अंगिका व्याकरण | Angika Grammar

अंगिका  भाषा व्याकरण और रचना : कुंदन अमिताभ

(Angika Language Grammar & Composition by Kundan Amitabh)

वर्ण, मात्रा और उच्चारण :

वर्ण

अंगिका भाषा की भी उस सबसे छोटी या लघुतम इकाई को वर्ण कहते हैं, जिसे और खंडित नहीं किया जा सकता है । वस्तुतः किसी भी भाषा को बोलने के लिए प्रयुक्त होने वाली उस मूल ध्वनि को ही वर्ण कहते हैं जिसे और तोड़ा नहीं जा सकता ।

वर्णमाला

किसी भी भाषा के वर्णों के उस समूह को वर्णमाला कहते हैं, जिसमें उस भाषा में प्रयुक्त होने वाले सारे स्वर व व्यंजन व्यवस्थित क्रम से लिखे होते हैं । अंगिका वर्णमाला में निम्नलिखित वर्णों  के समावेश हैं  –

स्वर

सामान्य स्वर :

अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः

विशेष अ स्वर :

अऽ – वर्तुल अ या दीर्घ विलंबित अर्द्ध विवृत पश्च स्वर

अ॑ –  प्रश्लेष अ या दीर्घ अर्द्धसंवृत मध्य

विशेष आ स्वर :

ऑ –  अर्द्ध विवृत पश्च स्वर

आ॑ –  प्रश्लेष आ या अर्द्धसंवृत दीर्घ मध्य स्वर

व्यंजन

क वर्ग  – क् ख्  ग्  घ्  ङ्

च वर्ग  – च् छ्  ज्  झ्  ञ्

ट वर्ग –  ट्  ठ्  ड्  ढ् ड़ ढ़

त वर्ग –  त् थ् द्  ध्  न्

प वर्ग –   प्  फ्  ब्  भ्  म्

अंतःस्थ – य्  र्  ल्  व्

उष्म व्यंजन – स्  ह्

संयुक्त व्यंजन – क्ष  त्र ज्ञ श्र

 

अंगिका वर्णमाला की मुख्य विशेषताएँ :

(क) अंगिका में अ के तीन रूप देखने को मिलते हैं –

अ, अऽ, अ॑

(ख) अंगिका में आ के तीन रूप देखने को मिलते हैं –

आ, ऑ, आ॑

(ग) अंगिका वर्णमाला में हिंदी वर्णमाला के कुछ वर्णों, ऋ, श, ष, ण का समावेश नहीं है । उदाहरण के लिए हिंदी के ऋषि, ऋतु, रमेश, बाण को अंगिका में रिसि, रितु, रमेस, बान लिखेंगें और उच्चारण भी बदले हुए वर्ण की तरह होगा ।

(ग)अं अर्थात अनुस्वार और अः अर्थात विसर्ग दोनों को अयोगवाह भी कहते हैं । क्योंकि ये न तो स्वर हैं और न ही व्यंजन । परंतु अं और अः को पारंपरिक तौर पर स्वरों के वर्ग में शामिल किया जाता रहा है । मूलतः इनका प्रयोग तत्सम शब्दों में स्वर के बाद होता है ।

(घ) अनुस्वार (ं) का प्रयोग ङ् , ञ्, ण् , न् ,म्  के बदले में किया जाता है । (जैसे – अङ्गिका – अंगिका, चम्पा – चंपा, अङ्ग – अंग, गङगा – गंगा, चञ्चल – चंचल, ठण्डा – ठंडा, कुन्द – कुंद, परम्परा – परंपरा )

(च) विसर्ग का प्रयोग अंगिका में संस्कृत से आए शब्दों में होता है । जैसे – प्रायः, फलतः, निःसंदेह, स्वतः ।

(छ) ऑ – अंगिका के इस स्वर में व् की अल्पध्वनि सुनाई पड़ती है । यह स्वर हालाँकि अंगिका में अंग्रजी से आए शब्दों में होता है । परंतु पारंपरिक रूप से अंगिका के स्वर वर्ण के रूप में भी उपयोग होता रहा है । जैसे –

अंग्रेजी से आये शब्दों में – डॉक्टर, डॉट, ऑफिस, कॉलेज, ऑफ , लॉग ।

अंगिका के मूल शब्दों में – चॉर (चावल), जॉत (पति के भाई का पुत्र), छॉउर (छाया) ।

स्वरों की मात्राएँ 

शब्द निर्माण की प्रक्रिया में जब किसी स्वर का प्रयोग किसी व्यंजन के साथ मिलाकर किया जाता है, तो स्वर का स्वरूप बदल जाता है । स्वर के इस बदले हुए स्वरूप को ही मात्रा कहते हैं ।

