तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग, पुस्तकालय, मैथिली, अंगिका समेत कई कोर्स में नाम मात्र के शिक्षक

व्यावसायिक कोर्स : नए सत्र में नामांकन पर रोक

Publish Date:Wed, 13 Sep 2017 01:58 AM (IST) | Updated Date:Wed, 13 Sep 2017 01:58 AM (IST)

भागलपुर। प्राध्यापकों की कमी के कारण तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने व्यावसायिक व स्नातक कोर्सो के लिए नए सत्र में नामांकन पर रोक लगा दी है। ऐसे में छात्रों की परेशानी बढ़ गई है।

क्या है परेशानी

विश्वविद्यालय में चलने वाले कई व्यावसायिक कोर्स की पढ़ाई के लिए प्राध्यापकों की कमी है। कोर्ट ने विवि को संविदा पर नियुक्ति करने पर रोक लगा रखी है। वहीं विवि लगातार राजभवन से प्राध्यापकों की मांग कर रहा है। लेकिन पर्याप्त संख्या में विवि को प्राध्यापकों नहीं मिल पा रहे हैं। इस वजह से समस्या बढ़ गई है। विवि ने कई कोर्स की पढ़ाई तो पूर्व में शुरू कर दी लेकिन शिक्षक नहीं हैं। उदाहरण के लिए विवि में पत्रकारिता विभाग, पुस्तकालय, मैथिली समेत कई कोर्स ऐसे चल रहे हैं जहां नाम मात्र के शिक्षक हैं। अंगिका विभाग में मात्र एक शिक्षक प्रो. मधुसूदन झा हैं जो इन दिनों विवि में डीएसडब्ल्यू का कार्य देख रहे हैं। ऐसे में कोर्स में दाखिला लिए छात्रों की कक्षा नहीं हो पा रही है। वहीं पत्रकारिता विभाग खोल तो दिया गया है लेकिन यहां एक भी इस विषय के अनुभवी शिक्षक नहीं हैं। वहीं कुलपति लगातार शिक्षकों की मांग राजभवन से कर रहे हैं लेकिन निकट भविष्य में मांग पूरा होती नहीं दिख रही है। इसलिए विवि प्रबंधन इस कड़े कदम पर विचार करने को मजबूर हुआ है।

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कोट

शिक्षकों की कमी है। छात्रों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। नए सत्र में नामांकन तब ही लिया जाएगा जब शिक्षकों की कमी दूर हो जाएगी।

डॉ. नलिनी कांत झा, कुलपति, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय

By Jagran 

हिंदी की शक्ति अंगिका जैसी इनकी बोलियों में छिपी है

भाषाः बोलियों की शक्ति

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है।

क्षिप्रा किरणJanuary 23, 2016 02:40 am

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते हैं। बोली की धुन, लय और उच्चारण में तो अंतर होता ही है, कई बार उसके शब्द-संदर्भों के अंतर को भी आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

व्यक्ति अपने परिवेश की उपज होता है और भाषा उसके परिवेश के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। वह जब संस्कृतियों का वहन करती है तो साथ-साथ मनुष्य के भावों का भी वहन कर रही होती है। व्यक्ति चाहे किसी भी भाषाई परिवेश में चला जाए उसकी अपनी भाषा या बोली कहीं न कहीं उसके अवचेतन में बनी ही रहती है। वह स्वयं को या किसी भी अन्य वस्तु को अपने ही भाषाई संदर्भों से जोड़कर देख पाता है। यह सिर्फ हिंदी के लिए ही नहीं, बल्कि किसी भी भाषा-भाषी के लिए भी उतना ही सच है। लेकिन हिंदी और उसकी बोलियों में इतनी विविधता है, उसके इतने अधिक और अलग-अलग अर्थ-संदर्भ हैं कि यही चीज उसकी ताकत बन जाती है। हिंदी की इस विविधता को समझने के लिए वास्तव में उसकी बोलियों को भी बहुत बारीकी से समझना होगा।

