स्त्री के मंदिर प्रवेश

बासी-टटका (अंगिका कॉलम) / राकेश पाठक

हमरऽ देशऽ के सामाजिक आरो धार्मिक परंपरा के इतिहास बताबै छै कि भारत मं॑ मंदिर ईश्वरोपासना, अराधना आरू बहुत हद ताँय पारिवारिक, सामाजिक कलह के निपटारा केरऽ केंद्र छेलै । पंडित-पुजारी-पुरोहित जहाँ मंदिर मं॑ भक्त सिनी क॑ भगवानऽ के पूजा-पाठ कराबै म॑ सहायता करै छेला वहीं समाजऽ के करता-धरता सिनी मंदिरऽ के एंगना मं॑ बैठी क॑ लोगऽ के कलह के निपटारा कराबै छेलात । मतुर आज मंदिर खुद्दे कलह के जड़ बनी गेलऽ छै । ई देशऽ के राम-रहीम के कलह त॑ जग जाहिर छै । साठ-पैंसठ बरिस स॑ उप्पर होय गेलऽ छै । मामला कोट म॑ अटकलऽ छै । आज ताँय ई फैसला नै हुअ॑ देलऽ जाय रहलऽ छै कि मंदिर राम के बन॑ नै कि रहीम के । जे चिडिय़ाँ-चुनमुन, पीपरी ताँय स॑ ल॑ क॑ आदमी आरो हाथी-घोड़ा तक क॑ घऽर दै बला छऽत हुनके आज अदना आदमी जेकरऽ साँस के डोरी राम-रहीमऽ के हाथऽ मं॑ छै सं॑ राम-रहीम के घऽर बनाबै लेली मानं॑ कि मंदिर बनावै लेली मार-काट मचाय रहलऽ छै । राम-रहीम के मंदिर के कलह त॑ कहियो साईं बाबा के मंदिर के कलह । आरो अब॑ मंदिर मं॑ स्त्री प्रवेश के कलह । मंदिर खुद्दे एक बडक़ा कलह ।

पिछला दिन एकटा शनि मंदिर मे स्त्री के प्रवेश के लै के कलह खड़ा भेलै । देखतं॑-देखतं॑ ई बडक़ा वितंडावाद बनी गेलै । एक तरफ देश भरी के जनानी सडक़ पर उतरी गेली त॑ दोसरा तरफ टी.वी. चैनल पर गरमागरम बहस छिड़ी गेलै । एकटा मठाधीश न॑ त॑ ई कही क॑ शनि क॑ भगवान के पदे स॑ खारिज करी देलकात कि शनि देवता नै मात्र एक ग्रह छैत । टी.वी. पर बहस करै वला सिनी म॑ स॑ कोय-कोय शास्त्र-पुराण के उदाहरण दै क॑ परंपरा निभावै के राग अलापलकात त॑ कोय-पवित्रता-अपवित्रता के प्रश्न खड़ा करी देलकात ।

जहाँ ताँय परंपरा निभावै के बात छै त॑ आज हम्मं॑ सिनी कहाँ अपनऽ पुरनका सनातनी परंपरा निभाय रहलऽ छी । हम्मं॑ सिनी जे  ऋग्वैदिक आर्य जन के संतान छिकाँ हुनकऽ पहनाबा कि पैन्ट, शर्ट, कोर्ट, टाई छेलै ?  हुनियों सिनी कि मॉम-डैड उच्चारण करै छेला ? एक दूसरा स॑ भेंट होला पर ‘हाय-हेलो’ कहै छेला ? केंडल लाइट डीनर करै छेला ? ई सब परंपरा की सनातनी छिकै । नै, एकदम नै । आज हम्मं॑ सिनी सनातनी रही गेलऽ छी खाली नामे के । बोली-चाली, पहनावा, खाना-पीना, जीवन पद्धति स॑ हम्मं॑ अपनऽ पूर्वज ऋग्वैदिक आर्य जन के सब टा परंपरा कहिये तियागी देन॑ छी । ऐसनऽ करना हमरा सिनी के गलती नै समय के माँग छेलै । हर तरह के रेवाज, परंपरा कहियऽ स्थायी नै रहै छै । समय आरो जरूरत के मोताबिक बदलतं॑ रहै छै । जब॑ खान-पान, रहन-सहन, बोली-चाली, भक्ति-भाव सब बदली जाय छै त॑ स्त्री के मंदिर प्रवेश के परंपरा कैहने नै बदल॑ पारै छै । जदि एकरा जबरदस्ती रोकलऽ जाय त॑ बेसी दिन तक नै । समय के मांग के अनुसार ई परंपरा खुद्दे टूटी जैतै । हवा चली चुकलऽ छै । कोय एकरा रोकै नै पारै छै ।

अब॑ बात रही जाय छै पवित्रता-अपवित्रता केरऽ । कैहने कि स्त्री रजस्वला होय छै, ई बातऽ के आधार बनाय क॑ हमरऽ देशऽ के सब टा शास्त्र-पुराण (वेदऽ के छोड़ी क॑) स्त्री क॑ अपवित्र घोषित करी देन॑ छै । स्त्री के प्रति ई तरह के मनोभाव रखना स्त्री के प्रति घोर अन्याय छिकै । रजस्वला होना एक टा अनिवार्य जैविक आरो प्राकृतिक नियम छिकै । स्त्री जानी-बुझी क॑ ई स्थिति मं॑ नै आबै छै । स्त्री क॑ ई अवस्था के लेली नारी वर्ग क॑ पुरूष समाज न॑ एतना न॑ नीचा देखैने छै, सैकड़ों बरिस स॑ ई रं घिन करन॑ छै कि स्त्री खुद्दे ई अवस्था लेली खुद क॑ दोषी मानी लै छै । पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक काम स॑ खुद्दे अपना क॑ दूर करी लै छै । मंदिर की, मंदिर के छाया तक स॑ सवा हाथ दूरे रहै के कोशिश करै छै । ई तरह के हीन भावना ग्रसित स्त्री की वू अवस्था मं॑ धोखा द॑ क॑ मंदिर मं॑ जाब॑ पारै छै ? कहियऽ नै । पुरुष समाज के स्त्री पर एतना त॑ विश्वास करने चाहियऽ । आज नारी क॑ जब॑ पुरुषऽ के बराबरी के हक मिली रहलऽ छै तब॑ मंदिर प्रवेशऽ मं॑ भी ई हक मिलना ही चाहियऽ ।

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