महापंडित राहुल सांकृत्यायन – यायावरी, वृहद साहित्य सृजन, ज्ञान-कला का अप्रतिम मसीहा

यादें यायावर की : ज्ञान के नवजागरण के मूल्यवान प्रतीक राहुल सांकृत्यायन
By Prabhat Khabar | Updated Date: Apr 9 2018 6:40AM

यायावरी, वृहद साहित्य सृजन, ज्ञान-कला के अद्भुत संग्रह की जब भी चर्चा होती है, तो इन क्षेत्रों में योगदान करनेवालों में महापंडित राहुल सांकृत्यायन का नाम अग्रणी होता है. उनकी सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक सक्रियता अप्रतिम है.

उनकी 125वीं जयंती न सिर्फ उनके प्रति कृतज्ञता का ज्ञापन है, बल्कि इस आत्ममंथन और आत्मचिंतन का भी अवसर है कि क्या हमने उनकी अमूल्य थाती को ठीक से संजो के रखा और उससे सीखने-समझने का प्रयास किया. उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित करते हुए उनकी स्मृति के विविध पहलुओं को स्पर्श करते हुए यह विशेष प्रस्तुति…

राहुल सांकृत्यायन

जन्म : 9 अप्रैल, 1893
जन्मभूमि : गांव- पंदहा, जिला- आजमगढ़, उत्तर प्रदेश
कर्मभूमि : बिहार
कर्मक्षेत्र : साहित्य, दर्शन, धर्म, यात्रा, राजनीति
पुरस्कार व उपाधि : पद्म भूषण, साहित्य अकादमी पुरस्कार
निधन : 14 अप्रैल, 1963 को दार्जिलिंग, पश्चिम बंगाल

राहुल सांकृत्यायन का जन्म नौ अप्रैल, 1893 को उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के पंदहा गांव में हुआ था. अपने पांच भाइयों में राहुल सबसे बड़े थे. राहुल सांकृत्यायन का मूल नाम केदारनाथ पांडे था. भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका निभाने के बाद वे नेपाल और तिब्बत में भी प्रवास कर चुके हैं.

बाद में श्रीलंका में उन्होंने श्रीलंका में बौद्ध धर्म अपना लिया और वर्ष 1930 में बौद्ध धर्म से दीक्षित होने पर उन्होंने अपना नाम राहुल रख लिया. बौद्ध धर्म अपनाने से पहले उन्हें दामोदर स्वामी के नाम से भी जाना जाता था. किशोरावस्था पार करते ही उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था. माना जाता है कि उनका साहित्यिक जीवन वर्ष 1927 से शुरू होता है.

बिहार में किसान आंदोलन

बिहार के किसान आंदोलन में भी उन्होंने प्रमुख भूमिका निभायी थी. वर्ष 1940 के आसपास इस कारण उन्हें कई माह तक जेल में भी रखा गया था. भारत छोड़ाे आंदोलन के बाद जेल से निकलने पर स्वामी सहजानंद सरस्वती द्वारा प्रकाशित साप्ताहिक अखबार ‘हुंकार’ का उन्हें संपादक बनाया गया.

घुमक्कड़ी स्वभाव

राहुल सांकृत्यायन का मानना था कि घुमक्कड़ी मानव-मन की मुक्ति का साधन होने के साथ-साथ अपने क्षितिज विस्तार का भी साधन है. सांकृत्यायन ने इंगलैंड समेत यूरोप के अन्य देशों की यात्रा भी की.

इसके अलावा, वे जापान, कोरिया, मंचूरिया, सोवियत संघ, ईरान समेत कई देशों की यात्रा पर भी गये. अपनी यात्रा के अनुभवों को आत्मसात करते हुए उन्होंने ‘घुमक्कड़ शास्त्र’ भी रचा. वे एक ऐसे घुमक्कड़ थे, जो सच्चे ज्ञान की तलाश में था और जब भी सच को दबाने की कोशिश की गयी, तो वह बागी हो गये. उनका जीवन अंतर्विरोधों से भरा पड़ा है.

