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कुंदन अमिताभ,

B.E. (Civil Engg.), MBA (Project Management)

लेखक व स्तंभकार ( हिंदी, अंगिका), संस्थापक व प्रधान संपादक –  www.angika.com

ई-मेल – kundan.amitabh@angika.com  मो. – 9869478444

यह एक अनबूझ पहेली सी ही है कि बिहार, झारखंड, पं. बंगाल के लगभग छह करोड़ भारतीयों द्वारा बोली जाने वाली भाषा अंगिका को अब तक भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल नहीं किया गया है. जबकि तथ्य यह है कि विश्व के प्राचीनतम भाषाओं में से एक अंगिका भारत के अलावा नेपाल, कंबोडिया, वियतनाम, लाओस आदि देशों में बोली जाने वाली एक अंतर्राष्ट्रीय भाषा है. यह एक अत्यंत गंभीर और विचारणीय विषय है कि आजादी के इतने बरसों के बाद भी एक विशाल जनसमुदाय की भाषा अंगिका अपने वाजिब हक से वंचित क्यों है. पर्याप्त पात्रता और ठोस आधार होने के बावजूद अंगिका को अष्टम अनुसूची में शामिल करने में भारत सरकार द्वारा किया जा रहा अप्रत्याशित विलंब समझ से परे है.

अष्टम अनुसूची में भाषा को शामिल करने हेतु निर्धारित मापदंड

भारत सरकार द्वारा कोई भी भाषा को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने के लिये कुछ निर्धारित मापदंड अपनाये जाते रहे हैं. इन निर्धारित मापदंडों में से किसी दो को पूरा करने वाली भाषा अष्टम अनुसूची में शामिल होती रही हैं. अभी तक जो मापदंड अपनायें गये हैं वे हैं-1) तीन दशक की जनगणना आंकड़ा अनुसार न्यूनतम पांच लाख लोग भाषा को बोलनेवाले हों. 2) कम से कम स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में भाषा का प्रयोग होता हो. 3) भाषा के लिखित रूप का पचास साल से अस्तित्व में होने का प्रमाण होना चाहिये. 4) साहित्य अकादमी द्वारा भाषा साहित्य का प्रचार-प्रसार होता हो. 5) जनगणना आंकड़ा के मुताबिक़ आसपास के इलाक़ा में दूसरी भाषा के रूप में इस्तेमाल होता हो. 6) नवनिर्मित राज्य में भाषा को राजभाषा का दर्जा मिला हो. 7)  देश बँटवारा से पहले भाषा किसी राज्य में बोली जाती हो और बँटवारा पश्चात भी कुछ राज्य में इस्तेमाल में हों.

अंगिका भाषा भाषी का विशाल भूक्षेत्र और छह करोड़ से भी ज्यादा जनसंख्या 

ज्ञातव्य है कि केवल भारत के बिहार, झारखंड आरू पश्चिम बंगाल राज्य में ही कुल मिलाकर लगभग छह करोड़ से भी ज्यादा लोगों द्वारा अंगिका भाषा प्रयोग में लाई जाती है. बिहार के पंद्रह अंगिकाभाषी जिले हैं- अररिया, कटिहार, पुर्णिया, किसनगंज, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, भागलपुर, बाँका, जमुई, मुंगेर, लखीसराय, बेगूसराय, शेखपुरा, खगड़िया. झारखंड के सात अंगिकाभाषी जिले हैं- साहेबगंज, गोड्डा, देवघर, पाकुड़, दुमका, गिरीडीह, जामताड़ा और पश्चिम बंगाल के तीन अंगिकाभाषी जिले हैं – मालदा, उत्तर दिनाजपुर, और बीरभूम अंगिका भाषा भाषी अन्य स्थान दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता सहित भारत के हर राज्य में भी बड़ी तादाद में निवासित हैं.

