आधुनिक अंगिका साहित्य

रूप निहारै ऐना मं॑

रूप निहारै ऐना मं॑

रूप निहारै ऐना मं॑ — भूदेव प्रसाद शर्मा ‘ भूषण ‘ — ऐना रंग चान चमकै छै अँगना मं॑ । सजलऽ रूप रंग चान सन मुख दमकै छै घोंघा मं॑, छिटकै दुघिया बदन सं॑ झकझक इंजोरिया साजन आबै सपना मं॑, लऽ औंगरी रऽ लाल लाल हाथऽ मं॑ मेंहदी रऽ निखार, कसमस बदन पर कुचुकी उभार, रूप निहारै नवोढ़ी रही –[Read More...]

विरह गीत

विरह गीत

विरह गीत — नरेश जनप्रिय — बदरा भैया हो लेनें जा हमरऽ ई सनेश । पियवा भुलैलै पता नै जाय कोन देश ॥ कही दिहौ जाय क॑ हमरऽ ई बतिया बिरहा में फाटै छै रात-दिन छतिया बेरथ होलऽ जाय छै हमरऽ जिन्दगानी तड़पी क॑ रात काटौं आरो दिन कानी कही दिहौ आबी देतै पलो भर दरेस बदरा भैया हो लेनें[Read More...]

जत्त॑ हटकै

जत्त॑ हटकै

जत्त॑ हटकै — मथुरानाथ सिंह ‘रानीपुरी’ — कौआ काँव-काँव कुत्ता भूकै दिन अन्हरिया रात नै सूझै हड़हड़ – गड़ग़ड देहे झूलै काँटऽ कूशऽ सगठें फूलै  । सनफन पिल्लू पेट्हें कोंचै जीत्ते मुर्दा गीधें नोचै माटी टूटलै धूरा फटकै बाहरें खनखन भीतरें चटकै । चिड़िया गुमसुम बाझहें गटकै इ बलजोरी अपन्हैं ढचकै य़हो डकार ‘रानीपुरी ‘अपनऽ गाड़ी के पहिया जत्त॑ हटकै[Read More...]

विदाई गीत

विदाई गीत

विदाई गीत — श्रीभगवान प्रलय — पोखरी किनारी होय क॑ चलिहें रे कहरा देखी लेबै बाबा के बहियार रे । की जानौं कहिया तक लौटबै नैहरबा कब तक बसबै ससुरार रे । कान दोनों पीन्हैं छेलाँ सरसों के बाली दुभड़ी अंगूठी पोरे – पोर रे । डिकरी-डिकरी कानै गैया-बछड़ुआ देतै कौनें ओकरा आहार रे । सुपती खोसलों खेली भनसा ओसरबा[Read More...]

भादऽ के झांकी

भादऽ के झांकी

भादऽ के झांकी — नरेश जनप्रिय — रिमझिम पड़ै छै बूँद फुहार देखौ भादऽ मं॑ हरिहर लागै समूच्चा बहियार देखौ भादऽ मं॑ । मेघो गरजै बिजली चमकै बेग्हौं शोर मचाबै पोखर नद्दी लबालब, मोरबा-मोरनी नाच देखाबै झिंगुर करै छै खूब झनकार देखौ भादऽ मं॑ रिमझिम पड़ै छै बूँद फुहार देखौ भादऽ मं॑ । कन्हौं कतरनी कन्हौ स्वर्णा खेतऽ मं॑ शोभै[Read More...]

समय समय के फेर (दोहा)

समय समय के फेर (दोहा)

समय समय के फेर (दोहा) — सुधीर कुमार प्रोगामर — कुर्सी, पगड़ी सोहरत, समय समय के फेर अैतें जैतें नय लगै, पिचकी टा भी देर।। चलऽ हिलैबै जोर स॑, तभिये टुटतै ध्यान जैसें माँझी बीच में, झारै आपनऽ शान।। कत्तऽ खरियैलऽ रहै, ढोरबा, धमना सांप जोखिम केरऽ बात नय, चाहे कत्तो चांप।। नीपल-पोतल पर चलै, झाड़ू के अभियान ज्ञानी क॑ होतै[Read More...]

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कठिन काल

कठिन काल – डा. अमरेन्द्र – कहीं नदीये लीलै मानुख, कहीं पहाड़ैं लीलै कहीं रेल के चक्का नीचूँ भीड़ भगत रऽ लथपथ कहीं बिलामऽ भागै छै, करला सें खाली हथहथ देखै छी केन्हऽकसाय होय काल मनुख क॑ छालै । ई बातऽ पर देवो चुप छै, धर्मऽ चुप छै आब॑ साठी माय कोण्टा में बैठी टप-टप लोर चुआवै सिरहान्हैं डैनी नुनुआँ[Read More...]

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बलि माँगै छै स्वदेश

बलि माँगै छै स्वदेश — विद्याभूषण सिंह ‘वेणु’ — बलि माँगै छै स्वदेश फेरू, बलि माँगै छै स्वदेश । सेठ-सामंत यहाँ छै सहकलऽ, बेईमानऽ के छै मऽन बहकलऽ, दीन-दलित के दिल छै दहकलऽ, कि जलै भी छै रोजे पेट बलि माँगै छै स्वदेश । कहाँ छै इंसानऽ के गुजारा ? मौज करै छै महलें आवारा, निर्धन जेनां बेघर – बनजारा,[Read More...]

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आदमी छै कहाँ

आदमी छै कहाँ — राजकुमार — आदमी छै कहाँ, जौं छै त॑ सहमलऽ डरलऽ, आरो, हुनखऽ थपेड़ सें छै दुबकलऽ डढ़लऽ । जहाँ भी जाय छी पाबै छी भयानक जंगल कुंद चन्दन छै, कुल्हाड़ी रऽ मान छै बढ़लऽ । बाघ-भालू भीरी भेलऽ छै आदमी बौना, हुनखऽ नाखून छै बढ़लऽ, कपोत पर पड़लऽ । आय काबिज हुनी, सागर आकाश, धरती पर[Read More...]

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जिनगी सगर छै

जिनगी सगर छै — कुंदन अमिताभ — जिनगी सगर छै जरा जरा छै मौत जहाँ भी जरा जरा । हवा हवा भलुक छै सोहानऽ हवा द्वार मन के खोलऽ जों जरा जरा । सभ दरबज्जा यहाँकरऽ फिट्टे छै खटखटाबऽ तं॑ सही जरा जरा । मिटी जैथौं मंजिल के सब फासला हौसला राखऽ बुलंद जों जरा जरा । छै इंजोरा के[Read More...]