भागलपुर : अंगिका क॑ अष्टम अनुसूची म॑ शामिल करबाबै लेली ‘अंग’ दौरा प॑ राष्ट्रपति आरू प्रधानमंत्री क॑ ज्ञापन सौंपलऽ गेलऽ छै । अंग उत्थानान्दोलन समिति,बिहार-झारखंड सह अंग मुक्ति मोर्चा तरफऽ स॑ राष्ट्रपति क॑ ३ अपैल, २०१७ ई. क॑ विक्रमशिला म॑ ज्ञापन देलऽ गेलै जबकि प्रधानमंत्री क॑ ६ अपैल, २०१७ ई. क॑ साहेबगंज म॑ ज्ञापन देलऽ गेलै ।

अंग उत्थानान्दोलन समिति,बिहार-झारखंड केरऽ राष्ट्रीय अध्यक्ष गौतम सुमन न॑ राष्ट्रपति आरू प्रधानमंत्री स॑  आग्रह करल॑ छै  कि अंग क्षेत्र केरऽ वाजिब अधिकार व सम्मान दै आरू दिलाबै के दिशा म॑ आपन॑ अपनऽ तरफऽ स॑ सकारात्मक पहल करी क॑ ई  ऐतिहासिक व अविस्मरणीय क्षेत्र केरऽ लोक भाषा अंगिका क॑ भारतीय संविधान केरऽ आठवीं अनुसूची म॑ शामिल करै-कराबै के कृपा करलऽ जाय कैन्हेंकि अपनऽ मातृभाषा के बगैर हम्म॑ अंगवासी व अंगिका भाषा-भाषी गूँगा जैसनऽ ही छियै । गैतम सुमन न॑ कहलकै कि अंगिका क॑ भारतीय संविधान केरऽ आठवीं अनुसूची म॑ शामिल कराना हमरऽ अस्मिता व अस्तित्व के भी सवाल छेकै ।

श्री गौतम सुमन न॑ कहलकै कि अंग महाजनपद केरऽ भाषा अंगिका भारतीय संविधान केरऽ आठमऽ अनुसूची म॑ शामिल होय केरऽ सब्भे शर्तों व मानक क॑ पूरा करै छै । ई लेली लोकतंत्र म॑  भाषा के साथ उपेक्षा या अन्याय कदापि उचित नै छै ।

अंग उत्थानान्दोलन समिति,बिहार-झारखंड सह अंग मुक्ति मोर्चा तरफऽ स॑ दिनांक ६ अप्रैल – २०१७, गुरूवार क॑ झारखंड केरऽ साहिबगंज केरऽ पुलिस लाईन मैदान म॑  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी क॑ सौंपलऽ गेलऽ ज्ञापन केरऽ मूल हिन्दी अंश  : - 

सेवा में,
श्री नरेंद्र मोदी जी प्रधानमंत्री महोदय,
भारत सरकार ।
विषय:- गृह मंत्रालय में लम्बे समय से प्रस्तावित पंक्तिबद्ध बिहार-झारखंड के 21 अंग जनपदों की लोकभाषा अंगिका को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने-कराने हेतु अनुरोध-पत्र ।

