनऽ के शांत करे से आबे छै । जे घरऽ केरऽ जनानी आरो मर्दाना शांतचित आरो धैर्य रखे वाला हो छे वहाँ लक्ष्मी केरऽ प्रवास स्थायी होय छै, वैदिक ग्रंथ के अगर मानऽ ते भाय लक्ष्मी केरऽ वास साफ सफाइ वाला घरऽ में होय छै । जे घरऽ में साफ सफाई नांय होय छै या जे घरऽ में साफ- सफाई पर ध्यान नांय देलऽ जाय छै । वहाँ ररूहऽ देखलऽ गेल छै कि धन केरऽ प्रवाह रूकी जाय छै । रसोई घर के भी लक्ष्मी केरऽ निवास स्थान मानलऽ गेलऽ छै । ई स्थान जेतना अशुद्ध आरो गंदगी से भरलऽ होलऽ होते, वू घरऽ में दरिद्रता केरऽ वास होते । रसोई घर के साफ सुथरा होना जरूरी छै । माय लक्ष्मी सभे तकलीफ दूर करे वाली छथिन दीपावली में सभे घरऽ में दीया जलैलऽ जाय छै । प्रकाश करलऽ जाय छै । अंधकार में दरिद्रता आरो प्रकाश में लक्ष्मी केरऽ वास मानलऽ गेलऽ छै । जे घरऽ में अंधकार ज्यादा होय छै वू घरऽ में धन केरऽ प्रवाह रूकी जाय छै । ऐहे से सांझ होते ही घरऽ में दीया जलाबे केरऽ नियम बनल छै ।
118- लक्ष्मी के साथ गणेश केरऽ पूजा अति शुभ मानलऽ गेलऽ छै ।
दीपावली में लक्ष्मी के साथ गणेश केरऽ पूजा अति शुभ मानलऽ गेलऽ छै । लक्ष्मी जी केरऽ साथ श्री विष्णु जी केरऽ पूजा होना चाहीवऽ । लेकिन दीपावली में माय लक्ष्मी के साथ गणेश जी केरऽ पूजा करलऽ जाय छै । धन केरऽ देवी लक्ष्मी छथिना जे धन समृद्धि प्रदान करे छथिन । लेकिन बिना बुद्धि केरऽ धन समृद्धि व्यर्थ छै । एकरऽ पीछु मुख्य कारण छै कि भगवान श्री गणेश समस्त विघ्नऽ के टारे वाला छथिन । दया आरेा कृपा केरऽ महासागर भी छथिन । तीनों लोक केरऽ कल्याण करे वाला भगवान गणपति सब प्रकार से योग्य छथिन । सब विघ्न- बाधा के दूर करे वाला गणेश विनायक छथिन । बुद्धि प्राप्ति के लेलऽ गणेश केरऽ पूजा करे केरऽ विधान छै । गणेश जी सब तरह केरऽ सिद्धि दै वाला देवता मानलऽ गेलऽ छथिन । काहे कि सब तरह केरऽ सिद्धि भगवान गणेश में वास करे छै । ऐहे से लक्ष्मी जी केरऽ साथ गणेश जी केरऽ आराधना जरूरी छै । भगवान विष्णु ने स्वयं गणेश जी के वरदान देलऽ छथिन ।
सर्वाग्रे तव पूजा चमया दत्ता सुरोतम ।
सर्व पूज्यश्रव योगीन्द्रो भव वत्से त्युवाच तम् ।।
अर्थात- सुरे श्रेष्ठ मैंने सबसे पहले तुम्हारी पूजा की है ।
अतः- वत्स ? तुम सर्व पूज्य तथा योगीन्द्र हो जाओ ।।
शिव जी अपनऽ पुत्र के आशीर्वाद देलथीन कि तोरो पूजा करलऽ बिना शुभ काम करे केरऽ अनुष्ठान करते, ओकरऽ मंगल भी अमंगल में बदली जेते, जे लोग फल केरऽ कामना से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र चाहे कोय देवता के भी पूजा करते आरेा तोरो पूजा नांय करते, ओकरा तोहें विघ्न के द्वारा बाधा पहुंचाय दिहें । ऐ हे सब कारणऽ से माय लक्ष्मी के साथ गणेश जी केरऽ पूजा करे केरऽ विधान छै । लक्ष्मी प्राप्ति केरऽ बाद ओकरा स्थिर करे के लेलऽ बुद्धि केरऽ जरूरत होय छै । लक्ष्मी के साथ गणेश केरऽ पूजा के संबंध में बहुत कथा यहाँ देलऽ गेलऽ छै । विष्णु धाम मे भगवान विष्णु आरो माता लक्ष्मी विराजमान होय के आपस में बात करी रहलऽ छेली । बातऽ बातऽ में लक्ष्मी घमंड से बोली उठली कि हम्में सभे लोकऽ में सबसे ज्यादे पूजनीय छी । आरो सबसे श्रेष्ठ भी छी । लक्ष्मी जी के ई तरह के अपनऽ घमंड केरऽ प्रशंसा करते देखी के भगवान विष्णु जी के अच्छा नांय लागल्हेन । हुन्कऽ घमंड दूर करे के लेलऽ भगवान विष्णु कहलका, तोहें सब तरह से सम्पन्न होते होलऽ भी आज तक माय केरऽ सुख प्राप्त नांय करे ले पारल्हे । ई सुनी के लक्ष्मी जी बहुत दुखी होय गेली । आरो अपनऽ पीड़ा सुनावे के लेलऽ, माता पार्वती के पास गेली आरो हुन्का से प्रार्थना करलकी । पार्वती जी से गणेश अपनऽ पुत्र कातिर्मकेय या गणेश में से कोय एक पुत्र दत्तक पुत्र के रूपऽ में दान करी के लक्ष्मी जी के दान करी दें । लक्ष्मी जी केरऽ पीड़ा देखी के माता पार्वती जी गणेश जी के लक्ष्मी जी के दत्तक पुत्र (पोस पुत्र) केरऽ रूपऽ में दै ले स्वीकार करी लेलकी । पार्वती जी से गणेश जी के पुत्र केरऽ रूप में पाप के लक्ष्मी जी खुशी होते होलऽ कहलकी, हम्में अपनऽ सभे सिद्धि, सुख अपनऽ पुत्र गणेश के प्रदान करे छी एकरऽ साथ- साथ हम्में हमरऽ पुत्री समान प्रिय रिद्धि आरो सिद्धि जे ब्रह्मा जी केरऽ बेटी छिकी, हुन्का से गणेश जी केरऽ बीहा करावे केरऽ बचन भ्ीा दे छी । ई सम्पूर्ण त्रिलोक में जे आदमी, श्री गणेश जी केरऽ पूजा नांय करतऽ हुन्कऽ निन्दा करतऽ, हम्में ओकरा से कोसों दूर रहबै । जब भी हमरऽ पूजा होते, ओकरा सत्य ही गणेश जी केरऽ पूजा होते । लक्ष्मी जी केरऽ आदेश छिकैं ।
119- धन्वंतरि केरऽ पूजा
धनतेरस में भगवान धन्वंतरि केरऽ पूजा करलऽ जाय छै । समुद्र मंथन में नारायण केरऽ अंश के रूप में अमृत कलश लै के प्रकट होलऽ छेलात । वू सब वेद केरऽ ज्ञाता गुरूड़ केरऽ शिष्य आरो भगवान शंकर केरऽ उप शिष्य छिका । समूचा जगत के निरोगकरी के मानव समुदाय के दीर्घायु रखै केरऽ शक्ति हुन्का पास छै । विष्णु पुराणऽ के अनुसार धनवंतरि से रहित सब शास्त्र केरऽ ज्ञान छैन । अकाल मृत्यु से बचे के लेलऽ यमदीया जरूर निकालना चाहीव । यमदीया जलाबे से यमराज खुश होय छथ । आरो सब परिवार के स्वस्थ आरोग्य केरऽ प्राप्ति होय छै । यमदीप्त माटी चाहे आय केरऽ बने छै । लाल कपड़ा केर बत्ती बनाय के सरसों या करंज तैल भरी के जलैलऽ जाय छै । दीया निकाले से पहिले एकरऽ पूजा करऽ । निकाले से पहिले पूरे घरऽ में घुमैलऽ जाय छै । ताकि सब दुख, बलाय, दरिद्रा बाहर निकली जाय । आरो लक्ष्मी माता केरऽ वास होवे । धनतेरस में धातु खरीदे केरऽ विशेष महत्व छै । काहे कि, धातु शुद्ध हेाय छै । नया बर्तन के खाली नांय रक्खऽ एकरा में फल- मिठाय से भरी देना चाहीवऽ । वर्तन पर स्वस्तिक चिन्ह बनाय के, धूप, दीप, अक्षत से पूजा करे से घरऽ में समृद्धि आरो आरोग्य केरऽ प्रवेश होय छै । साथ में एन्हऽ भी मानलऽ जाय छै कि ई शुभ मुहुर्त में धातु किने से परिवारऽ में धन केरऽ कमी नांय होय छे । आरो खुशिहाली बनलऽ रहे छै । कार्तिक महीना केरऽ कृष्ण पक्ष त्रयोदशी के धन तेरस होय छै । ई त्योहार दीपावली आबे केरऽ सूचना दै छै । ई दिन नया बर्तन किनना शुभ मानलऽ जाय छै । धनतेरस के दिन मृत्यु केरऽ देवता यमराज आरो भगवान धन्वंतरि पूजा केरऽ महत्व छै ।
120- श्री राम आरो रावण
जबे राम आरेा रावण में युद्ध चली रहलऽ छेले, जहाँ तक ओर राक्षस सेना दलबल के साथ, श्री रामकेरऽ वानर सेना पर बुरी तरह से हमला करी रहलऽ छेले । दोसरऽ तरफ से लक्ष्मण आरो हनुमान केरऽ युद्ध कौशल देखते बनी रहलऽ छेले । धर्म युद्ध में राम केरऽ सेवा लगातार राक्षस सेना के पीछु हटाय में लाचार करी रहलऽ छेले । राक्षस वानर केरऽ उत्पात से डरी के वापस लंका भागी गेलऽ । ई युद्ध में रावण केरऽ कत्ते भाय, पुत्र, बंधु बांधव आरो प्रिय योद्धा मारलऽ गेलऽ । फेरू वू दिन भी आलऽ जबे रावण केरऽ पुत्र मेघनाद युद्ध भूमि में अहंकार के साथ पहुँचला । रावण केरऽ सबसे प्रिय पुत्र छेलऽ । वू परमवीर, विद्वान आरो रण कौशल में पारंगत होय के साथ- साथ बहुत पितृ भक्त भी छेलऽ । जबे लक्ष्मण के मारै ले मेघनाद ने अपनऽ सबसे अमोध ब्रह्म, पाशुयत आरो विष्णु शस्त्र चलालकऽ सब लक्ष्मण केरऽ सम्मान में बेकार (निस्तेज) होय के विलीन लक्ष्मण केरऽ शक्ति केरऽ ख्याल होते, मेघनाद वहाँ से भागलऽ । सीधे रावण के पास पहुंचलऽ । पिताश्री ? अपनऽ युद्धानुभव से हमरा ज्ञान होलऽ कि श्री राम आरो लक्ष्मण भगवान केरऽ रूप छिका । ऐसे से तोहें लंका आरो प्रजा केरऽ कल्याण के वास्ते माता सीता के श्री राम के सौंपी दे । पुत्र केरऽ बात सुनी के रावण क्रोध से तमतमाय उठलऽ । मेघनाथ के कायर कही के युद्ध से डरी के भागे केरऽ आरेल लगालकऽ मेघनाथ बोललऽ हम्में श्रीराम के तरह पिता केरऽ वचन निर्वाह हेतु लक्ष्मण से युद्ध करते होलऽ वीरगति के होय जाबऽ, लेकिन कायर कहाय के जीना पसंद नांय करबऽ ।
121- हमेश प्रसन्न रहे ले योग करऽ
परमात्मा जबे जन्म दै छथिन, ते ओकरा साथ प्रसन्न रहे केरऽ सब संभावना के छोड़े छथिन । मनुष्य शरीर केरऽ गठन बाहर आरो भीतर से जेन्हऽ करलऽ छै कि ओकरा खुश रहना चाहीव । फेरू हम्में उदास काहे रहे दिये ? असल में उदासी हमरऽ भीतर से आबै छै । आरो खुशी मौलिक रूपऽ में मौजूद छै । चूंकि हम्में सावधान नांय रहे छिये । ऐसे से बाहर से ऐलऽ उदासी हाबी होय जाय छै । बहुत गहराई में नांय जाय ते हमरा पास पाँच ज्ञानेन्द्रियां, पांच कर्मेन्द्रियां आरेा पंचतत्व होय छै । ई पन्द्रह चीज हमरा खुशी दे के लेलऽ ही छै । ई सब के साथ एक सोलहवीं चीज छै मन । वैसे शास्त्र में एकरा से आगे तक केरऽ वर्णन छै । लेकिन हमरा सामान्य लोगऽ के ई सोलहवीं स्थिति पर काम करी लेना चाहीव। मन छिके उदासी केरऽ केन्द्र, रोग के इलाज केरऽ पहिले डॉक्टर पैथालॉजी केरऽ टेस्ट कराबे छै । जेकरा से पता चले छै कि बिमारी केरऽ जड़ कहाँ छै ? मन उदासी, दुख, परेशानी, निराशा, चिड़चिड़ापन, बेचैनी, हताशा, थकान आरो चिन्ता केरऽ घऽर छै । जे पन्द्रहो साधनऽ के मटिया मेट करी दै छै, नियंत्रण केवल योग से होय सके छै । मानवता अगर ऐत्ते उदास होय जाते ते प्रकृति ओकरऽ साथ कैसे देतै ? ऐ हे से योग करना एक पात्र के हाथ में लेबे जेन्हऽ छै । पात्र केरऽ ढक्कन खुललऽ छै । प्रसन्नता बरसी रहलऽ छै । तोहें भरी ले । जों ढक्कन बंद छै, या पात्र उलटा छै, ते प्रसन्नता बरसते परंतु खुशियाँ जमा नांय करे ले पारमऽ पात्र के खुला राखऽ आरो दोनों हाथऽ से खुशियाँ समेटी ले । एकरा लेलऽ चौबीस घंटा में कुछ समय योग जरूर करऽ । जों हनुमान चालीसा से सम्पर्क करी लेलऽ जाय ते फेरू प्रसन्न रहना आरो आसान होय जाने काहे कि हनुमान जी से बोड़ऽ कोय योगी नांय छै ।
122- शिव केरऽ महिमा
श्रद्धा, भक्ति आरो उल्लास केरऽ महीना सावन शुरू होय गेलऽ छै । सावन महीना में शिव केरऽ विशेष महत्व छै । सावन केरऽ महीना में साक्षात शिव संग जोड़े वाला महीना छिके । पूरा प्रकृति शिवमय होय जाय छै । सावन में झिमिर- झिमिर पानी, हवा के संग झुमते- नाचते करिया बादल, बिजले केरऽ चमक करजते बादल एन्हऽ लागे छै जेरऽ आरती होय रहलऽ छै । नगाड़ा बाजी रहलऽ छै । प्रकृति परमेश्वर केरऽ अराधना करी रहलऽ छै । शिव पूजा केरऽ अर्थ ही होय छै, प्रकृति आरो परमेश्वर केरऽ पूजा । अराधऽ सावन के महीना में जड़ चेतना सब शिवमय होय जाय छै । जबे समुद्र मंथन होलऽ छेले, ओकरा में से चौदह रत्न निकलऽ छेले, तेरह रत्न देवता आरो असुर बांटी लेलकऽ, लेकिन समुद्र मंथन में जहर भी निकललऽ छेले, जहर के जन हितकारी भोलेनाथ ही पीलऽ छेलाता जहर पीये से भगवान शंकर के गरमी होय ला गल्हेंन, हुन्कऽ गरमी शान्त करे वास्ते सब देवता जल से अभिषेक करे लागला । वू समय सावन महीन चली रहलऽ छेले । ऐसे से सावन महीना में भोले नाथ जल चढ़ाबे केरऽ महत्व छै । सब गाछ- बिरिछ, जीव जन्तु, पशु- पक्षी, नदी पहाड़, जेठ बैशाख केरऽ गरमी से व्याकुल तपलऽ धरती सावन के आबे से सब केरऽ आत्मा तृप्ति होय जाय छै । सावन महीना में लिंग पूजा केरऽ बहुत बोड़ऽ महात्तम छै । सावन महीना में भोलेनाथ केरऽ शिवा भिषेक, रूद्राभिषेक करलऽ जाय छै । ताकि भोलेनाथ केरऽ कृपा भक्तऽ पर सदा बनलऽ रहे । शिवलिंग परतीक छै विश्व ब्रह्मांड में जेकरऽ कण- कण में भगवान शिव केरऽ वास रहे छै । शिव पर शुद्ध जल, गंगा ज, दूध, दही, घी, मधुरस, भंग घोल, बेल पत्र, आक धतूरा केरऽ फूल विशेष रूपऽ से चढ़ैलऽ जाय छै । शिवलिंग में दही, दूध, घी, गंगाजल से अभिषेक के रै केरऽ अर्थ होय छै, हम्में अपनऽ धरती माय के परिपुष्ट करे छियै । हमरा सब के ऐहे संदेश मिले छै कि हम्में गाय, गंगा आरो प्रकृति के प्रति सदा समरपन भाव रखिये । साथऽ में हम्ममें अपनऽ मन में वेहे निर्मल द्रव्य जेन्हऽ पवित्र बने ये । शिव केरऽ अर्थ छै शिव केरऽ अर्थ छै कलापकारी, जे सदा अपनऽ भक्त के कल्याण ही करे छथिन । गांव शहर में ही नांय, देश में जगह- जगह भगवान भोले नाथ केरऽ मंदिर छै । दर्शन करे ले लोग जाय छै । काशी में विश्वनाथ, उज्जैन में महा कालेश्वर, गुजरात में सोमनाथ, दक्षिण में रामेश्वरम् बिहार में वैद्यनाथ धाम छै । सावन में सब जगह भक्तऽ केरऽ भीड़ लगी जाय छै । गेरूवा वस्त्र में कामरिया जल लै के कीर्तन भजन करते मंदिर जाय छे । देखी के मन आनन्द होय छै ।
123- परंपरा आरो संस्कार
आज काल केरऽ नई पीढ़ी केरऽ बच्चा से राष्ट्रीयता, नैतिकता, परिवार या धर्म केरऽ बात करलऽ जाय ते वू कुछ सवाल हमरो तरफ उछाले छै । जब बच्चा ई बातऽ पर प्रश्न उठाबे छै ते सावधानी से उत्तर दहऽ । परंपरा, संस्कार आरो मूल्य ई तीनों शब्द बच्चा के भारी लगे छै । लेकिन गहराई से देखऽ ते जीवन के लेलऽ तीन सरल स्थितियाँ आरो सफलता प्राप्त करे केरऽ तीन सहज साधन छै । परंपरा परिवर्तित होते रहे छै । संस्कार के निर्माण करै ले पड़े छै । आरो मूल्य स्थाई होय छै । जैसे अगरबत्ती जलैलऽ जाय ते परंपरा के रूप में ई पूजा केरऽ क्रिया छै । ओकरऽ सुगंध संस्कार छै आरो जों जलाबे केरऽ तर्क समझ में आबी जाय ते मूल्य शुरू होय जाय छै । परंपरा में तोरा पास ज्ञान होना चाहीव । फेरू तोहें प्रयास करे छऽ । जेत्ते ज्यादा संसारऽ में उतरते परंपरा, प्रयास सब भी ओतने ही काम ऐत्ते । केवल संसार केरऽ खोज आशान्ति देते । थोड़ऽ- थोड़ऽ खोज अपने भी करऽ । काहे कि स्वयं केरऽ खोज के बाद ही परमात्मा केरऽ खोज होय छै । अपनऽ खोज में ध्यान काम आबे छै । आरो ध्यान संस्कार से मिले छै । पहिला परिश्रम, दोसरऽ होले पुरूषार्थ, ध्यान एक पुरूषार्थ छै । परिश्रम जबे अपनऽ खोज में लगी जाय छै ते वही परिश्रम पुरूषार्थ बनी जाय छै । तीसरा चरण छै मूल्य । ध्यान के बाद जाबे छै समाधि आरो मूल्य एक प्रकार केरऽ समाधि छै । ओकरऽ प्रतीक परंपरा प्रयास छै । संस्कार पुरूषार्थ छै आरो मूल्य प्रतीक छै । जे हम्में या कोय भी व्यक्ति, वस्तुय स्थिति के अच्छा सही आरो महत्वपूर्ण होवे से जोड़े छिये । ई कमी नांय बदलते, संसार पाबऽ ज्ञान से, स्वयं केरऽ खोज ध्यान से आरो परमात्मा ।
124- आत्मा केरऽ योगदान
कोय चील केरऽ मुंह में बोटी या कोय चिडि़या केरऽ मुंहऽ में रोटी होवे आवे ओकरा उड़ते होलेऽ देखे ते लागे छै, ई बहुत दूर जाय रहलऽ छै । बस मनुष्य केरऽ भाग्य ऐह रंऽ होय गेलऽ छै । कभी- कभी ते लागे छै, कौन उड़ाय लै जाय रहलऽ छै, हमरऽ भाग्य के हमरा से? खूब प्रयास करै छिये कोय कसर नांय छोड़े छिये, योगा भी करे छिये । फिर भी काहे नांय मिले छै जे मिलना चाहीव । जबे एन्हऽ लागे छै, तबे हम्में निराश हुवे लागे छिये । एक बारीक कारण देखऽ ते पाभऽ ई समय हम्में सब बहुत ज्यादे भागै लागलऽ छिपै । भागते- भागते भी सब केरऽ इच्छा होय छै छलांग लगाबे केरऽ कुछ ते हमेशा उड़े केरऽ कोशिश में रहे छै, ई जे तेजी छै, अशांत करी के ही छोड़ते । मतलब ई नांय कि रूकी जाये या धीमऽ गति से चलै लागीय । मतलब एतना ही छै कि कुछ पड़ाव आरो जे अंतिम लक्ष्य छै, वहाँ थोड़ऽ विराम लै केरऽ वृत्ति बनाबऽ रूके- केरऽ वू स्थान कोय मंदिर होय सके छै । एकरऽ बाद चलभऽ ते तोरऽ चाल में तेजी ते होते, लेकिन अशांति नांय होते । केवल शरीर आरो मन से संचालित लक्ष्य केरऽ यात्र या कहऽ कि तोरऽ कैरिअर ई समय शरीर आरो मनऽ से जोड़लऽ होलऽ छै । एकरा कहीं न कहीं आत्मा से जोड़ऽ जैसे ही आत्मा केरऽ स्पर्श मिलते वू तोरा कुछ पड़ाव पर रूकै केरऽ समझाइश देतै । आरो जे लोग ध्यान योग करते होलऽ अपनऽ आत्मा से जुड़ते वू लक्ष्य पर पहुंची के आराम करना भी सिखी जेते । लोग लक्ष्य पर पहुंची के भी आदत नांय बदली रहलऽ छै । एकरे नतीजा छै सब कुछ मिलला के बाद भी अशांति । लक्ष्य केरऽ तरफ बढ़ते होलऽ शरीर आरो मनऽ से ज्यादे योगदान अपनऽ आत्मा के भी रखऽ फेरू देखऽ जे मिलथोंऽ वू अलग ही आनन्द दै के जैथों ।
