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केवल लिखित साहित्य को ही आधार मानें तो अंगिका भाषा में साहित्य निर्माण की समृध्द परम्परा प्राचीन काल से ही सतत रूप से जारी है, जो प्रामाणिक रूप से पिछले तेरह सौ वर्षों के कालखंडों में बिखरा पड़ा है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन के अनुसार हिन्दी भाषा के लिखित साहित्य का प्राचीनतम स्वरूप ‘अंग’ के प्राचीन सिध्द कवि ‘सरह’ की आठवी सदी में लिखी अंगिका-अपभ्रंश भाषा की रचनाओं में उपलब्ध है. अगर वैदिक संस्कृत में सृजित साहित्य के प्रारंभिक वर्षों को भारतीय भाषाओं में साहित्य लेखन की शुरूआत मानी जाय तो ‘अंगिका’ भाषा में साहित्य निर्माण का कार्य आज से चार हजार वर्ष पूर्व शुरू हो चुका था.

अंगिका में लिखित एवं अलिखित दोनों ही तरह के साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं. आज की स्थिति यह है कि अंगिका भाषा का अपना वेब पोर्टल अंगिका.कॉम बर्ष 2003 से अस्तित्व में हैं. साथ ही अंगिका भाषा में गुगल.क़ॉम जैसा विश्व के अव्वल दर्जे का सर्च इंजन भी बर्ष 2004 से उपलब्ध है. किसी भी विकसित भाषा की उत्कृष्टता का पैमाना बन चुके इन सुविधाओं से लैस होकर इंटरनेट क्रांति के इस युग में अंगिका भारत ही नहीं विशव की कुछ चुनिंदा विकसित भाषाओं की श्रेणी में शामिल हो भारत की अन्य भाषाओं को चुनौती देती हुई उन्हें विकास के डेग भरने हेतु उत्साहवध्र्दन में लगी हुई है.

किसी भी साहित्य का वहाँ की संस्कृति से सीधा संबंध होता है. जिस देश की संस्कृति जितनी ही प्राचीन होती है उसमें परंपरा, विश्वास, आस्था और अनुगमन की जड़ें उतनी ही गहरी होती हैं और व्यापक भी. ऐसे समाज में विचार, तर्क, विश्लेषण और अन्वेषण की प्रक्रिया एक ही समय में विविध मानसिक स्तरों पर सतत् जारी रहता हैं. ऐसा समाज नित्य ही आधुनिकता की चुनौतियों को भी आसानी से झेल लेता है. असीम धैर्य ऐसे समाज का संबल होता है. जिसका फल यह होता है कि संसार उसकी, अलग पहचान को अस्वीकार नहीं कर पाता, भले ही इसमें थोड़ा अधिक वक्त जाया हो जाय.

यह तथ्य सर्वविदित है कि प्राचीन भारत के सोलह महाजनपदों में ‘अंग महाजनपद’ भी एक था. प्राचीन काल में यहाँ की प्रचलित भाषा का नाम था – ‘आंगी’. इसका प्राचीनतम उल्लेख वामन जयादित्य द्वारा सातवी सदी में रचित ग्रंथ ‘काशिका वृति’ में मिलता है. पुनः सतरहवीं सदी में सिध्दांतकौमुदी के प्रणेता भट्ठोजी दीक्षित ने भी व्याख्या कर इस तथ्य की पुष्टि की है. कालक्रम में ‘आंगी’ को आंगीकर, देशी भाषा, अंग भाषा, भागलपुरी आदि के नाम से भी जाना गया. डा0 ग्रियर्संन द्वारा तो इसे ‘छिका छिकी’ जैसा अपारम्परिक एवं अवैज्ञानिक नाम भी दिया गया. हालाँकि महापंडित राहुल सांकृत्यायन ने जब से इसका नामकरण कर इसे ‘अंगिका’ कहकर सम्बोधित किया तब से प्राचीन अंग की भाषा ‘आंगी’ आधुनिक युग में ‘अंगिका’ नाम से ही जानी जाने लगी.

अंगिका भाषा की अपनी प्राचीन लिपि का नाम था – अंग लिपि. लगभग पच्चीस सौ बरस पहले लिखे गये बौध्द ग्रंथ ‘ललित विस्तर’ में वर्णित तत्कालीन प्रचलित चौसठ लिपियों में ‘अंग लिपि’ का स्थान चौथा है. भागलपुर जिले के ‘शाहकुंड पहाड़ी पर मिले कुछ ’शिलालेखों तथा कम्बोडिया वियतनाम एवं मले’शिया आदि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में प्राप्त शिलालेखों में ‘अंग-लिपि’ को देखा जा सकता है.

