अंगिका भाषा में प्रस्तुत प्रभात संगीत मानव मन में ईश्वर प्रेम के प्रकाश फैलाने का काम करता है

जमशेदपुर- प्रभात संगीत दिवस का हुआ आयोजन

जमशेदपुर। 14 सितंबर को प्रभात संगीत दिवस मनाया जाता है आज से लगभग 7000 वर्ष पूर्व भगवान सदाशिव ने सरगम का आविष्कार कर मानव मन के सूक्ष्म अभिव्यक्तियों को प्रकट करने का सहज रास्ता खोल दिया था। इसी कड़ी में 14 सितंबर 1982 को झारखंड राज्य के देवघर में आनंद मार्ग के प्रवर्तक भगवान श्री श्री आनंदमूर्ति जी ने प्रथम प्रभात संगीत” बंधु हे निये चलो” बांग्ला भाषा में देकर मानव मन को भक्ति उनमुख कर दिया।

8 वर्ष 1 महीना 7 दिन के छोटे से अवधि में उन्होंने 5018 प्रभात संगीत का अवदान मानव समाज को दिया। आशा के इस गीत को गाकर कितनी जिंदगियां संवर गई। प्रभात संगीत के भाव ,भाषा, छंद, सूर एवं लय अद्वितीय और अतुलनीय है। बांग्ला, उर्दू , हिंदी, अंगिका ,मैथिली, मगही एवं अंग्रेजी भाषा में प्रस्तुत प्रभात संगीत मानव मन में ईश्वर प्रेम के प्रकाश फैलाने का काम करता है। संगीत साधना में तल्लीन साधक को एक बार प्रभात संगीत रूपी अमृत का  स्पर्श पाकर अपनी साधना को सफल करना चाहिए।

आचार्य जीतात्मानंद अवधूत ने साधकों को संबोधित करते हुए कहा कि इस पृथ्वी ग्रह पर उपस्थित मनुष्य के मन में ईश्वर के लिए उठने वाले हर प्रकार के भाव को सुंदर भाषा और सूर में  लयबद्ध कर प्रभात संगीत के रूप में प्रस्तुत कर दिया।

उन्होंने कहा कि कोई भी मनुष्य जब पूर्ण भाव से प्रभात संगीत के साथ  खड़ा हो जाता है, तो रेगिस्तान भी हरा हो जाता है।

संगीत तथा भक्ति संगीत दोनों को ही रहस्यवाद से प्रेरणा मिलती रहती है। जितनी भी सूक्ष्म तथा दैवी अभिव्यक्तियां हैं, वह संगीत के माध्यम से ही अभिव्यक्त हो सकती है। मनुष्य जीवन की यात्रा विशेषकर अध्यात्मिक पगडंडियां प्रभात संगीत के सूर से सुगंधित हो उठता है।आजकल प्रभात संगीत एक नये घराने के रूप में लोकप्रिय हो रहा है ।

उदयपुर में अखंड प्रभात संगीत समारोह

उदयपुर, १४ सितंबर,२०१७। सोसाइटी फॉर माइक्रोवायटा रिसर्च एंड इंटीग्रेटेड मेडिसिन (स्मरिम) और विश्व अभ्युदय गोष्ठी द्वारा प्रभात संगीत दिवस पर उदयपुर में प्रथम बार अखंड प्रभात संगीत समारोह का आयोजन टेकरी-मादरी रोड स्थित जागृति परिसर में किया गया।

सोसायटी अध्यक्ष डॉ. एस. के. वर्मा ने बताया की ५०१८ गीतों का संग्रह ‘प्रभात संगीत’ श्री पीआर सरकार द्वारा आठ विभिन्न भाषाओं जैसे बंगाली, संस्कृत, हिंदी, अंग्रेजी, उर्दू, मैथिलि, अंगिका, भोजपुरी आदि में दिए गए हैं. श्री सरकार ने प्रथम गीत “बंधू है निए चलो” 14 सितम्बर 1982 को बिहार के देवघर में दिया था। उन्होंने बताया कि इसमें जीवन के विविध आयाम और मनोभाव पर आधारित गीत हैं। साथ ही शिव और कृष्ण स्तुति से सम्बंधित गीत भी हैं। अखंड प्रभात संगीत में प्रभात संगीत के विभिन्न गीतों को बिना अवरोधित हुए निरतंर तीन घंटे अथवा तीन के गुणज में गाया जाता है. इसे श्री प्रभात रंजन सरकार ने प्रथम बार अपने रांची प्रवास के दौरान सम्पादित किया था. अखंड प्रभात संगीत से अत्यधिक धनात्मक माइक्रोवायटा आकर्षित होकर वातावरण को आध्यात्मिक साधना के लिए अनुकूल बनाते हैं.