अंगिका के स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं ।

अ – कोई मात्रा नहीं

आ – ा

इ – ि

ई – ी

उ – ु

ऊ – ू

ए – े

ऐ – ै

ओ – ो

औ – ौ

अं – ं

अः – ः

अऽ – ़ऽ

अ॑ – ॑

ऑ – ॉ

आ॑ – ा ॑

वर्ण भेद 

उच्चारण और प्रयोग के आधार पर अंगिका के वर्णों को दो भागों में बाँटा गया है – स्वर और व्यंजन ।

स्वर 

अंगिका के जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अन्य वर्ण की सहायता से स्वतंत्र रूप से बिना किसी बाधा के होता है, उन्हें स्वर कहते हैं । बिना किसी बाधा के उच्चारण का मतलब यह है कि स्वरों के उच्चारण के वक्त मुँह से निकलने वाली वायु का प्रवाह सतत रूप से बिना किसी बाधा के होता है । आप सतत रूप से किसी भी स्वर वर्ण का उच्चारण देर तलक करके देखें, कहीं भी  ठहरने की जरूरत नहीं पड़ेगी । उदाहरण के लिए – आ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ, ई ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ, ओ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ, औ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ, ऐ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ऽ ।

वर्णों के उच्चारण

किसी भी भाषा में उच्चारण का बहुत अधिक महत्व है । अगर सही – सही उच्चारण नहीं किया जाए तो वर्तनी संबंधी गलतियाँ होने का डर होता है । क्योंकि हिन्दी, मराठी, मगही, भोजपुरी की तरह अंगिका भी आधुनिक जमाने में देवनागरी लिपि में लिखी जाती है । प्राचीन समय में भले ही यह अंग लिपि में लिखी जाती थी । बाद में यह कैथी लिपि में भी लिखी जाने लगी थी । आज के जमाने में भी अंगिका लिखने के लिए कैथी लिपि प्रयोग करने वाले कुछ लोग हैं । परंतु अंगिका को देवनागरी लिपि में लिखने का सर्वाधिक प्रचलन है । देवनागरी लिपि की यह विशेषता है कि यह जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है ।

स्वर के उच्चारण –

अंगिका भाषा में स्वर को विभिन्न आधार पर कई श्रेणियों में बाँटा गया है, जो निम्नलिखित हैं ।

१. उच्चारण  के आधार पर  –

(क) निरनुनासिक : जब उच्चारण केवल मुख से होता हो । जैसे – अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ ।

(ख) अनुनासिक : जब उच्चारण केवल मुख और नासिका की सहायता से होता हो । जैसे – अँ, आँ, इँ, ईं , एँ, ऐं, ओं, औं ।

अंगिका के सभी स्वरों के अनुनासिक रुप प्रयोग में देखने को मिलते हैं ।

२. उच्चारण  में लगने वाले समय के आधार पर – इस आधार पर स्वर के दो भेद हैं –

स्वर भेद 

ह्रस्व या एकमात्रिक

जिन स्वरों के उच्चारण में कम से कम समय लगता हो, लगभग एक मात्रा के समय के बराबर, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं ।  जैसे –  अ, इ, उ ।

दीर्घ या द्विमात्रिक – जिन स्वरों के उच्चारण में अधिक समय लगता हो, लगभग दो मात्राओं के समय के बराबर, या ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं ।  जैसे – आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ ।

किसी व्यंजन का उच्चारण करने पर उसके साथ-साथ अपने आप अ स्वर का उच्चारण हो जाता है । सभी व्यंजन स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं । जब किसी व्यंजन में स्वर नहीं होता, तो उसके नीचे  (् ) चिन्ह लगाते हैं , जिसे हलंत कहते हैं । किसी व्यंजन के साथ ‘अ’ जुड़ने पर उसके नीचे हलंत नहीं लगता ।

जैसे –

क् + अ  = क

ख् + अ  = ख

ह् + अ  = ह

यह स्पष्ट है कि –

(क) अ का कोई मात्रा चिन्ह नहीं होता ।

(ख) स्वर के मात्रा चिन्ह को लगाने के लिए व्यंजन का हलन्त चिन्ह हटाने के बाद ही मात्रा चिन्ह जोड़ते हैं ।

