सीताकांत महापात्रा समिति की सिफारिश सूची में शामिल अंगिका, भोजपुरी सहित 38 भाषाओं को 8वीं अनुसूची में तुरंत जगह मिले 

—  कुंदन अमिताभ —

कैंपेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी एंड राइट्स (CLEAR),  भारतीय भाषा समूह, मैथिली-भोजपुरी अकादमी और अंगिका.कॉम ने संयुक्त रूप से मांग की है कि देश में अलग-अलग समुदायों की 38 भाषाओं को यथाशीघ्र संवैधानिक दर्जा दिया जाए । 21 फरवरी 2017 ई. को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के मौके पर दिल्ली में जमा हुए देशभर के भाषा कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार से मांग की है कि 2004 ई. में सीताकांत महापात्र समिति द्वारा की गई सिफारिशों के अनुसार 38 भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में तुरंत शामिल किया जाए ।

नई दिल्ली स्थित प्रेस क्लब ऑफ इंडिया में आयोजित संयुक्त प्रेस कॉन्फेंस को संबोधित करते अंगिका.कॉम के संस्थापक और अखिल भारतीय अंगिका साहित्य व कला मंच के उपाध्यक्ष कुंदन अमिताभ ने अंगिका को एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा बताते हुए कहा कि अंगिका बिहार, झारखंड, पं. बंगाल के पच्चीस जिलों सहित दिल्ली, मुंबई, कोलकता, आदि नगरों में रहने वाले करीब 6 करोड़ लोगों की भाषा है । उन्होंने सरकार से माँग की कि अंगिका, भोजपुरी सहित उन सभी 38 भाषाओं को संविधान की अष्टम अनुसूची में तुरंत शामिल करे जो 2004 ई. की सीताकांत महापात्र समिति की सिफारिश सूची में शामिल है ।

उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं के संवर्धन व संरक्षण से हिन्दी अधिक विकसित व समृद्ध होगी साथ ही भारतीय संस्कृति अधिक सशक्त होकर विश्व पटल पर अपनी अलग पहचान बनाये रखने में अधिक सक्षम हो सकेगा । उन्होंने कहा कि भाषायें सभ्यता व संस्कृति की संवाहक हैं जो समाज व लोगों को परस्पर जोड़ने का काम करती हैं। भाषाओं में भेदभाव करने से देशवासियों में मतभेद व असमानता के भाव उत्पन्न होते हैं जो अंततः देश की एकात्मक संस्कृति के लिए ही नुकसानदेह है। उन्होंने कहा कि जब हम विदेशी भाषा अंग्रेजी को बड़े गर्व के साथ आत्मसात कर अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल कर अपनी संस्कृति का एक अहम हिस्सा बना सकते हैं, तो अपनी मातृभाषाओं को क्यों नहीं । आजाद भारत की पूरी की पूरी सरकारी प्रणाली अंग्रेजी के विकास में लगी है जबकि यहाँ की मातृभाषाओं के संरक्षण व विकास की ओर सरकार का ध्यान अपेक्षाकृत रत्ती भर भी नहीं है । उन्होंने कहा कि इस तरह के सरकारी रवैये से आम जनमानस में अपनी भाषा व संस्कृति के प्रति विलगाव व हीनभावना जाग्रत होने का खतरा हमेशा बरकरार रहता है जिनके शिकार अंततः पश्छिमि संस्कृति व अंग्रेजी भाषा को अपनाने हेतु विवश हो जाते हैं । उन्होंने कहा कि शिक्षा के माध्यम, संचार माध्यम व रोजगार की भाषा बनाये बगैर मातृभाषाओं का संरक्षण व संवर्द्धन संभव नहीं । रोजगार के लिये आयोजित होने वाली विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में ऐच्छिक विषय के रूप में विभिन्न मातृभाषाओं को अनिवार्य रूप से शामिल कर इनकी महत्ता को कायम किया जा सकता है ।

दिल्ली सरकार की दिल्ली स्थित मैथिली-भोजपुरी अकादमी के उपाध्यक्ष कुमार संजॉय सिंह ने कहा कि आज दो पीढ़ियों में मातृभाषा में आपसी संवाद नहीं हो रहा है, इसकी वजह यह है कि आज के बच्चे बुजुर्गों के भाषा के साथ मेल नहीं बैठा पाते हैं। इस वजह से दूरियां बढ़ती जा रही हैं। उन्होंने जोर देकर मांग की है कि 2004  में सीताकांत महापात्र समिति की सिफारिशों के अनुसार अंगिका सहित 38 भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में तुरंत शामिल किया जाए।

कैंपेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी एंड राइट्स (CLEAR) के प्रेजिडेंट डॉक्टर जोगा सिंह ने बताया कि भारत सरकार ने पिछले कई सालों के दौरान अलग-अलग समितियों की सिफारिशों के आधार पर जिन भारतीय भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल किया है उन पैमानों को नहीं लागू कर रही है। इससे भाषा की विविधता को लेकर सरकार की भेदभाव की नीति जाहिर होती है। डॉक्टर जोगा सिंह ने कहा कि मातृभाषा का अधिकार हर जन का एक ऐसा मौलिक सांस्कृतिक अधिकार है जो उन्हें उनके आर्थिक, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रणाली व राजनीतिक अधिकार से संबद्ध करता है ।

उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा का प्रमुख उद्देश्य था कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले । साथ ही विश्व में लुप्त हो रही भाषायें संरक्षित हो । इसके अलावे केंद्र सरकार ने दावा किया है कि वह मातृभाषा आधारित बहुभाषीय शिक्षा को बढ़ावा देगी जिससे स्कूल ड्रॉप आउट दर को कम करने में मदद मिलेगी । इस संबंध में हमारा यह आग्रह है कि सरकार के इस पहल को सफल बनाने के लिये 2004 में सीताकांत महापात्र समिति की सिफारिशों के अनुसार 38 भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में तुरंत शामिल किया जाए । दिल्ली से भारतीय भाषाओं में समाचार प्रसारण की व्यवस्था को देशभर में फैले आकाशवाणी के अलग-अलग केंद्रों में ट्रांसफर करने के फैसले का भी विरोध किया गया है । भारतीय भाषा समूह के दीपक ढोलकिया ने कहा भारतीय भाषाओं के समाचार प्रसारण को दिल्ली से देश के अलग-अलग रेडियो सेंटर की तरफ फेंकने के फैसले का भी वे विरोध करते हैं। यह लंबी योजना का हिस्सा है, जिसमें भारतीय भाषाओं के दर्जे को स्थानीय भाषा के रूप में कम करना शामिल है। उन्होंने कहा कि देश में एक राष्ट्रीय भाषा नहीं है और आकाशवाणी ने एक योजना के अनुसार भारतीय भाषाओं के लिए लंबे समय से अपॉइंटमेंट बंद कर रखा है।

कैंपेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी एंड राइट्स (CLEAR) के उपाध्यक्ष आनंद गुरु ने कहा कि एयरपोर्ट हो या सरकार के विज्ञापन, दिल्ली हो या तमिलनाडु केवल अंग्रेजी और हिंदी में ही सारी बातें लिखी होती हैं।

कैंपेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी एंड राइट्स (CLEAR) के साकेत एस. साहू ने कहा कि उड़ीसा में कोसली भाषा को उड़िया भाषा की वर्चस्वता का शिकार होना पड़ रहा है । जबकि कोसली भाषा भाषी करोड़ों में हैं ।

जन चेतना अभियान के अश्विनी कुमार ने कहा कि संविधान की धारा 348, 343(1)-(2), 351, 120, 210, 147 में व्यापक संशोधन के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय से लेकर निचली अदालतों तक की कार्यवाही एवं प्रत्येक स्तर का शासन-प्रशासन, उच्च शिक्षा, रोजगार की परीक्षा से अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर भारत की समस्त जन-भाषाओं को कानून, शासन-प्रशासन, उच्च शिक्षा, रोजगार की भाषा बनाना चाहिए । उन्होंने कहा कि सरकारी महकमे में भारतीय भाषाओं की हैसियत अनुवाद की भाषा की है । अपेक्षाकृत सरल हिन्दी (हिंदुस्तानी), एवं समस्त भारतीय भाषा ही अंग्रेजी का विकल्प है ।

तेलंगाना से आये रमेश आर्या ने कहा कि उनकी मातृभाषा बंजारा को बोलने वाले लगभग 6 करोड़ हैं, पर भाषा व साहित्य विकास हेतु कोई भी सरकारी सुविधा उपलब्ध नहीं है ।

भारतीय भाषा समूह के श्री अनिल चमरिया, कैंपेन फॉर लैंग्वेज इक्वलिटी एंड राइट्स (CLEAR) के श्री सेंथिल नाथन, श्री रॉवेल सिंह, दिप्यमान चक्रवर्ती, जसपाल सिंह सिधु, आदि ने भी सभा में अपने विचार व्यक्त किये ।

ज्ञातव्य है कि 2004 ई. में सीताकांत महापात्रा समिति द्वारा निम्नांकित 38 भाषाओं को संविधान की अष्टम अनुसूची मंें शामिल करने के लिए अनुशंसित किया गया है :-अंगिका, बंजारा, बज्जिका, भोजपुरी, भोती, भोटिया, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, धात्की, अंग्रेजी, गढ़वाली (पहाड़ी), गोंडी, गुज्जर या गुज्जरी, हो, काचाछी, कामतापुरी, करबी, खासी, कोदवा (कूर्ग), कोक बराक, कुमाउनी (पहाड़ी),  कुरक, कोसली, लेपचा, लिम्बु, मिजो (लुशाई), मगही, मुंडारी, नागपुरी, निकोबारीज, पहाड़ी (हिमाचली), पाली, राजस्थानी, शौर्सेनी (प्राकृत), सिरैकी, टेनइडी, टूलू । ( Angika, Banjara, Bajjika, Bhojpuri, Bhoti, Bhotia, Bundelkhandi, Chhattisgarhi, Dhatki, English, Garhwali (Pahari), Gondi, Gujjar or Gujjari, Ho, Kaachachhi, Kamtapuri, Karbi, Khasi, Kodava (Coorg), Kpk Barak, Kumaoni(Pahari), Kurak, Kosali, Lepcha, Limbu, Mizo,(Lushai), Magahi, Mundari, Nagpuri, Nicobarese, Pahari (Himachali), Pali, Rajasthani, Shaurseni (Prakrit), Tenyidi, Tulu )

 

Angika Samvad – Abri Dafi : अंगिका संवाद – अबरी दाफी  : 

सीताकांत महापात्रा समिति की सिफारिश सूची में शामिल अंगिका, भोजपुरी सहित 38 भाषाओं को 8वीं अनुसूची में तुरंत जगह मिले

Columnist (स्तंभकार) : Kundan Amitabh (कुंदन अमिताभ)

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