कार्यक्रम का शुभारम्भ डायोसिस महिला सचिव अवधूतिका आनंद कृष्णा आचार्या द्वारा श्री सरकार की प्रतिकृति पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन कर हुआ. तीन घंटे तक चले कार्यक्रम में विभिन्न प्रभात संगीत जैसे तुम हो मेरे कृष्ण जगतपति, जीवनै मरणे तोमाके आमी जानी, ऐ की आकर्षण स्मरणे,तुमि आमार शुधु जानी, तुमि चाँद आमी चकोर, ज्योतिते उज्जवल प्रीती समुज्जवल, तुमि की चाओ आमी जानी ना, जय शुभ वज्रधर शुभ्र कलेवर, प्राणेर आवेग भरा, जमीं आसमां तुम्हारा, तुमि भूलो ना मोरे, वज्र कठोर कुसुम कोरक, आमार मनेर वृन्दावने, तुमि आमार ध्यानेर ध्येय, एक फाली चाँद, तोमाय आमी पेलूम इत्यादि का गायन हुआ।
समारोह के अंत में डायोसिस सचिव आचार्य ललितकृष्णानन्द अवधूत द्वारा अष्टाक्षर सिद्ध महामंत्र ‘बाबा नाम केवलम’ आवर्त कीर्तन संपन्न किया गया तत्पश्चात मिलित ईश्वर प्रणिधान, वर्णाध्यन के साथ स्वाध्याय पाठ हुआ. इस अवसर पर गिरधारी लाल सोनी, इन्दर सिंह राठौर, तपोनिष्ठा, राहुल, अंजू राठौर, मंजू सोनी, सुधा वर्मा, नंदिनी, अनुराधा, ओम, विनोद भारती इत्यादि उपस्थित थे. अंत में स्मरिम सचिव डॉ वर्तिका जैन ने सभी का धन्यवाद दिया।

उदयपुर में अखंड प्रभात संगीत समारोह

अंगिका के लोगों की शिकायत है कि मैथिली ने उनके साहित्य का बड़ा हिस्सा अपना बनाकर पेश किया और आठवीं अनुसूची में शामिल हो गई, इस तरह उसके साथ अन्याय हुआ है

हिंदी दिवस 2017 : हिंदीभाषी ही हैं हिंदी की ताकत

Published: Thu, 14 Sep 2017 10:48 AM (IST) | Updated: Thu, 14 Sep 2017 01:35 PM (IST)

By: Editorial Team, http://naidunia.jagran.com

हिंदी आज टूटने के कगार पर है। भोजपुरी और राजस्थानी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग तेज हो गई है। भोजपुरी के लिए प्रभुनाथ सिंह, रघुवंश प्रसाद सिंह, संजय निरुपम, शत्रुघ्न सिन्हा, जगदम्बिका पाल, मनोज तिवारी आदि सांसदों ने समय-समय पर इस तरह की मांग संसद में की है। विगत 3 मार्च 2017 को बिहार की कैबिनेट ने सर्वसम्मति से ऐसा प्रस्ताव पारित कर गृहमंत्री को भेजा है। राजस्थानी के लिए अर्जुनराम मेघवाल कई बार मांग कर चुके हैं।

छत्तीसगढ़ी, मगही, अंगिका, कुमायूंनी गढ़वाली, हरियाणवी आदि को भी संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग जोर पकड़ रही है, मगर हिंदी के सुविधाभोगी साहित्यकार कविता-कहानी लिखने और उसके लिए पुरस्कार-सम्मान के जुगाड़ में व्यस्त हैं। हिंदी के विखंडन का मुद्दा अभी उनकी चिंता में शामिल नहीं है। उन्हें इस बात का कोई इल्म नहीं कि यदि हिंदी की बोलियां हिंदी से अलग होकर संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हो गईं तो हिंदी का संयुक्त परिवार टूट जाएगा और देश को जोड़ने वाली हिंदी खंड-खंड होकर बिखर जाएगी। ऐसी दशा में साम्राज्यवाद की भाषा अंग्रेजी का वर्चस्व और अधिक सुदृढ़ हो जाएगा। भोजपुरी को संवैधानिक मान्यता देने की मांग करने वाले अपनी मांग के समर्थन में जिन आधारों का उल्लेख करते हैं, उनमें से अधिकांश आधार तथ्यात्मक दृष्टि से अपुष्ट, अतार्किक और भ्रामक हैं।

भाषा विज्ञान की दृष्टि से भोजपुरी भी उतनी ही पुरानी है जितनी ब्रजी, अवधी, बुन्देली, छत्तीसगढ़ी, हरियाणवी, कुमायूंनी गढ़वाली, मगही, अंगिका आदि। क्या उन सबको आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना संभव है?

भोजपुरीभाषियों की संख्या बार-बार 20 करोड़ बताई जाती है, जबकि इस अवधारणा का कोई आधार नहीं है। वास्तव में, हिंदी समाज की प्रकृति द्विभाषिकता की है। हम लोग एक साथ अपनी जनपदीय भाषा भोजपुरी, अवधी, ब्रजी आदि भी बोलते हैं और हिंदी भी। लिखने-पढ़ने का सारा काम हम लोग हिंदी में करते है? इसलिए हम एक साथ भोजपुरीभाषी भी हैं और हिंदीभाषी भी। इसी आधार पर राजभाषा नियम 1976 के अनुसार हमें क श्रेणी में रखा गया है और दस राज्यों में बंटने के बावजूद हमें हिंदीभाषी कहा गया है। वैसे भी सन 2001 की जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार भारत में भोजपुरी बोलने वालों की कुल संख्या 3,30,99497 ही है।

भोजपुरी हिंदी का अभिन्न् अंग है, वैसे ही जैसे राजस्थानी, अवधी, ब्रजी आदि और हम सभी विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में इन सबको पढ़ते-पढ़ाते हैं। हिंदी इन सभी के समुच्चय का ही नाम है। हम कबीर, तुलसी, सूर, चंदबरदाई, मीरा आदि को भोजपुरी, अवधी, ब्रजी, राजस्थानी आदि में ही पढ़ सकते हैं। हिंदी साहित्य के इतिहास में ये सभी शामिल हैं। इनकी समृद्धि और विकास के लिए और प्रयास होने चाहिए।

