अंगिका उस अंग महाजनपद की भाषा है, जिसे पुराणों में अंगदेश के नाम से भी जाना गया है, जिस देश :क्षेत्र, की नींव बली के पुत्र अंग ने अपने नाम पर रखी थी और कि जिस चक्रवर्ती अंग के संबंध में यह कथन है कि उसने सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतकर अश्वमेध यज्ञ किया था। ‘अंग समन्तं सर्वतः पृथ्वीं जयन्परीयायाश्वेन च मेध्येनेज इति।’ :ऐतरेय ब्राह्मण-ण्ण्ण्९/८/२१,। चक्रवर्ती सम्राटों की संख्या अंग जनपद में कम नहीं रही है। चक्रवर्ती अंग के ही वंश में पृथु का जन्म हुआ, जो न केवल राजसूय यज्ञ से अभिसिक्त होने वाला प्रथम राजा हुआ, बल्कि अपने यशोगान से प्रसन्न होकर सूत को अनूप देश और मगध को मगध देश दे दिया था। इन पौराणिक कथाओं पर वाद-विवाद हो सकता है, लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि अंग की स्थापना ऋग्वेद काल में ही चुकी थी, इसे एक स्वर से  सभी इतिहासकार स्वीकार करते हैं। :देखें-राधा कृष्ण चैधरी/हिस्टंी आॅफ बिहार/१९५८ पृ.ण्ण्ण्ण्ण्ण्॰, ‘संस्कृति के चार अध्याय’ में रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं कि ‘हिन्द-चीन में समुद्र के किनारे चम्पा राज्य की स्थापना द्वितीय शती में हुई। यहाँ भी राज्य का चम्पा नाम इसलिए प्रचलित हुआ कि राज्य स्थापित करने वाले हिन्दू चम्पा :भागलपुर, से आए थे। इन सभी द्वीपों का नाम अंगद्वीप था। :देखें- डाॅ. रामधारी सिंह दिनकर/संस्कृति के चार अध्याय/पृ.२॰९, इतिहासकार

राधाकृष्ण चैधरी ने भी लिखा है कि, ‘भारत के पूरब के देशों में आर्य-उपनिवेश-काल में जो उपनिवेश कायम हुए, उनमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान चम्पा/अंग  उपनिवेश का है, जिसका नाम अंग जनपद के लोगों ने चम्पा नगरी के नाम पर रखा था। :राधा कृष्ण चैधरी/हिस्टंी आॅफ बिहार/पृ.१५,। इन बातों को यहाँ रखने का प्रयोजन सिर्फ इतना ही है कि अंग के धर्म और व्यापार-विस्तार के कारण न केवल अंगप्रदेश की संस्कृति ही व्यापक तौर पर फैली, बल्कि इस प्रदेश की भाषा भी। यह भाषा कुछ तो प्राचीन विक्रमशिला विश्वविद्यालय के सिद्ध कवियों द्वारा फैली।

अंगिका काव्य का आरंभ इन्हीं सिद्ध कवियों के साहित्य से होता है। यहाँ आरंभ में ही बता देना आवश्यक है कि सिद्धों के अधिकांश महत्वपूर्ण कवि भागलपुर के विभिन्न अंचलों से ही संबंध रखते हैं और कि अंगिका के आदिकवि सरहपा ही हैं जिन्हें हन्दी का भी आदिकवि कहा गया है। अंगिका के अन्य प्रमुख सिद्ध कवियों में हैं- सरहपा, शबरपा, धर्मपा, चम्पपा, चेलकपा, मेकोपा, लुचिकपा, चर्मटीपा, पुतलिया, कन्हपा, जयानन्त आदि। इस संबंध में बिहार राष्टंभाषा परिषद् पटना से प्रकाशित ‘हिन्दी साहित्य और बिहार’ :प्रथम खंड, भी द्रष्टव्य है। परिषद से ही प्रकाशित ‘पंचदश निबंधावली’ में डाॅ. माहेश्वरी सिंह ‘महेश’ ने इनमें से कई सिद्ध कवियों के पदों को प्रस्तुत किया है। साथ ही महापंडित और सिद्धकवि दीपंकर श्रीज्ञान तिब्बती ग्रंथों के अनुसार भागलपुर के निवासी थे और वास्तव में श्रीज्ञान
भागलपुर के ही रहनेवाले थे। :राहुल सांकृत्यायन/तिब्बत में सवा वर्ष, १९४८ ई./पृ.२॰९,।

इन सिद्ध कवियों की भाषा पर विचार करते हुए भाषाविद् डाॅ. डोमन साहु समीर ने अपने लेख ‘सिद्ध साहित्य, अंग जनपद और अंगिका भाषा’ में लिखा है कि सभी सिद्ध कवियों की कविताओं में आधुनिक अंगिका भाषा के प्राचीन रूप सुरक्षित हैं जो आधुनिक अंगिका के एकदम निकट हैं। वर्तमान समय में अंगिका का अर्थ, पुराने भागलपुर जिले की भाषा से है। भाषाविद् डाॅ. परमानंद पांडेय की तरह डाॅ. उदयनारायण तिवारी ने अंगिका को मुख्य रूप से पुराने भागलपुर प्रमंडल यानी आज के मुंगेर, कोशी, पूर्णिया, भागलपुर और संथालपरगना प्रमंडल की भाषा स्वीकार किया है। चूँकि अंगिका साहित्य के प्रति आरंभ से ही साहित्यकारों की उपेक्षा नीति रही है, इसी से इसके मध्यकाल के काव्य और कवियों पर विशेष प्रकाश नहीं मिलता, फिर भी प्राप्त स्रात से इसके कुछ मध्यकालीन कवियों की जानकारी अवश्य मिलती है।

