अंगिका कविता

समय समय के फेर (दोहा)

समय समय के फेर (दोहा)

समय समय के फेर (दोहा) — सुधीर कुमार प्रोगामर — कुर्सी, पगड़ी सोहरत, समय समय के फेर अैतें जैतें नय लगै, पिचकी टा भी देर।। चलऽ हिलैबै जोर स॑, तभिये टुटतै ध्यान जैसें माँझी बीच में, झारै आपनऽ शान।। कत्तऽ खरियैलऽ रहै, ढोरबा, धमना सांप जोखिम केरऽ बात नय, चाहे कत्तो चांप।। नीपल-पोतल पर चलै, झाड़ू के अभियान ज्ञानी क॑ होतै[Read More...]

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कठिन काल

कठिन काल – डा. अमरेन्द्र – कहीं नदीये लीलै मानुख, कहीं पहाड़ैं लीलै कहीं रेल के चक्का नीचूँ भीड़ भगत रऽ लथपथ कहीं बिलामऽ भागै छै, करला सें खाली हथहथ देखै छी केन्हऽकसाय होय काल मनुख क॑ छालै । ई बातऽ पर देवो चुप छै, धर्मऽ चुप छै आब॑ साठी माय कोण्टा में बैठी टप-टप लोर चुआवै सिरहान्हैं डैनी नुनुआँ[Read More...]

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बलि माँगै छै स्वदेश

बलि माँगै छै स्वदेश — विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ — बलि माँगै छै स्वदेश फेरू, बलि माँगै छै स्वदेश । सेठ-सामंत यहाँ छै सहकलऽ, बेईमानऽ के छै मऽन बहकलऽ, दीन-दलित के दिल छै दहकलऽ, कि जलै भी छै रोजे पेट बलि माँगै छै स्वदेश । कहाँ छै इंसानऽ के गुजारा ? मौज करै छै महलें आवारा, निर्धन जेनां बेघर – बनजारा,[Read More...]

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आदमी छै कहाँ

आदमी छै कहाँ — राजकुमार — आदमी छै कहाँ, जौं छै त॑ सहमलऽ डरलऽ, आरो, हुनखऽ थपेड़ सें छै दुबकलऽ डढ़लऽ । जहाँ भी जाय छी पाबै छी भयानक जंगल कुंद चन्दन छै, कुल्हाड़ी रऽ मान छै बढ़लऽ । बाघ-भालू भीरी भेलऽ छै आदमी बौना, हुनखऽ नाखून छै बढ़लऽ, कपोत पर पड़लऽ । आय काबिज हुनी, सागर आकाश, धरती पर[Read More...]

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जिनगी सगर छै

जिनगी सगर छै — कुंदन अमिताभ — जिनगी सगर छै जरा जरा छै मौत जहाँ भी जरा जरा । हवा हवा भलुक छै सोहानऽ हवा द्वार मन के खोलऽ जों जरा जरा । सभ दरबज्जा यहाँकरऽ फिट्टे छै खटखटाबऽ तं॑ सही जरा जरा । मिटी जैथौं मंजिल के सब फासला हौसला राखऽ बुलंद जों जरा जरा । छै इंजोरा के[Read More...]

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गामऽ मं॑

गामऽ मं॑ — कुंदन अमिताभ — मंजर – मंजर हर गाछी के झरतं॑ होतै । फलऽ के आश मन कोखी मं॑ पलतं॑ होतै ॥ घमा घमजोर देहऽ के रग टूटी रहलऽ छै । बड़ुआ नद्दी के कलकल नजरऽ म॑ ऐतें होतै ॥ साँझ दै वाला दीया के बरती छोटऽ भ॑ गेलै । डिबिया नेसै केरऽ चेष्टा जोर पकड़तें होतै ॥[Read More...]

गंगा नहान

गंगा नहान

प्रतिबिम्ब — कुंदन अमिताभ — माघी पूर्णिमा आरू तिलासंक्रांत मं॑ बिहनगरे फोरछॊ के पहिनै गंगा नहाबै लेली आपनऽ गाँव खानपुर सं॑ सुलतानगंज दन्न॑ चली दै वाला  वू दिन जब॑-जब॑ मऽन पड़ै छै बिसरलऽ दिन त॑ मऽन करै छै फेरू सं॑ ओन्हे जतरा आरम्भ करलऽ जाय । वैन्हऽ दिना मं॑ गंधवहगिरि  सं॑ चलै वाला हवाँ छुऐ रहै पहिनै हमरे देह आरू[Read More...]

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मानवता दफनैलऽ छै

मानवता दफनैलऽ छै — श्यामनारायण तूफान — पतझड़ बगिया में छैलऽ छै, नञ बसन्त अभियो अइलऽ छै । नञ पनघट आभियो पनियैलऽ, रधिया के खालिये घैलऽ छै । भुखिया छै भुखली झुग्गी में, भाँङलऽ अँचरा लहुवैलऽ छै ।। पतझड़ बगिया में छैलऽ छै, नञ बसन्त अभियो अइलऽ छै । कटलऽ छै चननऽ के गछिया, फूल सब्भे मुरझैलऽ छै । तिनरंङिया चुनरी[Read More...]

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शीशा के महलऽ सं॑ (गजल)

शीशा के महलऽ सं॑ (गजल) — लक्षमण मंडल — शीशा के महलऽ सं॑ पत्थर चलैबै छऽ आपने घरऽ क॑ कैन्हें जलाबै छऽ । दुनिया क॑ समझना आसान त॑ नै दोस्तऽ क॑ दुश्मन कैन्हें बनाबै छऽ । जखम छिपैला सं॑ बनै छै नासूर मौत क॑ गलाँ कैन्हें लगाबै छऽ । जिनगी के नै छै हिफाजत कोनो भगवानऽ के दुआ क॑ कैन्हें[Read More...]

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घर बनी गेलै (गजल)

घर बनी गेलै (गजल) — आदित्य प्रकाश सिंह — घर बनी गेलै हमरऽ ई धीरें – धीरें, होलै हमरऽ सपना साकार धीरें – धीरें । केकरौह सतैलियै नै गलऽ सभ्भै क॑ लगैलियै, गुजरी गेलै हमरऽ जिनगी के समय धीरें – धीरें । ई मंजिल रहै दूर, कठिन रहै डगर, पग बढ़ैलियै त॑ पहुँची गेलियै धीरें – धीरें । आपने सिनी[Read More...]