अब अंगिका फिल्म बनाएंगें छैला बिहारी

बांका,३१ जनवरी,२०१६। बिहार में अंगिका फिल्म उद्योग को जागृत करना मेरा पहला लक्ष्य है। इसके लिए मैं अब खुद फिल्म लेकर आ रहा हूं। यह बातें भोजपुरी गायक छैला बिहारी ने रविवार को दैनिक जागरण को बताई। वे एक कार्यक्रम में शहर के नयाटोला निवासी ओपी ¨सह के यहां आये हुए थे। छैला ने बताया कि आज तक बस ¨हदी और भोजपुरी में लोग फिल्म बनाने को प्रयासरत है। लेकिन, अब अंगिका में पूरी तरह से पारिवारिक फिल्म जल्द बनेगी। उन्होंने बताया कि उनकी पहली अंगिका फिल्म प्यार के बुखार के नाम से आ रही है। जिसमें गायक छैला बिहारी अपने पुत्र शिवम बिहारी को प्रस्तुत कर रहे हैं। उन्होंने भोजपुरी फिल्म पर चर्चा करते हुए कहा कि आजकल के लोग भोजपुरी के गीतों को गलत मान रहे हैं। लेकिन जो जनता मांग रही है, वहीं फिल्म उद्योग परोस रही है। अब सभ्य घराने के लोग सिनेमा हॉल से किनारा कर रहे है। वे फिल्म देखने से भी कतराने लगे है। लेकिन उनकी पहली अंगिका फिल्म प्यार के बुखार पूरी तरह से पारिवारिक फिल्म होगी। जिसमें पूरा परिवार एक साथ बैठकर देखना पसंद करेगा। उन्होंने राजनीति पर बोलते हुए कहा कि वर्तमान समय में सूबे में कानून नाम की कोई चीज नहीं रह गयी है। सबकुछ राजद के हाथ चला गया है। नीतीश बाबू बस मुखौटा होकर रह गये हैं।

(http://www.jagran.com/bihar/banka-13521261.html)

हिंदी की शक्ति अंगिका जैसी इनकी बोलियों में छिपी है

भाषाः बोलियों की शक्ति

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है।

क्षिप्रा किरणJanuary 23, 2016 02:40 am

हिंदी की शक्ति बोलियों में छिपी है। हिंदी प्रदेश की प्रमुख बोलियों- जैसे भोजपुरी, मैथिली, वज्जिका, अंगिका, अवधी, ब्रज आदि में तो इस विविधता को खासकर महसूस किया जा सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अलग-अलग क्षेत्रों में भोजपुरी के ही कई रंग-रूप देखने को मिल जाते हैं। बोली की धुन, लय और उच्चारण में तो अंतर होता ही है, कई बार उसके शब्द-संदर्भों के अंतर को भी आसानी से लक्षित किया जा सकता है।

व्यक्ति अपने परिवेश की उपज होता है और भाषा उसके परिवेश के निर्माण का एक महत्त्वपूर्ण साधन है। वह जब संस्कृतियों का वहन करती है तो साथ-साथ मनुष्य के भावों का भी वहन कर रही होती है। व्यक्ति चाहे किसी भी भाषाई परिवेश में चला जाए उसकी अपनी भाषा या बोली कहीं न कहीं उसके अवचेतन में बनी ही रहती है। वह स्वयं को या किसी भी अन्य वस्तु को अपने ही भाषाई संदर्भों से जोड़कर देख पाता है। यह सिर्फ हिंदी के लिए ही नहीं, बल्कि किसी भी भाषा-भाषी के लिए भी उतना ही सच है। लेकिन हिंदी और उसकी बोलियों में इतनी विविधता है, उसके इतने अधिक और अलग-अलग अर्थ-संदर्भ हैं कि यही चीज उसकी ताकत बन जाती है। हिंदी की इस विविधता को समझने के लिए वास्तव में उसकी बोलियों को भी बहुत बारीकी से समझना होगा।

भाषाई विविधता वाले देश हिंदुस्तान में किसी भी भाषा या बोली को किसी खास दायरे में बांध कर नहीं रखा जा सकता। ऐसा करना भाषा के लोकतंत्र का हनन होगा। भाषा सीखने और उसके प्रयोग का अधिकार कहीं न कहीं शिक्षा और जीवन के अधिकार जैसे मौलिक अधिकारों से जुड़ा है, क्योंकि सदियों से भाषा ही मानव जाति और विभिन्न सभ्यताओं की पहचान रही है। यही कारण है कि हमेशा सबसे पहले भाषा ही अस्मिताओं और संस्कृतियों के टकरावों का शिकार भी हुई है। हिंदी ने भी भाषा के रूप में ऐसे कई प्रहार झेले हैं।