यदि भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया तो हिंदीभाषियों की जनसंख्या में से भोजपुरीभाषियों की जनसंख्या घट जाएगी। स्मरणीय है कि सिर्फ संख्या-बल के कारण ही हिंदी इस देश की राजभाषा के पद पर प्रतिष्ठित है। यदि यह संख्या घटी तो राजभाषा का दर्जा हिंदी से छिनते देर नहीं लगेगी। भोजपुरी के अलग होते ही ब्रजी, अवधी, छत्तीसगढ़ी, राजस्थानी, बुंदेली, मगही, अंगिका आदि सब अलग होंगी। उनका दावा भोजपुरी से कम मजबूत नहीं है। रामचरितमानस, पद्मावत, या सूरसागर जैसे एक भी ग्रंथ भोजपुरी में नहीं है।

ज्ञान के सबसे बड़े स्रोत विकिपीडिया ने बोलने वालों की संख्या के आधार पर दुनिया के सौ भाषाओं की जो सूची जारी की है, उसमें हिंदी को चौथे स्थान पर रखा है। इसके पहले हिंदी का स्थान दूसरा रहता था। हिंदी को चौथे स्थान पर रखने का कारण यह है कि सौ भाषाओं की इस सूची में भोजपुरी, अवधी, मारवाड़ी, छत्तीसगढ़ी, ढूंढाढी, हरियाणवी और मगही को शामिल किया गया है। साम्राज्यवादियों द्वारा हिंदी की एकता को खंडित करने यह ताजा उदाहरण है।

हमारी मुख्य लड़ाई अंग्रेजी के वर्चस्व से है। उससे लड़ने के लिए एकजुटता जरूरी है। भोजपुरी की समृद्धि से हिंदी को और हिंदी की समृद्धि से भोजपुरी को तभी फायदा होगा, जब दोनो साथ रहेंगी। आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपना अलग घर बांट लेना है। भोजपुरी तब हिंदी से स्वतंत्र वैसी ही भाषा बन जाएगी जैसी बंगला, उड़िया, तमिल, तेलुगू आदि।

आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भोजपुरी के कबीर को हिंदी के पाठ्यक्रम में हम कैसे शामिल कर पाएंगे? तब कबीर हिंदी के नहीं, सिर्फ भोजपुरी के कवि होंगे। क्या कोई कवि चाहेगा कि उसके पाठकों की दुनिया सिमटती जाए?

भोजपुरी घर में बोली जाने वाली एक बोली है। उसके पास न तो अपनी कोई लिपि है और न मानक व्याकरण। उसके पास मानक गद्य तक नहीं है। किस भोजपुरी के लिए मांग हो रही है? गोरखपुर की, बनारस की या छपरा की? कमजोर की सर्वत्र उपेक्षा होती है। घर बंटने से लोग कमजोर होते हैं, दुश्मन भी बन जाते हैं। भोजपुरी के अलग होने से भोजपुरी भी कमजोर होगी और हिंदी भी। इतना ही नहीं, पड़ोसी बोलियों से भी रिश्तों में कटुता आएगी। मैथिली का अपने पड़ोसी अंगिका से विरोध सर्वविदित है। अंगिका के लोगों की शिकायत है कि मैथिली ने उनके साहित्य का बड़ा हिस्सा अपना बनाकर पेश किया और आठवीं अनुसूची में शामिल हो गई। इस तरह उसके साथ अन्याय हुआ है।

संयुक्त राष्ट्र संघ में हिंदी को स्थान दिलाने की मांग आज भी लंबित है। यदि हिंदी की संख्या ही नहीं रहेगी तो उस मांग का क्या होगा? स्वतंत्रता के बाद हिंदी की व्याप्ति हिंदीतरभाषी प्रदेशों मे भी हुई है। हिंदी की संख्या और गुणवत्ता का आधार केवल हिंदीभाषी राज्य ही नहीं, अपितु हिंदीतरभाषी राज्य भी हैं। अगर इन बोलियों को अलग कर दिया गया और हिंदी का संख्या-बल घटा तो वहां की राज्य सरकारों को इस विषय पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है कि वहां हिंदी के पाठ्यक्रम जारी रखे जाएं या नहीं।

निश्चित रूप से भोजपुरी या हिंदी की किसी भी बोली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग भयंकर आत्मघाती है। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद और स्व. चंद्रशेखर जैसे महान राजनेता तथा महापंडित राहुल सांकृत्यायन और आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे महान साहित्यकार ठेठ भोजपुरी क्षेत्र के ही थे, किंतु उन्होंने भोजपुरी को मान्यता देने की मांग का कभी समर्थन नहीं किया। आज थोड़े से लोग, अपने निहित स्वार्थ के लिए बीस करोड़ के प्रतिनिधित्व का दावा करके देश को धोखा दे रहे है।

(लेखक कलकत्ता विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर और हिंदी बचाओ मंच के संयोजक हैं)

http://naidunia.jagran.com/national-hindi-diwas-special-blog-on-hindi-diwas-by-experts-1315488

तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय में पत्रकारिता विभाग, पुस्तकालय, मैथिली, अंगिका समेत कई कोर्स में नाम मात्र के शिक्षक

व्यावसायिक कोर्स : नए सत्र में नामांकन पर रोक

Publish Date:Wed, 13 Sep 2017 01:58 AM (IST) | Updated Date:Wed, 13 Sep 2017 01:58 AM (IST)

