अंगिका की सांस्कृतिक छटाएं सजाई गई हैं पुरानी दुनिया के नये घर में

पुरानी दुनिया का नया घर

चिंकी सिन्हा बिहार, 25 अक्टूबर 2017, अपडेटेड 18:57 IST

(http://aajtak.intoday.in से साभार)
कला को एक कहानी की जरूरत होती है. ऐसा कहते हुए बिहार के मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह पेरिस के लोवरे संग्रहालय में रखी लिओनार्दो दा विंची की मोनालिसा पेंटिंग की मिसाल देते हैं और जोड़ते हैं कि इस पेंटिंग को हर साल साठ लाख लोग देखते हैं. यह पेंटिंग कई वजहों से मशहूर है जिनमें इसकी उम्र महज एक वजह हैः मोनालिसा तकरीबन 500 साल पुरानी है. इस लिहाज से दीदारगंज यक्षी कहीं ज्यादा मायने रखती है. बलुआ पत्थर की बनी 5 फुट 2 इंच ऊंची यह मूर्ति 2,300 साल से ज्यादा पुरानी आंकी गई है और तकरीबन एक सदी पहले गंगा के किनारे मिली थी. आज यह पटना के नए बने बिहार संग्रहालय की शान बढ़ाने वाली बेशकीमती कलाकृतियों में शरीक है. राज्य सरकार ने इस संग्रहालय का निर्माण 500 करोड़ रु. की लागत से किया है जिसके दरवाजे 2 अक्तूबर को आम जनता के लिए खोल दिए गए. संग्रहालय अंजनी कुमार के ही दिमाग की उपज है. वे कहते हैं, ”दीदारगंज यक्षी बिहार की मोनालिसा है. हमें अपनी कहानियां लोगों के सामने रखनी ही चाहिए. हमें अपनी धरोहर और हमारी संस्कृति को हर हाल में बढ़ावा देना चाहिए.”

संग्रहालय के निदेशक जे.पी.एन. सिंह कहते हैं, ”कलाकार की दूरदृष्टि की कल्पना कीजिए, जिसने बलुआ पत्थर के महज एक ही टुकड़े में यह कलाकृति गढ़ दी.” 2 अक्तूबर को भी कलाकार की इस कल्पनाशक्ति और दूरदृष्टि के काफी कसीदे काढ़े गए जब संग्रहालय के उद्घाटन के लिए हिंदुस्तान के 25 शीर्ष कलाकार इकट्ठा हुए. उनमें हिम्मत शाह, सुबोध गुप्ता, जतिन दास और अर्पणा कौर सरीखे जाने-माने कलाकार शामिल थे.

संग्रहालय में एक निर्माणाधीन रेस्तरां भी शामिल है जिसमें बिहार के व्यंजन पेश किए जाएंगे. तब तक लकड़ी में उकेरा गया बोधि वृक्ष का प्रतीक चिन्ह संग्रहालय के मुख्य द्वार की शोभा बढ़ा रहा है और आगंतुकों का पसंदीदा सेल्फी स्पॉट बन गया है. सुबोध गुप्ता कहते हैं, ”कल्पना करें कि गांव-देहात की एक औरत यहां आती है और समकालीन कला का दीदार करती है.” वे यहां अपनी खास शैली में एक फ्रिज, एक सिलाई मशीन, एक वाशिंग मशीन और बर्तनों के इस्तेमाल से एक रंगोली बना रहे हैं जो जल्दी ही संग्रहालय का हिस्सा बन जाएगी. वे अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं, ”दूसरे राज्यों और भारत सरकार को बिहार से जरूर सीखना चाहिए.”

2010 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार उस वक्त के पटना संग्रहालय में आए थे जो देश का तीसरा सबसे पुराना संग्रहालय है. उन्हें बताया गया कि प्रदर्शित कलाकृतियां राज्य के खजाने की 20 फीसदी भी नहीं हैं. अफसरों के मुताबिक, उस वक्त असल में महज 2,000 कलाकृतियां ही प्रदर्शित की गई थीं, जो न तो किसी खास क्रम से सजाई गई थीं और न ही उनके प्राचीन इतिहास की पूरी पृष्ठभूमि बताई गई थी. जगह की किल्लत की वजह से तब तकरीबन 49,000 कलाकृतियों का महज पांचवां हिस्सा ही प्रदर्शित किया जा सका था, जबकि कलाकृतियों के कुल खजाने में बिहार के अलग-अलग हिस्सों से मिले हजारों पुरापाषाण, सूक्ष्मपाषाण और नवपाषाण मूर्तिशिल्प शामिल थे. वैसे, सूबे का इतिहास खासा समृद्ध है. और क्यों न हो, आखिर इसी धरती पर बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था और जहां सम्राट अशोक ने युद्ध को तिलांजलि दी थी. इसकी विरासत में नालंदा भी शामिल है जो 12वीं शताब्दी तक दुनिया का बेहतरीन विश्वविद्यालय और विहार था. आज इसे बतौर शिक्षा केंद्र नए सिरे से जिलाया जा रहा है. अंजनी कुमार कहते हैं, ”हमें अपनी खोई विरासत फिर से हासिल करनी है. किसी जमाने में हम भारतीय साम्राज्य की राजधानी हुआ करते थे. हम सत्ता और संस्कृति की पीठ थे.”