उसे कभी राजनीतिक अवसरवादियों ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना चाहा है तो कभी कुछ अन्य असामाजिक लोगों ने उसका दुरुपयोग करना चाहा। भूमंडलीकरण की कोख से पनपा बाजार भी उन्हीं शरारती तत्त्वों में से एक है। बाजार ने अंग्रेजी को माध्यम बनाकर हिंदी और हिंदुस्तानियों की जातीय स्मृतियों को, उनकी भाषाई संस्कृतियों को मिटाने का प्रयास किया है। बाजार ने धर्म, राजनीति, मीडिया, विज्ञापन जैसे अपने औजारों की मदद से हिंदी की अस्मिता को चोट पहुंचाने की पूरी कोशिश की है, लेकिन वह बार-बार अपनी पूरी शक्ति से उठ खड़ी हुई है। अपने अस्तित्व पर आए तमाम नवउपनिवेशवादी-नवउदारवादी हमलों से जूझती हुई बड़े ही चाक-चौकबंद ढंग से अपना विस्तार कर रही है। अब तो वह अपने खिलाफ खड़ी इन ताकतों का अपने पक्ष और अपने प्रसार में प्रयोग करना भी सीख गई है। सिनेमा और विज्ञापन के क्षेत्र में हिंदी के इस रूप को सहज ही देखा जा सकता है।

किसी सभ्यता का अंत करने के लिए सदैव वर्चस्ववादी शक्तियों ने वहां की भाषा को अपना लक्ष्य बनाया है। हिंदी ने भी उपनिवेशवादी शक्तियों का सामना किया है, लेकिन वह बिखरी नहीं है। एक उपनिवेश की भाषा होते हुए भी, उसके हमलों को सहते हुए वह ताकतवर भाषा की बराबरी में खड़ी है या कहें कि कई मायने में और कम समय में उससे अधिक विस्तार और लोकप्रियता मिल रही है। हिंदी का विस्तार उसकी बोलियों का विस्तार है। हिंदी अकेली नहीं है, बल्कि वह अपनी सभी बोलियों के साथ मिलकर हिंदी है।

 आज हिंदी ने अपना अंतरराष्ट्रीयकरण किया है। सिर्फ प्रचार-प्रसार के संदर्भ में नहीं, बल्कि हिंदी की कुछ स्वभावगत विशेषताओं के कारण ऐसा हुआ है। हिंदी की एक बड़ी खासियत है , आत्मसात और अनुकूलन की प्रवृत्ति। हिंदी ने बदलते हुए समय के साथ खुद को इतना लचीला बनाया कि सिर्फ भारतीय बोलियों के शब्दों को ही नहीं, बल्कि विदेशी भाषाओं के शब्दों को भी अपने भीतर समेटा है। फ्रांसीसी, लातीनी, जापानी अरबी और न जाने कितनी ऐसी विदेशी भाषाएं हैं, जिनके तमाम शब्दों को हिंदी ने अपनाया है। अनुकूलन की अपनी इसी क्षमता के कारण ही बाजार के इस भयाक्रांत कर देने वाले दौर में भी हिंदी अपनी पहचान बनाने में सफल हुई है।
सामंजस्य बिठाने की अपनी क्षमता के कारण आज हिंदी ने यह साबित कर दिया है कि तीसरी दुनिया की भाषा होते हुए भी वह बेचारी नहीं है। ज्ञान-विज्ञान-तकनीक के हर क्षेत्र में अब वह एक नए तेवर और अपने नए अंदाज के साथ स्वयं को प्रस्तुत कर सकती है। भारतीय संस्कृति की समावेशी प्रवृत्ति को आज हिंदी के वर्तमान नए रूप में अनायास ही देखा जा सकता है। यह समावेशी प्रवृत्ति एक नए तरह की सृजनशीलता को जन्म देती है और यही किसी भी सभ्यता को गतिशील और ऊर्ध्वगामी भी बनाती है।
http://www.jansatta.com/news-update/sunday-column-jansatta-ravivari-jansatta-story/63537/

अंगिका के युगांतरकारी योद्धा थे डॉ.‘चकोर’