125- मौन साधना
बरसते पानी में यदि छाता केरऽ डंटी कोय दोसरे पकड़ते, तोरा भींजना ते जरूरी छोंग छाता वेहे पकरी सके छै जे भींगे से बचे के लेलऽ उपयोग करना चाहे छै । एन्हऽ जिन्दगी में कै बार हम्में अपनऽ बचाव या सुरक्षा केर प्रमुख साधन केरऽ कमान दोसरा के सौंपी दै छिये । आरो परेशान होय छिये । दोसरा के हम्में की, आरो केतना देबा छै, एकरऽ समझ ध्यान में रखऽ । ऐहे समझ केरऽ कमी के कारण हम्में महत्वपूर्ण चीज दोसरा के पकड़ाय दै छिये । जैसे प्रभावी शब्द, हम्में अपनऽ कई महत्वपूर्ण शब्द दोसरा पर खर्च करी दै छिये । दिन भर में हम्में अपन पराया कत्ते लोगऽ से मिले छिये । आरो एतना बोलते रहे छिये, अपनऽ शब्दऽ के बेकार फेंकते रहै छिये । हम्में अपनऽ ऊर्जा के भी चूसी के बाहर करी रहलऽ छिये । ई ऊर्जा कहीं आरो काम आय सके छै । थोड़ऽ विचार करऽ कि शब्द बाहर काहे फेंकी रहलऽ छिये ? बोलला के बाद कार्य छै कि नांय बोलत लिये ते ठीक छेले । दर असल, जबे भी तर बिचार केरऽ हल्ला होय छै ते बिकार भड़ भड़ करते तोरऽ शब्दऽ के धक्का दै छै आरो ई तरह निकललऽ शब्द अर्थ हीन बकवास बनी जाय छै । संभव छै अनर्थ भी पैदा करी दै । भीतर केरऽ बिचार, ओकरऽ हल्ला रोकना होयते मौन साधना करे ले पड़ते, जैसे ही मनऽ केरऽ बात आबे छै, लोग ठोर बंद करी लै छै । लेकिन ई मौन नांय, ई ते चुप्पी छै । चुप्पी से कुछ हासिल नांय होते हासिल होते मौन से आरो मौन तबे घटे छै जबे तोहें स्वयं से भी बात करना बंद करी दै छऽ । जैसे ही तोहें मौन साधल्हऽ, विचार विदा होय जेत्ते । आरो एकरऽ बाद जे शब्द होते वू अद्भूत प्रभाव शाली होय के तोरऽ ऊर्जा के बढ़ाबे वाला होते ।
126- भगवान गणेश से बोड़ऽ कोय गुरू नांय छै ।
सब विघ्न के हरे वाला आरो रिद्धि- सिद्ध, बुद्धि के दै वाला गणेश केरऽ अनुष्ठान करलऽ जाय छै । चाहे कोनऽ देवता या कोय शुभ काम करे से पीहले गणेश केरऽ पूजा अर्चना करलऽ जाय छै । गणेश केरऽ अर्थ होय छै समूह आरो ईस केरऽ अर्थ होय छै स्वामी । मतलब सब जीव जगत केरऽ मालिक गणेश कहाबे छथिन । माता पार्वती अपनऽ देहऽ से उबटन सरिखे मैल निकाली के एकरा बेटा बनाय लेलकी, आरो ओकरा में प्राण दे देलकी । ओकरा गणेश केरऽ रूप में द्वारी पर बैठाय देलकी । कहलकी हम्में नहाय ले जाय छी केकरो भीतर नांय आबे ले दिहें । ऐत्तने में शिव जी कहीं से आला, आरेा भीतर जाय ले चाहलका । गणेश रास्ता रोकी के खड़ा होय गेला, तोहें भीतर नांय जाय ले पारे दऽ । माता केरऽ आदेश छै, केकरो भीतर नांय जाना छै । माता अभी नहायर हलऽ छथ । शिवजी कहलका हम्में हुन्कऽ पति छिये । गणेश टस से मस नांय होला रास्ता रोकी के खड़ा रहला । शिवजी गुस्सा में अपनऽ त्रिशूल से गणेश केरऽ गर्दन (गला) काटी देलका । भीतरा गेला, पार्वती कहलकी द्वारी पर गणेश रोकल्खो नांय । शिवजी कहलका बहुत जिद्धि लड़का छैलै, हम्में ओकरऽ त्रिशूल से गला (गर्दन) काटी देलिये । पार्वती कान्दते- चिल्लाते बाहर गेली, गणेश के गोदी उठाय के विलास करै लागली, हमरऽ बेटा के मारी देल्हे, अभी जिन्दा करी दे । भोले नाथ के चिन्ता होवे लागल्हें न ई बेटा कहाँ से आबी गेलऽ । बाहर देखऽ जेकरा पर पहला नजर पड़थोंन ओकरे गला (गर्दन) काटी के तोरऽ बेटा के गला (गर्दन) में जोड़ी के जिन्दा करी देभों । पहला नजर हाथी पर पड़लऽ । हाथी केरऽ गला (गर्दन) गणेश जी में जोड़ी देलऽ गेलऽ । वेहे दिनऽ से गजानन्द नाम पड़ी गेलऽ । भादौ शुक्ल पक्ष चतुर्थी के हिनकऽ विशेष पूजा होय छैन । अनन्त चर्तुदशी के धूम धाम से निर्सजन होय छै । सबके सुख शान्ति दै वाला देवता छथिन, भगवान गणेश में सब तरह केरऽ वरदान दै केरऽ छमता छैन । विद्या- बुद्धि केरऽ दाता छथिन । आगे रहना छै ते गणेश केरऽ पूजा करना चाहीवऽ । सब देवता से अलग रंग रूप बुद्धि केरऽ ज्ञाता छथिन । हिनक शरीर से कुछ- कुछ शिक्षा मिले छै । लम्बा सूंढ- ई बताबे छै कोय दुःख विपत्त में केतनो बाधा आबे घबड़ावे ले नांय छे ।
बड़का पेट- लम्बोदर महाराज केरऽ पेट सीख दै छै, दोसरा केरऽ पेट भरे से अपनऽ पेट अपने आप भरी जाय छै । मतलब भेले दोसरा के सुख पहुंचा वाला के गणेश जी अपनऽ पेट सरिखे बढ़ोत्तरी दै छथिन । अपनऽ अपमान पचाबै केरऽ छमता गणेश जी केरऽ पेटऽ से मिले छै

माथा पर चन्द्रमा – गणपति महाराज केरऽ माथा पर चन्द्रमा रहे छैन, चन्द्र माई सीख दै छै मस्तिष्क के हमेशा ठंढा रखऽ गुस्सा नांय करऽ गुस्सा से अपने नुकसान छै ।
दांत – गणेश महाराज के एकेरा दांत छैन, दांत सीख दै छै, जेतना छै ओतने में संतोष करऽ ।
मूसऽ – गणेश जी केरऽ सवारी छिके मूसऽ, मूसऽ से सीख मिले छै, आगु बढ़ै ले बुद्धि केरऽ जरूरत होय छै । ताकत से दुनियां मे आगु नांय बढ़लऽ जाय सके छै ।
सूप सन कान – सूप सन कान सीख दै छै, अपनऽ बड़ऽ केरऽ बात सुने ले अपनऽ कान सूप सन बढ़ाय ले, गुरू केरऽ बात कानऽ से सुनी के हृदय में उतारी ले ।
लड्डु – गणेश जी केरऽ लड्डू सिखाबै छै, हमेशा लड्डू जेन्हऽ मिठ्ठऽ बोलऽ अपनऽ दुश्कन से भी कड़वा नांय बोलऽ ।
भूजा – गणेश जी केरऽ चार भूजा सीख दै छै, कमाबऽ दोनों हाथऽ से दान करऽ चारो तरफ से । हमेशा अपनऽ हाथ से शुभक काम करऽ ।
लाल ओढ़ना – गणेश जी केरऽ लाल ओढ़ना से प्रेरणा मिले छै, हमेशा ऊर्जावान बनलऽ रहऽ आलस करे वाला के दुनियां में कुच्छु नांय मिले छै ।
दुभी – गणेश जी के दुभी बहुत पसंद छैन, दुभी प्रेम केरऽ प्रतीक छै दुभी से सीख मिले छै प्रेम कई से प्रेम मिले छै ।
127- संघर्ष में धैर्य रखना
जबे अपनऽ से संघर्ष करे ले पड़े ते सब से बोड़ऽ ताकत होय छै आंतरिक प्रसन्नता । अपनऽ संघर्ष में अच्छा अच्छा आदमी टुटी जाय छै । एकरा लेलऽ पहिले ताकत जुटाबऽ आंतरिक प्रसन्नता के रूपऽ में । भीतर से खूब प्रसन्न रहऽ । शायद स्वजन शत्रु में नांय बदले, आय के तोरा से दोस्ती जोड़ी सके छै । जानवरऽ में सब से ज्यादा डऽर लागे छै सांपऽ से । कोय हिंसक जानवर मनुष्य कै ऐतना भयभीत नांय करते, एकरऽ कारण छै सांप केरऽ अज्ञात उपस्थिति आरो दोसरऽ ओकरऽ जहरीला होना । सपना में शेर आ जाय ते नींद खुलला पर ज्यादा विचार नांय आते, लेकिन सांप आ जाय ते बहुत देर तक मनऽ में पता नांय की – की चलते रहे छै । अपनऽ से संघर्ष भी ऐहे रंऽग होय छै, ऐहे से कहलऽ गेलऽ छै आस्तीन केरऽ सांप से सावधान रहऽ । ऐसे सांप के शिवजी से जोड़ी दै ते अर्थ बदली जाय छै । सांप एक बहुत बोड़ऽ संदेश दै छै कि बिषपान केरऽ जेरऽग शिवजी ने करलऽ छलाता विषपान यानि विपरीत परिस्थिति में, संघर्ष में धैर्य रखऽ । जबे अपनऽ से आहत होय जाय ते लड़खड़ै हऽ नांय । वर्तमान परिस्थिति प्रतिकूल हेाय जाय ते, भविष्य के प्रति धैर्य रखिहऽ । ई प्रकार से विषपान धैर्य, निर्भयता ई सब सिखाबै छै । सांपऽ से एक बोड़ऽ शिक्षा भी मिले छै कि एकरऽ मौजुदगी जों शिव केरऽ पास छै वू पुजनीय छै आरो यदि जंगल (वनऽ) में छै ते हिंसक छै आरो लोग ओकरा मारी दै छै । हमरा पास शिव के उपस्थिति केरऽ मतलब ऐहे छै कि हम्में विष के स्वीकार करीयै । आरो एकरा स्वीकारोक्ति से जीवन में भगवत्ता उतरते, परमात्मा केरऽ स्वाद उतरते, ध्यान रखिहऽ जेकरा पास विषपान केरऽ स्वीकृति छै ओकरा से बड़ऽ पराक्रमी आरो निर्भय कोय नांय हो सकै छै ।
128- रिश्ता
एक दिन बिहाने- बिहाने कै सालऽ के बाद देखलिये ओकरा सामने वाला छतऽ पर वू कत्ते गेलऽ छेली या हालात बदली गेलऽ छेले । देखी के- मुस्करैलकी लागले जेना बात करती, लेकिन अपनऽ कामऽ में लागी गेली, कुछ देरी के बाद वहाँ से ओझल होय गेली, मनऽ में ओकरे बात घुरी रहलऽ छेले । वू बचपन वाली दोस्ती, वू साथ, रूसना आरो मनाना । जब से होश सम्भार लिये हमेशा साथे रहे छेलिये । साथ पढ़ना, साथ खेलना आधऽ समय ओकरे घर रहे छेलिये । आरेा समय वू हमरा घऽर रहे छेली । घर वाला मजाक में कहबो करे छेले, दोनों साथ- साथ रहे छें ? कहें ते बीहा करी दियो ? बीहा केर? नाम सुनतें हंसी पड़े छेलिये, फेरू जैसे- तैसे उमर बढ़ै लागले, मिलना कम दुबे लागले । बाद में देखना भी बन्द होय गेले । एक अनचाही दूरी आप गेलऽ छै हमरा दोनों के बीचऽ में लेकिन हमरा मनऽ में अभियो ओकरा लेलऽ वेहे जग्घ छै । कुछ छेले जे हम्में ओकरा बताना चाहे छेलिये । लेकिन बतावे नांय पार लिये । समय अपनऽ रफ्रतार से बढ़ी छेले । एक दिन जैस हीं आफिस घऽर पहुंचलिये, माय खुशी होलऽ एकरा कार्ड (नेउता) हाथ में थम्हाय देलकी आरो कहलकी सामने वाली लवली केरऽ बीहा केरऽ नेउता कार्ड छिके । पन्द्रह दिनऽ के बाद बीहा छै ओकरऽ । चचा जी कुछ देर पहिले कार्ड दै के गेलऽ छै । आरो तोरा से कुछ छै चलऽ जैहें । घरऽ में कुछ कास होथ्हेंन । माय ई सब बतांते होलऽ बड़ी खुश छेली । आरो हम्में हताश होय गेलां । दिलऽ केरऽ बात बताबे में कुछ ज्यादे देर करी देलिये । चचा केरऽ घरऽ पर गेलिये हुन्ही एकरा लम्बा लिस्ट बनाय के रखलऽ छेलात । बीहा वाला सब खरीद- बिक्री करी के लै आबऽ । हम्में मनऽ से या बेमनऽ से पता नांय ई सब के लेलऽ तैयार होय गेलिये । लड़का अच्छा परिवार केरऽ छेल । खुद केरऽ बिजनेस छेले ओकरऽ । चचा जी ने फोटो देखैलके । देखै में हमरा से ते बढि़यें छेले । हम्में चाहे छलिये कि लवली हमेशा खुश रहे, पर केकरो दोसरा करे साथ, ई नांय सोचलऽ छेलिये । ओकरऽ बीहा होय गेले, फेरू कोय खोज- खबर नांय । हम्में भी ओकरा लगभग भूलिये गेलऽ छेलिये । कुछ दिनऽ के बाद बीच बाजार में ओकरा से सामना भेले, हाय- हैलनों के बाद, अचानक पांछु से सात – आठ साल केरऽ बच्चा भागते होलऽ ऐ ले । आरो गुस्सा में माय से बोलले, तोहें कहां चलऽ गेलऽ छेल्हीं ? लवली ने ओकरा से परिचय कराते होलऽ कहलकी, ई हमरऽ बेटा अभि छै । हम्में खामोश छेलिये । बच्चा के तरफ मुड़ी के कहलकी, ई तोरऽ मामा छवऽ । वू समय पल भर के लेलऽ दुनियां रूकी गेलऽ छेले । वू काबे गेली पता नांय चलले । हुन्हीं अपनऽ सच कहलकी, हम्में अपनऽ सच समेटी के नया रास्ता पर चली देलिये ।
129- हमर जीवन के राखै वाला हेलमेट ।
जिन्दगी में सही सलामत राखे वास्ते संसार सभे काम करे छै, सब से अनमोल हमरऽ माथऽ (सिर) छै । समूचा शरीर के सुन्दर संचालन करे छै आदमी केर । आदमी केरऽ एतना प्रमुख अंग छै, शरीर केरऽ सब अंग से माथऽ कमजोर भी छै । जिन्दगी केरऽ देख- रेख सजावे- संवावरे से पहिले अपनऽ माथऽ केरऽ सुरक्षा आरेा देख रेख सबसे जरूरी छै । जिन्दगी में आबे जाय (यातायात) केरऽ ओतने महत्व छै । आबे जाय केरऽ रफ्रतार दिन रात सुरसा केरऽ मुंह बराबर बढ़ते रहे छै । जैसे- जैसे आवे जाय केरऽ साधन बढ़ी रहलऽ छै, आदमी केरऽ जिन्दगी कम होते जाय रहलऽ छै । सावधानी केरऽ सबसे बोड़ऽ नांव छिकै हेलमेट ई माथा केरऽ मुकुट छिकै । जे जिन्दगी केरऽ रखवाला छै । सड़ दुर्घना में होय वाला बस से ज्यादे मौम माथऽ में चोट लागे से होय छै हेलमेट हमरा मौत से बचाबै छै आरो भी बहुत फैदा छे, एकरा पिन्हे से चेहरा, आंख, अंधड़, झक्कर, हवा, कीड़ा मकोड़ा, धूल गरदा, पानी सर्दी- गर्मी ठंढ से भी बचावे छै । चेहरा मोहरा भी हेलमेट लगाबे से साफ सुथरा सुरक्षित निरोग रहे छै । सबसे ज्यादा माथा केरऽ रक्षा करे छै । थोड़ऽ सन लापरवाही करे से जिन्दगी गंवाना अच्छा बात छै ? ई जिन्दगी दुबारा मिले वाला नांय छै । सड़क पार आबे जाय केरऽ नियम पालन करना बहुत जरूरी छै । सरकार कभी कभी (यातायात) पुलिस के साथ मिली के सड़क सुरक्षा सप्ताह भी मनाबे छै । यातायात पुलिस भी अपनऽ कर्त्तव्य देखे छै । आरो सड़क केरऽ नियम सबके समझावे छै । बैनर, पोस्टर, टी बी, रेडियो आरो फिल्म, विज्ञापन से जनता केरऽ सुरक्षा फैदा गिनाबे छै । सड़क सुरक्षा केर आधार हेलमेट लगाबे के लेलऽ सरकार हमेशा चेताबे छै । जबे जनता सरकार केरऽ बात नांय माने छै, तबे जोर- जुर्माना भी लगाबे छै । सीधा ओंगरी से घी नांय निकले छै, तबे ओंगरी टेढहऽ करे पड़े छै । सरकार के हेलमेट सब के लेलऽ अनिवार्य घोषित करी देना चाहीव । गाड़ी खरीदे (किने) केरऽ ताकत छै, हेलमेट किने में कत्ते खरचा होय छै । गाड़ी के साथ साथ हेलमेट भी किनी लै, जेकरा से जीवन सुरक्षित रहतै ।
130- माँ (माय)
एक दिन सांझ के समय ओसरा पर बैठी के सामने बच्चा सबके खेलते देखी रहलऽ छेलिये । ओकरा में एक बच्चा केरऽ नाम गुड्डू छेले, माय के आते देखी के खेल छोड़ी के दौड़लऽ होलऽ ऐल आरेा माय से लपटाय गेल । माय भी बड़ी प्रेम से गुड्डु के गोदी में उठाय लेलकी । चुम्बा चाटी लेबे लागली । ई दृश्य देखी के नांय जाने कबे अपनऽ अतीत में डुबी गेलिये । हमरा भी अपनऽ बच्चा केरऽ एक- एक पल याद आबे लागले, मानऽ कल्हे केरऽ बात हुवे । हम्में कामऽ पर से ऐतिये आरो दोनों बच्चा हमरा में लपटाय लागे छेल । खिलौना, टॉफी के लेलऽ जिद्द करना, कहीं जाय के समय साथ जाय केरऽ जिद्द करना, आरो हम्में ओकरा समझाबै छेलिये, जल्दी आय जैबो ? तोहें कहीं नांय जैहें? वर्ष बीतते चलऽ गेले हमरा ई एहसा नांय होले कि दोनों बच्चा कबे बोड़ऽ होय गेले । आरो बाहर पढ़ै लै भी चलऽ गेले । मन ई मानै ले तैयार नाय छेले कि दोनों बच्चा बोड़ऽ होय चुकलऽ छै । आरो अपनऽ अच्छा बुरा समझी सके छै । हम्में अपनऽ आदत से लाचार छेलिये । रोज बिहाने बिहाने ओकरा मोबाइल से फोन करी के उठे से लै के खाना खाय कालेज जाय तक याद दिलाते रहे छेलिये । टोकते समझाते रहे छेलिये । हालांकि बच्चा के एकरऽ जरूरत नांय छेले । फिर भी लागे छेले कहीं भूखलऽ नांय रही जाय । कालेज केरऽ क्लास नांय छुट्टी जाय । ऐहे से हम्में फोन करते रहे छेलिये । हमरऽ पड़ोसिन मना करै छेली । मगर हम्में कहलिहों ने आदत से लाचार छेलिये । ओकरा छोटऽ- छोटऽ बाल के लेलऽ फोन करते रहे छेलिये । लागे छेले कि माय केरऽ ई जिम्मेदारी छै । बच्चा ते बच्चा ही छै । एक दिन हमरऽ बड़का बेटा जे दिलली में रहे छेले । हम्में ओकरा कही रखलऽ छेलिये, कहीं जैहे ते बताय दिहें, मन तोरे सनी पर टांगल रहे छै । लेकिन वू दिन ग्यारह बजे तक कोय फोन- तोन, नांय ऐले, हम्मे फोन करे केरऽ कोशिश करिय ते बाते नांय हुवे सके । वू रात सुते नांय सकलिये, पुरे रात थोड़ऽ थोड़ऽ देरी में फोन करते रहलिये । आरो भगवान से ओकर कुशल मंगल केरऽ प्रार्थना करते रहलिये । बिहार बहुत परेशान छेलिये कि कामऽ पर निरंग जेऐ ? की बात छै, फोन काहे नांय करी रहलऽ छै । हम्में ऐहे उधेड़ बुन में बैठलऽ छेलिये कि बेटा केरऽ फोन ऐले । हम्में ओकरा से कुछ पुछतलिये बेहे हमरा से पूछे लागले, माय रात भर में चालीस बेर फोन कथीले करलऽ छेल्हें । की होलऽ घरऽ में सब ठीक- ठाक छै न ? रात में बात नांय हुवे सकले, हम्में अपनऽ दोस्त के यहां से तीन बजे एलिये, यहाँ सब ठीक छै तो हें चिन्ता नांय करि हें । हमरा आफिस के लेलऽ देर होय रहलऽ छै, फोन रखें । ई सब बात वू एके सांसऽ में कही गेले । हम्में ई सब बात अपनऽ छोटऽ बेटा से कहलिये ते वोहऽ कही ऐलके भैया ठीके ते कहलको, ई सब सुनी के हम्में सोचे लागलिये । सचमुच बच्चा सब ऐत्ते बोड़ऽ होय गेले ? लेकिन की, कहिहों मन माने ले तैयार नांय होय छै । कभी- कभी हमरा लागे छै कि काश हम्में भी ई लोगऽ के तरह सोचे पारतिये ते हमरा भी ऐत्ते चिन्ता नांय होतिये । मगर एन्हऽ नांय होरे पारै छै । शायद औरत केरऽ ऐहे रूप केरऽ नाम छै माय (माँ)