वर्तमान में भारत में अंगिका पाँच करोड़ से भी अधिक जनों की भा है. अंगिका भाषा का प्रभाव क्षेत्र बिहार, झारखंड एवं प’िचम बंगाल के लगभग 58000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है. इसके अलावा मुंबई, दिल्ली, कलकत्ता, बड़ौदा, बंगलोर जैसे नगरों के अलावा भारत के हर कोने में ही अंगिका भाषी निवासित हैं. नेपाल के तराई क्षेत्रों में भी अंगिका बहुलता के साथ बोली जाती है. पाली, चीनी, एवं खमेर आदि साहित्य में इस तथ्य के ढेरों प्रमाण मिलते हैं जिनसे यह अनुमान लगता है कि कम से कम पहली ई0 से लेकर 1400 ई0 तक और संभवतः इसके पहले और बाद भी कम्बोडिया, वियतनाम एवं मलेशिया आदि दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में ‘अंगिका’ भाषा एवं अंग संस्कृति का बोलबाला था.

कालक्रम के हिसाब से अंगिका में साहित्य लेखन की परम्परा को तीन कालखंडों में विभाजित किया जा सकता है – आदिकाल, मध्यकाल एवं आधुनिक काल.

आदिकाल : अंगिका भाषा साहित्य के आदिकाल का समय तेरहवीं सदी तक का है. इसे सिध्दकाल भी कहा जा सकता है, क्योंकि इन कालखंडों में उपलब्ध सभी लिखित रचनायें सिध्द कवियों की है. आदिकाल का अंगिका साहित्य मूलतः भक्ति काव्य का रहा हैं. अंगिका भाषा में प्राचीनतम उपलब्ध लिखित साहित्य आठवीं सदी का हैं. आदिकाल के अंगिका साहित्यकारों में आठवीं सदी के सरह या सरहपा, शबरपा, नवीं सदी के चर्पटीपा, धामपा, मेकोपा, दसवीं सदी के दीपंकर श्रीज्ञान आतिश, ग्यारहवीं सदी के चम्पकपा, चेलुकपा, जयानन्तपा, निर्गुंणपा, लुचिकपा तथा बारहवीं सदी के पुतुलिपा शामिल हैं. इन बारह सिध्द कवियों ने ऐसे कुल बत्तीस ग्रन्थों की रचनायें कीं जो तत्कालीन अंगिका भाषा में हैं. इनमें सरह ने सोलह एवं दीपंकर ने पाँच ग्रंथ अंगिका अपभ्रं’श में लिखे हैं. महापंडित राहुल साकृत्यायन के मतानुसार चैरासी सिध्दों में छत्तीस बिहार के रहनेवाले थे, जिनमें बारह तो सिर्फ अंग जनपद से ही थे. श्री राहुलजी ने सरह को अंग देश का बताते हुए लिखा है कि वे उन चैरासी सिध्दों के आदिपुरूष हैं जिन्होंने लोकभाषा (अंगिका-अपभ्रंश) की अपनी अद्भुत कविताओं तथा विचित्र रहन सहन एवं योग क्रियाओं से वज्रयान को एक सार्वजनिक धर्म बना दिया. इसके पूर्व यह, महायान की भाँति संस्कृत का आश्रय ले, गुप्त रीति से फैल रहा था.

मध्यकाल : मध्यकाल अथवा सिध्दोतर काल चैदहवी सदी से आरम्भ होकर उन्नीसवीं सदी में खत्म होता है. मध्यकाल का अंगिका साहित्य भी मुख्यतः काव्य विधाओं का रहा हैं. अंग देm की प्रमुख लोकगाथा काव्य ‘सती बिहुला’ की रचना इसी काल (सतरहवीं सदी) में हुई. जिसमें मनसा – विषहरी की पूजा केन्द्र बिन्दु हैं. भागलपूर का चम्पानगर बिहुला की गाथा एवं पूजन का प्रधान केन्द्र हैं. अठारहवीं सदी के अंत तक अनुवाद के जरिये कुछ अंगिका गद्य के लिखित रूप भी प्रकाश में आ गए थे. इस काल के साहित्यकारों में प्रमुख है – सोलहवीं सदी के सोनकवि, हेमकवि, सत्रहवीं सदी के कृ”णकवि, भूधर मिश्र, भृगुराम मिश्र, अठारहवीं सदी के किफायत, कुंजनदास, कृ”णाकवि, फादर अंटोनियोकूर, जगन्नाथ, जॉन क्रिश्चयन, लक्ष्मीनाथ परमहंस, वेदानन्द सिंह.