राहुल सांकृत्यायन की प्रमुख रचनाएं

मौलिक रचनाएं
सिंह सेनापति
वोल्गा से गंगा
मधुर स्वप्न
बहुरंगी मधुपुरी
विस्मृत यात्री
कनैला की कथा
सप्तसिंधु
अनुदित रचनाएं
शैतान की आंख
जादू का मुल्क
सोने की ढाल
जो दास थे
अनाथ
सूदखोर की मौत

यायावर को याद करने का मतलब

पुष्पराज
स्वतंत्र पत्रकार

उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ के पंदाहा में 09 अप्रैल, 1893 को जन्मे सभ्यता के महान यायावर और ज्ञानी राहुल सांकृत्यायन का यह 125वां जयंती वर्ष है. छत्तीस भाषाओं के ज्ञाता महापंडित सांकृत्यायन इतिहासविद, पुरातत्ववेत्ता और त्रिपिटकाचार्य होने के साथ एशियाई नवजागरण के प्रवर्तक भी माने जाते हैं.

उनके देहांत के 55 वर्षों बाद भी भारत में उनके अवदानों का संपूर्णता में मूल्यांकन नहीं हो पाना हमारी ज्ञान परंपरा की एक बड़ी विडंबना है. तिब्बत की जिस एतिहासिक यात्रा के बाद काशी के बौद्धिक समाज ने उन्हें ‘महापंडित’ के अलंकार से सम्मानित किया था, उस यात्रा से लायी गयीं हजारों पांडुलिपियों का दशकों बाद भी अनुवाद न हो पाना दुखद है. उनकी तिब्बत यात्रा पर लंदन से प्रकाशित प्रतिष्ठित पत्रिका ‘मॉडर्न रिव्यू’ की टिप्पणी थी कि राहुल सांकृत्यायन ने लुप्त प्राचीन भारतीय इतिहास को खोज निकाला है. तब प्रसिद्ध इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल ने उन्हें भारत का ‘दूसरा बुद्ध’ कहा था. वैश्विक स्तर के भाषाविद् मानते हैं कि राहुल सांकृत्यायन ने हिंदी के साथ पालि और संस्कृत को भी प्रतिष्ठित करने में अमूल्य योगदान दिया.

कृषकपुत्र केदार पांडेय को जिस बिहार के खेत-खलिहानों, किसानों के संघर्ष और जेलों ने राहुल सांकृत्यायन के रूप में गढ़ा, उस बिहार को उन्होंने अपनी यायावरी से अर्जित सबसे बड़ी थाती तिब्बती पांडुलिपियां, पुरातत्व और थंका चित्र पटना संग्रहालय को दान दे दिया था, पर बिहार सरकार आठ दशक बाद भी उनके अध्ययन में अक्षम साबित हुई है. यह आश्चर्य ही है कि जिस बिहार की जेलों में ‘वोल्गा से गंगा’, ‘दर्शन-दिग्दर्शन’ जैसे महान साहित्य रचे गये, उस बिहार में राहुल सांकृत्यायन की विरासत के संवर्धन के लिए एक भी सरकारी या सामाजिक संस्था स्थापित नहीं हुई.

ग्यारह वर्ष की बाल्यावस्था में हुए विवाह को नकारते हुए उनके अंतःकरण में विद्रोह की जो चिंगारी सुलगी थी, वह ज्ञानपिपासा की अग्नि बनकर यायावर के अंतर जीवनभर जलती रही. धर्म, राजनीति और गृहस्थी में लगातार जड़ चेतना का निषेध करते हुए वे विद्रोही स्वरूप बरकरार रख सके.

प्रसिद्ध फिल्म निर्देशक ऋत्विक घटक के जीवन में ‘वोल्गा से गंगा’ रही. साहित्यकार प्रभाकर माचवे के अनुसार, ‘वोल्गा से गंगा’ प्रागैतिहासिक और एेतिहासिक ललित कथा-संग्रह की अनोखी कृति है. हिंदी साहित्य में विशाल आयाम के साथ लिखी गयी यह पहली कृति है.’ महाप्राण निराला के शब्दों में, ‘हिंदी के हित का अभिमान वह, दान वह…’ लब्धप्रतिष्ठ फिल्मकार अडूर गोपालकृष्णन लिखते हैं कि मलयालम साहित्य पर जिस एक हिंदी साहित्य का प्रभाव सबसे ज्यादा हुआ, वह ‘वोल्गा से गंगा’ ही है. विडंबना ही है कि हिंदी में राहुल सांकृत्यायन के व्यक्तित्व या प्रभाव पर कोई फिल्म या वृत्त-चित्र उपलब्ध नहीं है.