महान्यवर,
भारतवर्ष विभिन्न भाषा,साहित्य,सभ्यता,संस्कृति एवं समुदाय को एकीकृत स्वरूप प्रदान करने वाला देश है, जहाँ क्षेत्र एवं प्रांतीय स्तर की भाषा,साहित्य,सभ्यता,संस्कृति व विरासत की गरिमा व अविस्मरणीय इतिहास है।विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र देश भारत की पहचान ही धर्म एवं भाषा- साहित्य,सभ्यता-संस्कृति की निष्पक्षता रही है । राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ-साथ यहाँ कई ऐसी क्षेत्रीय भाषायें हैं जिनका अतीत गौरवशाली रहा है ,परंतु समय के बदलते परिवेश एवं राजनीतिक व सरकारी उपेक्षा के कारण इनकी पहचान धूमिल होती जा रही है ।कई विद्वानों की राय रही है कि किसी क्षेत्र या राज्य के अस्तित्व व अस्मिता को समाप्त करना हो तो सबसे पहले वहाँ की भाषा,साहित्य,सभ्यता,संस्कृति पर वार कर उसे विलुप्त करवा दो ।आजादी के बाद से आज तक वेद-पुराण,रामायण-महाभारत,बौद्ध एवं जैन ग्रंथों तथा इतिहास में वर्णित अंग महाजनपद के साथ यही तो हो रहा है । चूँकि यह सर्वाविदित है कि अंग-अंगिका के बगैर बिहार बहियार की तरह है और इसकी समृद्धि के बिना बिहार कदापि समृद्ध नहीं होगा ।ज्ञात हो महोदय, कि अंग महाजनपद महान सपूतों की धरती है । इस धरा पर आज भी आध्यात्मिक,साहित्यिक व सांस्कृतिक त्रिवेणी बहती है ।पुराणों में वर्णित मंदार की मंथनी और जैन के 12 वें तीर्थकर वासुपूज्य के पाँचो कर्म इसी धरा पर घटित हुए हैं ।महाभारत काल में दानवीर कर्ण को इसी अंग देश का राजा बनाया गया था,जिसकी राजधानी चम्पा थी ।आदि कवि सरहपाद,फणीश्वर नाथ रेणु,शहीद सतीश सिंह,आनंद मोहन सहाय,दीपनरायण सिंह,शहीद कुताय साह,ध्रुव कुंडू,सिद्धु-कानूं,बाबू कृष्ण सिंह,बाबा नाम केवलम के प्रणेता आनंद मूर्ति,कवि सुमन सूरो,महर्षि मेंहीदास,बाबा तिलकामांझी आदि जैसे सपूतों को जन्म देने वाली अंग महाजनपद की धरती वंदनीय है और यहाँ की भाषा,साहित्य,सभ्यता,संस्कृति एवं विरासत पूजनीय ! विक्रमशीला विश्वविद्यालय,कृषि विश्वविद्यालय,बाबा बटेश्वर नाथ स्थान,बाबा बुढानाथ मंदिर,बाबा अजगैबीनाथ धाम,बाबा गोनूनाथ धाम,बाबा अशोक नाथ धाम,बाबा जैठोर नाथ धाम,बाबा सिंहेश्वर नाथ धाम,माता पुरणदेवी मंदिर, माता चण्डीदेवी स्थान,नौलखा मंदिर,बाबा बैधनाथ धाम, बाबा मनसकामना नाथ मंदिर,मंदार पर्वत,भगवान वासुपूज्य जैन मंदिर,पीर दमरिया साह मजार,आस्थाना शाहबाजी,लाल साह दरगाह,मांगन ससाह पीर स्थान,सुफी संत मसाहजंगी मजार,गुरुद्वारा श्री गुरू सिंह सभा आदि जैसे कई पर्यटन स्थल और यहाँ की सैकड़ों लोकगाथा विश्व भर में चर्चित है ।गांगेय डॉल्फीन अंग की धरोहर एवं पहचान है जो पूरे विश्व का ध्यान आकृष्ट करती है ।ज्ञात हो महोदय कि नालंदा विश्वविद्यालय-विक्रमशीला विश्वविद्यालय की ही एक इकाई थी ।यह महासमुद्र था तो नालंदा उसकी सहायक नदियों में से एक थी । शोधकर्ताओं के अनुसार भगवान बुद्ध के द्वितीय अवतार और विक्रमशीला के कुलाधिपति रहे दीपांकर ज्ञान श्री अतीश बौद्ध लामावाद की पुनर्स्थापना में अतुलनीय योगदान था । आज भी विक्रमशीला महाविहार बौद्ध धर्मावलम्बियों का सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र है ।यहाँ एक से बढकर एक पर्यटन स्धल हैं,जिसे उपेक्षा व उदासीनता के कारण बढ़ावा नहीं मिला है और जो आज दम तोड़ने के कगार पर है । बिहार-झारखंड के 21 अंग जनपदों की लोकभाषा ‘अंगिका’ लगभग 6-7 करोड़ लोगों के मन और प्राण में बसते हैं । इनमें अकेले बिहार के 15 अंग जनपद क्रमशः भागलपुर,बाँका,मुंगेर,जमुई,लखीसराय,शेखपुरा,कटिहार,पूर्णियां,अररिया,किशनगंज,सुपौल,सहरसा,मधेपुरा,बेगुसराय,खगड़िया स्थित 12 लोकसभा,71 विधानसभा,के 38 अनुमंडल,158 प्रखंड तथा 2542 पंचायतों में 3,33,82,848 (तीन करोड़,तैंतीस लाख,बेरासी हजार,आठ सौ अड़तालिस) लोगों के द्वारा अंगिका भाषा में बातचीत की जाती है। इसके अलावे झारखंड के 6 अंग जनपद क्रमशः दुमका,देवघर,गोड्डा,गिरिडीह,पाकुड़ एवं साहेबगंज सहित देश-विदेश का ऐसा कोई प्रांत या जिला नहीं है जहाँ अंगिका भाषी सरकारी या गैर सरकारी कार्यालयों में कार्य नहीं करते हैं । यदि ये कहा जाय कि अंगिका भाषी अपनी संख्यां के मुताबिक सत्ता परिवर्तन का दम रखते हैं तो इनमें कोई संदेह नहीं है ।यहाँ पर हम यह बता देना चाहते हैं श्री मान् कि बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉ0श्रीकृष्ण सिंह एवं राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर के भागीरथी प्रयास से ही भारत सरकार ने ‘अंगिका ‘ को भाषा की मान्यता दी थी । आज अंगिका भाषा का गध,पध एवं व्याकरण में समृद्ध साहित्य है ।साहित्य के क्षेत्र में रविन्द्र नाथ टैगोर, राहुल सांस्कृत्यायन, शरतचन्द्र,रामधारी सिंह दिनकर,गोपाल सिंह नेपाली,फणीश्वर नाथ रेणु आदि ने राष्ट्रीय मानचित्र पर अंग क्षेत्र को विशेष पहचान दिलवाई ।