 अंगिका भाषा का लिखित रूप 1200 बर्ष से भी अधिक समय से अस्तित्व में

अंगिका का लिखित साहित्य अंगिका के आदि कवि ‘सरह’ की रचना के रूप में आठवीं सदी से ही उपलब्ध है. साथ ही आधुनिक काल में बिहार सरकार द्वारा प्रकाशित अंगिका भाषा साहित्य की पुस्तकें 1963 ईं से ही उपलब्ध है. सर्वप्रथम बर्ष 1963 ई. में बिहार समाज शिक्षा बोर्ड, बिहार सरकार द्वारा अंगिका की चार पुस्तकें प्रकाशित की गईं थीं – डा. परमानंद पांडेय कृत दो कहानी संग्रह- ‘सात फूल’, ‘देश क॑ बढ़ाबऽ हो’, डा. नरेश पांडेय चकोर कृत नाट्य पुस्तक – ‘सर्वोदय समाज’ और श्री मेवालाल शास्त्री कृत ‘खेती के तरीका’.  जबकि अंगिका के आधुनिक साहित्यकारों द्वारा विविध विधाओं में लिखी अंगिका भाषा साहित्य की सैकड़ों पुस्तकें व्यक्तिगत प्रयास से प्रकाशित हो चुकी हैं. व्यक्तिगत प्रयास से अंगिका की पहली प्रकाशित पुस्तक डा. नरेश पांडेय चकोर कृत नाट्य पुस्तक – ‘किसान क॑ जगाबऽ हो’ 1961 ई. में उपलब्ध हुई थी. अंगिका भाषा की एक पत्रिका, ‘अंग माधुरी’ पिछले पैंतालिस बरसों से निरंतर प्रकाशित हो रही है. लगभग डेढ़ दशक से अंगिका भाषा साहित्य वर्ल्ड वाइड वेब के अंगिका.कॉम पर भी उपलब्ध है. बिहार सरकार के लोकभाषा अनुसंधान विभाग द्वारा प्रस्तुत और बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा बर्ष 1969 ई. में पं. वैद्यनाथ पाण्डेय व श्रीराधावल्लभ शर्मा की प्रकाशित लगभग पाँच सौ पृष्ठों की पुस्तक ‘अंगिका संस्कार गीत’ और बिहार सरकार के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा बर्ष 1960 ई. में प्रकाशित डॉ. माहेश्वरी सिंह ‘महेश’ की पुस्तक, ‘अंगिका भाषा और साहित्य’ भी बिहार सरकार द्वार प्रकाशित उन आरंभिक पुस्तकों में से हैं जो यह सिद्ध करतीं हैं कि केवल अंगिका भाषा के आधुनिक काल में ही लिखित रूप में अस्तित्व में होने का प्रमाण लगभग पचपन साल का है.

महापंडित श्री राहुल सांकृत्यायन के शोध के अनुसार प्रसिद्द बौद्ध ग्रंथ ‘ललित विस्तर’ दसवाँ अध्याय में वर्णित कुल चौसठ लिपियों में चौथे स्थान पर उल्लेखित अंगलिपि ही अंगिका भाषा की अपनी लिपि है. हालाँकि आधुनिक काल में अंगिका लिखने के लिये कैथी और देवनागरी लिपि उपयोग में लाई जाती है.

बिहार व झारखंड में स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में अंगिका भाषा

संविधान के अनुच्छेद 344 और 351 के अनुसार राज्यों को हिन्दी के विकास के साथ-साथ राज्य की मातृभाषाओं का भी ध्यान रखना आवश्यक है. अंगिका के व्यापक संरक्षण और प्रसार के लिये बिहार सरकार द्वारा बर्ष २०१४ ई. में बिहार अंगिका अकादमी का गठन किया गया है. ‘शिक्षा के अधिकार अधिनियम’ के तहत भी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में देने का प्रावधान हैं. अंग क्षेत्र के प्रायः हर सरकारी प्राथमिक स्कूल में शिक्षा का माध्यम अंगिका भाषा ही है. बिहार और झारखंड के कुछ विश्वविद्यालयों में पी.जी. स्तर पर अंगिका की पढ़ाई की सुविधा उपलब्ध है. बिहार के तिलकामाँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में स्वतंत्र अंगिका विभाग है. झारखंड लोक सेवा आयोग और बिहार लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में अंगिका भाषा और साहित्य संबंधी प्रश्नों को सम्मलित किये जाते हैं.

नवनिर्मित राज्य झारखंड में अंगिका भाषा को द्वितीय राजभाषा का दर्जा

बर्ष २००० ई. बिहार के बँटवारे के पश्चात झारखंड का निर्माण हुआ ।  इस नवनिर्मित राज्य झारखंड में बर्ष २०१८ ई. में अंगिका भाषा को राज्य के द्वितीय राजभाषा का दर्जा प्राप्त हुआ ।

निर्धारित मापदंडों को अंगिका भाषा बखूबी पूरा करती है

जाहिर है कि भारत सरकार द्वारा अष्टम अनुसूची में भाषा को शामिल करने हेतु निर्धारित मापदंडों को अंगिकाभाषा बखूबी पूरा करती है. आशा है कि सार्वजनिक व लोकतांत्रिक हित को ध्यान में रखकर माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी अंगिका के पक्ष में निर्णय लेकर अंगिका को संविधान की अष्टम अनुसूची में शामिल करने के लिये आवश्यक कार्यवाही करेंगें. इसमें कोई दो राय नहीं है कि इस पहल से राष्ट्रभाषा हिन्दी के विकास की रफ्तार भी तेज होगी. साथ ही भारतीय संस्कृति को बढ़ावा मिलेगी और अंग क्षेत्र के शिक्षित युवाओं को शिक्षा, रोजगार और प्रतियोगी परीक्षाओं में अधिक अवसर मिलेंगें.

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