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पटना।मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने देश में अंग्रेजी की बढ़ती अहमियत पर सवाल उठाया है। उन्होंने कहा कि आजकल देश में ऐसा माहौल बना दिया गया है जैसे अंग्रेजी के बिना काम ही नहीं चलेगा। अगर अंग्रेजी इतनी जरूरी है तो चीन, जापान, जर्मनी और फ्रांस इसके बिना कैसे तरक्की कर गए? वोट लेने के लिए हिंदी, उर्दू, मगही, मैथिली और अंगिका ही बोलना पड़ता है, उस समय कोई अंग्रेजी नहीं बोलता। cm_nitish_2014_jan
मुख्यमंत्री ने पिछले चार जनवरी को  जश्न-ए-उर्दू  सामारोह में कहा कि कोई भाषा सीखने में बुराई नहीं है, लेकिन अंग्रेजी की मजबूरी नहीं होनी चाहिए। यूपीएससी भी रह-रह कर अंग्रेजी को पता नहीं क्यों तवज्जो देने लगता है। हम अपनी भाषा की बदौलत ज्यादा तरक्की कर सकते हैं। लोकतंत्र में लोक अर्थात जनता सर्वोपरी होती है। इसलिए जनता की भाषा को तरजीह दी जानी चाहिए। मुख्यमंत्री ने कहा कि अंगिका,  उर्दू आदि को रोजगार की भाषा बनाना होगा.
उर्दू  शिक्षकों की बहाली की प्रक्रिया को और भी आसान किया जाएगा। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शिक्षा विभाग के अधिकारियों को जश्न-ए-उर्दू कार्यक्रम में शामिल विद्वानों के साथ बातचीत करके बहाली का रोडमैप तैयार करने को कहा। शनिवार को प्रेमचंद रंगशाला में इस कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि उर्दू के विकास के लिए इसे रोजगार से जोडऩा होगा। सरकार राज्य के सभी स्कूलों में उर्दू शिक्षक बहाल करना चाहती है, लेकिन शिक्षक मिल नहीं रहे। बहाली की परीक्षा को 200 अंक से घटा कर 50 अंक का कर देने पर भी समस्या बरकरार है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि जश्न-ए-उर्दू में देश के बड़े-बड़े विद्वान जुटे हैं। शिक्षा विभाग के अधिकारी इन लोगों से सलाह करके उर्दू  शिक्षकों की बहाली की अड़चन को समाप्त करें। मैं आश्वस्त करता हूं, सरकार उर्दू के विद्वानों की सलाह को मानेगी। यह समस्या सिर्फ इसी वजह से हो रही है क्योंकि दूसरी राजभाषा होने के बावजूद उर्दू को कभी भी रोजगार की भाषा नहीं बनने दिया गया। उर्दू किसी धर्म विशेष की भाषा नहीं है। यह सबकी भाषा है।
मुख्यमंत्री के सांस्कृतिक सलाहकार पवन वर्मा ने कहा कि मुशायरे के दायरे से बाहर एक ऐसा मंच बनना चाहिए जहां भाषा और खास कर उर्दू के विकास पर चर्चा हो सके। उर्दू परामर्शदातृ समिति के अध्यक्ष डॉ. कलीम अहमद आजिज ने कहा कि देश में फिर उर्दू को उसका मुकाम हासिल होगा। हिंदुस्तानी आवाज संस्था के जुड़ी रख्शंदा जलील ने कहा कि हिंदी और उर्दू के लिए जगह कम होती जा रही है।

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