अंगिका की गिनती दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में होती है । कथा-पुराणों में इस भाषा को ‘आंगी’ नाम से पुकारा गया है । बौद्ध ग्रन्थ के ललित विस्तर लिपि शाखा में अंगिका की लिपि आंगी चौथे स्थान पर है ।इस देश के 16 महाजनपदों में अंग का स्थान प्रथम रहा है । अंगिका भाषा में प्रचूर साहित्य का सृजन हुआ है और आज भी हो रहा है ।

यहाँ की लोक कला मंजूपा,अंगिका सिनेमा,डॉक्यूमेंट्री,गीत,काब्य,लेखन आदि का कार्य दुनिया में एक मिशाल बनकर प्रसिद्ध है । कई ब्यवसाय भी इस भाषा से जुड़े हैं और अब तो फैसन की दुनिया में भी अंग क्षेत्र धूम मचा रहा है ।अंग महाजनपद के लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम में भी अग्रणी भूमिका निभाकर हिन्दी के विकास में अपना सब कुछ न्यौछावर इसलिए किया था कि उनकी लोकभाषा अंगिका का वाजिब अधिकार व सम्मान के लिए सरकार व प्रशासन सक्रिय रहेंगे,किन्तु आजादी के बाद से यह छलावा साबित हुआ है ।