उस वक्त पटना संग्रहालय के दौरे के बाद मुख्यमंत्री ने एक अत्याधुनिक कला संग्रहालय बनाने का फैसला किया. इसका डिजाइन चुनने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय ज्यूरी का ताना-बाना बुना गया. पटना के बेली रोड पर एक नए संग्रहालय का डिजाइन तैयार करने के लिए 2011 में जापान की वास्तुकला कंपनी मकी ऐंड एसोसिएट का चयन किया गया. अगले साल जनवरी में राज्य सरकार ने इस कंपनी के चयन को मंजूरी दे दी और जुलाई 2013 में मुख्यमंत्री ने इसकी आधारशिला रखी.

दुनिया भर के कई संग्रहालयों का दौरा कर चुके अंजनी कुमार कहते हैं, ”हम किसी की भी नकल करना नहीं चाहते थे. यह जापानी डिजाइन सरल और काम में आने लायक था, जिसमें भूतल के अलावा एक मंजिल और थी. दीवारों के लिए कोर्टेंन स्टील या वेदरिंग स्टील (एक मिश्रधातु जिस पर जंग की ”स्थिर” परत होने की वजह से पेंट करने की जरूरत नहीं पड़ती) का इस्तेमाल किया गया. बहुत सारे लोगों को लगता है कि इस्पात पर जंग लग गई है पर यह डिजाइन से ही (ऐसा दिखता) है.” वास्तुशिल्पियों ने संग्रहालय के लिए एक ”कैंपस लेआउट” भी चुना, जिसमें प्रवेश स्थल पर एक पैविलियन, प्रदर्शनी के लिए कला दीर्घाएं और एक प्रशासनिक इमारत शामिल हैं. फिर कनाडा की लॉर्ड कल्चरल रिसोर्सेज नामक कंपनी को लाया गया जो सांस्कृतिक योजनाएं बनाने वाली दुनिया की सबसे पुरानी सलाहकार कंपनी है. यह 1,800 से ज्यादा संग्रहालयों और सांस्कृतिक योजनाओं को अंजाम दे चुकी है. एजेंसी ने प्रदर्शन के लिए कलाकृतियों के चयन में मदद की. इनमें पुराने पटना संग्रहालय (जहां जीर्णोद्धार के बाद सन् 1764 के बाद की कलाकृतियां रखी जाएंगी) से लाई गई कई कलाकृतियां भी शामिल हैं.

कुल 5.3 हेक्टेयर जमीन पर बने इस नए संग्रहालय में 24,000 वर्ग मीटर निर्मित क्षेत्र है. नए संग्रहालय के पांच हिस्से हैं. एक हिस्से में बहुत-सी ऐतिहासिक दीर्घाएं हैं. दूसरा हिस्सा समकालीन कला और अस्थायी प्रदर्शनियों के लिए है. एक और हिस्सा आंचलिक कलाओं के लिए है जिसमें मिथिला, भोजपुर, मगही और अंगिका की सांस्कृतिक छटाएं सजाई गई हैं. एक अन्य हिस्सा प्रवासी कलादीर्घा का है जो ठेका मजदूरों के बाहर जाने और नए देशों में जाकर बसने को समर्पित है. पांचवां हिस्सा बच्चों की कलादीर्घा का है. प्रदर्शित कलाकृतियों में बोधिसत्व की प्रतिमा और गांधार कला शैली की मूर्तियों से लेकर 1959 में वैशाली में खोजे गए बुद्ध के अवशेषों से वाबस्ता ”प्राचीन कलाकृतियों का खजाना” शामिल है.

