आँख खोलॊ जगो (गजल)

— सुधीर कुमार प्रोगामर —

आँख खोलॊ जगो, जगाबॊ ते
दीप अरमान के जलाबॊ तॆ।
ई धरा धर्म के बगीचा मॆ
घोसं ला प्यार के बनाबॆ तॆ।
खूब फरतै हँसी-खुषी सगरे
नेह के गाछ जों लगाबॊ तॆ।
देह के खून सब जरै-तॅ जरै
भूख के भूत सब भगाबॊ तॆ।
ई तिरंगा सरंग सॆ ऊँचॊ
गीत सरहद के गनु -गनुाबॊ तॆ।

Angika Poet : आँख खोलॊ जगो (गजल)
Poet : Sudhir Kumar Programmer

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