भोजपुरी और अंगिका को फिलहाल अष्टम अनुसूची में शामिल करने से केंद्र की कमेटी का इनकार

भोजपुरी और अंगिका को राजभाषा का दर्जा देने से केंद्र की कमेटी ने किया इनकार – दैनिक भास्कर
नई दिल्ली, १४ जुलाई,२०१५ । केंद्र सरकार की एक हाई लेवल कमेटी ने बिहार की दो प्रमुख भाषाओं भोजपुरी और अंगिका को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं करने की सिफ़ारिश की है। यानी उन्हें राजभाषा का दर्जा देने से इनकार किया है। केंद्र के इस फैसले का बिहार के विधानसभा चुनाव पर भी असर पड़ सकता है। ये चुनाव इसी साल के आखिर में होने वाले हैं। बिहार में बोली जाने वाली तीसरी प्रमुख भाषा मैथिली आठवीं अनुसूची में पहले से ही शामिल है।
होती रही है डिमांड
भोजपुरी और अंगिका उन 38 भाषाओं में से हैं, जिन्हें आठवीं अनुसूची में शामिल करने की मांग संसद में और दूसरे मंचों पर लगातार उठती रही है। सरकार ने इसी साल जनवरी में इन मांगों की जांच के लिए होम मिनिस्ट्री में अतिरिक्त सचिव बी.के. प्रसाद की अध्यक्षता में एक हाई लेवल कमेटी बनाई थी। इसमें होम मिनिस्ट्री, कल्चरल मिनिस्ट्री, एचआरडी, लॉ मिनिस्ट्री, साहित्य अकादमी, राजभाषा विभाग और केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान और रजिस्ट्रार जनरल ऑफ़ इंडिया के सीनियर अफसर शामिल थे।
क्या कहा गया रिपोर्ट में
पिछले महीने होम मिनिस्ट्री को सौंपी अपनी रिपोर्ट में इस कमेटी ने आठवीं अनुसूची में मौजूद 22 भाषाओं को शामिल करने की प्रक्रिया और मापदंडों को सही नहीं माना। कमेटी ने यह भी कहा कि इन भाषाओं को शामिल करने से हिंदी के विकास पर प्रभाव पड़ेगा।
उचित कार्रवाई होगी -राजनाथ सिंह
केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने भास्कर से बातचीत में माना कि समिति ने अपनी रिपोर्ट सौंप दी है, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ा कि अभी तक उन्होंने उसे देखा नहीं है। “जब रिपोर्ट मेरे सामने लाई जाएगी तो उसकी सिफ़ारिशों पर उचित कार्रवाई की जाएगी”, उन्होंने कहा। चूंकि अभी तक इस मामले पर बनी तीन समितियों की रिपोर्टों की सिफ़ारिशें सरकार ने जस की तस लागू कर दी, माना जा रहा है कि प्रसाद कमेटी की सिफ़ारिशों को भी मूल रूप में ही लागू किया जाएगा। लेकिन बिहार चुनाव में अब महज चार महीने ही बचे हैं, इसलिए लगता है कि केंद्र सरकार राजनीतिक रूप से संवेदनशील इस रिपोर्ट को चुनाव के बाद ही लागू करेगी।
यह भोजपुरी का अपमान है – जद (यू)
जनता दल (यू) के राष्ट्रीय महामंत्री केसी त्यागी का कहना है कि केंद्र की भाजपा सरकार भोजपुरीभाषियों का अपमान कर रही है। भोजपुरी केवल क्षेत्रीय भाषा ही नहीं है, बल्कि पचास से ज्यादा देशों में इस्तेमाल की जाने वाली अंतरराष्ट्रीय भाषा है। भारत के सभी राज्यों में भोजपुरीभाषी लोग रहते हैं। जिस भाजपा ने मैथिल ब्राह्मणों के वोट के लिए 2004 चुनाव से ठीक पहले मैथिली को राजभाषा बना दिया, वही भोजपुरी को यह दर्जा क्यों नहीं देना चाहती। उन्होंने कहा कि हम मैथिली के राजभाषा बनाने के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन भोजपुरी के अपमान को चुनावी मुद्दा बनाएंगे।
इससे पहले की कमेटियों ने जो मापदंड निर्धारित किए थे, उनमें से किन्हीं दो को पूरा करने वाली भाषा को ही आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
ये हैं मापदंड
1. तीन दशकों के जनगणना आंकड़ों के अनुसार इसे कम से कम पांच लाख लोग बोलते हों।
2. कम से कम स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप मे इस भाषा का प्रयोग होता हो।
3. लिखने की भाषा के रूप में पचास सालों से अस्तित्व में होने का प्रमाण हो।
4. साहित्य अकादमी उसके साहित्य का प्रचार-प्रसार करती हो।
5. जनगणना आंकड़ों के मुताबिक़, यह आसपास के इलाक़ों में दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल की जा रही हो।
6. नए बने राज्यों में राजभाषा का दर्जा मिला हो (मसलन कोंकणी, मणिपुरी)।
7. देश के बंटवारे के पहले किसी राज्य में बोली जाती हो और बंटवारे के बाद भी कुछ राज्यों में इस्तेमाल हो रही हो।
लड़ाई हारने वाली भाषाएं
अंग्रेजी, भोजपुरी, अंगिका, गढ़वाली, राजस्थानी, गुज्जरी, मगही, नागपुरी, कुमायूंनी, भोटी, बुंदेलखंडी, छत्तीसगढ़ी, बज्जिका, बंजारा, हिमाचली, धतकी, गोंडी, हो, कच्छी, कामतापुरी, करबी, खासी, कोडावा (कूर्ग की), कोक बराक, कुडक, कुमाली, लेपचा, लिंबू, मुंदड़ी, पाली, संबलपुरी, शौरसेनी (प्राकृत), सिरायकी, निकोबारी, मिजो, तेनिदी, और तुलू।
कब कौन-सी भाषा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल हुई
26 नवंबर 1949 को – 14 भाषाएं – हिंदी, तेलुगु, बंगाली, मराठी, तमिल, उर्दू, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, उडि़या, पंजाबी, कश्मीरी, असमिया और संस्कृत।
फिर 63 साल में हुए तीन संविधान संशोधन
1967 में – 21वां संशोधन – सिंधी के लिए
1992 में – 71वां संशोधन – कोंकणी, मणिपुरी और नेपाली के लिए
2003 में – 91वां संशोधन – मैथिली, संथाली, बोडो और डोंगरी के लिए।
क्या है फ़ायदा आठवीं अनुसूची में शामिल होने का
* यूनियन पब्लिक सर्विस कमीशन (यूपीएससी) और अन्य सेंट्रल एग्जाम में में माध्यम।
जिन राज्यों में बोली जाती है, वहां स्डडी मीडियम और सरकारी कामकाज की भाषा बन जाती है।
लोकसभा और विधानसभा में प्रश्न पूछने या भाषण देने का माध्यम यानी अब आप नेपाली, कोंकणी, संथाली, बोडो, डोंगरी और सिंधी में यूपीएससी की परीक्षा दे सकते हैं, लेकिन भोजपुरी, राजस्थानी, हिमाचली, बुंदेलखंडी या छत्तीसगढ़ी में नहीं।
(Source : https://www.bhaskar.com/news/nat-nan-centre-committee-denis-bhojpuri-and-angika-in-eighth-schedule-of-the-constitutio-5052064-nor.html)