इसी के लिए वैशाली में एक और संग्रहालय बनाया जा रहा है जिसके लिए 73 एकड़ जमीन का अधिग्रहण भी किया जा चुका है. डिजाइन के लिए दिल्ली की एक वास्तुशिल्प कंपनी को लाया गया है और इस नए संग्रहालय में बुद्ध के अवशेष रखे जाने की उम्मीद है. इसके लिए सरकारी खजाने पर 300 करोड़ रु. की लागत आएगी. अंजनी कुमार कहते हैं, ”हर साल दो-तीन लाख सैलानी बोधगया आते हैं. वैशाली में बुद्ध (के अवशेषों) का संग्रहालय सैलानियों के लिए एक और आकर्षण का केंद्र होगा. इसमें एक ध्यान केंद्र और बौद्ध धर्म से जुड़ी प्राचीन कलाकृतियां भी होंगी.”

दूसरी तरफ, पटना हाइकोर्ट में तीन जनहित याचिकाएं दायर की गई हैं जो इन खर्चों पर सवाल उठाती हैं. 2015 में अदालत ने सरकार को इस बाबत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया था. यह निर्देश अशोक कुमार नाम के एक अध्येता और शिक्षक की जनहित याचिका (पीआइएल) की बिना पर दिया गया जिसमें ऐसे निर्माण पर सार्वजनिक रकम खर्च करने को लेकर सवाल उठाया गया था.

राज्य मंत्रिमंडल ने मई 2012 में नए संग्रहालय के लिए 400 करोड़ रु. के खर्च को मंजूरी दी थी, जिसमें 298.5 करोड़ रु. निर्माण की अनुमानित लागत थी. परियोजना की अंतिम लागत 498.5 करोड़ रु. थी. बिहार को ”विशेष राज्य का दर्जा” देने की मांगों को देखते हुए कई लोगों को लगता है कि संग्रहालय पर यह खर्च नाजायज है. मगर अंजनी कुमार जोर देकर कहते हैं कि, ”आजादी के बाद इस तरह का कोई संग्रहालय नहीं बनाया गया है. यह ऐतिहासिक संग्रहालय है, पर इसके दूसरे हिस्से भी बेहद अहम हैं. हम बिहार को कला और संस्कृति के केंद्र के तौर पर विकसित कर सकते हैं.”

आंचलिक कलादीर्घा में 17 कलाकृतियां सूबे की संस्कृति का जश्न मना रही है. जमुई के रहने वाले शिल्पकार प्राणमोहन साह का बनाया मछलियों का झुंड, जो बिहार में शगुन का प्रतीक माना जाता है, छत से तारों के सहारे लटका हुआ है और हवा में तैरता जान पड़ता है. एक कोने में 51 वर्षीया दुलारी देवी चेहरे पर घूंघट काढ़े खड़ी हैं. मधुबनी की एक छोटी-सी बस्ती रांती की रहने वाली दुलारी देवी को कला में उत्कृष्टता के लिए 2012-13 के राज्य पुरस्कार से नवाजा गया था. संग्रहालय ने उनकी एक पेंटिंग का अधिकार हासिल किया है जो अब उनके इलाके की दूसरी किस्म-किस्म की कलाओं के साथ संग्रहालय की दीवार की शोभा बढ़ा रही है. वे कहती हैं, ”इस कैनवस को पूरा भरने में मुझे एक साल लग गया.

इसमें मैंने हमारी पारंपरिक कमला पूजा के नजारे चित्रित किए हैं.” मछुआरों के एक समुदाय में पैदा हुई दुलारी देवी मशहूर मिथिला चित्रकार महासुंदरी देवी के घर में काम किया करती थीं. उन्होंने रंग भरने में महासुंदरी की मदद करते हुए शुरुआत की और देखते ही देखते खुद अपनी शैली विकसित कर ली. वे कहती हैं, ”मैं यह जानने के लिए बहुत उत्सुक रहा करती थी कि क्या मैं भी एक दिन अपने पेंटिंग बेचकर धन कमा सकूंगी. इसी कमरे में कागज की लुगदी या कुट्टी में शरद कुमार की आदिशक्ति का चित्रांकन भी है. यहां भगवान कृष्ण की बेटी और बेटे—सामा और चकेवा की लोककथा से प्रेरित मिट्टी की मूर्तियों का एक जोड़ा भी है. इसमें वह कथा दर्शाई गई है जिसमें बेटी सामा पक्षी बन जाती है और फिर भाई चकेवा उसे उसके असली रूप में वापस लाता है. इसके अलावा यहां रजत घोष की कलाकृतियां भी हैं जिन्होंने अपने मूर्तिशिल्पों और मिट्टी की मूर्तियों के काम के लिए 1984 में राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था. घोष कहते हैं, ”यह संग्रहालय हमारे लिए आस्था की छलांग है.”

बेशक, आस्था की यह छलांग बिहार के लिए भी है.

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