भागलपुर। प्राध्यापकों की कमी के कारण तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय प्रशासन ने व्यावसायिक व स्नातक कोर्सो के लिए नए सत्र में नामांकन पर रोक लगा दी है। ऐसे में छात्रों की परेशानी बढ़ गई है।

क्या है परेशानी

विश्वविद्यालय में चलने वाले कई व्यावसायिक कोर्स की पढ़ाई के लिए प्राध्यापकों की कमी है। कोर्ट ने विवि को संविदा पर नियुक्ति करने पर रोक लगा रखी है। वहीं विवि लगातार राजभवन से प्राध्यापकों की मांग कर रहा है। लेकिन पर्याप्त संख्या में विवि को प्राध्यापकों नहीं मिल पा रहे हैं। इस वजह से समस्या बढ़ गई है। विवि ने कई कोर्स की पढ़ाई तो पूर्व में शुरू कर दी लेकिन शिक्षक नहीं हैं। उदाहरण के लिए विवि में पत्रकारिता विभाग, पुस्तकालय, मैथिली समेत कई कोर्स ऐसे चल रहे हैं जहां नाम मात्र के शिक्षक हैं। अंगिका विभाग में मात्र एक शिक्षक प्रो. मधुसूदन झा हैं जो इन दिनों विवि में डीएसडब्ल्यू का कार्य देख रहे हैं। ऐसे में कोर्स में दाखिला लिए छात्रों की कक्षा नहीं हो पा रही है। वहीं पत्रकारिता विभाग खोल तो दिया गया है लेकिन यहां एक भी इस विषय के अनुभवी शिक्षक नहीं हैं। वहीं कुलपति लगातार शिक्षकों की मांग राजभवन से कर रहे हैं लेकिन निकट भविष्य में मांग पूरा होती नहीं दिख रही है। इसलिए विवि प्रबंधन इस कड़े कदम पर विचार करने को मजबूर हुआ है।

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कोट

शिक्षकों की कमी है। छात्रों को बेहतर शिक्षा नहीं दे पा रहे हैं। नए सत्र में नामांकन तब ही लिया जाएगा जब शिक्षकों की कमी दूर हो जाएगी।

डॉ. नलिनी कांत झा, कुलपति, तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय

By Jagran 

बिहार के भागलपुर यानी प्रचानी काल के अंग प्रदेश की बोली अंगिका में कई शब्द गायब हो रहे हैं

पचास वर्षों में खत्म हो जाएंगी करीब चार सौ भारतीय भाषाएं

Publish Date:Sun, 10 Sep 2017 11:32 AM (IST) | Updated Date:Sun, 10 Sep 2017 11:32 AM (IST)
पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया के मुताबिक क्षेत्रीय भाषाओं पर खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। भाषा के संकट से क्षेत्र विशेष की संस्कृति के खत्म होने की आशंका भी बनी रहती है।

अनंत विजय

हाल ही में एक सर्वे आया है। इसमें अगले पचास साल में करीब चार सौ भारतीय भाषाओं के खत्म होने की आशंका जताई गई है। इस सर्वे के नतीजों के मुताबिक अगले पचास साल में करीब चार सौ भारतीय भाषाएं खत्म होने के कगार पर पहुंच सकती हैं। पीपुल्स लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया ने अपने सर्वे के आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। सर्वे रिपोर्ट के मुताबिक ये क्षेत्रीय भाषाएं हैं जिन पर खत्म हो जाने का खतरा मंडरा रहा है। भाषा के खत्म होने से या उसके संकट में आने से क्षेत्र विशेष की संस्कृति के खत्म होने का खतरा भी पैदा हो जाता है। हमारे यहां भाषा को लेकर हमेशा से एक खास तरह की चिंता रही है और समय समय पर भाषागत प्रयोग भी हुए हैं।

किसी भी भाषा का निर्माण शब्दों से होता है और वे शब्द बहुधा स्थानीय बोलियों से लिए जाते हैं। शब्दों के प्रचलन से गायब होने से भी भाषा पर खतरा उत्पन्न हो जाता है। शब्द की महत्ता को लेकर संत तुकाराम ने कहा था- शब्द ही एकमात्र रत्न है/जो मेरे पास है/शब्द ही एकमात्र वस्त्र है /जिन्हें मैं पहनता हूं/शब्द ही एकमात्र आहार है /जो मुङो जीवित रखता है/शब्द ही एकमात्र धन है /जिसे मैं लोगों में बांटता हूं।1क्षेत्रीय बोलियों में भी ऐसे ऐसे शब्द होते हैं जिनका अर्थ एक अपनापन लिए होता है। जिन शब्दों को लेकर रिश्तों की गर्मजोशी महसूस की जा सकती थी उन शब्दों को कथित आधुनिक शब्दों ने विस्थापित कर दिया।

बिहार और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों में भाभी के लिए ‘भौजी’ शब्द का प्रयोग होता था, लेकिन वहां भी अब भाभी शब्द ही प्रचलन में आ गया है। फिल्म ‘नदिया के पार’ का गाना याद करिए जहां नायक भाई की शादी के बाद गाता है, ‘सांची कहे तोरे आवन से हमरी अंगना में आई बहार भौजी।’ इस पूरे गाने में ‘भौजी’ शब्द जो प्रभाव पैदा करता है वह भाभी शब्द नहीं कर सकता है। दरअसल हमारे गावों में शहरी होने की जो होड़ शुरू हुई है उसने स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल रोका है। बिहार के भागलपुर यानी प्रचानी काल के अंग प्रदेश की बोली अंगिका में कई शब्द गायब हो रहे हैं।