भारतीय संविधान की धारा 29 के अनुसार हरेक व्यक्ति ,संगठन या जाति वर्ग के समुदाय को अपनी मातृभाषा,अपनी लिपि और अपनी संस्कृति को संरक्षित करने का मौलिक अधिकार है । इतना ही नहीं संविधान की धारा 350-ए में यह संवैधानिक प्रावधान है कि प्राथमिक स्तर पर बच्चों की शिक्षा-दिक्षा उनकी मातृभाषा में हो,परन्तु इस लोकतंत्र में बिहार-झारखंड के 21 जनपदों की लोकभाषा अंगिका के साथ सीधे तौर पर अन्याय किया जा रहा है । यह संविधान प्रदत्त समानता अधिकार(धारा 14) का खुला उलंघन है । प्राथमिक शिक्षा का मुख्य उद्देश्य होता है कि मातृभाषा के माध्यम से मौखिक और लिखित रूप से अपने विचारों एवं मनोभावनाओं को दूसरे तक प्रेषण करना तथा दूसरों के अभिव्यक्त विचारों और मनोभावनाओं को समझने की क्षमता का विकास करना ।जब भारत सरकार ने अंगिका को भाषा की मान्यता दी है और बिहार सरकार ने भी वित्तीय व॔ष 2006-07 में अंगिका भाषा को बिहार की लोकभाषा के रूप में मान्यता दी तभी तो राष्ट्रभाषा परिषद,पटना द्वारा लोकभाषा साहित्य पुरस्कार योजना में अंगिका भाषा को शामिल कर अंगिका भाषा हेतु प्रथम लोकभाषा साहित्य पुरस्कार पहले डाॅ0आर.प्रवेश और फिर डॉ0 रमेश मोहन आत्मविश्वास को दिया गया ? हमारे संघर्ष व आन्दोलन के फलस्वरूप राज्य सरकार ने सन् 2013 से अंगिका भाषा के विकास हेतु कई सकारात्मक कार्यवाही आरंभ की है- भागलपुर विश्वविधालय में अंगिका विभाग है और यहाँ एम.ए.(पीजी)में अंगिका की पढ़ाई होती है,लोग अंगिका भाषा में पीएचडी कर डी लिट्ट प्राप्त कर रहे हैं । झारखंड सरकार ने झारखंड लोकसेवा आयोग की परीक्षा और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की परीक्षा में अंगिका भाषा को महत्वपूर्ण स्थान देकर अंगिका उत्थान में मजबूत कड़ी जोड़ने का सराहनीय प्रयास किया है ।आकाशवाणी-दूरदर्शन पर भी अंगिका भाषा में कार्यक्रम प्रस्तुत होते हैं ।बिहार सरकार ने सरकारी स्कूलों में पहली व दूसरी कक्षा के पाठ्यक्रमों में अंगिका भाषा को शामिल करने की पहल की है ।विगत 9 मार्च 2015 को मुख्यमंत्री नीतिश कुमार ने जय अंग-जय अंगिका,जय बिहार का नारा देकर बिहार राज्य में अंगिका अकादमी के गठन की न केवल घोषणा की बल्कि इस दिशा में राज्य मंत्री परिषद को सकारात्मक निर्देश देकर इसकी सारी प्रक्रिया पूरी कराते हुए 21 जून 2015 को अंगिका अकादमी का गठन कर तत्काल इसके विकास के लिए 5 लाख रूपये की राशि प्रदान कर दिए ।

हम बताना चाहते हैं श्री मान् कि अंगिका केवल भाषा नहीं है बल्कि,यह सभ्यता व संस्कृति का परिचायक है जो कई भाषाओं को जोड़कर चलती है अंग महाजनपद पीर-पैगम्बरों,साधु-सन्तों एवं महापुरूषों की तपोभूमि के साथ -साथ कर्मभूमि भी रही है ।अंग महाजनपद की लोकभाषा अंगिका के वाजिब अधिकार व सम्मान की माँगों को लेकर हम अपनी अंग उत्थान आन्दोलन समिति,बिहार-झारखंड के नेतृत्व में अंगवासियों को संगठित कर बिहार-झारखंड के अंग क्षेत्रों में लम्बे समय से चरणबद्ध संघर्ष करते आ रहे हैं किन्तु आश्वासनों के बलबूते लोकभाषा अंगिका अपने हक-हकूक से आज तक वंचित है ।