131- समाज में बहुत बदलाव आबी गेलऽ छै ।
माय बाप बेटी के ई बताबे छै कि बेटा आरो बेटी बराबर छै, लेकिन बेटा के ई बात बताबे ले भूली जाय छै । बेटी सब के बराबरी केरऽ वास्तविक मतलब समझाबे में चुकी जाय छै, ऐहे से बीहा केरऽ बाद बराबरी केरऽ प्रवृत्ति बनी जाय छै । छोटऽ छोटऽ बात भी बोझऽ लागे लागे छै । जनानी केह छै कि सब काम हमहीं काहे करबऽ, दोसरऽ तरफ मर्दाना केरऽ साथ बोड़ऽ भेलऽ जवान लड़का कहे छै कि तोरऽ काम छिकौ, हम्में काहे मदद करबौ ? गाजियन अपनऽ बच्चा सबके सभे बातऽ से तैयार करे छै, लेकिन रिश्ता के लेलऽ ज्ञान नांय दै छै । अपनऽ जीवन में रिश्ता केरऽ अपनापन में कमी छै आरो हमरऽ सोच भी ई रिश्ता आरो सामाजिक संबंध के लै के प्रैटिक्ल होय चललऽ छै । एन्हऽ संस्कार के बीच दाम्पत्य केरऽ नया रिश्ता निभाना आरो सुदृढ़ करे के लेलऽ जे सब आरेा समझदारी केरऽ दरकार होय छै । वू गायब छै । बेटा आरो बेटी दोनों ‘‘मैं’’ आरो ‘‘मेरा’’ से आगु बढ़ी के ‘‘हमारा’’ तक कम ही सोची पावे छै । बेटा सब केरऽ परवरिश केरऽ ढंग बदले ले होते । आरो बेटी के भी कुछ परिभाषा केरऽ नया तरह से सिखावै ले होते । जेना (जैसे) मजबूत होय केरऽ मतलब सिर्फ ‘‘मैं’’ नांय होते बदलाव केरऽ । या केकरो बात मानी लेना केरऽ मतलब कमजोर होना नांय होय छै । काहे कि परंपरा केरऽ अनुसार बेटी के ही सब कुछ छोड़ी के नया घरऽ में जाय ले होय छै । जों बेटी के कोय चीजऽ पर आपत्ति छै, या वू सहमत नांय छै, ते ओकरा असहमति के सही ढंग से रखे, पति पत्नी दोनों के ई सोच छोड़े ले होते कि हम्में सब जानै छी । परिवार केरऽ कोय बुढ़ (बुर्जुग) अपनऽ अनुभव से कुछ बताय रहलऽ छै, ते हमेशा एकरऽ मतलब दबाना या दखल अंदाजी करना नांय होय छै । कुल मिलाय के कहऽ परवरिश के दौरान (समय) बच्चा सब के मजबूत आरो आत्म निर्भर केरऽ साथ समझदार आरो पो कठोर (पपिक्व) बनाबे केरऽ कोशिश भी होना चाहिब । बिहालऽ बेटी के भी समझदारी, मजबूती आरो पूरा तरह से समझै केरऽ जरूरत छै । बीहा टुटना अबे समाज के लेलऽ ओत्ते बोड़ऽ बात नांय रही गेले । जेतना चालीस पचास साल पहिले छेले । सामजिक दबाव कम होय से आरो आदमी केरऽ सोच बदले से भी ई तरह केरऽ फैसला लेलऽ जाय रहलऽ छै । दोसरऽ तरफ, अलग परिवार होय के चलते बिना कोय संकोच या लिहाज केरऽ झगड़ा होय छै । यहां तक कि सामने केरऽ बात ओकरऽ पक्ष में समझै नांय । ऐहे से सुनलऽ जाय छे कि मुंह तोड़ जवाब देलऽ जाय सके। अबे लागे सब कोशिश नाकाम होय चुकलऽ छै । आरो अबे तलाक ही एकमात्र रास्ता छै । देखऽ कि कहीं ई जाय वाला ते नांय छै । तोहें अपनऽ तलाक केरऽ बाद केरऽ । जीवन केरऽ योजना की बनैलऽ छऽ । योजना के छोड़ऽ वू जी वन केरऽ कल्पना भी करलऽ छऽ ? एक छोटऽ सन फैसला लै से पहले निर्णय करे छै, तलाक के बारे में तोहें कुछ सोचलऽ भी छऽ ? या आवेश में ही सब निर्णय लैरहल छऽ ।
132- दूर रहे वाला बेटा पुतोह आरो साथ रहे वाला बेटा पुतोह ।
जा ई दिन केरऽ भाग- दौड़, करण सुचि अपने थकलऽ होलऽ आरो कमजोरी महसूस करी रहलऽ छेले । फिर भी छः बजे उठी गेले । जल्दी जल्दी काम पूरा करे में लागी गेली । ओकरऽ सास 20- 25 दिनऽ से वीमार छेली । हुन्कऽ सेवा, आय जाय वाला केरऽ आब भगत, घरऽ केरऽ सब काम ई सब से ओकरऽ देह- देह दुखाय रहलऽ छेले । फिर आराम करले बिना सेवा भाव में लागल रहे छेली । सास केरऽ ज्यादे तबियत खराब होय के कारण अस्पताल में भरती कराबे ले पड़ले । समाचार सुनी के लखनऊ से भैंसूर गोतनी आबी गेली । अभी तक ते फोने से खोज खबर ले रहलऽ छेली, गोतनी के आबे से सुचि के लागले कुछ सहारा मिलतऽ । मगर वू चौबीसो घंटा अस्पताले में बैठली रहे छेले । घऽर ते खाली नहाय खाय ले आबे छेली । हुन्कऽ ते रटलऽ रटैलऽ बहाना छेल्हेन, कैसे की करीय ? कौन समाज कहाँ रखलऽ छै । हमरा ते कुच्छु माुमे नांय छै ? मालूम कैसे हे हो ? सुचि मन ही मन झुनझुनै ले, कभी आबे छऽ यहाँ । बरसों होय जाय छोंऽ मुँ देखैला ? आलऽ में हमान सब के चाय नास्ता (जलखै) कराये के, दूध जलखै केरऽ व्यवस्था करी के सुचि नौ बजे अस्पताल पहुंचली । सुचिं के देखत ही सास उलाहना दिये लागली, कसे देर करी के आबी रहलऽ छें ? बेचारी सुनीता (गोतनी) बिना चाह जलखै केरऽ बैठली छै ? ई सुनी के सुचि केरऽ दिलऽ में बहुत दुख होले । मन में होले हनी के जवाब दिये । हम्में की घरऽ में गोड़ पसारी के सुतलऽ छेलिये ? मगर लहु केरऽ घोंट पी के रही गेलिये । सास ममता भरल स्वर में बड़की पुतोह के पीठ पर हाथ धरी के जा बेटी आराम से नहाय धोय के खाय पी के अइहऽ । सुनीता चलऽ गेली । सुचि माथऽ झुकाय के सास केरऽ कपड़ा बदल बैकी, तैल कुड लगाय के कंघी चोटी करी देकी, दूध पिलाय के दवाय खिलाय देलकी, खोललऽ कपड़ा लत्ता लै के सुचि घऽर ऐली । तब तक सुनीता सिंगार- पटार करी के आवी गेली । सब केरऽ खाना- पीना केरऽ इन्तजाम करना छेले । ओकरऽ 10 साल केरा बेटी बतैल के, अस्पतालऽ में जेसिनी दादी के पुरसीस करे ले आबे छेले । सबसे बड़की माय केरऽ दिल खोली के तारीफ करे छेली । बेचारी रात- दिन अस्पतालऽ में लागली रहे छे । घऽर नहाय- खाय ले जाय छै । खाना बनाय रहलऽ सुचि गुस्सा में मुँह बनैते होलऽ बोलली, हम्में दिन- रात खटी रहलऽ छी, हमरा में खाली खोट ही खोट देखाबे छै । दु दिन खातिर ऐलऽ छै ते अच्छा देखाबे छै । दु दिनऽ के बाद साधु जी के अस्पतालऽ से छुट्टी मिली गेल्हेन । घऽर आबी गेली, रिस्तेदार, परिचित सब अबे घरेपर आबे लागले । अस्पताल में खाय- पीये में संकोच लागे छेले । घरऽ में कोय परहेज नांय छेले,मेला जेन्हऽ लागले रहे छेले । सुचि आरेा ज्यादे परेशान हुवे लागली । सोचे लागली दीदीअबे ते कुछ मदद करती ने ? सांझ होते ही अपनऽ दिक्कत माय जी के सुनाबे लागली । अबे हमरा जाय केरऽ आज्ञा देथीन । माय जी भी हों में हों मिलाबे लागली । तोरऽ बात सही छै हफ्रता भर होय गेल्होन घऽर छोड़ला, बच्चा बुतरू अकेले छै । परीक्षा भी नजदीक छै । घऽर भी विखरलऽ पड़लऽ होवहों, अबे तोहें जा यहां केरऽ फिकिर नांय करऽ । अबे ते घऽर आबी गेलिये ने । तोहे अपनऽ घऽर केरऽ चिन्ता- करऽ । ई कहते होलऽ बड़की पुतोह के गला लगाय लेलकी । सुचि अवाक देखते रही गेली । भैंसूर गोतनी विदा होय गेली । सुचिख टैले रही गेली । माय जी सब रिस्तेदार के अपनऽ बिमारी के साथ- साथ दूर रहे वाला बेटा- पुतोह केरऽ जिक्र पहिले कई छेली । दोनों एते दूर से ऐलऽ खरचा करी के, मगर साथ रहे वाला बेटा- पुतोह से हुन्का बड़ी असंतोष छेल्हेन । पहिले ही वू बोड़ऽ डाक्टर से देखाय देतलऽ ? हम्में एतना तकलीफ ते नांय भोगतलां । सुचि सोचे लागली दूर केरऽ ढोल ही नांय, बेटा- पुतोह भी सुहाने लागे छै । पास केरऽ ते———— ।
133- सच्चा दोस्त
एक आदमी के तीन दोस्त छेले । वू पहला दोस्त के बहुत चाहे छेले । आरो माने भी छेले । दोसरऽ दोस्त के थोड़ऽ कम चाहे छेले । तीसरा दोस्त के तरफ कम ध्यान दै छेले । ओकरऽ समय कुछ दिनऽ के बाद खराब होय गेले, सब कुछ खतम होय गेले । ई बात राजा के पता चलल्हेन, अपनऽ सिपाही द्वारा वू आदमी के राजमहल में पहुंचे केरऽ आदेश भेजबेल का । वू डरी गेले कि राजा केरऽ बुलाहट कथि ले ऐलऽ छै । अपनऽ तीनों दोस्त के बतैलकऽ आरो तीनों से मदद मांगलकऽ । पहला दोस्त से कहलकऽ कि तोहे हमरा साथ राज दरबार में चलभऽ ? ई सुनी के पहला दोस्त साफ इंकार करी देलके, आदमी के बड़ा सुख भेले कि ओकर सब से अच्छा दोस्त ओकरऽ मदद नांय करी रहलऽ छै । दोसरऽ दोस्त से पुछलकऽ तोहें हमरा साथ राज दरबार तक चलबे ? दोसरऽ दोस्त कहलके हम्में सिर्फ द्वारी तक जेभों । आगु तोरा अकेले जाय ले पड़थो । वू निराश होय के, तीसरा दोस्त के तरफ मुड़लऽ, जेकरा वे पसंद नांय करे छेले । वू अब तक सब केरऽ बात सुनी रहलऽ छेलऽ हम्में चलभोंऽ तोरा साथ आरे । जरूरत पड़ला पर तोरऽ रक्षा भी करभों । ई सुनी के हैरानी होले कि जेकरा हम्में कभी महत्व नांय देलिये, वेहे हमरऽ मदद करी रहलऽ छै । जेकरा अपनऽ समझलिये, वेहे छोड़ी के चलऽ गेलऽ । अबे तोरा बताय दै छिहों कि वू आदमी केरऽ तीन दोस्त कौन छेले । पहला दोस्त- जेकरा वू सबसे ज्यादा चाहे छेलऽ, वू छेली ओकरा दौलत, जे ओकरऽ मुसीबत के समय मदद नांय करे सकलकी । दोसरऽ दोस्त जेकरा वू थोड़ऽ कम चाहे छेलऽ वू छेले ओकरऽ घर परिवार वाला, जे केवल थोड़ऽ समय के लेल ही ओकरऽ साथ दै सके छेले । तीसरा दोस्त- जे दोस्त पर ओकरऽ बिल्कुल ध्यान नांय छेले, वू छेले ओकरऽ पुण्य सत्कर्म जे हमेशा ओकर साथ रहले आरो वक्त पर मदद भी करलके । ऐसे से आदमी के पुण्य जरूर कमाना चाहिवऽ आरो केकरो छोटऽ नांय समझना चाहीव । समय केकरऽ कबे की होते, कोय नांय जानलऽ छै ।
134- ब्रत करे वाला के एकदम भूखलऽ रहना चाहीव ।
उपवास में लोग साबूदाना केरऽ खिचड़ी खाय छै, खिचड़ी केरऽ अपेक्षा साबूदाना केरऽ खीर खाय से ज्यादे लाभ दायक होय छै । एकरऽ कै कारण छै । खिचड़ी के जग्घऽ खीर खाना सहज छै । खीर जल्दी पचे छै, वहीं खिचड़ी पचे में ज्यादे समय ले छै । एकरा में वसा होय छै, जबे कि खीर में दूध केरऽ प्रोटीन मिले छै जे फायदा मंद छै । नवरात्र के समय कत्ते लोग देवी अराधाना में उपवास रखे छै आरो गरबा में भी शामिल होय छै, रून्हऽ में शरीर केरऽ ऊर्जा आरेा पोषण केरऽ ख्याल रखना जरूरी छै । बहुत देरी तक भूखलऽ नांय रहे, थोड़ऽ- थोड़ऽ देरी में नारियल पानी, नींबू पानी पीये या कुछ फल खाते रहे, ई शरीर केरऽ सुचारू संचालन के लेलऽ महत्वपूर्ण छै । अपनऽ भोजन में आठ घंटा से ज्यादे केरऽ अन्तर नांय पराखऽ । का हे कि खाना पचै केरऽ बाद शरीर मांस पेशि आरो लीवर में संगृहित ग्लूकोज से ऊर्जा लेना शुरू करी दै छै । ब्रत में बिहाने- बिहाने लोग कुछ नांय खाय छै, लेकिन एन्हऽ आदत (नियम) के छोड़ी देना चाहीव । स्वास्थ्य केरऽ दृषिृ से बिहाने- बिहाने हल्का फलाहार जरूर लेना चाहीव । कुछ शारीरिक रोग में चिकित्सक केरऽ सलाह पर ही उपवास रखना चाहीव । एकरऽ तहत लीवर, किडनी, उच्च रक्तचाप से संबंधित समस्या से पीडि़त आरेा डाय विटीज, कुपोषित आरो कम रोग प्रतिशोधक क्षमता वाला लोगऽ के सतर्क रहे केरऽ आवश्यकता छै । खास तौर पर मधुमेह केरऽ (चीनी वाला रोगी के) रोगी व्रत के समय ज्यादा देर तक निराहार नांय रहना चाहीव । ब्रत में भूखलऽ रहे से चक्कर आना, शरीर में पानी कम होना ई समस्या ते लोगऽ में खास बात छै । ब्रत केरऽ दौरान में कै ठो दिक्कत जेना गैस, एसिडिटी, माबऽ दरदऽ पेट फुलना, एकरऽ नतीजा चिड़ाचिड़ापन जेन्हऽ लक्षण पर भी गौर करना चाहीव । ई समस्या नांय होते, जों तोहें सही समय पर आहार लेते रहऽ आरेा शांत रही के आराधना करऽ ऊर्जा बचथों । ऐसे से ब्रत में ऊर्जा आरो पानी केरऽ पूर्ति के लेलऽ सब प्रकार केरऽ फल सेवन करना चाहीव । एन्हऽ फल केरऽ सेवन जरूर करना चाहीव जेकरा में ज्यादे मात्र में पानी मिले छै । जेना कि- तजबूजा, नारंगी, ककरी, खीरा आदि में । शरीर के ताप नियंत्रण आरो पानी केरऽ मात्र के बनैलऽ रखे छै । फल केरऽ टुकरा पर नोन (नमक) लगाय के खाय सकऽ ते आरो बढि़यां । कभी हम्में फलाहार जूस के रूपऽ में लै छिये कभी सीधे फले खास के ब्रत करे छिये । यहाँ कुछ ध्यान रखै केरऽ बात छै । पहिलऽ, जों फल केरऽ रस निकाली के पीय छऽते एकरा में फाइबर कम होय जाय छै । जबक कि फलऽ ई शरीर के मिले छै । दोसरऽ तुरंत ज्यादे कैलोरी चाहीव ते जूस पीवऽ । वहीं कम कैलोरी में पेट भरना चाहे छऽते फल खा । फल खाय से पेट भरे केरऽ एहसास भी होय छै । त्रिशूल, देवी माय के भगवान शंकर ने देलऽ हेलात ई तीन गुणऽ केरऽ द्योतक छै । सत्व, रज, आरेा तमस । एही कारण दुर्गा के भौतिक, मानसिक आरेा अध्यात्मिक तीनऽ प्रकार केरऽ परेशानी के हरे वाली मानलऽ जाय छथिन । त्रिशूल केरऽ तीन नोक भी बताबै छै कि त्रिगुण महत्वपूर्ण छै ।
135- धन केरऽ साथ – साथ आदर जरूर कमाबऽ
सब लोग कुछ न कुछ कमाबै ले निकले छै । कमाना भी चाहीव । जीवन में धन- दौलत, पद- प्रतिष्ठा सब जरूरी छै । कुछ लोग बहुत ज्यादे कमाये लै छै । कुछ सामान्य या कुछ लोग ओकरो से भी कम । लेकिन सबके पास कुछ न कुछ कमाई छै । आदमी कमाबे छै कथिले ? ई वास्ते कमाबे छै कि जीवन केरऽ आनन्द उठाय सके आरो जरूरत पड़ला पर कमाई काम आ जाय । जों धन कमाय चुकलऽ छऽ ते एक चीज जरूर कमाबऽ, वू छै इज्जत । मान, आदर, कीर्ति, प्रतीका ई सब भी कमाई केरऽ रूप छिके । धन- दौलत आरेा ओकरा से मिले वाला सुख के ते हम्में भोगी लै छिये, पर बहुत कम लोग होय छै, जे अपनऽ इज्जत केरऽ आनन्द लै छै । जों तोरा पास मान- सम्मान दोंऽ ते ओकरऽ खूब आनन्द ले । ऐहे एन्हऽ कमाई छिकै जे तुपित दै छै । धन भोगे वाला केरऽ लालसा बढ़ते जाय छै, परिणाम तोहें गलत रास्ता पर भी जा सके छऽ ? ध्यान रखऽ, जों आदर, इज्जत केरऽ कमाई केरऽ आनन्द उठाया छै, ते अक्कड़ कम करले पड़थले । आदमी मान- प्रतिष्ठा कमाय ते लै छै, लेकिन ओकरऽ अकड़ ओकरा आनन्द नांय लै ले दै छै । हम्में कत्ते लोगऽ के देखे छिये, जेकरा पास खूब धन- दौलत सम्पत्ति छै, इज्जत भी खूब कमैलऽ छै । कत्ते आदमी एन्हऽ भी छे, जेकरा पास दौलत ज्यादा नांय कमैलऽ छै, लेकिन मान- सम्मान बहुत छै ईमानदारी, अपनापन, निष्ठा आरो दोसरा के लेलऽ जिये केरऽ तमन्ना से तोरऽ परिवार, समाज, रिश्तेदार, मित्र ई आदर के बड़ी प्रसन्नता से लौटाबै छै । आरो जबे तोहें ओकरा भोगे छऽ ते जीवन केरऽ आनन्द ही कुछ आरो होय छै । ऐहे से इज्जत जरूर कमाबऽ । आरेा ओकरऽ आनन्द, सुख खूब उठाबऽ ।
136- पंडित जी ।
एक छेलात पंडित जी गंगा नहाय ले निकली रहलऽ छेलात कि हुन्कऽ देह एकरा छोटुऽ जात से छुवाय गेल्हेन । छुवाते देरी कि हुन्का गुस्सा आबी गेल्हेन, आरेा हुन्हीं जोर- जोर से डांटे- डपटे लागला । हुन्कऽ गुस्सा ऐत्ते बढ़ी गेल्हेन कि वू आदमी के दुस्तीन छड़ी भी जमाय देलका, ई कहते होलऽ दोबारा नहाय गेला कि ई चंडाल आदमी हमरा अपवित्र केरी देलकऽ । नहाते समय देखलका कि वोहो आदमी नहाय रहलऽ छै । ओकरा नहाते देखी के पंडित जी के बड़ी अचरज गेल्हेन । पंडित ओकरा से पुछलका हम्में ते तोरा से घुवाय के कारण दुबारा नहाय ले गेलऽ छेलां ? लेकिन तोहें काहे नहाय ले गेले ? वू बोलले- पंडित जी ? मानव मात्र एक समान छै, जाति से पवित्रता नांय होय छै, लेकिन सब से अपवित्र ते गुस्सा छै, जबे तोरऽ गुस्सा ने हमरा छुवल कै ते ओकरऽ नाकारत्मक भाव से मुक्त होय के लेलऽ हमरा गंगा नहाय ले पड़लै । ई सुनी के पंडित जी लज्जित होय गेलात । हुन्कऽ जाति अभिमान दूर होय गेल्हेंन । सब के भगवान बनैलऽ छथिन पंडित जी ? जाति ते हमरा सनी केरऽ बांटलऽ छिकै ।