उस इलाके में ‘आटा’ को ‘चिकसा’ कहा जाता था, रोटी को ‘मांड़ो’, ‘झोला’ को ‘धोकरा’, ‘पॉकेट’ को ‘जेबी’, ‘बच्चों’ को ‘बुतरू’, ‘शिशु’ को ‘फुलवा’, ‘दुल्हन’ को ‘कनिया’ बोला जाता था। समय के साथ ये सारे शब्द प्रचलन से लगभग गायब होते चले गए। अब इस पर विचार करना होगा कि ऐसा क्यों हो रहा है। कुछ योगदान तो आधुनिक बनने की मानसिकता से तो कुछ टीवी के घर घर में पहुंचने और बच्चों की उस माध्यम की भाषा अपनाने से हुई है। शब्द प्रचलन से गायब होते रहे हैं जैसे सरिता, जल, पवन आदि, लेकिन चिंता तब होती है जब उसका संग्रह नहीं हो पाता है और उसका संरक्षण कहीं नहीं हो पाता है।

भाषा और बोलियों के संरक्षण के लिए हर स्तर पर गंभीर कोशिश की जानी चाहिए। सरकारें अपनी गति से काम करती हैं, लेकिन वह गति भाषा और बोलियों के शब्द संरक्षण के लिए बहुत धीमी है। यह काम पत्रकारिता और साहित्य में होना आवश्यक है क्योंकि ये दोनों विधाएं आम आदमी की बोलचाल को गहरे तक प्रभावित करती हैं। पत्रकारिता खासकर टीवी पत्रकारिता में आसान शब्दों पर जोर दिया जाता है। वाक्यों को और शब्दों को आसान बनाने के चक्कर में बहुधा अंग्रेजी के वैसे शब्दों का प्रयोग भी हो जाता है जिसके बेहतर विकल्प हिंदी में मौजूद हैं।

हर वर्ष की तरह एक अंग्रेजी शब्दकोश ने उन शब्दों की सूची जारी की है जो उन्होंने हिंदी समेत विश्व की दूसरी भाषाओं से लेकर अंग्रेजी में मान्यता दी हैं। यह अंग्रेजी का लचीलापन है जो उसको दूसरी भाषा के शब्दों को अपनाने में मदद करती है। अंग्रेजी जब इन शब्दों को गले लगाती है तो वो अपने शब्दों को छोड़ती नहीं है बल्कि उसको संजोकर रखते हुए अपने दायरे का विस्तार करती है। हिंदी में इससे उलट स्थिति दिखाई देती है। पत्रकारिता के अलावा साहित्यिक लेखन पर भी ये जिम्मेदारी आती है कि वो बोलियों में प्रचलित और हिंदी में प्रयुक्त शब्दों को बचाने का उपक्रम करे। इस संबंध में हमें जयशंकर प्रसाद का स्मरण होता है।

हिंदी में भारतेंदु ने खड़ी बोली शुरू की जिसमें हिंदी और उर्दू के शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग होता था, लेकिन जयशंकर प्रसाद ने अपनी रचना में देहाती शब्दों का जमकर प्रयोग किया। जयशंकर प्रसाद के निबंधों की एक किताब है-काव्य और कला तथा अन्य निबंध। इस किताब में जयशंकर प्रसाद ने जिस तरह की भाषा और शब्दों का प्रयोग किया है वो खड़ी बोली से बिल्कुल भिन्न है। जयशंकर प्रसाद की यह किताब महत्वपूर्ण है। प्रसाद ने उर्दू मिश्रित हिंदी को छोड़कर एक नई भाषा गढ़ी। खड़ी बोली के पैरोकारों ने उस वक्त प्रसाद के संग्रह ‘आंसू’ को दरकिनार कर उनका उपहास किया था। ‘आंसू’ में उनकी जो कविताएं हैं उसमें शायरी का आनंद मिलता है।

हिंदी के वरिष्ठ कवि लीलाधर जगूड़ी इस किताब को हिंदी में शायरी की पहली किताब कहते हैं। हिंदी के कई कथाकारों ने स्थानीयता के नाम पर बोलियों को अपनी रचना में स्थान दिया, लेकिन उत्तर आधुनिक होने के चक्कर में बोली के शब्दों का अपेक्षित प्रयोग नहीं कर पाए और उसको हिंदी के प्रचलित शब्दों से विस्थापित कर दिया। बहुत सारे लेखक जिस कालखंड को अपनी कृति में दर्शाते हैं उस काल-खंड में बोली जाने वाली भाषा और उसके शब्दों को बहुधा छोड़ते नजर आते हैं। इसका नतीजा यह होता है कि बोलियों के शब्द छूटते चले जाते हैं और पहले प्रचलन से और फिर स्मृति से भी गायब हो जाते हैं।

हिंदी में जरूरत इस बात की भी है कि कोई लेखक जयशंकर प्रसाद जैसा साहस दिखाएं और अपने मौजूदा दौर की भाषा की धारा के विपरीत तैरने की हिम्मत करे और ‘करुणा कल्पित हृदय में क्यों विकल रागिनी बहती’ जैसी रूमानी पंक्ति लिख सके। जयशंकर प्रसाद न तो खड़ी बोली से प्रभावित हुए थे और न ही गालिब या रवीन्द्रनाथ टैगोर की भाषा से जबकि उस दौर के साहित्य लेखन पर इन दोनों का काफी असर दिखाई देता है। इस वक्त साहित्य सृजन में भाषा के साथ उस तरह की ठिठोली नहीं दिखाई देती है जैसी कि होली में देवर अपनी भाभी के साथ करता है। भाषा के साथ जब लेखक ठिठोली करेगा तो उसको अपने शब्दों से खेलना होगा।