सिद्धार्थ के गृह त्याग और ज्ञान प्राप्ति तथा केदार पांडेय के गृह त्याग और सपनों में कोई अंतर नहीं है. सत्य की खोज में निकले बुद्ध ने ‘ज्ञान ही ईश्वर है’ की घोषणा की थी, तो उन्होंने बौद्ध दीक्षा के बाद खुद को सिद्धार्थ के पुत्र राहुल ‘राहुल सांकृत्यायन’ के रूप में परिणत कर अतीत के गर्भ में छुपे ज्ञान भंडार की खोज को अपना सबसे बड़ा लक्ष्य घोषित किया.

बुद्ध का अनुसरण करते हुए उन्होंने जो ज्ञान हासिल किया, उसके लकीर का फकीर बनने की बजाय बुद्ध को वैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया तथा ‘महामानव बुद्ध’ पुस्तक की रचना की और बुद्ध को बौद्ध धर्म एवं मठों से निकालकर विश्वविद्यालयों एवं शोध संस्थानों में अध्ययन का विषय बनाया. भारत में बौद्ध अध्ययन का प्रथम केंद्र ‘हिमालय अध्ययन केंद्र’ स्थापना राहुल जी ने ही लद्दाख में की थी. राहुल जी के प्रयास से शुरू हुए हिमालय अध्ययन केंद्र, बुद्ध अध्ययन केंद्र, तिब्बती भाषा केंद्र आज भारत से लेकर विश्व के अलग-अलग हिस्सों में हैं, पर राहुल सांकृत्यायन को जन्म देनेवाले राष्ट्र भारत में अब तक कोई ‘राहुल सांकृत्यायन शोध केंद्र’ नहीं बन सका है.

अपने जीवन में 50 हजार से अधिक पन्ने लिखनेवाले राहुल सांकृत्यायन ने घुमक्कड़ी में कितने किलोमीटर की यात्रा की, इसका किसी को पता नहीं है. राहुल सांकृत्यायन ज्ञान और संवेदना के नवजागरण के मूल्यवान प्रतीक हैं. उनके महान कार्यों का संरक्षण और अध्ययन हमारा दायित्व है.

तिब्बत से लाये थे दस हजार दुर्लभ ग्रंथ, दस किताबें ही छप पायीं

पुष्यमित्र, पटना

ज्ञान की क्षुधा और भारतीय बौद्धिक परंपरा के संधान में राहुल सांकृत्यान ताउम्र यहां-वहां भटकते रहे. इसी घुमक्कड़ी के दौरान उन्हें तिब्बत में वह धरोहर मिली जिसे आज दुनिया बीसवीं सदी के सबसे अमूल्य धरोहरों में से एक मानती है. ये धरोहर थीं, वे दस हजार ग्रंथ, जो पहले भारत से तिब्बत ले जायी गयी थीं. सातवीं से बारहवीं सदी के बीच लिखे इन ग्रंथों को राहुल चोरी-छिपे खच्चरों पर ढोकर भारत ले आये. ये ग्रंथ पटना के बिहार रिसर्च सोसाइटी में 80 साल से पड़े हैं.

दुर्भाग्यवश जिन दस हजार ग्रंथों को राहुल इतनी मशक्कत से लेकर आये उनमें से बमुश्किल दस का ही प्रकाशन हो पाया है. शेष रिसर्च सोसाइटी के डार्क रूम में पड़ी किसी ज्ञान के भूखे का इंतजार कर रही हैं.

इन दस हजार ग्रंथों में से कुछ संस्कृत में हैं, तो कुछ तिब्बती भाषा में. संस्कृत ग्रंथों को उन्होंने फिल्म निगेटिव और ग्लास निगेटिव बनवा कर लाया था. इन संस्कृत ग्रंथों में से तीन का प्रकाशन जापान की एक संस्था नारित्सन इंस्टीच्यूट फॉर बुद्धिस्ट स्टडीज के सहयोग से किया गया है.

इन तीनों ग्रंथों की कीमत सवा लाख रुपये है. कुछ और किताबों का प्रकाशन बिहार रिसर्च सोसाइटी और केपी जायसवाल इंस्टीच्यूट द्वारा किया गया है. मगर ज्यादातर किताबें अभी अप्रकाशित हैं. तिब्बती ग्रंथों का तो अनुवाद भी नहीं हुआ है. और यह काम कब होगा यह कहना मुश्किल है.