आचार्य शिवपूजन सहाय के मुताबिक इस काल में ऐतिहासिक विपल्वों का प्रभाव अंग देव पर इतना अधिक पड़ा कि बहुत से ग्रंथ भंडारों और प्रजा के विपुल धन का ध्वंस हो गया. यहाँ तक कि मुसलमानी शासन काल के आक्रमणों के अतिरिक्त सन 1857 के सैनिक विद्रोह में भी अनेक गाँव और संग्रहालय नष्ट हो गए. जान पड़ता है कि इसी कारण से अंगिका भाषा के अधिकांश साहित्य और साहित्यकार संबंधी जानकारियाँ उपलब्ध नहीं हो पातीं.

आधुनिक काल : अंगिका साहित्य के आधुनिक काल की शुरूआत बीसवीं सदी से मानी जा सकती है. जब महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा अंग देश की भाषा का नामकरण ‘अंगिका’ होने के बाद श्री लक्ष्मीनारायण सुधांशु की अध्यक्षता में 1956 ई0 में अंग-भाषा परिषद की स्थापना की गई और उनके साथ श्री गदाधर प्रसाद अम्ब”ठ, महे’वरी सिंह महेश, डा0 परमानन्द पाण्डेय, डा0 नरेश पाण्डेय चकोर, श्री श्रीमोहन मिश्र मधुप जैसे साहित्यकारों ने अंगिका भाषा के उत्थान हेतु अंगिका भाषा आन्दोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया.

इसके साथ ही प्रारम्भ हुआ अंगिका के साहित्यकारों द्वारा अंगिका के लोक साहित्य के संकलन का भगीरथ प्रयास. साथ-साथ अंगिका भाषा में आधुनिक साहित्य के लेखन का नया क्रान्तिकारी दौर भी आरम्भ हुआ. परिणाम स्वरूप आज अंगिका में विविध विधाओं की हजारों रचनायें लिखित रूप में उपलब्ध हो चुकी है. लगभग छह सौ साहित्यकार अंगिका साहित्य सृजन में लगे हैं, जिनकी सैकड़ो अंगिका की पुस्तकें प्रका’िात हो चुकी है. दर्जनों पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हो रही है.

बिहार सरकार की संस्था बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा अंगिका संबंधी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पहली पुस्तक 1959 ई0 में प्रकाशित श्री महेश्वरी सिंह महेश रचित ‘अंगिका भाषा और साहित्य है. दूसरी पुस्तक 422 पृ”ठों की ‘अंगिका संस्कार गीत’ है, जिसमें लगभग 500 अंगिका लोकगीत संग्रहीत हैं. इस पुस्तक के सम्पादक हैं – पं0 वैद्यनाथ पांडेय और श्री राधावल्लभ वर्मा.

आधुनिक काल : अंगिका साहित्य के आधुनिक काल की शुरूआत बीसवीं सदी से मानी जा सकती है. जब महापंडित राहुल सांकृत्यायन द्वारा अंग देश की भाषा का नामकरण ‘अंगिका’ होने के बाद श्री लक्ष्मीनारायण सुधांशु की अध्यक्षता में 1956 ई0 में अंग-भाषा परिषद की स्थापना की गई और उनके साथ श्री गदाधर प्रसाद अम्ब”ठ, महे’वरी सिंह महेश, डा0 परमानन्द पाण्डेय, डा0 नरेश पाण्डेय चकोर, श्री श्रीमोहन मिश्र मधुप जैसे साहित्यकारों ने अंगिका भाषा के उत्थान हेतु अंगिका भाषा आन्दोलन को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया.

इसके साथ ही प्रारम्भ हुआ अंगिका के साहित्यकारों द्वारा अंगिका के लोक साहित्य के संकलन का भगीरथ प्रयास. साथ-साथ अंगिका भाषा में आधुनिक साहित्य के लेखन का नया क्रान्तिकारी दौर भी आरम्भ हुआ. परिणाम स्वरूप आज अंगिका में विविध विधाओं की हजारों रचनायें लिखित रूप में उपलब्ध हो चुकी है. लगभग छह सौ साहित्यकार अंगिका साहित्य सृजन में लगे हैं, जिनकी सैकड़ो अंगिका की पुस्तकें प्रका’िात हो चुकी है. दर्जनों पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हो रही है.