भाषाई विविधता वाले देश हिंदुस्तान में किसी भी भाषा या बोली को किसी खास दायरे में बांध कर नहीं रखा जा सकता। ऐसा करना भाषा के लोकतंत्र का हनन होगा। भाषा सीखने और उसके प्रयोग का अधिकार कहीं न कहीं शिक्षा और जीवन के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, क्योंकि सदियों से भाषा ही मानव जाति और विभिन्न सभ्यताओं की पहचान रही है। यही कारण है कि हमेशा सबसे पहले भाषा ही अस्मिताओं और संस्कृतियों के टकरावों का शिकार भी हुई है। हिंदी ने भी भाषा के रूप में ऐसे कई प्रहार झेले हैं।

उसे कभी राजनीतिक अवसरवादियों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहा है तो कभी कुछ अन्य असामाजिक लोगों ने उसका दुरुपयोग करना चाहा। भूमंडलीकरण की कोख से पनपा बाजार भी उन्हीं शरारती तत्त्वों में से एक है। बाजार ने अंग्रेजी को माध्यम बनाकर हिंदी और हिंदुस्तानियों की जातीय स्मृतियों को, उनकी भाषाई संस्कृतियों को मिटाने का प्रयास किया है। बाजार ने धर्म, राजनीति, मीडिया, विज्ञापन जैसे अपने औजारों की मदद से हिंदी की अस्मिता को चोट पहुंचाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन वह बार-बार अपनी पूरी शक्ति से उठ खड़ी हुई है। अपने अस्तित्व पर आए तमाम नवउपनिवेशवादी-नवउदारवादी हमलों से जूझती हुई बड़े ही चाक-चौकबंद ढंग से अपना विस्तार कर रही है। अब तो वह अपने खिलाफ खड़ी इन ताकतों का अपने पक्ष और अपने प्रसार में प्रयोग करना भी सीख गई है। सिनेमा और विज्ञापन के क्षेत्र में हिंदी के इस रूप को सहज ही देखा जा सकता है।

किसी सभ्यता का अंत करने के लिए सदैव वर्चस्ववादी शक्तियों ने वहां की भाषा को अपना लक्ष्य बनाया है। हिंदी ने भी उपनिवेशवादी शक्तियों का सामना किया है, लेकिन वह बिखरी नहीं है। एक उपनिवेश की भाषा होते हुए भी, उसके हमलों को सहते हुए वह ताकतवर भाषा की बराबरी में खड़ी है या कहें कि कई मायने में और कम समय में उससे अधिक विस्तार और लोकप्रियता मिल रही है। हिंदी का विस्तार उसकी बोलियों का विस्तार है। हिंदी अकेली नहीं है, बल्कि वह अपनी सभी बोलियों के साथ मिलकर हिंदी है।

 आज हिंदी ने अपना अंतरराष्ट्रीयकरण किया है। सिर्फ प्रचार-प्रसार के संदर्भ में नहीं, बल्कि हिंदी की कुछ स्वभावगत विशेषताओं के कारण ऐसा हुआ है। हिंदी की एक बड़ी खासियत है , आत्मसात और अनुकूलन की प्रवृत्ति। हिंदी ने बदलते हुए समय के साथ खुद को इतना लचीला बनाया कि सिर्फ भारतीय बोलियों के शब्दों को ही नहीं, बल्कि विदेशी भाषाओं के शब्दों को भी अपने भीतर समेटा है। फ्रांसीसी, लातीनी, जापानी अरबी और न जाने कितनी ऐसी विदेशी भाषाएं हैं, जिनके तमाम शब्दों को हिंदी ने अपनाया है। अनुकूलन की अपनी इसी क्षमता के कारण ही बाजार के इस भयाक्रांत कर देने वाले दौर में भी हिंदी अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है।
सामंजस्य बिठाने की अपनी क्षमता के कारण आज हिंदी ने यह साबित कर दिया है कि तीसरी दुनिया की भाषा होते हुए भी वह बेचारी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के हर क्षेत्र में अब वह एक नए तेवर और अपने नए अंदाज के साथ स्वयं को प्रस्तुत कर सकती है। भारतीय संस्कृति की समावेशी प्रवृत्ति को आज हिंदी के वर्तमान नए रूप में अनायास ही देखा जा सकता है। यह समावेशी प्रवृत्ति एक नए तरह की सृजनशीलता को जन्म देती है और यही किसी भी सभ्यता को गतिशील और ऊर्ध्वगामी भी बनाती है।
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