भारतीय भाषाओं के बारे में बात करना एक दबी हुई तकलीफ को हवा देने जैसा है। इनके बल पर आज न कोई ऊंची पढ़ाई कर सकता है , न अच्छी नौकरी पा सकता है। हालत यह है कि अपनी मातृभाषा के बड़े से बड़े समर्थक के पास भी अब अपने बच्चे को अंग्रेजी मीडियम स्कूल में पढ़ाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है। ऐसे में गृहमंत्री पी . चिदंबरम जब भोजपुरी को संविधान की आठवीं अनुसूची में लाने का आश्वासन देते हैं , तो इससे मिलने वाली खुशी में संदेह का एक पुट भी शामिल होना स्वाभाविक है।

भोजपुरी भारत के एक बड़े हिस्से की मातृभाषा है। इसके माधुर्य और इसके गीतों की शक्ति के सभी कायल हैं। लेकिन क्या भोजपुरी और अन्य भारतीय भाषाओं को बचाए रखने के लिए एक समाज के रूप में हम कुछ कर पा रहे हैं ? कुछ समय पहले तक भोजपुरी, अंगिका, अवधी , मगही वगैरह बोलने वाले बच्चे क्लासरूम में इन भाषाओं के शब्द मुंह से निकल जाने पर मार खाते थे। उन बच्चों के बच्चे अब अपने स्कूल में गलती से हिंदी बोल देने पर डायरी में शिकायती नोट लेकर लौटते हैं।

भाषाओं को म्यूजियम में रखकर नहीं बचाया जा सकता। न ही इनके नाम पर बंटने वाली दो – चार सरकारी नौकरियों से इन्हें कोई मदद मिलती है। ये तो बोलने और लिखने से बचती हैं। खासकर तब , जब लोगों को लगता रहे कि इनसे दूर होकर वे किसी बेशकीमती चीज से हाथ धो बैठेंगे। आने वाले दिनों में चिदंबरम के आश्वासन और भोजपुरी समर्थक सांसदों के दबाव पर यह भाषा संविधान के आठवें शिड्यूल में जगह बना लेती है , तो इससे हालात कितने बदल जाएंगे ?

सचाई यह है कि भारत का शासक वर्ग ही नहीं , यहां का नवोदित मध्यवर्ग भी भाषा को अपने लिए चिंता का विषय नहीं मानता। विकास के नाम पर समृद्धि के आंकड़े ही इनके लिए सब कुछ हैं। पिछड़े इलाकों के वोट और उनकी जैजैकार पाने के लिए राजनेता बीच – बीच में आठवीं अनुसूची जैसी फुलझड़ी छोड़ देते हैं तो इसे ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नहीं है। अगर आप बचा सकें तो अपनी मातृभाषा का कोई लहजा या उसका कोई गीत बचाकर रख लें। किसी अकेले , उदास पल में वह आपके काम आएगा।

(Source:http://navbharattimes.indiatimes.com/eighth-schedule-of-games/articleshow/13273488.cms )

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