(ग) आ, ई, ओ, औ, अऽ, और ऑ की मात्राएँ व्यंजन के बाद लगाई जाती हैं ।

(घ) इ की मात्रा व्यंजन के पहले लगाई जाती है ।

(ङ) उ, ऊ, की मात्राएँ व्यंजन के नीचे लगाई जाती हैं ।

(च) ए ,ऐ,अ॑,अं, और अँ की मात्राएँ व्यंजन के ऊपर लगाई जाती हैं ।

(छ) र व्यंजन में उ एवं ऊ की मात्राएँ नीचे नहीं, बीच में लगती हैं । (र् +उ= रु,  र् +ऊ=रू )

अंगिका स्वर ध्वनियों की मुख्य विशेषताएँ :

(१) अंगिका की कुछ व्याकरणिक विलक्षणताएँ हैं, जो हिन्दी सहित बिहार, झारखंड की अन्य भाषाओं में दृष्टिगोचर नहीं होता है । जैसे –

(क) ह्रस्व ए और ओ के प्रयोग की बहुलता

(ख) न॑ का प्रयोग  (राम न॑ कहलकै)

(ग) वर्तुल अ का पदान्त में योग ( ओकरऽ, रामऽ, गामऽ)

अंगिका का इस दृष्टि से बँगला से सादृश्य लक्षित होता है ।

(२) स्वर – अ, इ, तथा उ का अति लघु उच्चारण होता है ।

(३) अंगिका में स्वर ए, ओ के दीर्घ रूप के अतिरिक्त ह्रस्व रूप भी मिलते हैं । (एकाधटा, ओकरऽ) ।

यहाँ एकाधटा में ए और ओकरऽ में ओ का उच्चारण ह्रस्व रूप में है ।

(४) ऐ और औ दीर्घ एवं सन्ध्यक्षर रूप में उच्चरित होते हैं । ऐलै, औरू, आबै छै, जैभौ में ऐ और औ के उच्चारणों की भिन्नता स्पष्ट है । पिछले दोनों शब्दों में सन्ध्यक्षर के रूप में ऐ, औ का उच्चारण द्रष्टव्य है ।

(५) अंगिका की सर्वाधिक विशिष्ट स्वरध्वनि अ है ।  जिसका उच्चारण इतना वर्तुल होता है जितना किसी अन्य भाषाओं में नहीं होता ।

(क) यह प्रायः उन सभी अकारान्त शब्दों के अंत में सुनाई पड़ती है जिसके आगे कोई कारक परसर्ग लगता है । जैसे – घरऽ के, गाछऽ के, अनाजऽ मं॑, खमारऽ प॑, ट्रेनऽ मं॑, बसऽ प॑, क्लासऽ मं॑ ।

(ख) लेकिन अगर पद यदि एक अक्षर का है, यानि बिना परसर्ग का है तो आदि अ के रूप में यह अंतिम वर्ण के पहले प्रयुक्त होगा  और इसका उच्चारण ओष्ठय होगा । जैसे – जऽल, घऽर, बऽल, कऽल, बऽन । यहाँ एकाक्षरिक पद में अ पर बलाघात भी लगेगा ।

व्यंजन

व्यंजन वर्ण  वैसे वर्ण हैं, जिनका उच्चारण स्वर वर्ण की सहायता से होता है । व्यंजन वर्ण के उच्चारण के वक्त मुख से निकलने वाली वायु के मार्ग में बाधा आती है । जिसकी वजह से वह रूक कर या बाधित होकर निकलती है । स्वरों की भाँति व्यंजनों के उच्चारण सतत रूप से नहीं हो पाता । आप जितनी बार व्यंजन का उच्चारण करने का प्रयास करेंगें, उतनी दफा नये सिरे से कोशिश करनी पड़ेगी । उदाहरण के लिए – क……क….क……, ह…..ह…..ह । स्पष्ट है कि स्वर की सहायता के बिना हम व्यंजन वर्ण लिख तो सकते हैं,जैसे – क्, ख्, ग् , पर बोल नहीं सकते । जब व्यंजन को मुँह से बोलेंगें तो उसमें स्वर वर्ण अ की ध्वनि छिपी मिलेगी और उसे हम क, ख, ग के रूप में ही बोल पाएँगें ।

अंगिका भाषा में व्यंजन को विभिन्न आधार पर कई श्रेणियों में बाँटा गया है, जो निम्नलिखित हैं ।

व्यंजन के भेद 

(१) चेष्टा के आधार पर भेद

चेष्टा के आधार पर व्यंजन को मुख्य रूप से तीन वर्गों में विभाजित किया गया है –

(क) स्पर्श व्यंजन – जिन व्यंजनों को बोलते समय जीभ का स्पर्श मुख के किसी न किसी भाग (कंठ, तालु, मूर्धा, दंत,ओष्ठ ) से होता है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं ।  जैसे – क् से लेकर म् तक के व्यंजन ।