बिहार सरकार की संस्था बिहार राष्ट्रभाषा परिषद, पटना द्वारा अंगिका संबंधी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं. पहली पुस्तक 1959 ई0 में प्रकाशित श्री महेश्वरी सिंह महेश रचित ‘अंगिका भाषा और साहित्य है. दूसरी पुस्तक 422 पृ”ठों की ‘अंगिका संस्कार गीत’ है, जिसमें लगभग 500अंगिका लोकगीत संग्रहीत हैं. इस पुस्तक के सम्पादक हैं – पं0 वैद्यनाथ पांडेय और श्री राधावल्लभ वर्मा.

आधुनिक काल में अंगिका भाषा की बहुचर्चित एवं प्रमुख लिखित एवं प्रकाशित साहित्य का विवरण विधाक्रम से अग्रलिखित हैं –

अंगिका लोकगीत साहित्यः अंगिका जतसार, अंगिका पिहानी, अंगिका के फैकड़े एवं लोरियाँ (सभी डा0 नरेश पाण्डेय चकोर), अंगिका महायात्रा गीत (डा0 तेजनारायण कुशवाहा), अंगिका लोकगीत (आभा पूर्वे), करमा धरमा (कुन्दन अमिताभ).

अंगिका लोकगाथा काव्य : बिहुला (महादेव साह), सलेस भगत (डा0 अभयकांत चैधरी, डा0 चकोर), बिसो राउत (डा0 रमेश आत्मविश्वास), हिरनी बिरनी, हरिया डोम, इंदुमाली – वेणी, ज्योति तपस्या (सभी प्रदीप प्रभात), राजा जयमाल (कुमार संभव), कमला मैया (सच्चिदानन्द श्रीस्नेही).

अंगिका लोककथा साहित्य : सती बिहुला (गोपाल कृष्ण प्रज्ञ), अंगिका लोककथा (आभा पूर्वे), चलॊ खिस्सा के गाँव (मीना तिवारी), सात पट्ठा हट्ठा कट्ठा (विद्यानन्द किशोर), अंग देश केरॊ लोक कथा, शीत बसंत (सभी कुन्दन अमिताभ)

अंगिका व्याकरण, वर्तनी, ‘शब्दकोष साहित्य : अंगिका भाषा, अंगिका वर्तनी, प्रथम अंगिका व्याकरण (सभी डा0 परमानन्द पाण्डेय), अंगिका व्याकरण, अंगिका-हिन्दी शब्दकोष (सभी डा0 डोमन साहु समीर), अंगिका भाष व्याकरण भास्कर, अंगिका शब्दानुशासन (सभी डा0 शिवचन्द्र अंगिरस), अंगिका व्याकरण (श्रीनिकेत), अंगिका भाषा उद्गन आरो विकास (परशुराम ठाकुर ब्रहम्वादी), अंगिका लोकोक्ति आरो मुहावरा (डा0अभयकांत चैधरी एवं डा0 चकोर)

अंगिका इतिहास साहित्य : अंगिका साहित्य का इतिहास (डा0 अभयकान्त चैधरी एवं डा0 चकोर), अंगिका भाषा का इतिहास (डा0 तेजनारायण कुशवाहा), अंग और अंगिका के अन्र्तराष्ट्रीय आयाम (कुन्दन अमिताभ), अंगिका साहित्य रॊ इतिहास (डा0 डोमन साहु समीर, डा0 कुशवाहा, डा0अमरेन्द्र), अंगिका भाषा आरो साहित्य (सुमन सूरो), अंगिका पत्रकारिता रॊ इतिहास (डा0 मधुसूदन झा)