ज्ञात हो कि हमने कभी अलग प्रांत या राज्य निर्माण की बात नहीं की है और न ही कभी करेंगे;क्यों कि हमारा मानना है कि राज्य हमारा जिस्म है और हम अपने जिस्म के और टूकड़े कतई बर्दास्त नहीं करेंगे,लेकिन अपना अधिकार व सम्मान लिए बिना भी हम कदापि चूप नहीं रहेगे क्योंकि यह हमारी अस्मिता व अस्तित्व के साथ-साथ पेट से जुड़ा हुआ सवाल भी है ।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय में भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल होने हेतु प्रस्तावित पंक्तिबद्ध 38 भाषाओं में ‘अंगिका ‘ अग्रसर है और यह इस कार्य हेतु सभी शर्तों व मानक को पूरा करती है,किन्तु सरकारी व प्रशासनिक उदासीनता हावी होने के कारण अंगिका भाषा को यह वाजिब सम्मान व अधिकार नहीं मिल पाया है ।

जबकि इस कार्य हेतु सन् 1978 ई0में सांसद सह कुलपति डॉ0 रामजी सिंह ने अपनी आवाज संसद में उठाई,सन् 1983 ई0में खाद्य आपूर्ति एवं नागरिक विकास मंत्री भागवत झा आजाद जी के पहल पर 7 अक्टूबर 1983 ई0 को सूचना एवं ष्रसार मंत्री एच के एल भगत ने आकाशवाणी के खेती गृहस्थी कार्यक्रम में अंगिका भाषा को स्थान दिलाया और इसे संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की वकालत की ,13 मई 2003 को सांसद सुबोध राय ने संसद में अंगिका के इस सवाल को रखा ,30 नवम्बर 2007 को सांसद सह पूर्व केन्द्रीय मंत्री सैयद शाहनवाज हुसैन ने भी अंगिका के इस सवाल को संसद में उठाई तब फरवरी 2008 में राज्य मंत्री प्रकाश जायसवाल ने श्री हुसैन को आश्वासन दिया कि चूँकि अंगिका भाषा संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल होने की सभी शर्तों को पूरा करती है इसलिए मैथिली की तरह इसे भी यह सम्मान दिया जाएगा और इसकी प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है ।बावजूद इसके इस दिशा में सरकारी पहल नहीं होने पर 2 सितम्बर,2011 को पुनः सांसद सैयद शाहनवाज हुसैन ने अंगिका भापा के इस सवाल को पूरजोर तरीके से संसद में रखा ।

तत्पश्चात 24 नवम्बर सन् 2012 को हम अपनी अंग उत्थान आन्दोलन समिति,बिहार-झारखंड के नेतृत्व में शिष्टमंडल द्वारा भारत सरकार के प्रधानमंत्री,गृहमंत्री सहित बिहार के मुख्यमंत्री व राज्यपाल महोदय को 13 लाख,38 हजार,8 सौ 38 लोगों के हस्तांतरित अनुरोध पत्र सौंपकर अपनी अंगिका भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने की माँग किये और फिर इनके पूर्व से आज तक इस लंबित माँग की पूर्ति हेतु अपनी समिति के बैनर तले बिहार-झारखंड स्थित अंग क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में इन्क्लाबी तेवर के साथ धरना-प्रदर्शन,अनशन-आमरन अनशन सह सत्याग्रह,पत्र-सम्प्रेषण एवं महापदयात्रा आदि करते आ रहे हैं ।

इस सुकार्य हेतु अंग जनपद गोड्डा के सांसद निशिकांत दूवे ने भी इस प्राचीन लोकभाषा अंगिका को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में करने-कराने हेतु लोकसभा में ” प्राईवेट मेमर विधेयक” बनाया है जिस पर बहस होना लंबित है ।इसके अलावे भी इस दिशा में सांसद श्री दूवे काफी सराहनीय पहल जारी रखे हुए हैं ।

उक्त लंबित माँगें और अंग महाजनपद के सड़क के इस आवाज को एक बार फिर 10 मार्च,2017 को सांसद सह राष्ट्रीय जनता दल युवा के राष्ट्रीय अध्यक्ष शैलेश कुमार उर्फ बुलो मंडल ने अपनी आवाज के रूप में संसद में रखा । पर खेद है मान्यवर कि इतना कुछ के बाद भी अब तक अंगिका भाषा अपने इस वाजिब सम्मान व अधिकार से वंचित है ।