समकालीन साहित्य सृजन में हो ये रहा है कि कथ्य तो एक जैसे हैं ही भाषा भी लगभग समान होती जा रही है। कभी कभार किसी कवि की कविता में या किसी कहानी में इस तरह के शब्दों का प्रयोग होता है जो भाषा को तो चमका ही देता है और बिसरते जा रहे शब्दों को जीवन भी देता है। शब्दों को बचाने में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका है। इस भूमिका का निर्वहन गंभीरता के साथ करना चाहिए। बिहार के ही महान लेखक फणीश्वर नाथ रेणु ने अपनी रचनाओं में स्थानीय शब्दों का ऐसा अद्धभुत प्रयोग किया कि वो अब तक पाठकों की स्मृति में है। पीढ़ियां बदल गई, आदतें बदल गईं, लेकिन रेणु के न तो पाठक कम हुए और न ही प्रशंसक।

ये भाषा की ही ताकत है कि रेणु के बाद बिहार में कहानीकारों की कई पीढ़ियां आईं, लेकिन उनमें से ज्यादातर रेणु के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। इस तरह से हम देखें तो रेणु के बाद निर्मल वर्मा ने भाषा के स्तर अपने लेखन में प्रयोग किया और अपनी कहानियों में उसका सकारात्मक उपयोग भी किया। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपनी किताब ‘कबीर’ में लिखा है कि कबीर वाणी के डिक्टेटर थे और वे चाहते थे वह करते थे और भाषा में वो हिम्मत नहीं थी कि उनको रोक सके। क्या आज शब्दों को बचाने के लिए हिंदी को कबीर जैसा एक भाषा का डिक्टेटर चाहिए।

संभव है ऐसा होने से कुछ हो सके, लेकिन जहां तक भाषा को बचाने की बात है तो हिंदी के वापस गांव की ओर ले जाने की जरूरत है। मुक्तिबोध ने कहा भी था कि ‘श्रेष्ठ विचार बोझा उठाते वक्त आते हैं तो हमें लगता है कि श्रेष्ठ भाषा और उसको व्यक्त करने की परिस्थियां भी गांवों में बेहतर हो सकती हैं। शहरों और महानगरों की भाषा और भाव दोनों नकली होते हैं जिससे न तो श्रेष्ठ रचना निकलती है और न ही पाठकों का परिष्कार होता है।’हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के अलावा बोलियों के बीच इस तरह की साङोदारी होनी चाहिए ताकि पुराने शब्दों को बचाया जा सके। इसके अलावा सभी भारतीय भाषाओं को नए शब्दों को गढ़ने का संगठित प्रयास करना होगा। इससे स्थानीयता का, भारतीयता का बोध कायम रह सकेगा।

By Kamal Verma 
http://www.jagran.com/news/national-jagran-special-more-than-half-of-indian-languages-may-die-out-in-50-years-16685921.html

बिहार के किसानों को क्षेत्रीय भाषाओं में ‘मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड’ उपलब्ध कराया जाएगा

क्षेत्रीय भाषा में किसानों को मिलेगा मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड

Publish Date:Sat, 09 Sep 2017 03:05 AM (IST) | Updated Date:Sat, 09 Sep 2017 03:05 AM (IST)

पटना । बिहार के किस इलाके में कौन सी भाषा प्रचलित है, इसे पता करने का जिम्मा सरकार ने कृषि विभाग के अधिकारियों को सौंपा है। दरअसल सरकार की योजना है कि किसानों को क्षेत्रीय भाषा में ‘मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड’ उपलब्ध कराया जाए। कृषि से संबंधित 58 शब्दों की सूची तैयार की गई है जिसका अनुवाद क्षेत्रीय भाषा में करना है।

राज्य के बांका जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में संथाली भाषा प्रचलित है। संथाल परगना का प्रभाव है। जिले के ही कुछ इलाकों में अंगिका बोली जाती है। इसी तरह कटिहार, किशनगंज और अररिया जिले में बंगाली के साथ सूर्यापूरी भाषा प्रचलित है। सूर्यापुरी की लिपि बिल्कुल अलग है। नेपाल की सीमा से सटे सीतामढ़ी और मधुबनी जिले में मैथिली के साथ ही नेपाली भाषा मिश्रित रूप से बोली जाती है। दरभंगा में मैथिली और तिरहुत क्षेत्र में वज्जिका क्षेत्रीय भाषा है। भागलपुर और मुंगेर के आसपास अंगिका तो मगध प्रमंडल में मगही भाषा प्रचलित है। शाहाबाद और सारण में भोजपुरी क्षेत्रीय भाषा है।

: किन शब्दों का चाहिए अनुवाद :

