प्रतिबिम्ब

— कुंदन अमिताभ —

माघी पूर्णिमा आरू
तिलासंक्रांत मं॑
बिहनगरे
फोरछॊ के पहिनै
गंगा नहाबै लेली
आपनऽ गाँव खानपुर सं॑
सुलतानगंज दन्न॑
चली दै वाला  वू दिन
जब॑-जब॑ मऽन पड़ै छै
बिसरलऽ दिन
त॑ मऽन करै छै
फेरू सं॑ ओन्हे जतरा
आरम्भ करलऽ जाय ।

वैन्हऽ दिना मं॑
गंधवहगिरि  सं॑
चलै वाला हवाँ
छुऐ रहै पहिनै हमरे देह
आरू सौंसे बदन
स्वर्ग केरऽ शुद्धता सं॑
नहाय जाय रहै
बीच रस्ता मं॑
बड़ुआ नद्दी केरऽ बालू प॑
परै वाला डेग
नरम – नरम छुहन पाबी क॑
बढ़ै के नै लै नाम ।

मामा के हाथऽ  सं॑
अनवरत हिलतं॑ कंतरी सं॑
दही के महक जब॑
नाकऽ तलक पहुँचै
त॑ बुझाय पड़ै
जेना गंगा छितिज मं॑
उपर खूब उपर
उठी गेलऽ छै
कोसऽ के दूरी डेगऽ मं॑
बदली गेलऽ छै ।

गंगा माय केरॊ
कन-कन ठार पानी मं॑
डुबकी लगाबै रहौं त॑
उत्तरवाहिनी गंगा केरऽ विशालता
बीच गंगा मं॑ बसलऽ अजगैबी बाबा मंदिर
केरऽ भव्यता
आपनऽ दन्न॑ खींची लै रहै
हमरऽ मऽन ।

गंगा घाट प॑ सुक्खै लेली
रौदा मं॑ हवा सथें लहरैतें
रंग-बिरंग के नुंगा-फट्टा
मछुआरा केरऽ जाली मं॑ बझलऽ
कतला बुआरी आरू कै तरह के मछली
नाव आरू स्टीमर के हलमिल – हिलमिल
भुरूकबा उगला के गंगा सीना प॑
झिलमिल झिलमिल
केरऽ ऐन्हऽ शमां बँधै
कि बस देखतै रहै के मऽन करै ।

गंगा स्नान करी क॑
घाटै पर
दही-चूड़ा-गूड़-तिलबा
अल्लू-कोबी के तरकारी
खाय केरऽ मजा
कि कहियो भुलैलऽ जाब॑ पार॑ ?
लौटै के मऽन त॑ नहिंयें करै
मन मसोसी क॑ गामऽ के ढग्घर
लौटला के बहुत दिना बाद तलक
सुलतानगंज के गंगा बहतैं रहै
हमरऽ मनऽ के अंदर ।

Angika Poetry : Ganga Nahan
Poetry from Angika Poetry Book : Dhamas (धमस)
Poet : Kundan Amitabh

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