137- सच्चा मन से करऽ उपकार
वनऽ में शेर- शेरनी अपनऽ शिकार खोजते- खोजते बहुत दूर निकली गेली, शेरनी केरऽ बच्चा अकेले रही गेले । काहे कि बच्चा बहुत छोटऽ छेले । ऐहे से साथ नांय ले जाय सकले का । दोनों के आबे में बहुत देर होय गेले । बच्चा भूखऽ से छटपटय रहला छे ले । वहीं पासऽ में एकरा बकरी चरी रहल छेली । शेरनी केरऽ बच्चा के छटपटाते देखी के बकरी के दया आबी गेले । भूखऽ बच्चा केरऽ हालत खराब हुबे लागले, बकरी शेरनी केरऽ बच्चा के अपनऽ दूध पियेलकी आरो ओकरऽ प्राण बचैलकी । बच्चा के अपना पास बैठाय दुलारे- पुचकारै लागली । शेरनी केरऽ बच्चा बकरी केरऽ देहऽ पर उछली- कुदी रहलऽ छेलऽ । एतने में शेर- शेरनी आबी गेली । बकरी के अपनऽ बच्चा के पास देखी के आग- बबुला होय गेली, शेरनी बकरी से कुछ कहतली कि पहिल हीं ओकरऽ बच्चा सब सुनाबे लागले । बकरी माय नांय रहतली ते आज हम्में भूखऽ से मरिये जातलां । बकरी माय हमरऽ प्राण बचालऽ छै । ई सुनी के शेर- शेरनी अपनऽ करनी पर लजाय गेली आरेा बकरी से क्षमा मांगलकी कहलकी ई कर्जा हमरा पर रहले । तोरऽ ई उपकार कभी नांय भूलबे । शेर बकरी से कहलके तोहें आजाद छऽ । आरेा पुरे वन में निर्भयता के साथ घुमी सके छऽ । तोरा के करो से भयभीत होय केरऽ जरूरत नांय छै । बकरी पुरे वनऽ में अपनऽ बच्चा के साथ रहे लागली । यहाँ तक कि शेर केरऽ पीढी पर बैठी के कभी- कभी गाछी केरऽ पत्ता भी खाय छेली । ई सब दृश्य चीज देखलके ते हैरानी में पड़ी गेले । बकरी से चील पुछलकी ई संबंध किरंग बनलै ।, भोली- भाली बकरी पूरा कहानी सुनैलकी, साथ में उपकार केरऽ महत्व भी समझैलकी, काहे कि चील ते मतलबी आदत केरऽ छेली, लेकिन बू भी केकरों पर उपकार करे- केरऽ मनऽ में ठानलकी ।
138- बच्चा के सिखाबऽ अपनापन
गरमी केरऽ मौसम, खाली तपन, उमस केरऽ ही समय नांय छिके, एक सोहानऽ अवसर भी छिके । गरमी केरऽ दिनऽ में बच्चा सब केरऽ सकूल (स्कूल) में एक महीना के लेलऽ इसकूल (स्कूल) बन्द होय जाय छै, बच्चा सनी के छुट्टी मिली जाय छै । कहीं- कहीं नया जग्घ पर घुमैल जाय केरऽ प्लान बनाबै छै । प्लानिंग में गौर करऽ कहीं जरूरी कुछ छुट्टी ते नांय रहलऽ छोंऽ । तोहें ई अवसर पर अपनऽ से बच्चा के जोड़बाबै केरऽ गाढ़ऽ प्रयास करऽ । हालांकि एक समय एन्हऽ छेले, बच्चा सनी के छुट्टी केरऽ मतलब होय छेले, नानी- दादी केर कहानी गांव केरऽ हरियाली आरो खेत-खरिहाल बरूवा पर उछला कुदना मस्ती करना छेले । लेकिन धीरे-धीरे ई चलन कम होय गेले । गरमी केरऽ छुट्टी पहले जन्हऽ नांय रही गेले । तोहें चाहऽ ते कहीं घुमी के आबे केरऽ औपचारिकता पूरा करे केरऽ बजाय ई बेर गरमी केरऽ छुट्टी में अपनऽ के सत्य, यादगार आरो मजेदार बनाबै केरऽ कोशिश करी सके छऽ ? एन्हऽ करे से तोरा अलग अनुभव मिलथों । तोरऽ बच्चा केरऽ जीवन में भी बड़ा परिवर्तन होते । जे मजा अपनऽ दादी- नानी पर बिताबे में छुट्टी केरऽ आनन्द तोरा आरो तोरऽ बच्चा के मिलथों_ वू बहुत अनोखा आरो यादगार होथोंऽ । रिश्तेदार केरऽ आना- जाना, मिली- जुली के खाना बनाना, खाना खिलाना, दुनियां- जहान गांव- घर केरऽ बात तोरा खुसनुमा करी देथोंऽ । वहीं बच्चा सब के भी ग्रामीण जीवन के करीब से देखै केरऽ मौका मिलते । नानी- दादी केरऽ पिटारी में से ढेर सारी कहानी (खिस्सा) सुने केरऽ मोका मिले छै । ई सब बातऽ से भी बच्चा सिनी के भी एक अलग जिन्दगी से दुनियां केरऽ सामना करबैते । वहाँ ओकरा नया- नया दोस्त मिलते, संगे- संगे खूब धमा- चौकड़ी मचैते, एन्हऽ शहर केरऽ दिन चर्या में संभव नांय होय सके छै । काहे कि वू टी- वी- विडियो ग्रम्स आरो मोबाइल क साथ ही अपनऽ समय बिताबे छै । जेतना बत गांव में आय के सिखते, जे कुछ नया अनुभव करते, बू सब दूर से नांय सिखी पैयते । महसूस करते अपनापन केरऽ जबे बच्चा संयुक्त परिवार में दादा दादी, चाचा चाची, ताऊ ताई, बुआ (फुआ) केरऽ सान्निधय में रही के बोड़ऽ होय छेले । रिश्तेदार के बीच अपनापन केरऽ नजदीक से महसूस करे छेले । अबे शहरऽ केरऽ व्यस्त जिन्दगी में बच्चा सिर्फ अपनऽ माता पिता आरो भाई बहीन के ही जानी पावै छै । ऐहे वजह से वू अपनऽ नजदीकी रिश्ता से अनजान रहे छै । रिश्ता नाता जानै केरऽ मौका ही नांय मिले छै । बच्चा के कहऽ जे खिस्सा कहानी दादी या नानी सुनाय रहलऽ छौ, ओकरा लिखी के रखी ले, ई तरह से तोरा पास कहानी केरऽ संग्रह बनी जैतो । रीति रिवाज आरेा परंपरा से भ्ज्ञी बच्चा के परिचित करा बड़ा एकरा में निहित अर्थ भी समझाबऽ अपनापन केरऽ ।
139- दिल केरऽ बात
एक बार गुरू जी अपनऽ चेला केरऽ साथ बैठलऽ छेलात । अचानक हन्हीं सब चेला से एक सवाल पुछलका, बतावें जबे दु आदमी एक दोसरा पर गुस्सा करै, छै ते जोर- जोर से चिल्लावै काहे छै ? चेला कुछ देरी सोचलके, आरो उत्तर देलके, हम्में अपनऽ शान्ति खतम चुकलऽ रहै छिये । ऐसे से चिल्लाबै लागे छिये । गुरू जी मुस्कुराते होलऽ कहलका, दोनों एक दोसरा केरऽ नजदीक रहे छै । धीरे- धीरे भी बात होय सके छै । फेरू वू चिल्लावबै काहे छै, चेला केरऽ जवाब से गुरू जी संतुष्ट नांय छेला । हुन्हीं उत्तर देना शुरू करलका, जबे दु लोग एक दोसरा से नाराज होय छै ते ओकरऽ दिलऽ में दूरी बहुत बढ़ी जाय छै । जबे दुरी बढ़ी जाय छै ते आवाज के पहुंचावै के लेलऽ ओकरा तेज होना जरूरी छै । दूरी जेते ज्यादा होते, ओतने तेज चिल्लाबै से पड़ते । दिल केरऽ दूरी ही गुस्सैलऽ लोग के चिल्लावै पर लाचार करी दै छै । गुरूजी आगे बोलला, जबे दु लोगऽ में प्रेम होय छै ते एक दोसरा बड़ी आराम से आरो धीरे- धीरे बात करै छै । सेम दिलऽ के नजदीक लाबे छै ।
140- दान करना भी पाप होय गेले ।
हमेशा हम्में द्वारी पर आलऽ या रास्ता में भीख मांगे वाला के कुच्छु पैसा दै दै छेलिये । लेकिन, हमरऽ देलऽ दान केकरो के लेलऽ बोड़ऽ मुसीबत केरऽ कारण भी बनी सके छै । एन्हऽ ही एक घटना हमरा हि लाय के रखी देलके । हमरा घऽर झाडू – पोछा करे वाली नौड़ी केरऽ आदमी (पति) दरूहा छै । काम वाली अपनेऽ बड़की बेटी के अपनऽ कमाई से उच्चऽ शिक्षा दिलाबे केरऽ किरिया (कसम) खैलऽ छेले, ओकरऽ बेटी अच्छा इसकूलऽ (स्कूल) में पढ़ी रहलऽ छेले । ओकरऽ छोटकी बेटी जे मात्र चार साल केरऽ छेले, ओकरा अपनऽ आदमी (पति) केरऽ भरोसा छोड़ी के काम करे ले चलऽ आबे छेले । एक दिन काम वाली नौड़ी हमरा बतैलके, हमरऽ कमाई से घर खरचा आरो बेटी केरऽ पढ़ाई चली रहलऽ छै । लेकिन समझ में नांय आबै छै कि हमरऽ आदमी (पति) के पैसा कोन दै छै जे रोज दारू पी के घऽर आबे छै । सत्यानाश होवे ओकरऽ जे ओकरा दारू पी केरऽ पैसा दे छै । वे कत्ते सरापलकी आरो बड़बड़ाते रहली । हमरऽ आदत छेले, जबे हम्में बाजार जाय छेलिये तरकारी भाजी किने ले, एकरा छोटऽ सन बच्ची फटलऽ- पुरानऽ कपड़ा में देखाबे छेला ओकरा कभी दस कभी पांच टाका दान में दै दे छेलिये । एक दिन काम वाली नौड़ी अपनऽ छोटकी बेटी के साथ लै के आली, बढि़याँ कपड़ा पेन्हलऽ, ओकर पति कहीं बाहर गेलऽ छेले, अकेले कहाँ छोड़तिये । ओकरऽ बेटी के देखी के चौंकी गेलिये । ई ते वेहे बच्ची छिके, जेकरा हम्में कभी कभार दस पांच टाका दै दै छेलिये । हमरे सरिखे आरो लोग भी पैसा दै छेले, तब भी वू फटलऽ पुरानऽ कपड़ा में रहे छेले । अपनऽ माय के साथ साफ- सुथरा कपड़ा में आल छेली । हम्में ओकरा से पुछलिये हम्में जै पैसा दै छेलियो, वू पैसा तोहे केकरा दै छें ? बच्ची जबाब देलके वू सब पैसा बाबू (बाप) के दै छेलिये । आरो बाबू कहे छेला केकरो बतैई हें नांय ? नांय ते मारी के फेंकी देबो । डर के मारे हम्में माय के भी नांय बताबे छेलिये । अपना साथ फटलऽ – पुरानऽ कपड़ा पिंहाय के लै जाय छेले । अपने कहीं छुपी के देखते रहे छेले, कौन केतना दै रहलऽ छै । माय ई सब सुनी के फफकी- फफकी के कान्दे लागली, हम्में मरी मरी के काम करे छी घर खरचा चलाबे छी, अबे तोरा सनी ही निर्णय करऽ ई दान केन्हऽ फल दिलैते ।
141- बेटी जलखै करी के जो ।
बात कुछ समय पहले केरऽ छिके, माय अबे ई दुनियां में नांय रहली । हमरा वू घटना हमेशा आंखऽ के सामने नाचते रहे छै । जबे माय जिन्दा छेली आरेा हम्में गांव गेलऽ छेलिये । वू समय हमरऽ बेटा केरऽ भी तबियत खराब छेले । हम्में माप से मिले ले गेलऽ छेलिये बहुत जल्दी में छेलिये । माय बहुत आशक्त होय गेलऽ छेली देहऽ में खाली हड्डी- चपड़ा बची गेल छेले, काया एकदम जर्जर, मायके देखी के लागले भगवान अबे उठाय लहऽ । आंखी से लोर चुवे लागलऽ । माय हमरा देखी के खुश होय गेली, हम्में जल्दी में छेलां माय केरऽ दर्शन करी के बेटा के डार से चलऽ ऐलां कहीं बेटा नाराज नांय होय जाय । माय बहुत रोकलकी, रूकी जा बेटी, कहीं के बहुत मनैल की, आरो कहलकी जलखे चाह (चाय) करी के जो, हमरो चाय (चाह) पिलाय के जो । लेकिन बेटा केरऽ डर से तुरंत निकली गेलिये । माय केरऽ पुकार अनसुनी करै केरऽ मलाल मनऽ में लै के चलऽ ऐलिये । माय केरऽ गुहार करते आँख याचक की तरह हमरा पीछा करी रहलऽ छेले । हम्में फेरू गांव के माय के कुछ खिलाबे केरऽ बहाना ढुंढ़ी रहलऽ छेलिये । माय केरऽ हाल बेहाल देखी के मन में बहुत पीड़ा छेले । जबे गांव जाय केरऽ मौका ऐले बहुत देर होय चुकल छेले । माय सबकुछ भूली के निर्विकार हमरा देखते रहली । बहुत याद दिलैला पर भी हमरा नांय पहचाने सकलकी । माय केरऽ आग्रह नांय सुनला केरऽ कष्ट हमरा जिन्दगी भर भोगे ले पड़लऽ माय केरऽ आददास्त चलऽ गेलऽ छेले । माय अबे ई दुनियां में नांय छथ, लेकिन हुन्कऽ आखिरी बार केरऽ छोटऽ सन आग्रह हमरा आज भी याद आबै छै, जबे हम्में जल्दी में लौटी रहल छेलिये, आरो माय ने बार- बार हमरा रोकी के कहलऽ छेली, बेटी चाय (चाह) पिलाय के जो । अपने भी चाय जलखै करी के जो । शायद माय ई तरह से चाय पी के जाय ले कहें छेली । सच में माय हमरा सबसे रूठी के दूर चलऽ गेली । बहुत दूर अबे हम्में चाहे जेतना बुलायें । बू घुरी के नांय आबे वाली छै । बेटी चाय पिलाय के जो, जाने कहां चलऽ गेली । हमरा छोड़ी के । जहाँ से लोग कहियो नांय घुरी के आबे छै । भगवान माय के आत्मा के शान्ति दिहऽ ।
142- माटी केरऽ गुण ।
पेट के सभे रोग केरऽ भंजर मानलऽ जाय छै । पचै केरऽ गड़बड़ी आरो पेट विकार केरऽ स्थिति में पेटऽ पर ठंढा मोटी केरऽ पट्टी राखे से लाभ होय छै । शरीर (देहऽ) में सूजन आबे पर, दर्द होवे ते गरम माटी केरऽ पट्टी लाभ दायक मानलऽ गेलऽ छै । गरम (गर्म) आरेा ठंढा माटी केरऽ पट्टी बनाबे केरऽ तरीका एके छै । गरम पट्टी बनावे के लेलऽ गरम पानी में माटी के सानलऽ जाय छै । आरो सुखलऽ कपड़ा पर पट्टी बनाय के तुरंत दरद वाला या फुलान वाला जग्घऽ पर (देह) पर लगाय देलऽ जाय छै । गरम पट्टी सेंक केरऽ काम करे छै । निमोनिया में जों छाती केरऽ दरद बढ़ी जाय ते गरम माटी केरऽ पट्टी राखे से पीड़ा कम होय जाय छै । आंखऽ में सूजन या दरद होला पर माटी केरऽ पट्टी फैदा करे छै । आंखऽ केरऽ गर्मी से पट्टी जल्दी सुखी जाय छै, ऐहे से हर आधऽ घंटा में पट्टी बदलते रहना चाहीवऽ । एन्हऽ कम से कम दिन में दुबार जरूर करऽ । आँखऽ पर माटी केरऽ पट्टी राखे से धीरे- धीरे चश्मा केरऽ नम्बर कम होय जाय छै, आंख स्वस्थ आरो ओकरऽ ज्योति भी बढ़ी जाय छै । जे जनानी केरऽ बाल (केश) तेजी से झड़ी रहलऽ होवे, या बाल (केश) असमय में सफेद होय रहलऽ होबे, माथा में रूसी या फंसी केरऽ शिकायत होबे एन्हऽ जनानी के माही से बाल धोना चाहीवऽ । कुछ दिनऽ के बाद बाल (केश) मुलायम आरो घनऽ काला होय जाय छै । माटी लगाय के नहाबे से दाद, खाज, खुजली, दिनाय आदि में फैदा करे छै । चर्म रोग ठीक होय जाय छै । नोन (नमक) शरीर के लेलऽ बहुत उपयोगी छै, लहु (खून) के खारा या खट्टा नांय होय ले दै छै । हड्डी के मजबूत बनाबे छै । दिल आरेा दिमागऽ पर एकरा खास जरूरत होय छै । नोन (नमक) के अलावा, दूध, दही, छाछ मट्ठा (घोर), पनीर, साग चौलाई, पालक, मटर, सेम, गाजर, सलाद आदि खाना चाहीवऽ, एकरऽ अलावा ई भी याद रखऽ मांस- मछली दूध केरऽ साथ नांय खाना चाहीवऽ घी शहद के साथ नांय खाना चाहीवऽ जहर बनी जाय छै । एक ही बार में ज्यादा खाय के बजाय दिन में पांच बार थोड़ऽ थोड़ खाय के पाचन शक्ति बनलऽ रहे छै । शरीर स्वस्थ प्रसन्न निरोग रहे छै ।
143- महादेव जी ।
जबे पाप केरऽ अंधकार संसार के ढकी दै छै, तबे एक आनोखा शक्ति प्रकट होय के अंधकार के खतम करी दै छै । लेकिन एक समय एन्हऽ भी आलऽ छेले, जबे ई अंधकार केरऽ नष्ट करे में सब आदमी नाकाम साबित होलऽ छेले । तबे अवतार लेलऽ छेली, मृत्यु आरो अंधकार के नष्ट करे वाली देबी ने । जे पाप के जड़ से खतम करी के संसार के देलकी सच्चाई केरऽ एक नया शुरूआत । ई छेली माता पार्वती केरऽ रूद्र अवतार, महाकाली । तोहें पार्वती से महाकाली बने तक केरऽ सफर ते अब- तक देखी लेलहऽ । अबे शुरू होते हुन्कऽ कहानी केरऽ एक अनोखा आरो दिलचस्प पाठ । तोरा सनी ते जानै छऽ, कि महादेव के नील कंठ के नाम से भी जानल जाय छै । लेकिन काहे ? एकरऽ वजह छै, समुद्र मंथन जे पौराणिक कथा सबसे ज्यादा प्रचलित छै । कहलऽ जाय छै कि देवता आरो असूर केरऽ बीच होलऽ समुद्र मंथन से निकललऽ छेले, कालकूट नाम केरऽ जहर (विष) वू विष से देवता आरो असूर दोनों परेशान होय गेला वू जहरऽ में पूरे सृष्टि के खतम करै केरऽ ताकत छेले । विष्णु देव केरऽ आगेह पर देवता ने महादेव जी से मदद मांगलका । करूणामय ने बेझिझ विष (जहर) पी गेला । जे एतना शक्तिशाली छेले कि ओकरा से महादेव जी केरऽ गर्दन केरऽ रंग नीला पड़ी गेल्हेन । ई वजह से महादेव जी के नील कंठ भी कहल जाय छै । लेकिन ई विष केरऽ प्रभाव के दूर करना आरो ओकरा गला में समेटी के रखना महाकाल यानि महादेव केरऽ बस में भी नांय छेल्हेन, वू समय महाकाली ने पत्नी धर्म के निभाते होलऽ एन्हऽ करलऽ गेले । जेकरा देखी के सब आश्चर्य चकित रही गेले । हमरऽ संस्कृति में एन्हऽ बहुत उदाहरण रहलऽ छै । जहाँ पत्नी ने पत्नी धर्म निभैलऽ छै । जेकरऽ सबसे बोड़ऽ उदाहरण महाकाली छथिन । आज तक महाकाली केरऽ पूजा लोग आदर से करै छैन ।
144- सुनो
सुनो ———– तोहें कुच्छु सुनल्हऽ की ? नांय ———– लेकिन हम्में ते साफ सुनलिये अभी अभी समुन्दर ने कहलके मोती के किनारां पर नांय गहराई में खोजऽ । नदी ने कहलके, प्रेम चाहे छऽ ते हमरा सरिखे निर्मल होय जा । पहाड़ ने कहलके, शिखर जीतै केरऽ सपना मैदानऽ में खड़ा होय के पूरा नांय होय सके छै । आगु बढ़ऽ आरो छलांग लगाबऽ पंछी ने कहलके हमरऽ उड़ान कैद नांय करऽ काहे कि जीवन केरऽ गीत आजाद पांखऽ फड़फड़ाहट में छिपलऽ होय छै । चौपाया जानवर ने कहलके तोरऽ हमरऽ बीच अन्तर बता इंसानियत केरऽ छै । ओकरा बनैलऽ रखऽ । गाछ ने कहलके टांगा कुदाल माथा पर छाँह नांय करी सकते । एक बीचा रोपऽ एक गाछ अभाबऽ आरेा भगवान ने कहलका, अपनऽ चेहरा से उदासी केरऽ रंग पोछी दहऽ । काहे कि जिन्दगी के पास आरो भी बहुत तरह केरऽ रंग छै । कहलके ते माटी, रौद (धूप) हवा, वर्षा आरो भी रास्ता बहुत कुछ छै । लेकिन कहे से पहले हम्में बस ऐतने कहे ले चाहे छी कि सुनऽ ।
