अंगिका के युगांतरकारी योद्धा थे डॉ.‘चकोर’

कुंदन अमिताभ
लगातार 46 बर्षों  तक अंगिका भाषा की मासिक पत्रिका ‘अंग माधुरी’ का प्रकाशन व संपादन करने वाले संपादक डॉ नरेश पाण्डेय ‘चकोर’ अंगिका भाषा के अन्यतम सेवक और समय से कहीं आगे चलने वाले भाषाविद् और साहित्यकार थे.
कद और चमक में हर उपमा, उपाधि, अलंकरण से ऊपर.  उन्हें अंगिका का भारतेन्दु हरिश्चन्द्र, महावीर प्रसाद द्विवेदी, तुलसी, शेक्सपीयर, कालिदास आदि नामों से भी पुकारा गया.  अंगिका को पूरी जिंदगी अपने सीने से चिपकाये रख कर वह इसके पालन-पोषण और संरक्षण-संवर्द्धन के लिए जूझते रहे.
डॉ नरेश पाण्डेय चकोर का जन्म भागलपुर जिलान्तर्गत सुलतानगंज से 15 किमी दूर देवधा गांव में तीन जनवरी 1938 को हुआ था. पिता का नाम चंद्रमोहन पाण्डेय और माता का नाम प्रजावती देवी था. उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव और आसपास के स्कूलों में जबकि उच्च शिक्षा भागलपुर विश्वविद्यालय के टीएनजे कॉलेज में हुई.
उन्होंने 1963 में बिहार राज्य खादी ग्रामोद्योग बोर्ड, पटना में एक सांख्यिकी पदाधिकारी के रूप में अपनी नौकरी शुरू की और वहीं से 1996 में सेवानिवृत्त भी हुए.  1961 में आधुनिक अंगिका भाषा की पहली प्रकाशित पुस्तक डॉ चकोर कृत ‘किसान क॑ जगाबऽ’ साहित्य जगत के सामने आयी थी.
फिर इसी साल वे ‘अंग भाषा परिषद’ से प्रचार मंत्री के रूप में जुड़कर अंगिका भाषा आंदोलन की यात्रा प्रारंभ कर एक नया इतिहास रचने में लग गये. 1963 में  उनकी एक और पुस्तक ‘सर्वोदय समाज’ प्रकाशित हुई थी . यह अंगिका भाषा की पहली पुस्तक थी, जो किसी सरकारी विभाग द्वारा प्रकाशित हुई थी.  पूरे जीवन काल में डॉ चकोर ने अंगिका व हिंदी की 71 किताबें लिखीं,  जिसमें उनके द्वारा  संपादित आठ पुस्तकें भी शामिल हैं.
डॉ चकोर के उपर विभिन्न विद्वानों द्वारा नौ पुस्तकें भी लिखीं गई हैं.  उन्होंने दिसंबर, 1970 से अंगिका मासिक पत्रिका, अंग माधुरी का प्रकाशन व संपादन प्रारंभ किया था और आजीवन नवंबर, 2015 तक संपादक बने रहे. भाषा के संरक्षण व संवर्द्धन के क्षेत्र में वे अपनी तरह के पहले व अंतिम व्यक्ति नजर आते हैं.
आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने केवल 18 बर्षों तक ही सरस्वती का संपादन किया था.  पंडित श्रीराम शर्मा ने लगभग दो दशकों तक ‘विशाल भारत’ हिन्दी मासिक का संपादन किया, जबकि डॉ. चकोर ने अंगिका मासिक ‘अंग माधुरी’ का पूरे 46 बर्षों तक लगातार संपादन किया.
डॉ चकोर ने हमेशा एक सर्वोच्च कोटि के संगठक, आंदोलनधर्मी की भूमिका निभायी थी.  वे अंगिका व िहंदी के विकास के लिए जीवनपर्यंत कार्य करते रहे.  पटना में ‘जाह्नवी अंगिका संस्कृति संस्थान’ के तत्वाधान में वे आजीवन हर साल ‘अंगिका महोत्सव’ का आयोजन करते थे.
हर आयोजन पर अंगिका की पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाना नहीं भूलते थे, चाहे इन किताबों को उन्हें अपने माथे पर ही ढोकर आयोजन स्थल तक क्यों नहीं ले जाना पड़ता हो.
उनका पूरा जीवन अंगिका और हिन्दी साहित्य की सेवा करते तथा राम की अराधना में गुजरा.  जिस तरह डॉ चकोर का लोकान्तरण राम-तुलसी संबंधी आलेख का प्रूफ रीडिंग करते-करते हुआ, एक भाषाविद, साहित्य सेवी और रामभक्त के लिए उससे बेहतर तरीके का निधन भी भला क्या हो सकता है ?
यह कैसा महासंयोग है कि वे उन्हीं दो चीजों में तल्लीन रहते अनंत लोक की तरफ प्रस्थान भी कर गये, जिनमें वे आजीवन तल्लीन रहे थे, बिल्कुल उस बेहद सच्चे, कर्मठ और कर्मवीर योद्धा की तरह जो मातृभूमि की रक्षा के लिए रणभूमि में लड़ते सर्वस्व न्योछावर कर वीरगति को प्राप्त कर लेता है.
(http://www.prabhatkhabar.com/news/patna/story/689944.html)