आधुनिक अंगिका साहित्य

अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की आनाकानी समझ से परे

अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की आनाकानी समझ से परे

अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की आनाकानी समझ से परे —  कुंदन अमिताभ — यह एक अनबूझ पहेली सी ही है कि बिहार, झारखंड, पं. बंगाल के लगभग छह करोड़ भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषा अंगिका को अब तक भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है. जबकि वास्तविकता यह है कि विश्व के[Read More...]

क्या आज प्रधानमंत्री अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की घोषणा करेंगें?

क्या आज प्रधानमंत्री अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की घोषणा करेंगें?

क्या आज प्रधानमंत्री अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने की घोषणा करेंगें? —  कुंदन अमिताभ — यह एक अनबूझ पहेली सी ही है कि बिहार, झारखंड, पं. बंगाल के लगभग छह करोड़ भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषा अंगिका को अब तक भारतीय संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है. जबकि वास्तविकता यह है कि विश्व[Read More...]

पीयै के पानी लेली मारा-मारी

पीयै के पानी लेली मारा-मारी

पीयै के पानी लेली मारा-मारी —  कुंदन अमिताभ — पीयै के पानी केरऽ समस्या दिनों दिन भयावह होलऽ जाय रहलऽ छै. दिनों-दिन बढ़लऽ जाय रहलऽ जनसंख्या के अलावा नदी, जंगल आरू पहाड़ जैसनऽ जलस्त्रोत वाला प्राकृतिक संपदा केरऽ अंधाधुंध दुरूपयोग एकरऽ मूल कारणऽ मं॑ सं॑ चंद आसानी सं॑ समझलऽ जाय वाला कारण छेकै. मनुष्य आरू इतर जीव समुदाय लेली जीवन[Read More...]

दूरी

दूरी

दूरी — कुंदन अमिताभ — सहज क॑ सहेजन॑ बिना असहज क॑ सहेजी कहिया तलुक दुनिया सहेजै के नाटक करभो ? मानलिहौं कि तोंय क्षणभर मं॑ अंतरिक्ष नापी लै छहो तड़ातड़ सामुद्रिक गहराई पैठी लै छहो पर हमरा तलक पहुँचै मं॑ एत्त॑ समय केना लागी जाय छहौं ? हम्मं॑ कोय भी हुअ॑ पारै छी तहूँ, तोरऽ पड़ोसी या कोइयो लेकिन अंतरिक्ष केरऽ[Read More...]

रौदा

रौदा

रौदा — कुंदन अमिताभ — उधारो लै ल॑ पड़हौं रौदा त॑ नै हिचकिचाबऽ लै ल॑ आखिर धरती भी त॑ उधारे लेलऽ रौदा पर ही जिंदा छै । Angika Poetry : Rouda Poetry from Angika Poetry Book : Dhamas (धमस) Poet : Kundan Amitabh

कल॑-कल॑

कल॑-कल॑

कल॑-कल॑ — कुंदन अमिताभ — कल॑-कल॑ गरै छै दूध गाय केरऽ थऽन सं॑ दोल भरी जाय छै. कल॑-कल॑ । कल॑-कल॑ टपकै छै बूँद सरंग सं॑ सागर भरी जाय छै. कल॑-कल॑ । कल॑-कल॑ बिखरै छै चाँदनी चान सं॑ धरती तरी जाय छै दिल बहुराय छै कल॑-कल॑ । कल॑-कल॑ भरै छै आग सीना मं॑ मानव के जोद्दा बनी जाय छै देशऽ के[Read More...]

गीढ़ऽ

गीढ़ऽ

गीढ़ऽ — कुंदन अमिताभ — खोली ल॑ गीढ़ऽ तभिये तरान छौं । खोलै छहो किताब त॑ गीढ़ऽ खोलऽ चलाबै छहो जुबान त॑ गीढ़ऽ खोलऽ । चलाबै छहो कलम त॑ गीढ़ऽ खोलऽ खंगारै छहो मऽन त॑ गीढ़ऽ खोलऽ । खोलऽ हवा खोलऽ पानी खोलऽ रौदा खोलऽ चाँदनी । खोलऽ धरती खोलऽ सरंग सब छै तंग छेड़ऽ जंग । नै अब॑ चिढऽ[Read More...]

कहिया अवतरित भेलै मानव

कहिया अवतरित भेलै मानव

कहिया अवतरित भेलै मानव —  कुंदन अमिताभ — धरती पर मानव केरऽ अस्तित्व केतना पुरानऽ छै ? इ सवाल केरऽ जबाब खोजै केरऽ प्रयास लगातार होतं॑ रहलऽ छै. पर ठीक-ठीक कुछ पता नै चल॑ पारलऽ छै. ऐन्हऽ मं॑ समय – समय पर मिललऽ पुरातात्विक अवशेष ही अनुमान लगाबै के मुख्य आधार बनै छै. लगातार होय रहलऽ वैज्ञानिक शोध सं॑ कुछ[Read More...]

की छेकै जिनगी

की छेकै जिनगी

की छेकै जिनगी — कुंदन अमिताभ — की छेकै जिनगी ? बस तनी देर पलाश फूलऽ सं॑ बात कर॑ द॑ झब-झब मंजर के खूशबू मनऽ के कोना मं॑ जौरऽ कर॑ द॑ बबूली के काँटऽ सं॑ ताड़ऽ पत्ता के घिरनी नचाब॑ द॑। बस तनी देर निहार॑ द॑ कूँड़ऽ चली रहलऽ छै लहाब॑ द॑ तमसलऽ रौदा मं॑ घामऽ सं॑ तरान ल॑ लीखी[Read More...]

डडीर

डडीर

डडीर — कुंदन अमिताभ — ऐन्जां सं॑ जे लौकै छौं पातरऽ – पातरऽ टांगुर – मांगुर डडीर लगीच गेला पर बनी जाय छै झरना जे जीवन क॑ समेटी क॑ चूरू मं॑ उतरी रहलऽ छै स्वर्ग सं॑ धरती पर झरी – झरी क॑ जीवन बाँचै ल॑ धरती क॑ । डडीर पारलऽ छै जन्न॑ – तन्न॑ भाग्यऽ के खाली पहचानै के जरूरत[Read More...]