145- गाड़ी पर फोन देखे ले किरिया खाय ले लियै ।
हम्में बाइक पर पीछु बैठलऽ छेलिये, हमरऽ पति बाइक चलाय रहलऽ छेलात । हम्में मोबाइल फोनऽ पर बात करे में मस्त छेलिये । हमरा कत्ते बेर समझैलऽ छलथीन, गाड़ी पर चलते समय मोबाइल बन्द रखऽ ? हम्में हुन्कऽ बातऽ के अनसुनऽ करी छै छेलिये । बाइक कुछु पुछै छेलथीन ते हुन्कऽ बातऽ पर ध्यान नांय दै छेलिये । एतवार के दिन घुमे ले निकल लिये, हम्में अपनऽ आदत के अनुसार मोबाइल निकाली के देखे लागलिये । एतने में एकरा ब्रेकर ऐले । आरो हमरऽ पति ने जैसे ही ब्रेक लगैलका झटका लगे के कारण हमरा हाथऽ से मोबाइल छुटी के गिरी गेले । मोबाइल उठाय के देखलिये, पुरी तरह से सत्यानाश होय चुकलऽ छेले स्क्रीन चुर चुर होय गेले । वू समय ते हमरऽ पति हमरा कुछ नांय कहलका । हम्में उदास मनऽ से खड़ा होय के देखे लागली, घऽर आये चुपचाप बैठलऽ छेलां अपनऽ बेबफूपी पर । पति समझाते होलऽ बोलला, हम्में तोरा ई वजह से मना नांय करे छेलिहों कि हमरा कोय दिक्कत छै । बल्कि ई कारण से मना करे छेलिहों कि गाड़ी पर फोन चलाबे से ध्यान बटी जाय छै । ध्यान नांय देला के कारण आज 40 हजार केरऽ मोबाइल चुर भै गेल्होंन । गाड़ी पर हमेशा ध्यान से बैठना चाहिव । हमरा हुन्कऽ बात समझ में ऐले । कहलऽ गेलऽ छै जबे ठेस लागे छै, तबे बुद्धि खुले छै । अबे हम्में ई बातऽ के मंत्र बनाय लेलिये । गाड़ी पर बैठे से पहिले मोबाइल के पर्स में रखबे । अबे वू दौरान केकरो फोन ऐते ते गाड़ी रोकवाय के फोन उठैबे । हैरंऽ पति केरऽ भी ध्यान गाड़ी चलाबे समय नांय भटकतै । आरो हम्में भी आराम से रहबऽ । ई सब छोटऽ मोटऽ बात पर ध्यान देलऽ जाय ते आदमी आराम से रहे । सड़कऽ पर कत्ते आदमी देखे छिये, गर्दन टेढ़ऽ करी के कानऽ में फोन लगाय लेलऽ छै, आरो बात करते होलऽ गाड़ी दौड़ाय रहलऽ छै । मौत के न्योते ने दै छै । आज काल केरऽ छौंड़ा सनी केरऽ ऐ हे फैसन छिके, वू हैरंग चलावे छै, ते हम्में ओकरा से कम छी ।
146- भगवान जे हमरा देलऽ छथिन वेहे हमरऽ छिके ।
ताहें चाहऽ या नांय चाहऽ, जिन्दगी में कुछ न कुछ बात होते रहे छै । खास तौर पर वू घटना जे प्रतिकूल छै या हमरऽ चाहे अनुसार नांय छै । इ समय में की करियै ? जबे जीवन में अनचाहा होय लागे ते तीन हालात बनते । या ते तोहें ओकरा से निपटै के लेलऽ उत्साह में आय जागऽय निराशा में डुबी जागऽ । ई दोनों से भी खतरनाक एक स्थिति हाय जे ईर्ष्या में डुबी जाना । ध्यान रखिहऽ, ईर्ष्या की करी जाय छै । हमरा साथ कुछ गलत होय गेलऽते ईर्ष्या कहे छै, तोहें भी दोसरा के साथ गलत करऽ दोस्ती में कष्ट मिली गेलऽ होय ते कहे छै दोस्ती करना भी बन्द करी दे । जो केकरो से ठगाय गेलऽ ते ईर्ष्या कहे छै तोहें भी छल- कपट करो । अच्छा लोगऽ के साथ भी खराब बात होते रहे छै । लेकिन जबे अच्छा आदमी के साथ गलत होय छै, ते वू आरो अच्छा बनी जाय छै । लेकिन ईर्ष्या ओकरा कहे छै अच्छा बनी के की करबे ? तोरा साथ खराब होलऽ छऽ ते तोहें भी खराब बनी जो । ईर्ष्या एक एन्हऽ दुर्गुण छै जे हमरऽ भीतर मंद गति से जहर के रूपऽ उतरै छै । जेकरा ईर्ष्या मोटाबे ले होवे ओकरा एक मंत्र जीवन में उतारी लेना चाहीवऽ । एकदम सीधा सन बात छै, भगवान जे हमरा, हमरऽ हिस्सा में देलऽ छय, फेरू काहे दोसरा केरऽ हिस्सा पर नजर लगैए ? योग में एकरा अपरिग्रह कहलऽ गेलऽ छै । अपरि ग्रह केरऽ मतलब छै जे मिली गेलऽ ओकरे में संतोष करऽ बस ईर्ष्या यही से गलना शुरू होय जाते । आरेा वू ईर्ष्या ने तोरऽ जे अच्छाई के रोकी राखलऽ छै, वू अपने आप ऊपर आय जाते ।
147- राम – राम
बात बिहाने- बिहाने केरऽ छिके । जबे हम्में आरो हमरऽ पति रहले ले जाय छेलिये, हमरऽ पति के रास्ता में कोय मिली गेलऽ राम – राम कहे केरऽ आदत छेल्हेन । साथ में हमरा भी कहे छेला, तोहें भी सबके राम- राम कहलऽ करऽ । लेकिन हमरा चुपचाप रही के टहलना अच्छा लगे छेलऽ । रोज दिन ऐबे जेबे ते सब से परिचय होना स्वाभाविक छै । एक दिन सामने से आते होलऽ एकटा । बुढ़ऽ आदमी के राम राम कहलका, लेकिन वू कुछ जवाब नांय देलके, अपनऽ ध्यानऽ में मगन छेले । नांय जनिकी सोचते जाय रहलऽ छेले । हमरऽ पति के खराब लगल्हेंन, हमरा कहलका देखऽ ने हम्में एकरा रोज राम राम कहे छिये, आरो ई नांय जाने केन्हऽ छै कि प्रभु केरऽ नाम भी लेना नांय चाहे छै । अबे हम्में भी राम राम नांय कहबे, हमरऽ पति ई बात ई ढंग से कहलका कि हमरा हंसी आबी गेले । हम्में कहलिहेंन कोय बात नांय, होय सकै छै हुन्हीं सुनलऽ नांय होता ऐहे सब बात करते होलऽ घऽर तरफ आबी रहलऽ छेलिये, कि वेहे आदमी लौटते समय फेरू मिलले आरेा हमरऽ पति के तरफ देखी के बोलले शर्मा जी राम-राम । हुन्कऽ ई कहत ही हम्में सोचऽ में पड़ी गेलिये कि ई आदमी कहियो राम- राम केरऽ जवाब नांय दै छेले, आज एकरा की होले ? राम- राम केरऽ जवाब मिलला पर हम्में अपनऽ पति से हंसी केरऽ अन्दाज में कहलिहेंन, भगवान बात सुनी लेलथीन आरो नांय चाहलका कि तोहें ई बढि़याँ आदत छोड़ऽ ऐहे से भगवान साक्षात वू आदमी केरऽ रूप में आय के तोरा से राम- राम बोललका । पति अब भी हैदान छेला । हम्में कहलिहेंन, अबे ते तोहें खुश होय जा, काहे िक आज भगवान साक्षात तोरा से राम- राम बोललथीन ।
148- पैसा खाय – पीके
समय केरऽ साथ याद भूली जाय छै । लेकिन आज भी हुन्कऽ मिट्ठऽ (मधुर) आवाज मनऽ में ताजा छै । बहुत पहले केरऽ बात छिके_ हम्में बहुत छोटऽ छेलिये, हमरऽ टोला में एकरा बुढ़ऽ आदमी माथा पर ताजा तरकारी (सब्जी) केरऽ टोकरी (डाला) राखी के आबै छेले । सभे केरऽ घरऽ में जाय के तरकारी दै छेले आरो कहे छेले पैसा खाय- पीके । केकरो तरकारी नांय ले केरऽ मोन रहे छेले, तइयो ओकरा से तरकारी किनी लै छेले । कोय हिसाब- किताब नांय रखे छेले । दु- तीन दिनऽ केरऽ बाद वू एक साथ पैसा लै छेले । ओकरऽ व्यवहार ऐत्ते अच्छा छेे कि टोला महल्ला के लोग ओकरा से खुश रहे छेले । वेहे आस- पास में ओकरऽ थोड़ऽ सन जमीन छेले, ओकरे में साग- भाजी उगाबे छेले । वेहे में एकरा बेर केरऽ गाछ छेले । बेर केरऽ मौसम में बेर लै के आबै आरो सनी के मंगनी बार्ट, ओकरऽ पैसा वू नांय ले छेले । सब लोग ओकरा बहुत इज्जत करे छेले । आरेा बिना मांगले कीमत से ज्यादा पैसा मिली जाय छेले । आज भी तरकारी किनते समय ओकर मिठ्ठऽ (मधुर) आवाज कानऽ में गूंजे छै । पैसा खाय- पी के । अच्छा व्यवहार करे वाला आदमी अमर होय जाय छै । वू आदमी ई दुनियां नांय रहले, लेकिन ओकरऽ नाम रही गेले ।
149- विदूर नीति अपनाबऽ
विदूर बहुत गरीब ब्राह्मण छेला, गरीबी केरऽ हद छेल्हेंन साग भी खाय छेला ते अनोनऽ नोन (नमक) किने केरऽ भी पैसा नांय छेल्हें । लेकिन पैंसा उधार नांय मांगे छेला । काहे कि पैंचा घुराबे केरऽ शक्ति नांय छेल्हेंन । विदूर नीति से जिये के लेलऽ तरीका बढि़यां बतैलऽ गेलऽ छै । विदूर नीति में लिखलऽ छै कि हर आदमी के अपनऽ सामर्थ्य के अनुसार ही काम करना चाहीवऽ जेतना लम्बा चादर हुवे, ओतने ही गोड़ पसारना चाहीवऽ । कत्ते बेर देखलऽ गेलऽ छै कि अपन झूठी शान के लेलऽ आदमी अपनऽ सामर्थ से ज्यादा खर्च करे छै । आरो ओकरा लेलऽ उधार कर्जा में डुबी जाय छै । आदमी के अपनऽ आमदनी के अनुसार ही इच्छा रखना चाहीवऽ । कत्ते लोगऽ केरऽ मन वश में नांय होय छै । वू अपना इच्छा के पूरा करे के लेलऽ दोसरा से उधार लै ले पड़े छै । दोसरा से लै के पैलऽ सुख सुविधा कभी स्थायी नांय होय छै, क्षणिक सुख बहुत कष्टकर होय छै । जों करजा नांय चुकायबे ले पारल कऽ ते अपनऽ परिवार के भी परेशानी में डाली दै छै । जे आदमी हमेशा करजा से बचलऽ रहे छै, वू बहुत सुखी मानलऽ जाय छै । अच्छा लोगऽ साथ संगति राखै छै आरो विद्वानऽ से दोस्ती राखे छै, आरो ओकरा साथ समय बिताबे छै, वू बहुत ही सुखी मानल जाय छै । खराब लोगऽ केरऽ संगति केरऽ परिणाम भी खराबे निकलै छै । जे लोग हिंसक आरो दुष्ट से मेल मिलाप राखे छै, ओकरा आगे चली के परेशानी केरऽ सामना ही करै ले पड़े छै । जेकरऽ दोस्ती अच्छा लोगऽ के साथ छै, वू बहुत सुखी होय छै । ऐहे से दोस्ती करे से पहले अच्छा तरह से सोची समझी लेना चाहीवऽ कि हमरऽ दोस्त किरंग छै, एकरा साथ दोस्ती करना चाहीवऽ कि नांय ?
150- मनऽ केरऽ बात
ईश्वर केरऽ देलऽ होलऽ ई जिन्दगी में कोय मोड़ पर हमरऽ कोय न कोय प्रिय हमेशा के लेलऽ छुट्टी जाय छै । जेकरऽ आबे केरऽ रास्ता सब तरफ से बन्द छै । एन्हऽ में ऐहे ख्याल आबे छै कि दुनियां से जाय वाला नांय जाने कहाँ चलऽ जाय छै । विश्वास करना आसान छै कि दुनियां केरऽ ई भीड़ऽ में वेहे आदमी नांय देखाय रहलऽ छै जे हमरऽ प्रिय छेले । जेकरऽ अपनऽ हमेशा के लेलरऽ छुट्टी चुकलऽ छै, वेहे ई दर्द के समझी सके छै । जे चलऽ गेले ओकरऽ पीथु रही जाय वाला ई दर्द के साथ कैसे जीवन बिताबै छे, ई एक भुक्त भोगी ही समझी सके छै । हर घड़ी ऐहे लागे छै, वू कहीं से निकली के सामने आय जेतले, ई भगवान केरऽ देलऽ होलऽ एन्हऽ पीड़ा छै, जे हमरा बारं बार याद दिलाबै छै कि वू परम सत्ता केरऽ सामने हमरऽ कुछ भी नांय छै । बस बेवसी छै, अपनऽ आदमी के हमेशा- हमेशा के लेलऽ खो देना बहुत अधिक पीड़ा होय छै । जे हमरा आगु जीये केरऽ इच्छा ही खतम करी दै छै । हम्में समझ ही नांय पाबे छिये कि जेकरा साथ कल तक जिन्दगी केरऽ सब घड़ी बीती रहलऽ छेले, वू अबे कहियो नांय आबे वाला छै । हमरऽ जिन्दगी केरऽ समय ही बदली गेले । यहाँ तक कि लोगऽ केरऽ व्यवहार भी बदली गेछऽ छै, एन्हऽ में आदमी के अपनऽ दुख खतम करे केरऽ एके रास्ता नजर आबे छै, अपने के ही खतम करी दिये । एन्हऽ बहुत पीड़ा झेली रहलऽ लोगऽ से हमरऽ एक आग्रह छै कि थोड़ऽ ठहरऽ आरो सोचऽ कि हम्में अपनऽ जिन्दगी में एकरा से भी ज्यादे मानसिक पीड़ा नांय काटलऽ छिपे ? कुछ नांय करी के भी दोसरा या अपना से पैलऽ होलऽ धोखा, अपमान, कट वचन, तिरस्कार, हमेशा नीचा देखाबै केरऽ कोशिश जब ई सब समय केरऽ मार समझी के कारी ले लियो ते काहे नांय एकरा भी समय आरो भगवान केरऽ निर्णय मानी के आगु बढि़ये । कहलऽ छै भगवान ने सब के ई धरती पर कोय न कोय उद्देश्य से ही भेजलऽ छथिन । एकरा खतम करे केरऽ अधिकार हमरऽ नांय छिके । जों ई धरती पर अपनऽ इच्छा से नांय एलऽ छिये, ते जाय केरऽ निर्णय भी हम्में नांय लै सके छिये । अपनऽ प्रिय केरऽ मृत्यु के बाद हमरऽ जीवन केरऽ कोय अर्थ नांय रहले ते अपनऽ ई सोचऽ के विराम (रोक) देते होलऽ, हमरा ई सोची के आगु बढ़ना चाहीव, कि दुनियां में एन्हऽ लोगऽ से भरलऽ पड़लऽ छै । जेकरऽ हालत हमरा से भी बदतर छै, जबे वू अपनऽ विषम (दुर्लभ) हालत से लोहा लै के आगु बढ=ी सके छै, ते हम्में काहे नांय ? (कत्ते लोग छै जेकरा हमरऽ जरूरत छै, बस अबे निर्णय ले आरो वू आदमी के सहायता के लेलऽ आगु बढ़ऽ जे तकलीफ में छै । थोड़े से शुरूआत करऽ तोहें अपने अनुभव करमऽ कि तोरऽ मनऽ केरऽ तकलीफ कम होय रहलऽ छै । ऐ हे ते तोहे चाहे छेल्हऽ । देर की बात केरऽ आगु बढ़ऽ आरो बनाबऽ अपनऽ आरो दोसरा केरऽ जिन्दगी के ।
151- सुबह उठना श्रेष्ठतम छै ।
आजकल जेत्ते भी काम कठीन मानलऽ जाय छै, ओकरा में से छै बिहाने जल्दी उठना । आबै वाला दस- पन्द्रह साल बाद ते शायद जल्दी उठे वाली पीढ़ी ही खतम होय जेते । जल्दी उठे केरऽ महत्व तबे समझते जबे प्रातः काल केरऽ मतलब समझ में ऐते । प्रातः काल यानि सूर्योदय केरऽ घड़ी । काहे कि वू समय सूरज उदय होय छथिन, ऐहे से ध्यान मय, ज्ञानमय आरेा पराक्रम मय ऊर्जा एकदम ताजा उदय होय छथिन, ई समय सभे देवता अपनऽ शक्ति के साथ हवा के रूपऽ में आवे छथिना शास्त्र काइ ने काल पुरूष के एक घोड़ा केरऽ उपमा देते होलऽ । कहलऽ छथिन की उषा काल यानि बिहाने बिहाने वू घोड़ा केरऽ माथऽ छै । जे ई समय के गमैलकऽ समझऽ वें काल पुरूष केरऽ माथऽ ही काटी देलकऽ । ऐहे से हिाने केवल बिछौना छोड़ना नांय, ओकरा से भी ज्यादा समय से पकड़ना छै । बिहाने जल्दी उठना एक नियम छै । फेरू दिन भर हमरा परिश्रम (मेहनत) भी करना छै । जेकरा अनुशासन (नियम) से स्पर्श मिली जाय वू कम मेहनत में भी ज्यादा सफलता पाय लेते । एक पहलवान दोसरऽ पहलवान के पटकी दै छै, आरेा ओकरऽ छाती पर चढ़ी जाय ते ऊपर वाला के ज्यादा ताकत लगे छै । काहे कि ओकरा फिकिर रहे छै कि नीचे वाला पहलवान की तरह से छै । हम्में ऊपर वाला के रूपऽ में ओकरा पर नियम लदी देलऽ छिये । नियम के दबाव नांय बनाबऽ । बिहाने उठै केरऽ मतलब ई समझऽ कि प्रकृति जो अपनऽ श्रेष्ठ दै रहलऽ छै, तो हमरा जरूर लेना चाहीवऽ बिहाने बिहाने सूर्य केरऽ किरण देहऽ में लागे से देह निरोग रहे छै ।
152- बीहा वाला घऽर हँसते रहे छै ।
बीहा वाला घऽर हँसते रहे छै । खुशी केरऽ डेरा होय छै । रंग, खुशबू, मधूर ध्वनि, मधीम- मधीम हंसी केरऽ फुहारऽ के साथ हंसी केरऽ ठहाका, केरऽ मिलन यहीं होय छै । त्योहार वाला बंदन बार रंगोली चौक भी, हल्दी केरऽ रंग, कत्ते सुहावना लागे छै । दीया भी जले छै, आरो रोशनी केरऽ लरी झालर है रंग लागे छै, सभे परब (पर्व) एक साथ मनाबे के लेलऽ पूरा परिवार एक जगह आबी गेलऽ होवे । सब के पास कुछ न कुछ काम होय छै । बीहा वाला घऽर में जहाँ सभे के सजे सम्हरे केरऽ मौका मिले छै सब एक दोसरा के देखी के हँसी- मजाक करे छै, तोहें हैरंग पेन्हल छें ? लघटरऽ भरना, आम- महुआ विहाना, कत्ते विधि विधान में दिन बीती जाय छै । दिन भर केरऽ थकान केरऽ बाद बेटी माय केरऽ आंखऽ में नींद कहाँ । बिछौना पर सुते ले गेली । ते लोरे से चदर भींजी गेलऽ । माय, मौसी, बहीन, भौजाय सब बेटी केरऽ सामान सरियाबे में रात बीती गेलऽ । बात गमछा से लोर पोछी पोछी के बोले लागला पालना में झुले वाली नन्ही बेटी, आज गेली में बैठती । दिन किरंग बीती गेले, बीहा होय गेलं विदाई केरऽ घड़ी आबी गेले । ई घड़ी जिन्दगी केरऽ आईना होय छै । नाता रूप बदलते रहे छै, हुन्कऽ नया रूप के किरंग स्वागत चाहीवऽ । कोय त्रुटि नांय होय जाय । माय बाप के उल्टी उल्टी के देखते बेटी डोली पर बैठी गेली, आंखऽ से लोर चुवाते एक देहरी लांघै छै, दोसरऽ देहरी पर अपनऽ स्वागत में आरती केरऽ थरिया पावे छै । समृद्धि केरऽ कलश लै के नया घरऽ में प्रवेश करे छै । कनियाय अपना नया पहचान से मिले छै । जिन्दगी नया पोशाक में सजे छै । दु परिवार केरऽ सभे लोगऽ से अपना लेल नाता केरऽ नया नाम पावे छै । बीहा जिन्दगी केरऽ हाथऽ में मेंहदी जेन्हऽ सजै छै । एकरऽ रंग गाढ़ो रहे, ई महकते रहे, ऐहे सब बेटी (कनियाय) केरऽ कामना रहे छै । ऐहे सब दुल्हा केरऽ जिम्मेदारी होना चाहीव । आरेा घर केरऽ इच्छा भी । दोनों परिवार एक दोसरा के लेलऽ जिम्मेदार होय जाय छै सुख दुख सब घड़ी निभाबे के लेलऽ ।
153- नया रिस्ता अपनाय के, पुरानऽ के नांस भूलऽ ।
