महात्मा जी के तोता

बासी-टटका (अंगिका कॉलम) / राकेश पाठक

पिछला बेर तीन-चार दिन बिन मौसम के बरसात ऐलै। तीने-चार दिन के झऽर बून मे देषऽ के मैट्रो पोलिटर षहर चेन्नई बोहा-पानी में बहाय गेलै। षहर तहस-नहस होय गेलै। आदमी सिनी जहाॅं-तहाॅं बन्धाय गेलै। निकलै के रस्ता नै। रेल,बस, जहाज सब जहाॅं के तहाॅं रूकी गेलै। त्राही-त्राही मची गेलै। अपने सिनी सब जाने छियै। टी. वी. पर सब देखैलऽ गेलऽ छेलै।

            ई बोहा-पानी प्राकृतिक विपदा से बेसी मानवीय विपदा छेलै, कैहने कि नदी-नाला के जल भराव, जल निकास के जगह पर बड़का-बड़का आलीषान अपार्टंमेंट बकी गेलऽ छेलै। झडर-बूव के पानी जाय तऽ जाय कहाॅं। उप्पर से नदी-बाॅंध के पानी थोड़ी देलऽ गेलै। बाद में ई मानवीय विपदा के प्राकृतिक विपदा के नाम दै देलऽ गेलै ताकि बाढ़ पीड़ित सहायता फंड के नाम पर लाखों-करोड़ो के लूट-खसोट करलऽ जाय। ई हालत खली चेन्नई अे के नै छै। दिल्ली, कलकत्ता, बम्बई, गौहाटी सब के एक्के हाल छै। वनिहा झडर-बून आबै नै छै कि बाढ़-बोहा आबी जाय छै। जन-जीवन अस्त-व्यस्त होय जाय छै। सब जगह एक्के हा कारण। नदी-नाला बाॅंध-पीखर भरी के अवैध निर्माण। जल निकासी, जल भराव के रस्ता बन्द करी देना।

            चुनावी मौसम आबे छै तऽ घोशणा के बरसात आबी जाय छै। सोना-चाॅंदी, गहना जेवर, वाषिंग मषीन से लै के स्कूटी, लॅपटाॅप दैके घोशणा। देष के, षहर के, जनता-जर्नादन के भूल भूत समस्या के समाधान के घोशणा नै होय छै। बोटर तऽ उमताय जाय छै दामी सामान पाबै के लालय में। ओकरं चुनाव चिह्न पर तड़ातड ठप्पा मारी दै छै जे नेता, जे पार्टी बेसी से बेसी दामी चीज है के लालच दै छै। हर चुनावी मौसम में षिकारी आबै छै। दाना डालै छै आरऽ तोता पाॅंच बरिस ले ली जाल में फॅंसी जाय छै। चुनाव के समय सौंसे देष में येहे होय छै। सौंसे देषऽ के वोटर महात्मा जी के रटंल तोता। ‘षिकारी आयेगा। जाल बिछायेगा। दाना डालेगा। लोग से इसमें फॅंसना नही। जय ललिता के जाल में महात्मा जी के रटंल तोता फॅंसी गेलै। चुनाव के समय जय ललिता जाल बिछाय के गहना-जेवर, वाषिंग मषीन के दाना छिटी देने छेलै। अकबे पिन्हऽ गहना-जेवर, घोबऽ-पीचऽ कपड़ा वाषिंग मषीन से। बाद-बोहा से बच ने की अपनऽ गहना-जेवर, वाषिंग मषीन के गचै मे? तखनी नौ सुझलऽ छेल्हौं कि जान छै तमिअे जहान छै। चुनाव के समय ई षर्त रखैं कि जे नता, जे पार्टी हमरऽ षहर, हमरऽ घऽर के बचाबै ले ली काम करतै ओकरे वोट देबै। नैऽय कधी ले ली सोच मे। तोरा में चैथै के कूवत कहाॅ छौन। तोंहे तऽ महात्मा जी क तोता छिका। खाली रहै लेली जानै छऽ – ‘षिकारी आयेगा। जाल बिछायेगा। दाना डालेगा। लोभ से इ समे फंसना नही। ’ रटंत तोता जाल में फॅंसला के बादऽ येहे रहतें रहै छै। महात्मा जी के तोता के चेन्नई वला सिनी जैसने हाल होय छै। आज की सौंसे देष केरऽ वोटर महात्मा जी के तोता छिकै। सब जानै छै। जानी बुझी के षिकारी के जाल में पाॅंच साल ले ली फॅंसे छै।

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