बताया जा रहा है कि सारनाथ के सेंट्रल यूनिवर्सिटी ऑफ तिब्बतन स्टडीज ने इन ग्रंथों के अनुवाद, संपादन और प्रकाशन के लिए बिहार रिसर्च सोसाइटी से संपर्क किया है. मगर उसका एमओयू अभी साइन नहीं हुआ है. हालांकि वे भी पहले संस्कृत ग्रंथों का प्रकाशन करेंगे. दूसरे चरण में ही तिब्बती ग्रंथों का अनुवाद और प्रकाशन होगा. इस बीच एक सकारात्मक कार्य यह हुआ है कि इन तमाम ग्रंथों का डिजिटलाइजेशन हो चुका है. इन पांडुलिपियों का संरक्षण भी ठीक से किया जा रहा है.

मगर इनके अनुवाद, संपादन और प्रकाशन की जो योजना है, उससे प्रतीत होता है कि इस ज्ञान संपदा को बाहर आने में अभी कितने दशक लगेंगे कहना मुश्किल है.

भागलपुर विवि से मिली थी राहुल को पीएचडी की डिग्री, पहली रंगीन पत्रिका का किया था संपादन

राहुल सांकृत्यायन का बिहार के अंग क्षेत्र से गहरा लगाव था. देश की पहली रंगीन हिंदी पत्रिका गंगा के संपादन के सिलसिले में उन्होंने भागलपुर के सुल्तानगंज में लंबा अरसा गुजारा था. इसी दौरान उन्हें भागलपुर विवि से पीएचडी की मानद डिग्री भी दी गयी थी.
इस डिग्री को उन्होंने काफी संभाल कर रखा था. आठ-दस साल पूर्व उनकी पत्नी कमला जब भागलपुर आयी थीं तो उन्होंने ये जानकारियां दी थीं. उन्होंने बताया था कि भागलपुर विवि की पीएचडी की डिग्री उनके घर की दीवार पर टंगी रहती थी, बच्चे पूछते थे कि भागलपुर कौन सी जगह है. इसी वजह से उनके मन में एक ख्वाहिश थी कि एक बार भागलपुर देख आयें.

कहा जाता है कि अंग क्षेत्र की भाषा अंगिका को यह नाम भी राहुल सांकृत्यायन ने ही दिया था. पहले इस भाषा को छिका-छिकी कहा जाता था. राहुल ने यहां के सिद्ध कवि सहरपाद के कृतित्व और योगदान को सामने लाने में भी बड़ी भूमिका निभायी

बिहार में भी रहे थे सक्रिय

म हापंडित राहुल सांकृत्यायन की बिहार में सक्रियता सारण में असहयोग आंदोलन से प्रारंभ हुई थी, जहां वे पहले एक महंत के शिष्य रह चुके थे.

जनवरी, 1922 में वे गिरफ्तार हुए और छह माह जेल में रहे. रिहाई के बाद वे कांग्रेस के जिला सचिव बने और कांग्रेस के गया अधिवेशन में बतौर प्रतिनिधि हिस्सा लिया.

अन्य मुद्दों के अलावा उन्होंने बोधगया के महाबोधि मंदिर को बौद्धों को सौंपने पर जोर दिया था. अगले साल वे राजद्रोह के आरोप में फिर जेल गये और उन्हें ढाई साल के कारावास की सजा मिली. यह सजा उन्होंने बक्सर और हजारीबाग जेलों में काटी. राजेंद्र प्रसाद, मजहरुल हक और अन्य नेताओं के साथ जेल से बाहर आने पर सांकृत्यायन ने कौंसिल चुनावों में कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए प्रचार किया.

कई सालों तक विभिन्न देशों में भ्रमण के बाद वे पांच अक्तूबर, 1938 को पटना आये. उन्होंने तिब्बत से लायी हुई सारी चीजें पटना संग्रहालय और उड़ीसा रिसर्च सोसाइटी को दान कर दिया. किसानों की हालत जानने-समझने के इरादे उन्होंने छपरा और डिहरी-ऑन-सोन की यात्राएं कीं.