अपनऽ पुरानऽ रिस्ता आरो नजदीक केरऽ रिस्ता केरऽ ऐते भी तारीफ नांय करऽ कि नया रिस्ता बने वाला छोंऽ वेहे पुरानऽ से जलन हुवे लगे या अपने के उपेक्षित महसूस करे लागे । पुरानऽ रिस्ता केरऽ अपनऽ महत्व छै, आरो जे नया रिस्ता तोरऽ जीवन में आय रहलऽ छै, ओकरऽ अपनऽ खुबी होते । जिन्दगी केरऽ सफर में रिस्ता निशान के तरह होते जाय छै । आरेा ई सफर जमीन से आसमान तक केरऽ होय छै । ऐहे से रिस्ता इशारा बनते चलऽ जाय छै । हर लम्बा सफर थकाबै भी छै । रिस्ता जबे अपनऽ मंजिल पर पहुँचे दै ते एक मिठऽ सन थकान आय जाय छै । कुछ रिस्ता प्रेम केरऽ अनुभूति कराबे छै, जे बहुत अपनऽ होय छै । एन्हऽ देखलऽ जाय छै कि पुरानऽ रिस्ता माय- बाप, बच्चा सनी, भाय बहीन केरऽ होय छै । फेरू बीहा केरऽ बाद ससुरार पक्ष आदि के रूपऽ में आबे छै । जबे लोग पुरानऽ रिस्ता केरऽ गुणगान करते रहे छै, ते नया रिस्तेदारऽ के लागे छै । हमरऽ जरूरत की छै ? आरो यहीं से झंझट शुरू होय जाय छै । अपनऽ सगे भाई बहन, माय बाप केरऽ महत्व बिल्कुल नांय नकारऽ लेकिन जीवन में पत्नी या पति के रूपऽ में जीवन साथी आलऽ छै, ते ओकरऽ सामने रिस्ता केरऽ एन्हऽ बखान नांय करऽ कि वू उपेक्षित महसूस करे लाये । ध्यान दिहऽ रिस्ता जलन भी पैदा करे छै ई जलन मिटाबै ले होवेते बालऽ (वाणी) में मिठास रखिहऽ । रिस्ता केरऽ अदालत में जे खुशामद (पैरवी) करे ले पड़े छै, ओकरे में मिठ्ठऽ बोली (वाणी) केरऽ बहुत बोड़ऽ योगदान होय छै । ऐहे से रिस्ता पुरा मिठास के साथ निभै ईहऽ पुरानऽ के छोड़ना नांय छै, नया के जोड़ना छै ।
154- मुस्कुराहट
आफिस में केकरो से बहस होय गेलऽ होवे, या फेरू घरऽ में केकरो से मन मुटाव होय गेलऽ होवे ति तोहें ओकरा सामने थोड़ऽ सन मुस्कुराय दहऽ, ते सब दोव शिकयत पलभर में दूर होय जातै । मुस्कुराहट में ऐत्ते ताकत होय छै । एकरऽ जरिया से तोहें दोसरा केरऽ दिल जीती सके छऽ । कोय रोखलऽ (रूठलऽ) के मनाय सके छऽ । ई तरह से तोरा भी खुशी आरेा संतोष मिल्थों, मुस्कुरैलऽ चेहरा देखाय छै, ते गुस्सा कम होवे लागे छै । हमरऽ चेहरा पर मुस्कान खिली उठे छै । एकरऽ ई मतलब नांय छै कि हंसते रहे वाला के जीवन में दुख नांय छै, लेकिन खुश मिजाज रहते होलऽ स्थिति के संभाले छै । हंसते- मुस्कुराते लोग जानलऽ बिना जानलऽ दोसरा के भी हंसे मुस्कुराबे केरऽ प्रेरणा दै छै । ऐ हे से एन्हऽ लोगऽ से सभे मिलना पसंद करे छै । जे मुस्कुराबे केरऽ महत्व समझै छै, हमेशा हंसे मुस्कुराबै वाला आदमी छोटऽ मोटऽ बातऽ पर लड़ाय झगड़ा से भी बचाबै छै, काहे कि केकरो बातऽ पर ऐतता ध्यान नांय देते कि बात बिगड़ी जाय, सब कोय एन्हऽ आदमी से बात करना आरो दोस्ती करना चाहे छै । एन्हऽ लोगऽ केरऽ व्यवहार भी अच्छ होय छै । एन्हऽ लोगऽ केरऽ आस पास गलत सोच वाला लोग भी कमे मिले छै । विज्ञानिकऽ केरऽ मुताबिक हंसना मुस्कुराना कोय दवाई (दवाय) से कम नांय होय छै । हंसे से तनाव दूर होय छै । आरो सब तरह केरऽ दुख के भी भूलाबै में मदद मिले छै । जहाँ एक तरफ मुस्कान हमरऽ जीवन के सुन्दर बनाबै छै, वहीं एकरऽ जरिया से हम्में स्वस्थ भी रहे छिये । स्वास्थ्य केरऽ दृष्टि से भी हंसते- मुस्कुराते रहला से अच्छा होय छै । जे लोग हमेरो हंसते मुस्कुराते रहे छै, वू लम्बा समय तक जवान देखाबै छै । मुस्कुराबै आरो हंसे से मांस पेशि केरऽ एक्सऽ साइज भी होय छै । जेकरा से चेहरा पर जल्दी झुर्री नांय पड़े छै, आरो चेहरा हमेशा सुन्दर चमकदार रहे छै । मुस्कुरैलऽ चेहरा तोरऽ आत्म विश्वास के भी देखाबै छै । अगर तोहें मुस्कुरैलऽ होलऽ चेहरा कोय परीक्षा में जाय रहलऽ छऽ ते तोरऽ पक्ष में सही केरऽ माहौल शुरूआते में बनी जाय छै । हंसी मुस्कुराहट सब दुख भूलाय के, रिस्ता में तनाव मिटाय के आगु बढ़ाबै केरऽ प्रेरणा भी दै छै । एकरा से चिड़चिड़ापन गुस्सा दूर होय छै । रिस्ता बढि़यां बने छै, एकरऽ भी ध्यान रखै ले पड़थों । तोरऽ हंसी मुस्कुराहट हमेशा मर्यादित होना चाहिवऽ । हंसी मुस्कुराहट केकरो उपहास करे वाला नांय होना चाहीव । एन्हऽ करे से सामने वाला नाराज भी होय सके छै । जबर जस्ती हंसे मुस्कुरावै केरऽ कोशिश नांय करऽ । नाटकीय हंसी मुस्कुराहट तोरऽ व्यक्तित्व पर खराब असर पड़थोंऽ । लोग तोरा देखावटी इंसान समझथोंन । अगर हंसे मुस्कुराबै केरऽ मोन नांय छोनते बढि़यां छै कि नांय हंसऽ नांय मुस्कुरावऽ ।
155- खुश रहना सिखऽ
खुश रहना खुश रखना आरो खुशी बांटना, अलग अलग बात छै । चलऽ देखे छिये ई तीनों काम कि रंग करलऽ जाय, सबसे पहिले ते खुश रहना शुरू करऽ । एकरा आसान नांय समझऽ । हम्में अपनऽ खुशी केरऽ रिमोट दोसरा केरऽ हाथऽ में दे देल छिये । ज्यादातर हमरऽ खुशी दोसरा लोगऽ से संचालित होय छै । कोय हमरा से कहे छै, होतें बहुत अच्छा छऽ आरो हम्में दिन भरके लेलऽ प्रसन्न होय जाय छिये । थोड़ सन विपरीत बात होय गेलऽ कि हमरऽ दिमाग खराब होय जाय छै । लोग तै ही नांय करे ले पावे छै कि छिकां ? ई भी दोसरे से तै कराबे छै । जो अपने के जाने केरऽ इच्छा जाग्रत करी ले ते तोहें खुश रहना सिखी जाभे । जबे खुश रहे ले सिखी जाभे ते पहिला काम ऐहे करीहऽ कि दोसरा के खुश रखिहऽ । खुश रहना आसान छै, लेकिन खुश रखना कठीन छै । अपनऽ लोगऽ से जान पहचान होय जाय ते तोहें ओकरा खुश रक्खी सके छऽ । खुश रहना आरेा खुश रखना, एकरा में पहिले अपने के जानना आरो दोसरा में अपनऽ जान पहचान केरऽ लोग आते । लेकिन एक तीसरा काम भी छै खुशी बांटना । ई अनजान लोगऽ के बीच कई ले पड़े छै । खुशी बांटे के लेलऽ कोय बहुत संसाधन नांय अपनाना छै । एकरा लेलऽ बस बोड़ऽ दिल चाहीवऽ खुश रहना, खुश रखना आरो खुशी बांटना ई तीन केरऽ ताल मेल बनी जाय ते मानी के चलऽ तोहें अपनऽ जीवन केरऽ समापन तक खुशी केरऽ ऐते बोड़ऽ बैंक बनाय चुकलऽ होभऽ कि जबे विदा होय जाभऽ ते लोग मानी के चलते कि ई एतना कुछ दै गेले कि एकरऽ गेला केरऽ बाद अबे पता चलले कि खुशी केरऽ सही मतलब की छिके ।
157- इमानदारी
गांव में एक पंडित जी रहे छेलात । हुन्कऽ आरेा हुन्कऽ प्रवचन केरऽ ख्याति दूर- दूर तक फैललऽ छेले । एक दिन मंदिर केरऽ पुजारी केरऽ अचानक मृत्यु होय गेले । मंदिर केरऽ पूजा करे के वास्ते पंडित जी के जाय ले पड़ल्हैन, पंडित जी बस पर जाय रहलऽ छेलात । हुन्हीं कन्डक्टर के किराया देलका बांकी पैसा लौटाते समय कन्डक्टर दस टाका बेसी लौटाय के देलके, पंडितजी नोट मुठ्ठी में बांधी लेलका । हुन्कऽ मनऽ में पहले ख्याल ऐल्हें न कि कन्डक्टर दुबारा पैसा मांगे ले आते । आरो अपनऽ दस टाका लै जाते । लेकिन वू नांय आलऽ पंडित जी मनऽ में सोचलका, बस मालिक ते लाखों केरऽ मालिक छै, लाखों टाका कमाबे छै, दस टाका रखी लेबे ते ओकरा की फरक पड़ते, ई सोचते सोचते हुन्हीं मनऽ में तै करी लेलका कि ई दस टाका केरऽ नोट मंदिर में चढ़ाय देबे, फेरू अपना पास रक्खी लेबे, ई बीचऽ में वू स्थान आबी गेले जहाँ पंडित जी के उतरना छेल्हेंन । पंडित जी उतरता, लेकिन हुन्कऽ मन नांय मानल्हेन हुन्ही घुरी के कंडक्टर के दस टाका केरऽ नोट देते होलऽ कहलका, भाय तोहें दस टाका केरऽ नोट बेसी दै देलऽ छेल्हऽ, एकरा पर कन्डक्टर जे कहल रवें पंडित जी केरऽ होश उड़ी गेल्हेंन । कन्डक्टर बोलले तोहें गांव केरऽ नया पुजारी छिक्खऽ, पंडितजी हामी भरलका । कन्डक्टर बोलले हमरऽ मनऽ में के दिनऽ से अपने केरऽ प्रवचन सुने केरऽ इच्छा छेले । अपने के बसऽ में देखलिये ते ख्याल आबे कि अगर हम्में बेसी पैसा लौटाय दे छिये ते अपने की करे छऽ । ऐ हे देखना छेले । अबे हमरा पूरा विश्वास होय गेले कि अपने केरऽ प्रवचन में जे रंग कहे छऽ वेहे रंग अपने केरऽ आचरण भी छै । एतना कहते होलऽ कन्डक्टर बस आगु बढ़ाय देलके ।
158- बिना मतलब दखल देना ।
बिहाने केरऽ आठ बजे वाला छेले, उमा अपनऽ दोनों बच्चा केरऽ टिफिन बनाय के इसकूल (स्कूल) बस पर बैठाय के लौटी रहलऽ छेली, तभीय फोन घनघनाय लागले । उमा मुंह बनैलऽ फोन उठालकी, वू समझी रहलऽ छेली कि माय केरऽ फोन होते । मौका बेमौका मांय केरऽ फोन आना आरो ओकरऽ निजी जिन्दगी में बेमतलब दखल देना । अबे उमा के भारी पड़े लागलऽ छेले । ओकरा अपनऽ गृहस्ती अस्त व्यस्त नजर आय रहलऽ छेले । वू अपनऽ माय केरऽ बात नांय माने छै तेमाय नाराज होय जाती, आरो हमरऽ पति से उलटा सीधा सुनाती, एकरऽ असर सीधा उमा पर पड़ते । पति अपनऽ सब गुस्सा उमा पर उतारता, उमा केरऽ सास भी कटी जली सुनाबे छथिन, पता नांय केन्हऽ सुतोह मिललऽ छै । बीहा केरऽ पांच साल होय गेले, लेकिन अभी तक माय केरऽ अचरा में ही चिपक रहे छै । आय दिन फोनऽ पर बतियाते रहती । काम धंधा पर कोय ध्यान नांय । जबे कि आज माय बिहाने बिहाने फोन करी के उमा के अलग रहे केरऽ सलाह दे रहलऽ छेली । उमा के मना करे पर बिगड़ी गेली । आरो बोले लागली । कुछ अपनऽ भविष्य केरऽ बारे में भी सोचे उमा ? कब तक साझा परिवार में पिसाते रहबे । कब तक सास ससुर आरेा देवर केरऽ सेवा करते रहबे । बहुत रहले साझा परिवार में । अबे अलग रही के अपनऽ घऽर बसा । तोहरा से ई सब नांय बोललऽ जाय छऽ, ते हम्हीं दमाद के अलग रहे केरऽ सलाहदे दै छिहेंन । एन्हऽ कही के उमा केरऽ माय फोन काटी देलकी । उमा मने मन परेशान हुवे लागली माय केरऽ ई सब सुनी के उमा के ई बात बिना मतलब दखल देना लागी रहलऽ छेले । हम्में यहाँ आराम छी सभे हमरा कत्ते भाने छै । वू तुरंत अपनऽ पति के फोन करी के सब बात बताय देलकी, आरो ई भी कहलकी माय केरऽ फोन आबे ते तोहें साफ कही दिहऽ कि हमरऽ परिवार में अनावश्यक दखल नांय दहऽ ते ज्यादा अच्छा छै । भले माय हमरा से नाराज होय जाती ते होय जाय । हमरा कोय हालत में अलग नांय रहना छै । आरेा होंऽ भले ही हमरा से हमरऽ माय नाराज होय जाय, लेकिन हम्में अपन ई माय के नाराज नांय करबऽ जेकरा साथऽ में हम्में रही रहलऽ छिये । ई कही के उमा फोन राखी देलकी । हुन्ने पति आफिस में चापकेरऽ चुस्की लेते होलऽ अपनऽ कनियाय केरऽ समझदारी भरलऽ निर्णय पर गर्व महसूस करते होलऽ धीरे धीरे मुस्कुराय रहलऽ छेला । हुन्हीं भी निर्णय करी रहलऽ छेला आज जों, माय जी केरऽ फोन आते ते आय दिन केरऽ अनावश्यक दखल देना हमेशा हमेशा के लेलऽ बन्द करी देवूं । भले ही अन्जान जे होते । अबे ते उमा भी हमरऽ साथ छै । उमा केरऽ समझदारी पर पति गौरवान्वित महसूस करी रहलऽ छेला ।
159- सास केरऽ देल ज्ञान ।
पन्द्रह- बीस साल पहले केरऽ बात छिके हमरऽ बीहा केरऽ दु बरस होय गेलऽ छेले । खाना करेऽ बाद आबे वाला अवान्छित मेहमानऽ से हमरा बड़ी चिढ़ लागे छेले नेहरा में मेहमानऽ केरऽ आवभगत केरऽ जिम्मेदारी माय आरे । बड़की दीदी ही निभाबे छेली । ऐहे से हमरा कुछ पता नांय छेले । बीहा केरऽ बाद हमेशा हमेशा ही हमरऽ प्रति दोस्तऽ के कभी खाना के पहिले आरो कभी खाना केरऽ बाद न्योता दे दे छेला । हम्में सगे केरऽ खाना बनावे छेलिये । लेकिन हमरा ई बातऽ पर गुस्सा आबे छेले कि ऐहे बात पहिले बताय सके छेला कि हम्में चार आदमी आय रहल छी, खाना बनाय केर खिहऽ । बिना परेशानी केरऽ खाना बनी जातले । हमरऽ पति हमेशा कहे छेला कि जेन्हऽ हम्में चाहे छिये, हमेशा होरंग नांय होय सके छै । कभी- कभी अप्रत्याशित के लेलऽ भी रहना चाहीवऽ । फेरऽ खाना खिलाना कोय ऐत्ते बोड़ऽ बात ते छै कि प्रोग्राम बनेलऽ जाय एन्हऽ समय में हमरा चुप्पे रहे में अच्छा समझलिए । काहे कि हम्में जाने देलिये कि हम्में यहां पर गलत छिये । माय के भी हमेशा अचानक आवे वाला मेहमानऽ केरऽ स्वागत प्रसन्नता से ही करते होलऽ देख छेलिये । लेकिन दुर्भाग्यवस माय केरऽ ई स्वभावऽ के नांय अपनावे पार लिये । शायद हम्में ई स्वभावऽ के बदले में असमर्थ ही रहत लिये लेकिन एक घटना हमरा हमेशा के लेलऽ बदली देलके । पति केरऽ पोस्टिंग एक बोड़ऽ शहरऽ में होय गेल्हेंन, आरेा हम्में सास ससुर के साथ में रहे छेलिये । हुन्कऽ टीम एक एक प्रतियोगिता में प्रथम ऐलऽ छेले । रात करीब साढ़े नौ बजे फोन पर बतैलका कि हम्मेमं दु घंटा में आबी रहलऽ छी । तोहें ग्यारग आदमी केरऽ खाना बनाय के रखिहऽ । यहाँ हम्में सब खाना खाय के खुते केरऽ तैयारी करी रहलऽ छेलिये । ई सुनी के हम्में झनक पटक करे लागलिये । हम्में सोचलिये कि जबे खाना घरे में खाय ले छेले ते पहिवे बताय देलऽ होतला । फेरू एत्ते लोगऽ केरऽ । खाना बनाबे केरऽ अनुभव नांय छेले । दोसर तरफ हमरऽ सास जिनका जल्दी खाना खाय के सुते केरऽ आदत छेल्हेंन, लेकिन ऊ दिन सास बिना कोय शिकायत केरऽ झटपट खाना बनाबे केर तैयारी करे लागली तैयारी में ते हम्हुं शामिल छेलिये । एकर खीझ हमरऽ चेहरा पर साफ झलकी रहलऽ छेले । लेकिन सास केरऽ चेहरा पर तनियोटा शिकन नांय छेल्हेंन । बल्कि हुन्हीं खुशी खुशी सब करी रहलऽ छेली । हम्में घड़ी घड़ी सास से कही रहलऽ छेलिये कि अगर ऐहे बात समय से पहिले बताय देतला ते शायद हम्में सब कुछ खास बनाय के खिलाय सके छेलिये । हम्में चाहे छेलिको कि सास कही हमरऽ बात पर समर्थन करती, लेकिन हुन्हीं जे कहलकी वू हमरा शब्दशः, याद छै । तोहें ई काम मत करऽ । आरो जो करे छऽ, ते पुरे प्रेम आरो निष्ठा से प्रसन्नचीत होय के करऽ । जो तोहें समयाभाव केरऽ कारण कुछ खास नांय बनाबे से छऽ ते कम से कम साधारण खाना ते कड़ुवाहट से नांय बनाबऽ । प्रतियोगिता केरऽ कारण नांय जाने कत्ते दिनऽ से बच्चा घरऽ केरऽ खाना नांय खालऽ होते । हम्में शर्मिंदा होय गेलिये, हुन्कऽ बातऽ पर । हमरऽ मनऽ में बात बैठी गेले, आरेा वेहे समय परण (प्रण) करी लेलिये कि भविश्द में कभी भी ई तरह केरऽ व्यवहार नांय करबे तब से लेके आज तक वक्त वेवक्त खाना बनाना हमरा खराब नांय लागले । सासु माता केरऽ बातऽ में देलऽ गेलऽ ज्ञान ने हमरऽ जिन्दगी केरऽ एक बेहतरीन पाठ पढ़ाय देलकी ।
160- बेटी
बेटी बोड़ऽ होय गेली, एक दिन वें बड़ी सहज भाव से बाबू से पुछलकी बाबू जी हम्में तोरा कहियो रूलैलऽ छिहों ? बाबू जी ने कहलका हों, बेटी बड़ी अचरजऽ पुछलकी कहिया ? बाबू जी बतैलका वू समय तोहें करीब एक साल केरऽ छेल्हीं, घुटना से चले छेल्हीं, तोरऽ बुद्धि केरऽ परीक्षा लेबे खातिर तोरऽ सामने हम्में पैसा, कलम, आरो खिलौना राखी देलिये काहे कि हम्में देखना चाहे छेलिये कि तोहें ई तीनों में से केकरा उठाबे छें । तोरऽ चुनाव हमरा बतैलके कि तोहें बोड़ऽ होय के केकरा ज्यादा महत्व दे भीं । बेटी पुछलकी जैसे ? पैसा मतलब सम्पति, कलम, मतलब बुद्धि, आरो खिलौना मतलब आनन्द । हम्में ई सब बहुत सहजता से आरो उत्साह से करलऽ छेलिये । काहे कि सिर्फ तोरऽ चुनाव देखना छेले । तोहें एक जग्धऽ स्थिर बैठी के टुकुर टुकुर वू तीनों चीजें के देखी रहलऽ छेल्हीं । हम्में दोसरऽ तरफ बैठी के बस तोरे देखी रहलऽ छेलियो । तोहें घुटना के बल चलते आगु बढ़ले हम्में अपनऽ सांस रोकी के तोरे देखी रहलऽ छेलियो, आरो क्षण भर में तोहें तीनों चीजऽ के आजू बाजू सरकाय देल्हीं आरोऽ सबके पार करते होलऽ आय के सीधा हमरऽ गोदी में बैठी गेल्हीं । हम्में सोचले भी नांय छेलिये कि ई तीनों चीजऽ केरऽ अलावा तोरऽ चुनाव हमरऽ भी होय सके छेले । तभीये तोरऽ तीन साल केरऽ भाय आलऽ आरो कलम उठाय के चलऽ गेले । वू पहिली बार आरो आखिरी वार छेले । बेटा जबे तोहें रूलैले हमरा आरो बहुत रूलैले भगवान केरऽ देलऽ होलऽ सबसे बोड़ धरोहर छिकी बेटी । की खूब लिखलऽ छै एक पिता ने – केकरो बेटा केरऽ कतार चाहीवऽ । हमरा हमरऽ बेटी ही काफी छै ।
