गाय हमरऽ माय

बासी-टटका (अंगिका कॉलम) / राकेश पाठक

‘गाय हमरऽ माय।” ईं बात खाली हंम्ही नै कहै छी। ईं बात हमरऽ बाप, दादा, परदादा, धरदादा, लकड दादा सिनी सब ने कहने घेत। कारण  कारण छै। एक हा नैै। अनेक । गौ माता हमरा दूध, दही, घी, घोर, मट्टा सब दै छेती। गाय के दूध, दही, घी में गाय केरऽ गोबर आरऽ पेसाब मिलाय देलऽ जाच छै तऽ बू ‘पंचगण्य‘ हीच जाच छै। ‘पंचगण्य‘माने कि बडऽ से बडऽ पापऽ के नाश करै बला। सासतर पुराण में पंचगण्य के महिमा के वर्णन करलऽ गेलऽ छै। ये हे लेली तऽ पंडीजी अपतड  जजमान सिनी के पाप के पराय सचित कराबै घडी पंचगण्य खिलाबै घेत। गौ माता के मल-मूत्र जदि पापना शक पंचगण्य छै तबे हमरऽ जन्मदात्री माय के मल-मूत्र तऽ ओकरऽ से बढी के ग्राह्य योग्य होना चाहिय तब्बे हम्मे सिनी अपनऽ शैथ्थागत बृद्दा माता के मल-मूत्र साफ करै मे एते घृणा कैहने करै छी  जे माय हमरा रोच्चॉ- रोच्चॉ ममता दै छेती वू माय अपनऽ बृद्दा काल में हमए लेली अवहेलना, उपेक्षा के पात्र कैहने बनी जाच छेती तखनी हमरऽ धार्मिकता, मानवता, आदर्शता दिता कहाँ चतलऽ जाच छै।

एक बात आरऽ गाय हमरऽ माय छेकी। जाच हमरा मरला पर बैतरणी पार कराबै छेती। मरला के बाद बैतरणी पार करी के स्वर्ग जाँच पहँुचय के लालच मेें हम्मे अपनऽ माय गाय के दोसरा के दान करी दै छियै। मरै से पहिले ‘गौदान‘ कराच दै हमरऽ लालसा रहै छै। कैहने गाय जे माय के पेट से हम्मे जनम लै छी वू माय कि हमरा बैतणी नै पार कराबै पारै छेती वू माय से बढी के हमरऽ जीवन यात्रा आर कीय होबे पारै छै वूम ाय के हम्मे ‘गौदान‘ के जगह ‘मायदान‘ कैहने नै करी दै छियै अपनऽ जीवन त्राण ले ली गाय के हम्मे दोसरा के दान करी दै छियै बिना ई बात के सोचने, समझने कि जेकए हम्मे गाय दान करी रहलऽ छियै वू गाय के पेट भरी के घास- भुस्सऽ दाना-पानियऽ देबे पारतै कि लै ऐसन हम्मे चेहे लेली करे पारै छियै कि गाय नि मँुहियाँ घडन छै। वू हमरऽ विरोध नै करै पारै छै। जे खुट्टा से बन्ही दहऽ सेहे खुट्टा से बन्ही जाच छै। हमो सिनी सासतर-पुराण के परमान दै छियै सासतर में लिखलऽ छै। सेहे लेली हम्मे ई करै छियै । लेकिन ई नै सोचै छियै कि सासतर पुरान के बात माती के धरम निभाय के हम्मे एक हा निमुँद्दियाँ घन के साथे केतना बडऽ अन्याय करी रहलऽ छियै। एक तरफ तऽ गाय के हम्मे  मानै छियै आरऽ दोसरऽ तरफ बेहे माय के दोसरा के हाथऽ मे दै दै छियै। की ई पाप नै छियै कि ई हमरऽ कधनी औरऽ करनी के फरक नै उजागर धरी दै छै कोच बेटा कि अपनऽ माय के दोसरा के हाथऽ में दै के बात सपनऽ में सोचे पारै छै कि सच में हम्मे जाच के पाय मानै छियै

तनिहा यहऽ बात पर धियान देलऽ जाय। गाय जदी हमरऽ माय छिकै तब्बे ओकरऽ बेटा-बेटी, माने कि बाछा-बाछी सिनी तऽ हमरऽ भाय बहिन होलै नी। कैटा बाछा-बाछी के हम्मे अपनऽ माय-बहिन जखाँ मानै धियै जरूरत पडला पर बेची के टका लै लै छियै। कि कोच आदमी अपनऽ माय-बहिन के बेची के टका लेबे पारै छै हमरे गाय आरऽ ओकरऽ बाछा-बाछी जदी हमरे धान-बहूँम के खेतऽ में थल्लऽ जाच छै तऽ हम्मे ओकरा बेरहमी से लाढी से ढेंगाय दै धियै। बाहरे हम्मे जौ माता के बेटा।

हमरऽ देश में गौहत्या नै होते पारे। ई बात हमरा बरदास्त से बाहर। कैहने कि ई हमरऽ धरम के खिलाफ बात छै। रूक गाय के मारै के बदला हम्मे एक सौ आदमी के मारी के लेबै। नै तऽ ‘गौरक्षा‘ लेली अपनऽ मुडी कटबाय देबै। लेकिन हम्मे बेहिचक गाय के बेचे पारै छी। ‘गय हमरऽ माय” ओकरा बेचै में हमरा तनिकऽ टा लाज बएचन नै। गौमाता के बेची देला पर भी हमरा कोच ‘मायबेचबा” नै कहे पारै छै। कैहने कि खाली हम्हीं नै ई देशऽ के हिन्दू अपनऽ माय गाय के बेचै छै। हम्मे जानै धियै कि हमरऽ बेचलऽ गाय गाय के तस्करी करै बला के हाथऽ मेें पडी जाच छै।  बंगला देश आरऽ पाकिस्तान के सीमा से लगलऽ भारतीय सीमांचल में तस्करी करी के उपरी संख्या मंे हमरऽ माय गाय के पाकिस्तान आरऽ बंगला देश भेजी देलऽ जाच छै बूचट खाना मे कटै लेली। हम्मे खुट्टे जाच के नै काटै छी मतरकी नगद टका लै के हमरऽ माय गाय के दोसरा के हाथऽ से कटैलेली खुट्टे भेजी दैच छी बिना कोच हिचकिचाहट कै। बिना कोच लाज-गरायन कै। वाह रे गाय हमरऽ माय कहै बला हम

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