कुंदन अमिताभ
लगातार 46 बर्षों  तक अंगिका भाषा की मासिक पत्रिका ‘अंग माधुरी’ का प्रकाशन व संपादन करने वाले संपादक डॉ नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ अंगिका भाषा के अन्यतम सेवक और समय से कहीं आगे चलने वाले भाषाविद् और साहित्यकार थे.
कद और चमक में हर उपमा, उपाधि, अलंकरण से ऊपर.  उन्हें अंगिका का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, तुलसी, शेक्सपीयर, कालिदास आदि नामों से भी पुकारा गया.  अंगिका को पूरी जिंदगी अपने सीने से चिपकाये रख कर वह इसके पालन-पोषण और संरक्षण-संवर्द्धन के लिए जूझते रहे.
डॉ नरेश पाण्डेय चकोर का जन्म भागलपुर जिलान्तर्गत सुलतानगंज से 15 किमी दूर देवधा गांव में तीन जनवरी 1938 को हुआ था. पिता का नाम चंद्रमोहन पाण्डेय और माता का नाम प्रजावती देवी था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव और आसपास के स्कूलों में जबकि उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय के टीएनजे कॉलेज में हुई.
उन्होंने 1963 में बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड, पटना में एक सांख्यिकी पदाधिकारी के रूप में अपनी नौकरी शुरू की और वहीं से 1996 में सेवानिवृत्त भी हुए.  1961 में आधुनिक अंगिका भाषा की पहली प्रकाशित पुस्तक डॉ चकोर कृत ‘किसान क॑ जगाबऽ’ साहित्य जगत के सामने आयी थी.
फिर इसी साल वे ‘अंग भाषा परिषद’ से प्रचार मंत्री के रूप में जुड़कर अंगिका भाषा आंदोलन की यात्रा प्रारंभ कर एक नया इतिहास रचने में लग गये. 1963 में  उनकी एक और पुस्तक ‘सर्वोदय समाज’ प्रकाशित हुई थी . यह अंगिका भाषा की पहली पुस्तक थी, जो किसी सरकारी विभाग द्वारा प्रकाशित हुई थी.  पूरे जीवन काल में डॉ चकोर ने अंगिका व हिंदी की 71 किताबें लिखीं,  जिसमें उनके द्वारा  संपादित आठ पुस्तकें भी शामिल हैं.
डॉ चकोर के उपर विभिन्न विद्वानों द्वारा नौ पुस्तकें भी लिखीं गई हैं.  उन्होंने दिसंबर, 1970 से अंगिका मासिक पत्रिका, अंग माधुरी का प्रकाशन व संपादन प्रारंभ किया था और आजीवन नवंबर, 2015 तक संपादक बने रहे. भाषा के संरक्षण व संवर्द्धन के क्षेत्र में वे अपनी तरह के पहले व अंतिम व्यक्ति नजर आते हैं.
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने केवल 18 बर्षों तक ही सरस्वती का संपादन किया था.  पंडित श्रीराम शर्मा ने लगभग दो दशकों तक ‘विशाल भारत’ हिन्दी मासिक का संपादन किया, जबकि डॉ. चकोर ने अंगिका मासिक ‘अंग माधुरी’ का पूरे 46 बर्षों तक लगातार संपादन किया.
डॉ चकोर ने हमेशा एक सर्वोच्च कोटि के संगठक, आंदोलनधर्मी की भूमिका निभायी थी.  वे अंगिका व िहंदी के विकास के लिए जीवनपर्यंत कार्य करते रहे.  पटना में ‘जाह्नवी अंगिका संस्कृति संस्थान’ के तत्वाधान में वे आजीवन हर साल ‘अंगिका महोत्सव’ का आयोजन करते थे.
हर आयोजन पर अंगिका की पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाना नहीं भूलते थे, चाहे इन किताबों को उन्हें अपने माथे पर ही ढोकर आयोजन स्थल तक क्यों नहीं ले जाना पड़ता हो.
उनका पूरा जीवन अंगिका और हिन्दी साहित्य की सेवा करते तथा राम की अराधना में गुजरा.  जिस तरह डॉ चकोर का लोकान्तरण राम-तुलसी संबंधी आलेख का प्रूफ रीडिंग करते-करते हुआ, एक भाषाविद, साहित्य सेवी और रामभक्त के लिए उससे बेहतर तरीके का निधन भी भला क्या हो सकता है ?
यह कैसा महासंयोग है कि वे उन्हीं दो चीजों में तल्लीन रहते अनंत लोक की तरफ प्रस्थान भी कर गये, जिनमें वे आजीवन तल्लीन रहे थे, बिल्कुल उस बेहद सच्चे, कर्मठ और कर्मवीर योद्धा की तरह जो मातृभूमि की रक्षा के लिए रणभूमि में लड़ते सर्वस्व न्योछावर कर वीरगति को प्राप्त कर लेता है.
(http://www.prabhatkhabar.com/news/patna/story/689944.html)