161- टुटल कटोरी
कटोरी टुटी गेलऽ छेले, पुरानऽ होय गेलऽ छेले । ओकरा फेंकी दहिं । कभी भी हाथऽ में लगी जेती, धोते भांजते हाथ कटे केरऽ डऽर बनलऽ रहतौ । लेकिन कनियाय कटोरी के नांय फेंकलकी । एक दिन फेरू टोकलके, ओकरऽ कनियाय बोलली, ई हाथ में नांय लगते बल्कि ई कहऽ कि एन्हऽ हाथऽ में लगलऽ छै कि फेंके केरऽ इच्छा नांय होय छै । मोह होय मेलऽ छै ई कटोरी से । तोहें भूली जाय छऽ, लेकिन हमरा याद छै । दस साल पहले कुछ परेशानी छेले । हम्में सब जबे बाड़ेऽ शहरऽ में छेलिये, जहाँ जब चीज महँग, मिले छेले । जबे तीन महीना से दरमाहा (बेतन) नांय खरीदे सकलऽ छेलिये । एक चम्मच आरो ऐ हे कटोरी खरीदने छेलिये । हुनका सचमुच ई सब याद नांय रहे छैन । इसकूलऽ (स्कूल) में गर्मी केरऽ छुट्टी होले, कनियाय बच्चा के साथ गांव चलऽ गेली । अबे रसोई इन्के सम्भारे ले पड़ल्हेंन । कोह कि हुन्का छुट्टी नांय मिललऽ छेल्हेना एक दिन कुकर में दाल चूल्हा पर चढ़ाय के सोचे लागला, चावल साफ करी के रखी ले छी, जब तक दाल सीझे छै । चावल जे डिब्बा में राखलऽ छेले, ओकरऽ मुंह छोटऽ छेली चावल निकाले के लेलऽ ओकरा वेहे कटोरी सामने देसले । कटोरी छोटऽ छेले ऐहे से डिब्बा से चावल निकाले आसानी काम आय गेले । एतने देर में ओकरा लागले भानऽ कटोरी कही रहलऽ छै, देखऽ हमरा फेंके ले कही रहलऽ छेल्हऽ ने ? आखिरकार हम्ही काम आलीहोंन । मानऽ शरीर से थोड़ऽ कमजोर छी, लेकिन कही न कहीं घरऽ केरऽ बुढ़ऽ केरऽ तरह समय पर तोरऽ काम जरूर ऐमोंन । चावल निकालला केरऽ बाद अबे वू ऐसे शर्मिदा छेले कि जेना वू कटोरी के फेंके ले कही रहलऽ छेलिये, मानऽ सचमुच घरऽ केरऽ बड़बुढ़ऽ केरऽ अपमान करी रहलऽ छेलिये । सम्मान जनक दृष्टि से देखते होलऽ ऊ कटोरी के रसोई में एक उचित जग्घऽ पर राखी देलके ।
162- धरती माय
विद्वानऽ केरऽ बीच चर्चा चली रहलऽ छेले कि सृष्टि में वू कौन छै, जेकरऽ सहनशीलता अपार छै कोय पानी के सहनशीलता कहलके ते कोय हवा के कोय अग्नि (आग) के सहनशीलता कही रहलऽ छेले । ते कोय आकाश के वहाँ उपस्थित एक महात्मा ने सभे केरऽ बातऽ के शांत करते होलऽ कहलका – ई सृष्टि में माता धरती ही सबसे ज्यादा सहनशील छथिन । पानी में उफान आय सके छै, आरो हवा में तुफान, आग दावानल केरऽ रूप ले सके छै । आरो आकाश में चक्रवातऽ के जनम दे सके छै । लेकिन धरती माय, एक माय के तरह सभे कष्टऽ के सहते होलऽ सभे प्राणियों केर रक्षा करे छथिन । ऐहे से शास्त्रऽ में प्रातः काल यानि बिहाने- बिहाने धरती केरऽ बन्दना करते होलऽ ई श्लोक के करी के बिछौना से उड़ी के धरती पर लात धरे केरऽ नियम छै । ई मंत्र चढ़ी के धरती पर लात रखलऽ जाय छै ।
‘‘समुद्र बसने दवि पर्वत स्तन मपिऽते ।
विष्णु पत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्श क्षमस्वमे ।।
अर्थात- हे धरती माता आप समुद्र आरो पर्वतों के अपनऽ हृदय में धारण करे छऽ । हम्में अपने केरऽ ऊपर लात (चरण) रखे ले जाय रहलऽ छी, कृपया हमरा क्षमा करीहऽ ।
163- स्वास्थ्य केरऽ कुन्जी
हाथ- पैर में तकलीफ होय के कारण डॉक्टर ने हमरा बिहाने बिहाने टहले केरऽ सलाह देलऽ छै, लेकिन काम धंधा करेऽ व्यस्तता आरो बिहाने केरऽ ठंढा केरऽ कारण घरऽ से निकलना मुश्किल लागे छेले । डॉक्टर केरऽ बात याद आते रहे छेले कि जों तोहें नांय चलभऽ बुलभऽ ते दवाय चले गाजथोंन । हुन्कऽ ऐहे बात डराय देलऽ छेले । तबे हम्में अपने आप बिहाने बिहाने टहले के लेलऽ तैयारी करलिये, तै करलिये कि जल्दी उठबे, समय केरऽ ध्यान रखबै, घरऽ केरऽ सब काम, जेना कि बच्चा के इसकूल (स्कूल) भेजना, टिफिन तैयार करना, पति के आफिस भेजना ई सब ते करबे करे छिये । दोसरऽ दिन हम्में बिहाने बिहाने उठी गेलिये आरो अकेले ही एक छड़ी पकड़ी के घुमे ले निकली गेलिये । टहले में बहुत अच्छा लगले । साफ स्वच्छ हवा केरऽ कारण देहऽ में फुर्ती केरऽ एहसास होले । आरो लोगऽ से मिलना जुलना भी होय गेले हिन्ने हुन्ने केरऽ बातऽ से मनोरंजन भी हुवे लागले, हाथ, पैर केरऽ दरद (दर्द) भी रोज दिन केरऽ घुमे- फिरे से कम हुवे लागले । हम्में एकरा मंत्र बनाय लेलिये कि रोज आधा घंटा घुमे ले जाबे । एकरा से कै फैदा भी छै । बिहाने घुमे से दिन भर ताजगी बनलऽ रहे छै । आरो अबे रोज अपने आप नीन्द आसानी से खुली जाय छै । हम्में ई परिवर्तन से जानलिये कि सब कुछ हमरऽ हाथऽ में ही छै, बस बहाना बनाबे ले छोड़ी के, अच्छा आदत के लेलऽ तैयार रहना चाहीवऽ । स्वस्थ शरीर खुशी केरऽ भंडार छिके ।
164- माय बाप के प्रति श्रद्धा गणेश जी से सिखऽ ।
आदमी केरऽ जीवन सुख- दुख केरऽ जोड़ी छिके । समय एक जन्हऽ केकरो नांय रहे छै । कोय सोची लै कि हमरऽ हिस्सा में सिर्फ सुख ही सुख आबे, ई ओकरऽ भूल छिके । सुख केरऽ पीछु पीछु दुःख भी ऐवे करे छै । आदमी केरऽ जीवन में दुःख पाँच जगह से आबे छै । संसार से, संपत्ति से, संबंध से, स्वास्थ्य से, आरऽ संतान से । बांकी दुखऽ से आदमी लड़ी भी सके छै । परंतु संतान केरऽ दुःख से बोड़ऽ से बोड़ऽ आदमी के टूटते देखलऽ छिये । संतान नांय होय केरऽ दुःख ते अपनऽ जग्घऽ होबे करे छै, लेकिन संतान होय के नालायक निकली जाय से मनमें ज्यादा कष्ट दै छै । ई दुःख बचे के लेलऽ एक मात्र उपाय छै, बच्चा के जन्म से ही संस्कार से जोड़ी देलऽ जाय । बच्चा संस्कारीवान होते ते संतान से मिले वाला संताप से ते तोहें बचबे करभे । बांकी चार प्रकार केरऽ दुखऽ के भी धैर्य करेऽ साथ सामना करी ले भे । ध्यान रक्खऽ अपनऽ दांपत्य जेतना प्रेमऽ पूर्वक आरो दिव्य होन्हों, संतान ओतने संस्कारी आरो शीलवान होनहों । एकरऽ सबसे अच्छा उदाहरण छै, गौरी पुत्र गणेश । माय बाप के प्रति समर्पण की होय छै, आज केरऽ पीढ़ी के गणेश जी से सीखना चाहीव । जे आज घर- घर में विराजै वाला छथ । दस दिन चले वाला मंगल आराधना में ई संकल्प जरूर लै ले कि ई साल कुछ एन्हऽ करीयै, जेकरऽ उपयोगिता पुरे समाज के लेलऽ हुवे । एक बात आरऽ सुनऽ, अपनऽ घरऽ में माटी केरऽ ही गणेश जी स्थापना करऽ । पर्यावरण केरऽ दृष्टि से समाज के लेलऽ बहुत अच्छा संदेश छै । विद्या-बुद्धि केरऽ भंडार छिका गणेश जी हिन्कऽ अराधना जरूर करऽ ।
165- ज्ञान केरऽ परीक्षा
एक बहुत बोड़ऽ जगर छेल, नदी किनारो एक विद्याश्रम छेले । आश्रम में दुठो लड़का ज्ञानर्जन करे छेले । एक केरऽ छेले संतोष आरो एक केरऽ नाम सुबोध, एक दिन दोनों में वाद- विवाद होवे लागले । दोनों अपने आपके ज्यादे बुद्धिमान बताय रहलऽ छेले । समस्या समाधान के लेलक दोनों गुरूजी के पास पहुँचलऽ । वू अपनऽ आश्रम के अलावा आस- पास के क्षेत्र में ज्ञान परीक्षण केरऽ मामला में काफी प्रसिद्ध छेल । हुन्हीं अपनऽ शिष्य केर समस्यासुनलका आरऽ हल करे केरऽ आश्वासन देलका । गुरू जी ने काफी सोच- विचार करलका । हुन्का एक उपाय सुकल्खें । शिष्य केरऽ हाथ में आटा, नमक, मिर्च आरो जरते लकड़ी केरऽ ळुकड़ा थम्हातें होलऽ कहलका, तोरा दोनों के हमरा वास्ते स्वादिष्ट खाना बनाना छै । हम्में दोपहर में खाना खाय वास्ते ऐ भों । हमरऽ आश्रम केरऽ दु दिशा छै । पुरब आरो पश्चिम, पश्चिम में घनऽ वन छै, संतोष तोहें पुरब दिशा केरऽ ओर जा जहाँ तक झरना मिल्योंऽ तोहें वहीं खाना बनैहऽ । सुबोध तोहें पश्चिम दिशा के ओर जा । वहाँ नदी आरो पीपर केरऽ गाछ दिखाई देत्यों वहीं खाना बनाना छै । दोनों गुरू केरऽ आदेशानुसार अपनऽ- अपनऽ दिशा में निकलला । झरना पर पहुंची के संतोषा खाना केरऽ व्यवस्था करे लागला । वहीं झाड़ी में खट्टा- मीठा बेर देखैल्हें, तेड़ी के लै आनल का झरना के एकटा पथल केरऽ चट्टान छेले साफ- सुथरा के पथलऽ पर आटा सानी लेलका, छोटऽ- छोट लिट्टी बनाय लेलका । आस पास से सुखलऽ गोबर केरऽ कंडा (गोइथा) आरो सुखल झुरी झमारी जमा करी लेलका आग जराय के अंगार बनी गेलऽ अंगारऽ पर लिट्टी पकाय लेलका । लिट्टी सबके झाड़ी- पोछी एकटा पत्ता पर जमा करी लेलका । बेर के पथलऽ पर चटनी पीसी लेलका, नोन मरचाय मिलाय चटनी बनाय लेलका । केला पेड़ से पत्ता काटी के लै आनका । चटनी- लिट्टी बढि़या से झांपी के राखी देलका । गुरू जी केरऽ इंतजार करे लागला । गुरूजी पहिले सुबोध केरऽ पास गेला, सुबोध कान्दी- कान्दी के अपनऽ हालत खरा बकरी लेलऽ छेलऽ । गुरूजी बोले, ई की हाल बनाय राखलऽ छें । सुबोध हाथ जोड़ी के गुरूजी से मांफी मांगते होलऽ कहे लागले, गुरू जी अपने ते खाना बनाय के लेलऽ नांय ते पूरा सामान देल्हऽ नांय ते कोय बर्तन, हम्में अपने के लेलऽ खाना किरेंऽ बनात लिये । गुरू जी बोलला, सुबोध कोय बात नांय छै । उठें हमरा साथ चलें । दोनों संतोष के पास पहुँचला । संतोष केरऽ बनैलऽ खाना गुरू जी खैलका, साथऽ में सुबोध भी खैलकऽ बिना वर्तन, बिना मसाला केरऽ संतोष स्वादिष्ट खाना बनैलऽ छै । तोहें सुबोध, सामान केरऽ अभाव में खाना नांय बनाय सकले । संतोष ने ईकरी के देखाय देलके, अबे तोहें समझी गेलऽ होबे कि संतोष तोरा से ज्यादे बुद्धिमान छै ।
166- महापर्व नवरात्र
आश्विन शुक्ल पक्ष केरऽ पडि़वा (प्रतिपदा) से नौमी तक केरऽ अवधि के नवरात्र कहलऽ जाय छै । माता दुर्गा ही समूचा (सम्पूर्ण) विश्व केरऽ शक्ति, स्फूर्ती आरो स्वास्थ्य दै छथिन, देवता सनी केरऽ सहायता के लेलऽ माता जगदम्बा अनेक रूपऽ में प्रकट होलऽ छथिन । घुम्रांक्ष, शुंभ- निशुंभ, चंड- मुंड, मधु कैटभ रक्त बीज आरो महिषासुर जेन्हऽ असुरऽ के संहार करी के ही, महिषासुर मर्दनी कहैलऽ छथिन । जगत जननी माता के प्रकृति भी कहलऽ गेलऽ छै । ई शब्द केरऽ तीन अक्षर सत्व, रज, आरो तम गुणऽ केरऽ प्रतीक छथिन । दुर्गति नाशिनी होवे के कारण माता भगवती के दुर्गा भी कहलऽ जाय छै । दिव्य ऊर्जा से परिपूर्ण होने के कारण नवरात्र के नौ दिन शक्ति केरऽ आराधना केरऽ विशेष फल दै छथिन । अंक में भी नौ अंक के सर्वाधिक ऊर्जावान मानलऽ गेलऽ छै । देवी माता केरऽ त्रिगुणात्मक शक्ति ही नौ दुर्गा स्वरूप छै । ऐसे से पुरे भारत में नवरात्र केरऽ उत्सव बड़ी उल्लास के साथ मनैलऽ जाय छै । ई दौरान माता दुर्गा केरऽ नवऽ रूपऽ केरऽ पूजा करे से नवऽ ग्रहऽ केरऽ पीड़ा (कष्ट) केरऽ भी शमन होय जाय छै । नवरात्र केरऽ व्रत आरो अनुष्ठान में आदमी के अपनऽ परिवार आरो गुरू परंपरा केरऽ ही अनुसार करना चाहव । व्रत केरऽ मुख्य उद्देश्य छै संयम केरऽ प्राप्ति संयमी ही शक्ति केरऽ संयम करी सके छै । ई व्रत आश्विन महीना केरऽ शुक्ल पक्ष केरऽ पडि़वा (प्रतिपदा) से नवमी तक करलऽ जाय छै । कुछ समुदाय में केवल पडि़वा आरो अष्टमी के ही व्रत रखै छै । भक्त के वेहे नियम अपनाना चाहीवऽ जेकरा से ओकराऽ सेहत (शरीर) पर कोय नुकसान नांय पहुंचे । नवरात्र केरऽ शुरू आश्विन शुक्ल पक्ष पडि़वा (प्रतिपदा) के शुभ मुहूर्त में कलश स्थापना केरऽ साथ करलऽ जाय छै । अखंड ज्योति जलाबे केरऽ भी विधान छै । ताकि देवी माता हमरऽ घरऽ में नौ दिन तक विराजमान रहथ । नवरात्र में नवरात्र में नौ दिन देवी नौ रूपऽ में समर्पित छथिन आरो रोज दिन, देवी माता केरऽ कोय एक खास रूपऽ केरऽ विधिवत पूजा करलऽ जाय छै ।
शैलपुत्री- माता दुर्गा अपनऽ पहला रूप में शैलपुत्री केरऽ नामऽ से जानलऽ जाय छथिन । वृषभ (बैल) पर सवाल देवी केरऽ दाहिना हाथऽ में त्रिशूल आरो बाँया हाथऽ में कमल फूल सुशोभित छैन । पूर्व जन्म में ऐहे देरी दक्ष प्रजापति केरऽ कन्या सती छेली । नवरात्र केरऽ पहला दिन हिन्कऽ पूजा करलऽ जाय छैन । देवी भक्त के निरोग रहे केरऽ वरदान दै छथिन । पूजा आरो भोग:- सब से पहिले चावल के कलश में भरी के ओकरा पर घी केरऽ दीया जलाबऽ, फेरू धूप- दीप, कपूर, कुमकुम आरो सुहाग सामग्री अर्पित करी के हुन्का लाल रंग केरऽ चुनरी ओढ़ाबऽ बाजा- गाजा केरऽ साथ देवी माता केरऽ आवाहन करऽ । जों तोहें बिना पंडित केरऽ कलशा स्थापना करे ले चाहे छऽ ते पीतर (पीतल) । केरऽ कलशा में गंगाजल, जौ, तील, आरेा अक्षत डालऽ । फेरू ओकरऽ चारो तरफ लाल कपड़ा बांधी के ओकरा पर स्वस्तिक केरऽ चिन्ह बनाबऽ कलशा केरऽ बीचऽ में आम केरऽ पल्लव लगाबऽ सूखा- नारियल लाल कपड़ा में लपेटी के देवी माता केरऽ ध्यान करते होलऽ कलशा पर स्थापित करऽ । कलशा स्थापना से पहिले गणेश जी आरो शिव जी केरऽ ध्यान करते होलऽ हुन्कऽ पूजा जरूर करऽ । चमेली केरऽ फूल शैलपुत्री माता के बहुत प्रिय छैना एकरऽ अभाव में अड़हुल केरऽ फूल भी चढ़ैलऽ जाय छै । पहला दिन माता के देशी घी अर्पित करलऽ जाय छै । एकर अलावा दूध से बनलऽ पकवान नारियल केरऽ बर्फी पोस्ता केरऽ हलवा, लौंग- इलायची आरो पान केरऽ बीड़ा (कथा, चूना, सुपाड़ी युक्त पान) से माता बहुत प्रसन्न होय छथिन ।
ब्रह्मचारिणी- माता दुर्गा केरऽ दोसरऽ स्वरूप ब्रह्मचारिणी केरऽ छै, जे तप केरऽ आचरण करे वाली छथिन । हिन्कऽ स्वरूप ज्योर्तिमय छैन । दहिना हाथ में जय माला आरो बांया हाथऽ में कमंडल रहे छैन । पिछला जनम में पर्वतराज हिमालय केरऽ बेटी पार्वती छेली, आरो अपनऽ तपस्या केरऽ बल से हि नी शिवजी के प्राप्त करलऽ छेली । ई देवी अपनऽ भक्त के संयम, त्याग, आरो सदाचार केरऽ वरदान दै छथिन । पूजा आरो भोग- कपूर आरो लौंग द्वारा माता केरऽ आरती करऽ छिन्का गुलाबी रंग केरऽ चुनरी ओढ़ाबऽ आरो अड़हुल फूल केरऽ भाला या सफेद फूल चढ़ाबऽ । हिन्का माल पुआ आरेा केला केरऽ भोग लबागऽ ।
चन्द्रघंटा- सिंह पर सवार दस भूजा वाली ई देवी केरऽ मस्तक पर घंटा केरऽ आकार केरऽ अर्द्धचन्द्र (आद्यऽचन्द्रमा) छै । हिन्कऽ शरीर सोना के समान चमके छैन । हिन्कऽ भयानक, घंटा ध्वनि से असूर मय भीत रहे छै । माता अपनऽ भक्तऽ के संसार केरऽ कष्टऽ से मुक्ति करे छथिन । पूजा आरो भोग- तीसरऽ दिन माता केरऽ पूजा सुगंधित धूप, इत्र, आरो कपूर से करना चाहीवऽ । हिन्का केसरिया रंग केरऽ चुनरी ओढ़ाय के चूड़ी बिन्दी सहित सुहाग केरऽ सब चीज अर्पित करऽ, गेंदा या अड़हुल फूल केरऽ माला चिन्हाबऽ । माता चन्द्रघंटा के खोवा से बनलऽ मिठाय, खीर आरेा अनार केरऽ भोगल गाबऽ ।
कुष्मांडा- जबे सृष्टि केरऽ अस्तित्व नांय छेले आरेा चारेा तरफ अंधकार छेले । तबे हिनी अपनऽ हाथऽ से ब्रह्मांड केरऽ रचना करलऽ छेली । ऐहे सृष्टि केरऽ आदि स्वरूपा आरो आदि शक्ति छथिन । हिन्के तेज आरो प्रकाश से दसो दिशा में चमकी रहलऽ छै । हिन्क आठ भुजायें छेन ई अष्टभुजी देवी केरऽ नाम से विख्यात छथिन । संस्कृत में कोंहड़ा के सीताफल या कुष्मांडा कहलऽ जाय छै । जे हिन्का बहुत प्रिय छैन । एकरऽ बलि से माता शीघ्र पस्न्न होय जाय छथिन । हिन्कऽ पूजा हे आयु, यश, आरो, बल केरऽ वृद्धि होय छै । पूजा आरेा भोग- चौथा दिन केरऽ पूजा में माता के पीला कनेर केरऽ फूल चढ़ाबऽ आरो ऐहे रंग केरऽ चुनरी ओढ़ाबऽ । कपूर, लौंग से आरती करऽ, सुहाग केरऽ चीज में बिन्दी सिन्दूर अर्पित करऽ नारियल केरऽ जगह कोंहड़ा, केला आरो संतरा केरऽ भोग लगाबऽ । ई दिन माता के केसरिया खीर या पुलाव भी चढ़ैलऽ जाय छै ।