सरकार ने मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड के लिए जिन शब्दों की सूची भेजी है उसमें उर्वरक, मृदा, सूक्ष्म पोषण तत्व, विश्लेषण परिणाम, भूमंडलीय स्थिति निर्धारण प्रणाली, खेसरा, देशांतर, अक्षांश, क्षेत्रफल, नमूना संग्रहण, जैव उर्वरक, चूना, जिप्सम, कार्बनिक उर्वरक, वर्षाश्रित, एकड़ सहित अन्य शब्द शामिल हैं। हरेक शब्द को क्षेत्रीय भाषा में किसान क्या कहते हैं उसकी सूची कृषि मंत्रालय को भेजनी है।

: किसानों को क्या होंगे फायदे :

मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड क्षेत्रीय भाषा में किसानों को देने के पीछे मकसद कृषि से संबंधित तकनीकी शब्दों का अर्थ समझाना है। वैसे बिहार की सरकारी भाषा देवनागरी लिपि है। परीक्षाएं हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत, उर्दू में ली जाती है। संविधान की आठवीं अनुसूची में क्षेत्रीय भाषा में मैथिली भाषा शामिल है।

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क्षेत्र का नाम – क्षेत्रीय भाषा

पटना – हिन्दी

मगध प्रमंडल – मगही

बांका – संथाली और अंगिका

पूर्वी बिहार – सूर्यापूरी

चंपारण – भोजपुरी

शाहाबाद – भोजपुरी

नेपाल की सीमा – नेपाली मैथिली

तिरहुत क्षेत्र – वज्जिका

दरभंगा – मैथिली

भागलपुर व मुंगेर – अंगिका

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किसानों की सुविधा के लिए खेती से जुड़े तकनीकी शब्दों की जगह स्थानीय शब्दों का इस्तेमाल मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड में करने की योजना है। सरकार को जिले और क्षेत्रवार बोलचाल की भाषा में मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने की प्रक्रिया शुरू की गई है।

– संजय कुमार, उप निदेशक, कृषि रसायन संस्थान।

http://www.jagran.com/bihar/patna-city-soil-health-card-will-have-terms-in-local-language-16680506.html

शिक्षक दिवस पर अंगिका के डॉ रमेश मोहन शर्मा आत्मविश्वास पर सम्मानित

राष्ट्र निर्माण में शिक्षकों की भूिमका अहम

 शिक्षक दिवस. बच्चों ने शिक्षकों उपहार दिया, भव्य सांस्कृतिक कार्यक्रम का भी आयोजन

नवगछिया : नवगछिया के विभिन्न संस्थानों में शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया गया. नवगछिया के सावित्री पब्लिक स्कूल में शिक्षकों को छात्रों ने उपहार भेंट कर उन्हें सम्मानित किया. सावित्री पब्लिक स्कूल के निदेशक शिक्षाविद रामकुमार साहू ने कहा कि शिक्षक के ही हाथों में राष्ट्र निर्माण की जिम्मेदारी होती है. ऐसे में शिक्षकों को अपने कर्तव्य का निर्वहन ईमानदारी पूर्वक करना चाहिए. नयाटोला गुरुकुल स्कूल में भी बच्चों ने कार्यक्रम का आयोजन किया.
स्कूल के निदेशक राजू रंजन ने बच्चों को पुरस्कृत किया. नवगछिया महिला जागृति शाखा की सचिव रूपा पंसारी सहित शाखा के सदस्यों ने विभिन्न विद्यालयों में जाकर शिक्षकों को उपहार प्रदान कर सम्मानित किया गया.
सौ बच्चों को दी जायेगी मुफ्त शिक्षा : मॉडर्न वैभव पब्लिक स्कूल भवानीपुर में शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया गया. इस अवसर पर घोषणा की गयी कि अगले सत्र में 100 गरीब बच्चों को विद्यालय द्वारा मुफ्त में शिक्षा दी जायेगी. मौके पर प्राचार्य विश्वास झा, त्रिपुरारि कुमार भारती, किरण चौधरी, बीना झा, वैभव स्वराज, संजीव झा, कुमारी रूपम प्रिया, आर्यन राज, सपना पांडे, अंकित कुमार, आशा रानी, बबीता कुमारी, संदीप कुमार, मोहन, जाफर, सोहन, रश्मि,  साक्षी व सैकड़ों छात्र उपस्थित थे.
ध्वनि वैज्ञानिक डॉ  आत्मविश्वास सम्मानित : जाह्नवी प्रतियोगिता केंद्र में शिक्षक दिवस पर जदयू अध्यक्ष गुलशन कुमार ने अंगिका भाषा के प्रथम ध्वनि वैज्ञानिक व शिक्षक डॉ रमेश मोहन शर्मा आत्मविश्वास, मनमोहन जी, माधव जी, उपेंदर जी, नीभा ऋतू जी को सम्मानित किया.  प्रखंड के मधुरापुर बाजार स्थित कृष्णा विवाह भवन बलाहा में मंगलवार को डायनामिक्स फिजिक्स क्लासेस की ओर से संस्थान के सफल छात्रों को पुरस्कृत कर सम्मानित किया. कार्यक्रम का उद्घघाटन भवानीपुर थानाध्यक्ष जयंत प्रकाश सीआई विजय शंकर सिंह, किशोर कुमार, संचालक रौशन कुमार ने दीप प्रज्वलित कर किया.
वहीं गोपालपुर प्रखंड के निजी व सरकारी स्कूलों व विभिन्न कोचिंग संस्थानों में छात्र-छात्राओं ने शिक्षक दिवस मनाया.  मौके पर शिक्षक व पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के चित्र पर माल्यार्पण किया.  हरनाथचक स्थित आवासीय आइडियल विद्या मंदिर में प्रधानाचार्य प्रमोद कुमार सिंह ने केक काटकर शिक्षक दिवस मनाया.
शाहकुंड>> शिक्षक दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम : प्रखंड अंतर्गत बाल वाटिका आवासीय विद्यालय सजौर फतेहपुर में  शिक्षक दिवस पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हुआ. मौके  पर सर्वपल्ली राधा कृष्णन की जीवनी पर विस्तारपूर्वक चर्चा करते हुए  छात्रों के बीच पुरस्कार का वितरण किया गया.  मौके पर प्राचार्य विपुल  देव मोदी, प्रधानाध्यापक केदारनाथ सिंह सहित अन्य लोग मौजूद थे.
कहलगांव.  शिक्षक दिवस पर कहलगांव के विभिन्न शिक्षण संस्थानों में धूमधाम से कार्यक्रम हुआ. कहलगांव के शारदा पाठशाला, गणपत सिंह उवि,  गुरुकृपा एकेडमी, सरसहाय बालिका उवि. सहित सभी निजी संस्थानों में शिक्षक की महत्ता बतायी गयी. देश के दूसरे राष्ट्रपति सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बारे में शिक्षकों ने छात्रों को बताया. विधायक सदानंद सिंह के गांव अरार धुआवै में एक कंप्यूटर प्रशिक्षण केंद्र में ‘शिक्षा का महत्व’ विषय पर  एकांकी प्रस्तुत किया गया. एनटीपीसी के संत जोसेफ स्कूल, डीएवी पब्लिक स्कूल, केंद्रीय विद्यालय व विद्या भवन में सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जन्म दिवस पर उन्हें याद किया गया.
बिहपुर>> बच्चों ने दिखायी प्रतिभा, पुरस्कृत : प्रखंड के लगभग सभी सरकारी गैरसरकारी व कोचिंग संस्थानों में मंगलवार को  शिक्षक दिवस धूमधाम से मनाया गया. छात्र-छात्राओं ने शिक्षक को सम्मान  स्वरूप उपहार दिये. प्रखंड के मवि पछियारी टोला औलियाबाद में केक काटकर  शिक्षक दिवस मनाया गया. मौके पर चित्रांकन, गीत,वाद-विवाद व निबंध  प्रतियोगिता हुई. अव्वल प्रतिभागियों को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित किया  गया. स्कूल की सबसे छोटी बच्ची खुशी ने अपने लघु नाटक हमारी मांगे पूरी करो की बेहतरीन प्रस्तुति से सबका मन मोह लिया.
http://www.prabhatkhabar.com/news/bhagalpur/story/1050523.html