ज्ञात हो महोदय,कि इससे पूर्व भारत सरकार ने 2008 ई0में अध्यादेश जारी कर संपूर्ण भारतीय लोक भाषाओं के दस्तावेजीकरण के लिए “पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया” को अधिकृत किया था ।इसी क्रम में PLSI ने बिहार की लोक भाषाओं के दस्तावेजीकरण के लिए सर्वे हेतु 3 अप्रेल 2012 ई0 को पटना में एक सेमिनार आयोजित की थी ।इसी सेमिनार में अंगिका भाषा सर्वे समिति ,बिहार का भी गठन हुआ था । PLSI को पत्रांक BRPC-366 दिनांक 9 मई 2012 के आलोक में अंगिका भाषा क्षेत्र के मानचित्र सहित अंगिका साहित्य एवं साहित्यकारों की लम्बी सूची,भाषा वि्ज्ञान,ध्वनि विज्ञान,व्याकरण तथा विश्व विद्यालय स्तर पर इसके पठन-पाठन,अंगिका वर्तनी नियम तथा इस भाषा की थ्री लैंग्वेज फार्मुला के अन्तर्गत सभी स्कूल,काॅलेजों में पढ़ाई कराने की भी सरकार से माँग करते हुए दिनांक 09.07.2012 को रजिस्ट्री डाक द्वारा चेयलमैन PLSI को प्रेषित की गई थी,लेकिन इस पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है ।अंग महाजनपद का अस्तित्व व अस्मिता खतरे में हॅ ।एक तरफ भारत सरकार बिहार की लगभग 11करोड़ जनता के अस्तित्व व अस्मिता के सवाल पर बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने एवं विशेष पैकेज देने हेतु संकल्पित हैं वहीं दूसरी तरफ 6-7 करोड़ अंगिका भाषियों के माँगों की उपेक्षा कहाँ तक जायज है ? जब कि वर्षों बाद केन्द्र में एक कुशल व ईमानदार छवि का नेतृत्व है जो हर कार्य में कुशल उदारता दिखाकर देश को प्रगति व उन्नति के पथ पर अग्रसारित कर रहा है तो फिर क्यों और किसलिये इस लोकतंत्र में प्राचीन लोकभाषा अंगिका को उपेक्षित रखे हुए हैं ।यह समझ से परे है ।

ज्ञात हो महोदय कि सन् 2014 के लोकसभा चुनाव के दौरान जब आपने (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) अंग महाजनपद में अपने चुनावी सभा के दौरान इसी अंगिका भाषा में ही संबोधन किया था और कहा था कि लोकतंत्र में आप किसी भी लोकभाषा की उपेक्षा होने नहीं दैंगे,तब हम अंगिका भाषियों को अपनी भाषा- साहित्य,सभ्यता-संस्कृति और विरासत हेतु अच्छे दिन आने व देखने की उम्मीद जाग उठी थी और अब,जब महामहिम राष्ट्रपति महोदय के भी चरण-स्पर्श अंग की धरोहर विक्रमशीला की धरा पर पड़ी और जब आप द्वारा निरन्तर अंग महाजनपद की प्रगति व उन्नति की दिशा में कार्य हो रहे हैं तो हमारी उम्मीद यकीन में बदलता हुआ प्रतीत हो रहा है ।अपनी मातृभाषा अंगिका के इस सम्मान के बगैर हम गूँगे की तरह हैं,इसलिए इस दिशा में अब अविलंब आप द्वारा सकारात्मक पहल जरूरी हो गई है ।