इसी दौरान वे किसान सभा की बिहार ईकाई के सम्मेलन में शामिल हुए. वर्ष 1939 की जनवरी से वे सीवान के गांवों का दौरा करने का सिलसिला शुरू किया. वहीं एक सत्याग्रह के दौरान उन पर हमला हुआ और वे पचास साथियों के साथ हिरासत में लिये गये. उन्हें छह माह और बीस रुपये अर्थदंड की सजा हुई, पर उन्होंने यह राशि चुकाने से इनकार कर दिया जिसके लिए तीन माह की सजा और बढ़ा दी गयी. व्यापक विरोध के कारण तत्कालीन कांग्रेस सरकार को उन्हें रिहा करना पड़ा.

राहुल सांकृत्यायन ने जेल से बाहर आने पर फिर गांवों में घूमना शुरू किया और गिरफ्तार हुए. दो साल की सजा काटने के लिए उन्हें हजारीबाग जेल भेज दिया गया. पर वे जुलाई में रिहा कर दिये गये. मुंगेर में अक्तूबर, 1939 में बिहार की कम्यूनिस्ट पार्टी के संस्थापक सदस्य बने.

उन्हें 15 मार्च, 1940 को इलाहाबाद में फिर गिरफ्तार किया गया. उन्होंने हजारीबाग और अजमेर में 29 महीने जेल में बिताये. जेल में विभिन्न मुद्दों पर लेखन के अलावा आठ नाटक भोजपुरी में रचे. वर्ष 1942 में रिहाई के बाद वे फिर सक्रिय हुए. (महादेव साहा के लेख से)
एक ऐसा मनुष्य, जो बुद्ध से मिलता-जुलता है, जो जीव मात्र के प्रति दुर्भावना से मुक्त है, जिसका दृष्टिकोण विश्वव्यापी है, जो पूर्णरूप से सुस्थिर और शांत है, जिसके पास बच्चे स्वस्फूर्त दौड़ पड़ते हैं, जो अगर यह कहे कि मेरे पीछे आओ तो मनुष्य उसके पीछे ऐसे चल पड़ेगा जैसे वह गौतम या ईसा मसीह के पीछे-पीछे चलता था. राहुल सांकृत्यायन कई अर्थों में गांधी से भी आगे ‘जनता के आदमी’ हैं.

डॉ काशी प्रसाद जायसवाल, प्रसिद्ध इतिहासकार

बौद्ध दर्शन के सांगोपांग अध्ययन की तृषा दुर्गम मार्गों से घसीटकर उन्हें तिब्बत ले गयी. इसी बीच हिंदी-साहित्याकाश में उनका उदय धूमकेतु की भांति हुआ. भूमंडल के सभी प्राच्य विद्याविद् उनके एतिहासिक अनुसंधानों पर विस्मय कर रहे हैं. राहुल जी के लिए दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं है. सचमुच ऐसे पराक्रमी पुरुष को ईश्वर की आवश्यकता नहीं हो सकती.

रामधारी सिंह दिनकर, राष्ट्रकवि

राहुल जी के जितने प्रेमी हिंदी प्रदेश में हैं, उससे ज्यादा उनके प्रेमी हिंदी प्रदेश के बाहर के क्षेत्र में हैं. आजकल हिंदुत्व के उन लोगों ने, जो वेद देखे नहीं केवल नाम सुने हैं, जिन लोगों ने उपनिषद् पढ़ा नहीं, वे हिंदुत्व के नाम पर डींगें मारते हैं. राहुल जी ने जो भी लिखा उस वेद परंपरा से गुजर के लिखा था. भारत पर अभिमान करनेवालों को याद दिलाना जरूरी है कि समूचे हिंदी में, अन्यत्र, ऐसा मनीषी कोई और नहीं था. राहुल की सबसे बड़ी विशेषता है कि संस्कृत के पंडित होते हुए, ब्राह्मण होते हुए अपने ब्राह्मणत्व का अतिक्रमण किया. राहुल को कोई लाईब्रेरी बांधकर नहीं रख सकती है. राहुल का सत्य आग है, चिनगारी है.

(7 फरवरी 1993, नागपुर में नामवर सिंह द्वारा दिये गये राहुल सांकृत्यायन शताब्दी व्याख्यान से)

(Source: https://www.prabhatkhabar.com/news/vishesh-aalekh/memories-yayavar-knowledge-renaissance-rahul-sankrityan/1142132.html)