स्कंदमाता- दुर्गा माता अपनऽ पांचवें स्वरूप में, स्कंदमाता केरऽ नाम से जानलऽ जाय छथिन । नवरात्र केरऽ पांचवा दिन हिन्कऽ पूजा करलऽ जाय छै । हिन्कऽ स्वरूप वात्सल्यमय छै, आरो ई अपनऽ भक्तऽ पर सदैव कृपा-दृष्टि बनैलऽ रखे छथिन । संतान केरऽ इच्छा रखे वाली हिन्कऽ आराधना से संतान सुख केरऽ प्राप्ति होय छै । कमल केरऽ फूल पर विराजमान स्कंदमाता सफेद वर्ण केरऽ छथिन । ऐहे से हिन्का पदमासना देवी भी कहलऽ जाय छै । हिन्कऽ पूजा से बाल रूप स्कंद भगवान (कार्तिकेय) केरऽ भी पूजा करलऽ जाय छै । कुमार कार्तिकेय केरऽ नाम से जाने वाला स्कंद जी प्रसिद्ध देवासुर- संग्राम में देवताओं केरऽ सेनापति छेलात । आरो हिन्कऽ वाहन मोर छै । पूजा आरो भोग- ई दिन माता के हरा, रंग केरऽ वस्त्र से सजैलऽ जाय छै । लाल- गुलाबी फूल केरऽ माला चढ़ाबे से देवी अत्यंत प्रसन्न होय छथिन । ई दिन माता के सोना या चांदी केरऽ आभूषण चढ़ाबै केरऽ नियम छै । धूप-दीप आरो कपूर द्वारा हिन्कऽ स्तुति करलऽ जाय छै । हिन्का ठंढा खीर, सेव, नाशपाती आरो खीरा केरऽ भोग लगैलऽ जाय छै ।
कात्यायनी- नवरात्र केरऽ छठा दिन माता दुर्गा के कात्यायनी स्वरूप केरऽ पूजा करलऽ जाय छै । हिन्कऽ अवतरण महर्षि कात्यायन केरऽ घोर तपस्या से होलऽ छै । आश्विन कृष्ण पक्ष चतुर्दशी के जनम ले के शुक्ल पक्ष केरऽ सप्तमी, अष्टमी, आरो नवमी, ई तीन दिनऽ में कात्यायन ट्टषि केरऽ पजा ग्रहण करला केरऽ बाद दशमी के माता कात्यायनी ने महिषासुर केरऽ वध करला छेली । ऐहे से ई महिषासुर मर्दनी भी कहाबे छथिन । ब्रज मंडल में ई अधिष्ठात्री देवी केरऽ रूपऽ में प्रतिष्ठित छथिन । पूजा आरो भोग- हिन्कऽ पूजा में सब प्रकार केरऽ सुहाग सामग्री अर्पित करलऽ जाय छै । धूप- दीप, कपूर, लौंग पान आरो सुपाड़ी से पूजा करे से माता अति शीघ्र प्रसन्न होय जाये छथिन । माता कात्यायनी केरऽ पूजा में नारियल केरऽ बलि अवश्य देलऽ जाय छै । छठा स्वरूप में माता के लाल रंग केरऽ चुनरी ओढ़ाबऽ माता के लालरंग केरऽ गुलाब या अड़हुल फूल केरऽ माला पिन्हाबऽ सुयोग्य वर केरऽ प्राप्ति के लेलऽ कुंवारी कन्या के हिन्कऽ पूजा करना चाहीवऽ । पूरे साल माता कात्यायनी केरऽ अमोध मंत्र केरऽ जप करे से अविवाहिता कन्या के इच्छित वर केरऽ प्राप्ति होय छै । कात्यायनी माता के मीठऽ पकवानऽ सहित पंचामृत, माखन मिश्री, शहद, अनार, सेव आरो केला केरऽ भोग लगावऽ ।
कालरात्री- माता दुर्गा केरऽ सातवाँ शक्ति छथिन, कालरात्री हिन्कऽ शरीर केरऽ रंग घनऽ अंधकार के तरह काला (कारऽ) आरेा केश छिटकल (विखरलऽ) होलऽ छैन । हिन्कऽ गला में बिजली जेन्हऽ चमके वाली माला छैन, तीन आँखऽ वाली माता केरऽ नाकऽ से भयंकर ज्वाल निकले छैन । आरो हिन्कऽ वाहन गर्दन (गधा) छै । भयंकर स्वरूप में देखाबे वाली माता हमेशा शुभ फल दै छथिन । ऐहे कारण संशु भंकरी नामऽ ेस जानलऽ जाय छथिन । हिन्कऽ पूजा से ग्रह, बाधा, आरो शत्रु भय केरऽ नाश होय छै । पूजा आरो भोग- गाढ़ऽ लाल रंग केरऽ ओढ़ने से माता केरऽ श्रृंगार करऽ रातरानी या नीला रंग केरऽ कोय भी फूल माता के अर्पित करऽ । लौंग, कपूर, पान सुपाड़ी, इलायची आरो धूप-दीप से स्तुति करऽ । माता कालरात्री के खिचड़ी, चना आरेा गुड़ से बनलऽ- सामान केरऽ अलावा गुड़ आरो आटा से बनलऽ हलुवा फल अर्पित करऽ । नारियल केरऽ बलि से माता काल रात्री शीघ्र प्रसन्न होय जाय छथिन ।
महागौरी- माता दुर्गा केरऽ आठवीं शक्ति महागौरी छथिन । हिन्कऽ हिन्कऽ रंग एकदम सफेद (गोरऽ) छै । हिन्कऽ गोरऽ रंग केरऽ उपमा शंख, चन्द्र आरो सफेद कमल केरऽ फूलऽ से करलऽ गेलऽ छै । हिन्कऽ आयु आठ वर्ष केरऽ मानलऽ गेलऽ छै । हिन्कऽ वाहन बृषभ (बैल) छैन । ई अत्यंत शान्त मुद्रा में रहे छथिन । पार्वती रूप में शिवजी के प्राप्त करे के लेलऽ हिनी कठीन तपस्या करलऽ छेली, जेकरा से हिन्कऽ रंग काला (कारऽ) होय गेलऽ छेल्हेंन । हिन्कऽ तप से प्रसन्न होय के शिवजी ने गंगा जल से स्नान कर बैल का तेब गौरीमाता केरऽ रंग एकदम सफेद (गोरऽ) होय गेल्हेव, आरो तभी से महागौरी कहाबे लागली । पूजा आरो भोग- गुलाबी रंग केरऽ वस्त्र से माता केरऽ सिंगार करऽ कपूर आरो धूप, दीप से हिन्कऽ पूजा करऽ । सफेद फूल अर्पित करे से माता गौरी प्रसन्न होय के अपनऽ भक्तऽ केरऽ सब दुख आरो पापड़ से बचाबे छथिन । हिन्का सूखा नारियल से बनलऽ मिठाय, चावल आरो मखान केरऽ खीर, केला, सेव, संतरा या नाशपाती केरऽ भोग लगाबऽ ।
सिद्धिदात्री- माता दुर्गा केरऽ नवीं शक्ति सिद्धि दात्री केरऽ नामऽ से जानलऽ जाय छै । ई देवी सभे प्रकार केरऽ सिद्धि के दै वाली छथिन । चार भुजावऽ वाली देवी कमल फूल पर विराजमान छथिन, सब प्रकार केरऽ सम्पत्ति से युक्त देवी दिव्य स्वरूपा छथिन । पूजा आरेा भोग- दीया जलाय के कपूर, लौंग तिल आरो पान सुपाड़ी अर्पित करला केरऽ बाद हवन करी के हिन्कऽ पूजा संपन्न करलऽ जाय छै । हवन में जौ, तिल, चावल, पंचमंवा, घी, आरो आम केरऽ लकड़ी प्रयोग में करलऽ जाय छै । माता के सब प्रकार केरऽ सिंगार चढ़ाय के लाल वस्त्र से सजैलऽ जाय छै । अड़हुल, कमल, आरो गुलाब केरऽ फूल माता के प्रसन्नता दै छै । नवमी के दिन माता के हलुवा, पुड़ी, चना, खीर, जलेबी आरो पंचमेवा पाँच फल केरऽ भोग चढ़ैलऽ जाय छै । ई तरह कन्या पूजन के साथ नवरात्र केरऽ व्रत संपन्न होय छै । नवमी के दिन हवन के बाद कलश केरऽ पवित्र जल अपनऽ घरऽ में छिटल (छिड़कलऽ) जाय छै । जौ केरऽ हरियाली (जयंत्री) माता केरऽ आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण करऽ आरो अपनऽ घरऽ में सुरक्षित जग्घऽ पर रखऽ एकरा से परिवारऽ में सुख समृद्धि आवे छै । नदी या तालाब में कलशा विसर्जन करी के पारणऽ करऽ ।
167- कौन देवता के कौन फूल चढ़ैलऽ जाय छै ।
हमरऽ परंपरा में धार्मिक आयोजन में फूलऽ केरऽ विशेष महत्व छै । देवता केरऽ पूजा विधि में कै तरह केरऽ- पत्ता के भी चढ़ाना बड़ी शुभ मानलऽ गेलऽ छै । धार्मिक अनुष्ठान, पूजा, आरती आदि काम बिना फूल केरऽ अधूरा ही मानलऽ जय छै । कुछ विशेष फूल देवता के चढ़ाना मना करलऽ गेलऽ छै । लेकिन शास्त्र में एन्हऽ भी फूल बतैलऽ गेलऽ छै, जेकरा चढ़ाबे से देव शक्ति केरऽ कृपा मिली जाय छै । बहुत शुभ, देवता केरऽ विशेष प्रिय होय छैन आरो सब तरह केरऽ सुख सौभाग्य बरसाबे छथिन । कौन फूल से कौन देवता केरऽ पूजा करिये, ई भी पूजा विधि केरऽ खास हिस्सा छै । फूल हमरऽ जीवन के रंग आरो सुगंध से भरी दै छै । ई हमरा लेलऽ हमरऽ भावना केरऽ प्रतीक छिके । ऐहे से हम्में पूजा करते समय फूल अर्पित करे छिये । लेकिन पूजा पद्धति में कौन फूल कौन देवता के वर्जित छै आरो कौन फूल प्रिय छै । हमेशा हम्में नांय जाने ले वारे छिये ।
गणपति- भगवान गणपति के तुलसी दल छोड़ी के सब तरह केरऽ फूल चढ़ैलऽ जाय छै । ‘‘न तुल्ट ्या गणाधिपम’’ तुलसी से गणपति केरऽ सूजा कभी नांय कर गणेशजी के पारंपरिक रूप से दुभी (दुवी) चढ़ैलऽ जाय छै । मानलऽ जाय छै कि हुन्का दुभी (दुवी) प्रिय छै । दुभी केरऽ ऊपरी हिस्सा पर तीन या पाँच पत्ता होवे ते बहुत शुभ मानलऽ जाय छै । गणपति के लाल रंग प्रिय छैन । ऐहे से हुन्का लाल रंग केरऽ गुलाब भीचढ़ैल जाय छै ।
शिवजी- अवधूत शिवजी के धतूरा केरऽ फूल, हरसिंगार, नागेसर केरऽ सफेद फूल, सुखलऽ कमलगट्टा, कनेर, कुसुम, आक, कुश आदि केरऽ फूल प्रिय छैन । जेभे से सबसे ज्यादा प्रिय छैन धतूरा केरऽ फूल एकरऽ अलावे बेलपत्र आरो समीपत्र भी पसंद छैन । शिवजी के सेमल, कदम्ब, अनार, सिरीष, माधवी, केवड़ा, मालती, जूही आरो कपास केरऽ फूल नांय चढ़ैलऽ जाय छै ।
सूर्य- सूर्य केरऽ उपासना कुटज केरऽ फूल से करलऽ गेलऽ छै । एकरऽ अलावा आक, कनेर, कमल, चंपा, पलाश, अशोक, बेला, मालती आदि केरऽ फूल भी सूर्य के प्रिय छैन । भविष्य पुराणऽ में कहलऽ गेलऽ छै कि जों एक आक केरऽ फूल भगवान सूर्य पर चढ़ैलऽ जाय ते ओकरा सोना केरऽ दस असर्फि चढ़ाबे केरऽ फल मिले छै । सूर्य के भी गणपति के तरह लाल फूल पसंद छैन ।
कृष्ण- कृष्ण अपनऽ प्रिय फूल केरऽ वर्णन करते होलऽ महाभारत में युधिष्ठिर से कहलऽ हथ । हमरा कुमुद, करवरी, चणक, मालती, नंदिक, पलाश, आरो वनमाला केरऽ फूल प्रिय छै । भगवान श्री कृष्ण केसर केरऽ तिलक या पीला चन्दन केरऽ तिलक करे से आरो पीला फूल चढ़ाबे से अति प्रसन्न होय छथिन ।
विष्णुजी- भगवान विष्णु के कमल, मोलसिरी, जूही, कदंब, केवड़ा, चमेली, अशोक, मालती, वासंती, चंपा, बैजंती केरऽ फूल विशेष प्रिय छैना । हिन्का पीला फूल बहुत पसंद छैन । विष्णु भगवान के तुलीस दल चढ़ाबे से अति प्रसन्न होय छथिन । कार्तिक महीना में भगवान नारायण के केतकी केरऽ फूलऽ से पूजा करे से विशेष रूप से प्रसन्न होय छथिन । लेकिन विष्णु जी पर आक, धतूरा, शिरीष, सहजन, समेल, कचनार, आरो गुलर आदि केरऽ फूल नांय चढ़ाना चाहिवऽ । विष्णु पर अक्षत भी नांय चढ़ैलऽ जाय छै ।
बजरंगबली- बजरंगबली के लाल या पीला रंग केरऽ फूल विशेष रूपऽ से अर्पित करना चाहिव । फूल में अड़हुल, गुलाब, कमल, गेंदा आदि केरऽ विशेष महत्व छै । हनुमान जी के रोज सब फूल आरो केसर के साथ लाल चन्दन घिसी के तिलक करना शुभ कानलऽ जाय छै ।
शनि- शनि देव के नीला लाजवंती केरऽ फूल चढ़ैलऽ जाय छै । एकरऽ अलावे कोय भी नीला फूल या गाढ़ऽ रंग केरऽ फूल शनि देव के चढ़ाना शुभ मानलऽ गेलऽ छै । अपनऽ आराध्य देव के हुन्कऽ पसंद केरऽ फूल अर्पित करऽ । आरो सौभाग्य केरऽ प्राप्ति करऽ ।
लक्ष्मी जी- माता लक्ष्मी सुख, समृद्धि, धन आरो सौभाग्य केरऽ देवी छथिन । माता लक्ष्मी केरऽ सबसे प्रिय फूल कमल छैन । कमल जल से उत्पन्न होय छै आरो माता लक्ष्मी केरऽ उत्पत्ति भी सागर से ही होलऽ छै । कमल केर फूल हुन्कऽ आसन भी छै । ऐसे से देवी के कमल केरऽ फूल अर्पित करना शुभ कानलऽ जाय छै । लक्ष्मी के रोज दिन गुलाब केरऽ फूल भी अर्पित करलऽ जाय छै । भगवान विष्णु केरऽ अर्धांगिनी होय के कारण हिन्का पीला सुगंधित फूल भी चढ़ैलऽ जाय छै ।
पार्वती- गौरी या पार्वती के ई सब फूल प्रिय छैन, जे सब फूल भगवान शंकर के चढ़ैलऽ जाय छै । एकरऽ साथ हुन्कऽ पूजा बेला, सफेद कमल, पलाश आरो चम्पा केर, फूल से भी करलऽ जाय छै ।
दुर्गा- माता दुर्गा के लाल रंग केरऽ फूल विशेष प्रिय छैन । एकरा में गुलाव आरो अड़हुल खासतौर पर । नवरात्री आरो शुक्रवार के माता के लाल गुलाब या लाल अड़हुल फूल केरऽ माला चढ़ाना शुभ मानलऽ जाय छै । दुर्गा के बेला, अशोक, माधवी, केवड़ा अमलतास केरऽ फूल भी चढ़ैलऽ जाय छै । लेकिन दुर्गा के दुभी (दुवी), तुलसी दल, आंवला आरो तमाल, केरऽ नांय चढ़ाना चाहीवऽ । दुर्गा के आक आरो मदार केरऽ फूल भी नांय चढ़ैलऽ जाय छै ।
सरस्वती- विद्या केरऽ देवी माता सरस्वती के प्रसन्न करे के लेलऽ सफेद या पीला रंग केरऽ फूल चढ़ैल जाय छै । सफेद गुलाब, सफेद कनेर या फेरू पीला गेंदा केरऽ फूल से भी माता सरस्वती प्रसन्न होय छथिन ।
काली- देवी के नीला अपराजित केरऽ फूल चढ़ाबै केरऽ विधान छै । बंगाल में दीपावली में होय वाला काली पूजा में अपराजिता केरऽ फूल चढ़ाना जरूरी होय छै ।
168- बड़ी मिट्ठऽ ।
मोहनी सिन्न रहे लागलऽ छेली । ओकरऽ पति के ऐत्ते कम उमर में चीनी केरऽ बिमारी कि रंग होय गेले । चिन्ता में डुबलऽ रहे छेली, अभी हुनी जिन्दगी देखलऽ की छथ । पहाड़सन जिन्दगी पड़लऽ छै । बिना मिठ्ठऽ केरऽ किरंग रहता, केत्ते पसंद छेल्हें, हुन्का रसगुल्ला, खीर, ओह, हे भगवान, फार्ट छेले मोहनी केरऽ करेजा । (कलेजा) आज चाय बनाते समयपति के लेलऽ फीकी चाय निकाली के अपना में चीनी डालते समय हाथ रूकी गेले । अबे हम्में भी नांय पीबऽ चीनी वाली चाय । जबे हमरा हमेशा मिट्ठऽ केरऽ अनुभूति कराबे वाला ही फीकी जिन्दगी जी रहलऽ छथे, त हम्में कथी ले मिट्ठऽ चाय पीबऽ । फीकी चाय ही दोनों कपऽ में भरे लागली, तभिये पति बाजारऽ से तरकारी भाजी लेके रसोई में दै ले गेला । हुन्हीं देखलका चाय वाला बर्तनऽ से सीधे दोनों कपऽ में छानी रहलऽ छथ । पति निराश जेन्हऽ मुस्कुराते होलऽ बोलला, आज हमरो हिस्सा में चीनी डाली देन्हऽ की ? भूलाय गेल्हऽ हम्में बिना चीनी केरऽ पिये दिये । नांय, अपनऽ वाला में भी चीनी नांय डाललऽ छिये । एके रंग बनाय लेलिये । काहे भाप ? हम्में कहलिहेन हमरा से भी मिट्ठऽ नांय खैलऽ जाते । पति प्यार से मोहनी वाली कप में दु चम्मच चीनी मिलाय देलका, हमरा चीनी खाय केरऽ घुटन डबल करबाबे केरऽ कोशिश दुबारा नांय करिहऽ । एक ते हमरऽ चीनी छुटी गेले, ओकरा पर तोहें भी मिठ्ठऽ छोड़ी देभे हद होय गेले । मोहनी ने हुन्का रोके ले चाहल के । तब तक पति अपनऽ काम करी चुकलऽ छेला । बिना मिठ्ठऽ केरऽ शरीर कमजोर होय जाय छै, स्वस्थ आदमी केरऽ । तोहें कमजोर होय जाभे ते हमका के, देखते । हमरऽ भी स्वार्थ छै न ? कही के हँसे लागला । चुप रहऽ, पति के मजाक वाला स्वभाव छेल्हेंन । दोनों चाय पीये लागली । एक चम्मच चीनी वाली चाय भी मिठास से दूर लागी रहलऽ छेले । लेकिन पति केरऽ फीकी चाय केरऽ स्वाद बड़ी मिठ्ठऽ होय चुकलऽ छेले ।
169- एकदम माय जेन्हऽ ।
इसकूल (स्कूल) से आते ही देख्चालिये नैकी माय अंगना में बैठी के गहुम (गेहूँ) फटकी पछोड़ी रहलऽ छै । देखी के बिनू केरऽ मोन भिन्नाय उठले, अंगन केरऽ वेहे कोना में रौद (धूप) आबै छेले । वही पर बिनू भरी दुपहरिया पटिया बिछाय के अपनऽ पढ़ाई करे छेली । ई नैकीमाय पहले बाबू जी के अपनैलकी, फेरू बाबा- दादी भैया के भी बश में करी लेलकी, घरऽ भर के हथियाय लेलकी । एकरा अंगना केरऽ कोना बचलऽ छेले, आज अंगना के भी हथियाय के बैठी गेली । झुनझुनाते जिद में अपनऽ अधिकार जताते होलऽ बीनू किताब लै के धम्म से जाय नैकी माय केरऽ आगु में बैठी गेली । नैकी माय तुरंत सूप जमीन पर रखते होलऽ बोलली नांय बीनू सामने में नांय बैठें । हिन्ने जाय जो हमरा बगल में बैठे सुनी के बीनू नैकी माय के घृणा आरो गुस्सा से देखलकी । केत्ते सौरू छेले ओकरा नया चीजऽ से, नया चीज पाते ही बीनू खुशी से भरी जाय छेली । लेकिन नया माय केरऽ चाह ओकरा कभी नांय छेले । माय केरऽ मरला आज कै साल होय गेले, माय केरऽ याद आबी गेले वू फुटी के कान्दे लागली । नैकी माय नांय बीनू कभी नांय कग्न्दिहे, माय अपनऽ बच्चा केर कान्दब कभी देखी सके छै ? सामने बैठे से हम्में ऐहे से मनाकर लियो- काहे कि एन्हऽ कहलऽ जाय छै कि सूप केरऽ फटकन पड़े से सामने वाला केरऽ सब खुशी भी छिलका के साथ उडी जाय छै । आरो नेहरा से कुछ दान- दहेज नांय मिले छै । ते हम्में तोरा कैसे सामने बैठे ले देतियो । अपनऽ प्यारी बेटी के सूप के सामने । ले तोहें आराम से बैठें, हम्हीं दूर चलऽ जाय छियो यहाँ से । कहते होलऽ नैकी- माय गहुम केरऽ टीन उठाबे लागली । ऐतबे में बीनू केरऽ मनंऽ केरऽ धुंध छटी गेले, नैकी माय बिल्कुल माय जेन्हऽ समझावे आरो बेले छथ, माय भी बीनू केरऽ लोर देखी के छटपटाय लागे छेली, वू उठी के नांय माय तोहें कहीं नांय जा । माय केरऽ बाँही पकड़ी लेलकी, कुछ ससरी के माय केरऽ पीठ में पीठ सटाय के बैठी गेली । माय केरऽ स्पर्शपाय के बीनू केरऽ आँखी से आनन्द केरऽ लोर गिरे लागले ।

टुटलौ कटोरी | अंगिका कहानी संग्रह | डॉ. (श्रीमती) वाञ्छा भट्ट शास्त्री
Tutlow katori | Angika Story collection | Dr.(Smt.) Vanchha Bhatta Shastri