2 months ago
उधाडीह गाँव मँ मनैलौ गेलै शौर्य चक्रधारी अंग गौरव शहीद निलेश कुमार नयन केरौ शहादत दिवस | New in Angika
2 months ago
गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड मँ जग्घौ बनाबै लेली आय 122 भाषा के गाना कार्यक्रम मँ अंगिका मँ भी गैतै पुणे केरौ मंजुश्री ओक | News in Angika
2 months ago
अंगिका भाषा क आठमौ अनुसूची मँ दर्ज कराबै लेली दिसम्बर मँ दिल्ली मँ होय वाला आन्‍दोलन क सफल बनाबै के करलौ गेलै आह्वान | News in Angika
2 months ago
अंगिका आरू हिन्दी केरौ वरिष्ठ कवि व गीतकार, कविरत्न महेन्द्र प्र.”निशाकर” “दिनकर सम्मान” सँ सम्मानित  | News in Angika Angika
3 months ago
चाँद पर विक्रम लैंडर के ठेकानौ के लगलै पता, पर अखनी नै हुअय सकलौ छै संपर्क | ISRO found Vikram on surface of moon, yet to communicate | Chandrayaan 2 | News in Angika

जादुई व्यक्तित्व, निश्छल एवं अलौकिक मुस्कराहट वाले डॉ. परमानंद पांडेय ने अंगिका को वैसे तराशा, जैसे कोई जौहरी किसी बेडौल-बेजान पत्थर को तराशता है. वह एक संवेदनशील कवि हैं. उनके रचनात्मक व्यक्तित्व ने साहित्य सर्जकों, पाठकों एवं प्रशंसकों को काफी अभिभूत किया है. अंगिका व्याकरण, अंगिका भाषा, अंगिका वर्तनी, अंगिकांजलि, अंगिका और भोजपुरी भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन, हिंदी और अंगिका का अंतर्संबंध आदि अपनी श्रेष्ठ कृतियों से डॉ. पांडेय ने अंगिका का भंडार समृद्ध कर दिया. परमानंद पांडेय को इस सदी का सर्वश्रेष्ठ भाषा वैज्ञानिक मानकर उनकी उपलब्धियों पर आज गर्व किया जा रहा है.

आज अंगिका भाषा-भाषी क्षेत्रों का जो मानचित्र जहां-तहां पत्र-पत्रिकाओं में छप रहा है, वह भी डॉ. पांडेय का ही बनाया हुआ है, जो उन्होंने अपनी डी. लिट की थीसिस-अंगिका का भाषा वैज्ञानिक अध्ययन में बनाकर भागलपुर विश्वविद्यालय को दिया था. भागलपुर में आकाशवाणी केंद्र भी डॉ. पांडेय की देन है. पांडेय ने भागलपुर विश्वविद्यालय में अंगिका की पढ़ाई प्रारंभ करने के लिए 1963, 1969 और 1970 में पहल की थी. यही वजह है कि लोग उन्हें अंगिका का जनक कहते हैं.

सम्राट मायाराम के वंशज सम्राट सूर्यमौलि के सुपुत्र राजा दामोदर पांडेय एवं महारानी मैना देवी के पौत्र और क्रांतिकारी महर्षि चुनचुन पांडेय एवं सीता देवी के पुत्र होने के कारण उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि अंग्रेज सरकार विरोधी थी. परिणामस्वरूप डॉ. पांडेय भी अपने अग्रज प्राचार्य सच्चिदानंद की तरह फरार होकर 1942 के ब्रिटिश सरकार विरोधी आंदोलन में कूद पड़े. इसलिए चाहकर भी वह उस समय अंगिका के प्रचार को परवान नहीं चढ़ा पाए. बाद में इस कमी को उन्होंने अपनी कृति पछिया बयार से पूरा किया. पछिया बयार की भाषा से भ्रम का पर्दा हटना शुरू होने लगा और धीरे-धीरे अंग अंचल के लोगों में भी अपनी भाषा के प्रति अभिमान जगने लगा.

यूं तो उन्होंने 14 जनवरी, 1940 को ही अंगिका में चानन नामक एक हस्तलिखित पत्रिका निकाल कर लोगों को चौंका दिया था. अंगिका भाषा में उनकी कविताएं आरंग नामक पत्रिका के अप्रैल एवं अगस्त 1945 के अंकों में निहोरा एवं गांधी जी के ऐलै जमाना शीर्षक से प्रकाशित हुईं. देशप्रेम सर्वोपरि था, इसलिए बहुत से भाषा संबंधी कार्य बीच-बीच में बाधित भी होते रहे.Permanand_pandey_angika

डॉ. पांडेय के दिल में अंगिका का ऐसा जुनून समाया कि उन्होंने आजादी के बाद कहलगांव के सुकुमारी पहाड़ के पहड़ बंगले पर, जहां वह संन्यासी के रूप में रहते थे, ब्रजभाषा की तर्ज पर अंग बोली को अंगभाषा नाम देकर केंद्रीय अंगभाषा परिषद के गठन का ऐलान किया, जिसकी नींव उन्होंने अंग बोली प्रचारिणी सभा के रूप में 5 जनवरी, 1945 को ही रख दी थी. डॉ. पांडेय ने केंद्रीय अंगभाषा परिषद की विधिवत स्थापना 1953-54 में की. 15 अगस्त, 1947 को कहलगांव की शारदा पाठशाला में एक कार्यक्रम का आयोजन करके उन्होंने जयप्रकाश नारायण को एक खूबसूरत थैली में ग्यारह सौ रुपये भेंट किए. आजादी के बाद किसी को थैली प्रदान करने का यह पहला उदाहरण था.यदि डॉ. पांडेय ने अंगिका आंदोलन न चलाया होता तो बिहार बहुत पहले ही बंट गया होता.

वर्तमान में बिहार और झारखंड के लगभग अट्ठारह-बीस जिलों यानी समस्त अंग अंचल के चार-पांच करोड़ लोगों की भाषा अंगिका है. आज जो भी लोग अंगिका में लिख-बोल रहे हैं, उसका रास्ता डॉ. पांडेय का बनाया हुआ है. इसी कारण उन्हें सदी का सर्वश्रेष्ठ भाषा वैज्ञानिक कहा जाता है.

(Source: http://www.chauthiduniya.com/2011/04/angika-language-generator.html)

 

Comments are closed.

error: Content is protected !!