अंगिका काव्य साहित्य : पनसोखा, उध्र्वरेता, सती परीक्षा, रूप-रूप प्रतिरूप (सुमन सूरो), पछिया बयार (डा0 परमानन्द पांडेय), किसान क’ जगाबॊ,फूलॊ के गुलदस्ता, ययाति, भोरकॊ लाली (डा0 नरेश पाण्डेय चकोर), करिया झुम्मर खेलै छी, रेत रॊ राग, ऋतुरंग, गेना (डा0 अमरेन्द्र), सवर्णा,माद्री (डा0 तेजनारायण कुशवाहा), महमह फूल (विद्याभूषण सिंह वेणु), धमस (कुन्दन अमिताभ), मन रॊ मनका, सीपी में सागर, कोशी के तीरे-तीरे (चन्द्रप्रकाश जगप्रिय), जाहनवी (कनकलाल चैधरी कणक), उतंग हमरॊ अंग (हीरा प्रसाद हरेन्द्र), कैन्हॊ चाँद केकरॊ चाँद (जीवन लता पूर्वे),गुमार (गुरेश मोहन घोष सरल), गुदगुदी (प्रकाश सेन प्रीतम), जत्ते चलॊ चलैने जा (कैलाश झा किंकर), चढावा, लाठी महात्म्य (अंजनी कुमार शर्मा), इ जिनगी, बिछलॊ गीत (डा0 भूतनाथ तिवारी), कच (अनिल चन्द्र ठाकूर), उषा (सुभाष भ्रमर), मंथरा (जगदीश पाठक मधुकर), घैरको (भुवनेश्वर भुवन), अंग तरंग (परशुराम ठाकुर ब्रहम्वादी), गीत माधुरी, जैबै अंग देश (प्रीतम कुमार दीप), चानन के रेत (आर. प्रवेश) कैटरेंगनी के फूल (विजेता मुदगलपुरी).

अंगिका कथा साहित्य : सात फूल (डा0 परमानन्द पाण्डेय), स्वर्गारोहन (विद्याभूषण सिंह वेणु), शुकरी (अनिरूध्द प्रसाद विमल), अंगिकाजलि (डा0परमानन्द पाण्डेय एवं डा0 चकोर) तिलका सुन्दरी डार-डार (डा0 चकोर) पंचमेवा (नरेश जनप्रिय), अंगिका कहानी (डा0 अमरेन्द्र), सुखलॊ बडुआ (राजीव परिमलेन्दु), शनिचरा (महेन्द्र जयसवाल), बेरा लबलै (कुन्दन अमिताभ), चैक (सुरेन्द्र परिमल), अंगिका अणुकथा (चन्द्रप्रका’ा जगप्रिय),भोर (आमोद कुमार), रस्ता पैड़ा (अनिल शंकर झा), लपकी (सुरेश मंडल कुसुम), पंचफोरन (जगदीश पाठक मधुकर), पंचैती, पंचकाठ, थुकथुकौन जग्ग, भंगलका नुंगा (सभी कनक लाल चैधरी कणीक)

अंगिका बाल साहित्य : ढोल बजै छै ढम्मक ढम, बुतरू के तुतरू (डा0 अमरेन्द्र), बाजै छै बीन (सान्त्वना)

अंगिका उपन्यास साहित्य : नया सूरज नया चान (अनुपलाल मंडल), विशाखा (डा0 चकोर), जटायु (डा0 अमरेन्द्र), शुभद्राँगी (सुमन सूरो) परबतिया,अन्तहीन, वैतरणी, गुलबिया (सभी आभा पूर्वे), तुलसी मंजरी (श्रीकेशव), छाहुर (अनिरूध्द प्रभास)

अंगिका जीवनी एवं यात्रा वृतांत साहित्य : हमरॊ जीवन के हिलकोर (डा0 अभयकांत चैधरी), मलिनी के संस्मरण (विकास पाण्डेय), आध्यात्मिक आरो साहित्यिक जतरा (डा0 नरेश पाण्डेय चकोर), चकोर आरो हुनकॊ साहित्य साधना (डा0 तेजनारायण कुशवाहा), गणनायक केरॊ देश में, ‘अंगिका के आदि कवि : सरह’ (सभी कुन्दन अमिताभ), ऐंगन्है में अतीत (डा0 मृदुला शुक्ला), नैहरा के ओलती आरो ऐंगना (जीवनलता पूर्वे)

अंगिका आलोचना, निबंध एवं शोध साहित्य : ‘अंगिका गाथा काव्य में गीति तत्व’ (डा0 सरिता सुहावनी), कोया से बाहर आवॊ (कुन्दन अमिताभ),छन्द मौनी, छनद हौनी, गजल रॊ पिंगले (सभी डा0 अमरेन्द्र), कबीर हंस दर्शन – छोटेलाल मंडल, समीक्षात्मक निबंध (डा0 डोमन साहु समीर),संस्कृति सुमन (डा0 चकोर), अंगिका काव्यांग (सुमन सूरो), अंगमाधुरी आरो चकोर (डा0 शिवनारायण).