(ख) अंतःस्थ व्यंजन – इन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ विशेष रूप से सक्रिय नहीं रहती है । इस वर्ग के व्यंजनों की दूसरी विशेषता यह है कि ये व्यंजन स्पर्श और ऊष्म व्यंजनों के बीच में स्थित यानि अंतःस्थ होते हैं । जैसे – य् , र् , ल् , व्  ।

(ग) ऊष्म व्यंजन – इस वर्ग के व्यंजन के उच्चारण में हवा के रगड़ के फलस्वरूप मुख से गरम या ऊष्म हवा निकलती है । जैसे – स् , ह् ।

(२) उच्चारण के आधार पर भेद

(क) अल्पप्राण – जिन व्यंजनों के उच्चारण में थोड़ा परिश्रम करना पड़ता है  और जिनमें हकार जैसी ध्वनि नहीं निकलती है । जैसे – क् , ग् , च् , ज् , ञ् , ट् , ड् , त्  , द् , न् ,प् , ब् , म् , य्, र्, ल्, व् ।

(ख) महाप्राण – जिन व्यंजनों के उच्चारण में हवा अधिक मात्रा में और तेजी से निकलती है और कुछ अधिक परिश्रम करना पड़ता है, उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते हैं । इनके उच्चारण में हकार जैसी ध्वनि विशेष रूप से निकलती है । जैसे – ख्, घ्, छ्, झ्, थ्, ध्, फ्, भ्, स्, ह् ।

वर्णों के उच्चारण स्थल

मुख के जिस भाग से जो वर्ण उच्चारित होता है या बोला जाता है, वह स्थल उस वर्ण का उच्चारण-स्थान कहलाता है ।

स्थान – वर्ण                        –          नाम

कंठ  – क् , ख् , ग् ,घ् , ह्, अ, आ-कंठ्य

तालु  – च् , छ् , ज् , झ् , य् , इ, ई – तालव्य

मूर्धा –  ट् , ठ् , ड् , ढ् ,र् – मूर्धन्य

दंत –  त् , थ् ,द् , ध् , ल् , स् – दंत्य

ओष्ठ –   प्  ,फ् , ब् , भ् , उ, ऊ – ओष्ठ्य

कंठतालु – ए , ऐ – कंठ तालव्य

कंठोष्ठ – अऽ, ओ, औ – कंठोष्ठ्य

दंतोष्ठ – व् – दंतोष्ठ्य

नासिका – अं, ङ्,ञ् ,ण् ,न्, म् – नासिक्य

वर्ण-संयोग

एक वर्ण के दूसरे वर्ग से मिलने को वर्ण-संयोग कहते हैं ।

(१) व्यंजन और स्वर का संयोग –

नीचे सभी व्यंजन मात्राओं के साथ दिए गए हैं । खुद लिखकर मात्राओं को लगाकर के उच्चारण करते हुए अभ्यास करें –

अ आ अऽ अ॑ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ ऑ अं अः

क का कऽ क॑ कि की कु कू के कै को कौ कॉ कं कः

(२) व्यंजन का व्यंजन से संयोग –

संज्ञा

संज्ञा शब्द का मतलब होता है – नाम । यह नाम किसी का भी हो सकता है । किसी भी जीव -जन्तु, वस्तु – पदार्थ, स्थान, भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं ।

संज्ञा के उदाहरण

जीव -जन्तु – आदमी, नौकर, अध्यापक, गाय आदि ।

वस्तु-पदार्थ – किताब, रेडियो,अखबार, कोबी आदि ।

स्थान – खेत, इसकूल, भागलपुर, धर्मशाला आदि ।

भाव – मिठास, अच्छाई, बुराई, ठंडा, सुंदरता आदि ।

संज्ञा के भेद

अंगिका में संज्ञा के तीन भेद मिलते हैं ।

(क) व्यक्तिवाचक या विशेष संज्ञा

(ख) जातिवाचक या सामान्य संज्ञा (अंगिका में  समूहवाचक और द्रव्यवाचक संज्ञा को सामान्य संज्ञा के अंतर्गत ही मानते हैं ।)

(ग) भाववाचक संज्ञा

 

व्यक्तिवाचक या विशेष संज्ञा

जिस शब्द से किसी विशेष प्राणी, वस्तु या स्थान का बोध होता हो, उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं ।