कहै दादा सॅ इक पोता (गजल)

— सुधीर कुमार प्रोगामर —

कहै दादा सॅ इक पोता, कि बाबू याद आबै छै
कहींने नें हमर मैया, अबॆ सिन्दूर लगाबै छै।

जों गहलै छै कभी कौवा, तॆ ढेला फेंकी कॆ मैया
अहो बोलॊ न हो दादा, तुरत कहिनें भगाबै छै।

खनाखन हाँथ मॆ चूड़ी, बजै छै रोज काकी कॆ
हमर मैया के हांथों मॆ, एगो मठिया सुहाबै छै।

न गल्ला मॆ कोनॊ मल्ला, न टीका माथ मॆ पीन्हैं
कि बाबू घॊर कल अैतौं, कही हमरा ठगाबै छै।

पुजै छै तीज, करमाँ-चैथ ई टोला मुहल्ला कॆ
मगर मैया सॅ पूछै छी तॆ कानी कॅ कनाबै छै।
- अहो बोलॊ न हो दादा, तुरत कहिनें भगाबै
छै ।

Angika Poetry : कहै दादा सॅ इक पोता (गजल)
Poet : Sudhir Kumar Programmer

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