अब जरा इसे भी देखें:-
☆पराक्रमी सम्राट बली के पुत्र अंग के नाम पर इस महाजनपद का नाम अंग हुआ -मतस्य पुराण-48/25.
☆भगवान शंकर के क्रोध के कारण कामदेव के अंग का जहाँ दहन हुआ,वह क्षेत्र अंग कहलाया- बाल्मिकी रामायण-1/32.
☆शरीर के सुंदरता के कारण इस महाजनपद के लोग अपने को अंग कहते थे-बौद्ध ग्रन्थ “दीर्घनीकाय टीका”.
☆अंग जनपद की स्थापना मध्य ऋग्वेद काल के पूर्व में ही हो चुकी थी- राधाकृष्ण चौधरी/हिस्ट्री ऑफ बिहार/1958 पृ0 330.
☆गन्धारिभ्यों मूज वद्म्योड़ गैम्यो मगधेभ्यः-अर्थवेद-5/22/14.
☆अंग जनपद पुराने भागलपुर और मुंगेर तक विस्तृत था ।पूर्णिया की सीमा इसी महाजनपद के अन्तर्गत थी।गंगा का उत्तर वाला हिस्सा अंगुत्तराप /उत्तर अंग कहलाता था – पार्जिटर/जनरल ऑफ एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल/1987, 85.
☆अंग का प्रसिद्ध नगर “विटंकपुर”समुद्र के किनारे बसा था -कथा सरित सागर -25/35,26/115,82/3-16.
☆अंग की सीमा बैधनाथ धाम/देवघर से भुवनेश्वर तक विस्तृत था-शक्ति संगम तंत्र,सप्तम पटल.
☆कलिंग भी अंग राज्य में सम्मिलित था और तंत्र भी अंग की सीमा एक शिव मंदिर से दूसरे शिव मंदिर तक बतलाता है ।यह एक महाजनपद था ।अंग में मानभूमि,वीरभूम,मुर्शिदाबाद,संथाल परगना ये सभी इलाके सम्मिलित थे-डॉ0देव सहाय त्रिवेद/प्राड़ मौर्य बिहार/पृ071.
☆ प्रभात रंजन सरकार,डॉ0परमानंद पांडेय,डॉ0डोमन साहु समीर,महेश्वरी सिंह महेश,सुमन सूरो,प्रो0मनमोहन मिश्र, तेज नारायणकुशवाहा,डॉ0अमरेन्द्र,प्रो0बहादुर मिश्र,नरेश पांडेय चकोर,राजेन्द्र प्रसाद सिंह,रंजन,डॉ0रमेश मोहन आत्मविश्वास आदि जैसे भाषा विद्वानों ने केन्द्रीय अंगिका भाषा की चार बोलियाँ स्वीकार की है-देवघरिया,मुंगेरिया,धर्मपुरिया,और गिद्धोरिया ।

अतः आपसे सादर अनुरोध है कि उपर्युक्त विषयक संबंधी उल्लेखित बातों पर ध्यानाकृष्ट करने की कृपा कर अंग महाजनपद के करोड़ों लोगों की लोकभाषा अंगिका को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूचि में शामिल करने-कराने हेतु आवश्यक व सकारात्मक पहल करने की कृपा करें,साथ ही अंग महाजनपद के सभी रेलवे स्टेशनों पर अंगिका भाषा में सूचना प्रसारण करने-कराने का निर्देश दें जो कि हम अंगिका भाषियों का वाजिब सम्मान व अधिकार है।यह कृपा हमारी समिति के साथ-साथ करोड़ों अंगिका भाषियों के प्रति न्याय के रूप में होगा और इस कृपा व न्याय के लिए हम आपके आजन्म ऋणी व आभारी रहेंगे।

शुभ कामनाओं सहित शीघ्र कार्रवाई की प्रतिक्षा में………
आपका विश्वासी

( गौतम सुमन)
राष्ट्रीय अध्यक्ष
अंग उत्थानान्दोलन समिति,बिहार-झारखंड सह अंग मुक्ति मोर्चा ।
Mobile No. 09934880594,09709432576.

अंग उत्थानान्दोलन समिति,बिहार-झारखंड सह अंग मुक्ति मोर्चा तरफऽ स॑ दिनांक ३ अप्रैल – २०१७, सोमवार  क॑ बिहार  केरऽ विक्रमशिला म॑ राष्जीट्रपति प्रणव मुखर्जी क॑ सौंपलऽ गेलऽ ज्ञापन केरऽ मूल कॉपी केरऽ फोटो  : - 

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