अंगिका नाट्य साहित्य : सर्वोदय समाज (डा. चकोर), सौर सुरमि (डा. तेजनारायण कुशवाहा), पंचगव्य (डा0 अमरेन्द्र), फैरछॊ (कुन्दन अमिताभ),तीरथ जतरा (श्री उमेश), किसान क’ जगाबॊ, लहुऔ सें महगॊ सिनूर (बैकुण्ठ बिहारी), बहिष्कार (हीरा प्रसाद हरेन्द्र), समाज सुधार (श्रीकान्त व्यास),ध्दौतांगिनी (कनकलाल चैधरी कणीक)

अंगिका भाषा की पत्र-पत्रिकायें : अंगिका भाषा में फिलहाल पच्चीस से भी अधिक पत्र-पत्रिकायें प्रकाशित हो रही है. इनमें मासिक पत्रिका‘अंगमाधुरी’ सर्वाधिक महत्वपूर्ण है, जो पिछले पैंतीस वर्ष से नियमित प्रकाशित हो रही है. इसके सम्पादक हैं – डा0 नरेश पांडेय चकोर.

अन्य पत्रिकाओं में उल्लेखनीय हैं – ‘अंगिका’ (डा0 परमानन्द पांडेय), आंगी (डा0 अमरेन्द्र), उत्तरांगी (चन्द्र प्रकाश जगप्रिय), पुरबा (सुधाकर),चम्पा, अंगिकांचल (डा0 आत्मविश्वास), कात्यायनी (कैलाश झा किंकर), अंग तरंगिनी (परशुराम ठाकूर ब्रहमवादी), अंग धात्री (कुमार संभव), अंग गौरव (प्रदीप प्रभात) आदि.

‘अंगिका’ को हिन्दी पत्रकारिता की मूल धारा से जोड़ने की एक नई पहल बीसवी सदी के नब्बे के द’ाक में ‘प्रभात खबर’ ने की थी और इस क्रम में कुन्दन अमिताभ के ‘अंगिका संवाद – अबरी दाफी’ नामक साप्ताहिक स्तम्भ का नियमित प्रकाशन प्रारंभ हुआ था. अंगिका को एक नई गरिमा प्रदान करने की दिशा में किए गए इस ऐतिहासिक पहल के लिए ‘प्रभात खबर’ के प्रधान संपादक श्री हरिवंश, वरिष्ठ पत्रकार श्री अजय कुमार एवं श्री कुमार मुकुल के प्रति अंगिका भाषी समाज सदैव ऋणी बनी रहेगी. उनकी जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है. प्रभात खबर के उक्त पहल को जारी रखते हुए इस वक्त दैनिक  जागरण ने ‘अपनो बात’ नामक अंगिका का साप्ताहिक स्तम्भ प्रारंभ किया है जिसे डा0 बहादुर मिश्र नियमित रूप से लिख रहे है.

किसी भी भाषा साहित्य के दो रूप होते हैं – लिखित व अलिखित अथवा मौखिक. वर्तमान परिपाटी के अनुसार भाषा विशेष की वही रचनायें साहित्य अथवा तथाकथित विशिष्ट साहित्य की श्रेणी में आती हैं जो लिखित रूप में मौजूद हों. मौखिक साहित्य को हम विशिष्ट साहित्य न मानकर भाषा विशेष की लोक साहित्य की संज्ञा देकर निश्चिन्त हो जाते है. यह एक विचारणीय विषय है कि केवल लिखित रूप के अभाव में कोई रचना साहित्य का अंग क्यों कर नही बन पाती. साथ ही यह भी कि क्या केवल लिखित रूप में आ जाने मात्र से ही कोई लोक साहित्य, विशिष्ट साहित्य बन कर केवल पृष्ठों तक सीमित हो जाता है? व्यास, बाल्मीकि और होमर ने क्रमशः वेद, रामायण एवं इलियद और ओदेसी जैसे महाकाव्यों की रचना की जो मौखिक ही थे. कबीर, सूर, तुलसी, तथा इतावली के दान्ते, अंग्रेजी के चॉसर और जर्मन के लूथर ने जो रचनायें की वे भी मूलतः अलिखित ही थे. क्या इन रचनाओं को केवल लोकसाहित्य मानकर इनकी उपेक्षा संभव है ?

— कुंदन अमिताभ, 09869478444,

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