अंगिका विभाग के डॉ. मधुसूदन झा को तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष (डीएसडब्ल्यू) बनाया गया

डॉ. मधुसूदन झा विवि के डीएसडब्ल्यू बने – दैनिक जागरण

भागलपुर, १ सितंबर,२०१७ । पीजी हिन्दी व अंगिका विभाग के शिक्षक डॉ. मधुसूदन झा को तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय का छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष (डीएसडब्ल्यू) बनाया गया है। इस आशय की अधिसूचना गुरुवार को कुलपति डॉ. नलिनी कांत झा के आदेश पर जारी कर दी गई है। डॉ. झा इसके पहले विवि के परीक्षा नियंत्रक रह चुके हैं। डॉ. झा भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् से जुड़े रहे हैं। इधर, पीजी अर्थशास्त्र विभाग के शिक्षक व छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष डॉ. उपेंद्र साह गुरुवार को सेवानिवृत्त हो गए। हालांकि छात्रसंघ चुनाव होने तक इसका कार्य देखते रहेंगे। वहीं पीजी जंतु विज्ञान विभाग की हेड डॉ. अमिता मोइत्रा को साइंस का डीन बनाया गया है। पीजी भौतिकी के शिक्षक डॉ. आशुतोष प्रसाद को विभाग का हेड बनाया गया था। पीजी भौतिकी के हेड डॉ. दुर्गेश नंदन झा साइंस के डीन भी थे। डॉ. झा गुरुवार को सेवानिवृत्त हो गए। डॉ. आशुतोष प्रसाद विवि के कुलसचिव, इंस्पेक्टर ऑफ कॉलेज (साइंस) व परीक्षा विभाग के ओएसडी रह चुके हैं। पीजी ¨हदी विभाग की हेड डॉ. विद्यारानी का तीन वर्ष का कार्यकाल पूरा होने के बाद विभाग की ही शिक्षिका डॉ. किरण सिंह को नया हेड बनाया गया है। जबकि पीजी कॉमर्स के हेड डॉ. अशोक साह का कार्यकाल पूरा होने पर विभाग के ही वरीय शिक्षक डॉ. पवन पोद्दार को हेड बनाया गया है। इधर, लीगल विभाग के ओएसडी व टीएनबी कॉलेज के मनोविज्ञान विभाग के शिक्षक डॉ. राजेश तिवारी का तबादला केएसएस कॉलेज लखीसराय कर दिया गया है। जबकि तिवारी हाल ही में ओएसडी बनाए गए थे। जबसे वे ओएसडी बने थे, तब से विवि के लीगल कार्य में तेजी आई थी। आंदोलन की गतिविधियां कम हुई। हालांकि कुलपति का कहना है कि जिस काम के लिए उन्हें रखा गया था, वह पूरा नहीं कर पा रहे थे।

By Jagran 
(http://www.jagran.com/bihar/bhagalpur-college-news-16636491.html)