अंगिका भाषा और साहित्य के मध्यकालीन कवि :सोन कवि/कृष्ण कवि/परस रमा/जान क्रिश्चियन/लक्ष्मीकांत/परमहंस :सभी सहरसा जिले के,, भूधर/भृगुराम मिश्र/कुंजन दास/जगन्नाथ :सभी मुंगेर जिले के,, शेख किफायत/कृष्णा कवि/वेदानंद सिंह :सभी पूर्णिया जिले के, और गिद्धौर राजवंश के अधिकांश राजा मध्यकालीन अंगिका भाषा के कवि हैं। इन कवियों की अधिकांश कविताएँ मुक्तक रूप में ही प्राप्त होती हैं, जो प्रवाहित होते हुए आधुनिक काल के कवि जगन्नाथ चतुर्वेदी दर्शन
दूबे, भवप्रीता नंद ओझा आदि की कविताओं तक पहुँचती है। डाॅ. समीर ने दर्शन दूबे को आधुनिक अंगिका का प्रथम कवि माना है, लेकिन समय के हिसाब से पं. जगन्नाथ चतुर्वेदी को ही प्रथम कवि मानना उचित है। यहाँ यह भी संकेत कर देना आवश्यक होगा कि इन कवियों के मुक्तक काव्यों में अंगिका की सामान्य क्रिया :छै, छेकै, का लोप देखकर, कुछ लोग इसे ब्रज की कविताएँ मान बैठते हैं, जो भ्रमपूर्ण है।

अंगिका के आधुनिक प्रबंधकाव्य : यह कुछ चैंकाने वाली बात भी हो सकती है कि जहाँ हिन्दी में प्रबंधकाव्य खासकर महाकाव्य की परम्परा लगभग समाप्ति पर है, वहाँ अंगिका के आधुनिक समय में भी प्रबंधकाव्य की धारा क्षीण होने के बदले प्रबल ही हुई है। रामायण और महाभारत की कथाओं पर आधारित अंगिका के प्रबंध काव्य आधुनिक समय और जीवन को बड़ी सफलता से व्यक्त करते हैं। वह चाहे वैदिक कथा पर आधारित अंगिका महाकाव्य ही क्यों न हो। अंगिका में ऐसे प्रबंध की सर्जना भी हुई है जो आधुनिक भारत के महापुरुष रहे हैं और समाज के ऐसे भी व्यक्ति पर, जो समाज के सर्वाधिक उपेक्षित वर्ग का है।

अंगिका के आधुनिक महाकाव्यों में अमरेन्द्र का ‘गेना’ :१९९॰ ई.,, डाॅ. तेजनारायण कुशवाहा कृत ‘सवर्णा’ :१९९॰ ई.,, महाकवि सुमन सूरो कृत ‘उध्र्वरेता’ :१९९९ ई.,, जगदीश पाठक मधुकर कृत ‘मथुरा’ :२॰॰॰ ई.,, महेन्द्र नारायण शरण कृत ‘महाप्रभु आनंद दास’ :२॰॰४ ई.,, नंदलाल यादव सास्वत कृत ‘अंगेश कर्ण’ :२॰॰९ ई.,, हीरा प्रसाद हरेन्द्र कृत ‘तिलकामांझी’ :२॰॰९, और विजेता मुदगलपुरी कृत ‘अंगिका रामायण’ :२॰॰९ ई., शामिल हैं। :मुझे इस रामायण का एक खंड ही प्रकाशित रूप में देखने को मिला है।,

अंगिका के आधुनिक खंडकाव्यों में अनिलचंद्र ठाकुर कृत ‘कच’ :१९७५,, सुमन सूरो कृत ‘सती परीक्षा’ :१९८४,, अंजनी कुमार शर्मा का ‘मुष्ठियुद्ध’, रघुनंदन झा राही का ‘चिन्ता’ :१९८५ ई.,, अनिरुद्ध प्रसाद विमल कृत ‘कागा की संदेश उचारै :१९८८,, छोटेलाल मंडल प्रणीत ‘भक्तराज प्रह्लाद; :२॰॰१ ई.,, डाॅ. तेजनारायण कुशवाहा कृत ‘माद्री’ :२॰॰२ ई.,, डाॅ. विनय कुमार चैधरी कृत ‘सुनो हो भैया लोक जहान’ :२॰॰८ ई., और यदुनंदन झा द्विज कृत ‘राष्टंभक्त जटायु’ :२॰॰९ ई.,। इन खंडकाव्यों में ‘कागा की संदेश उचारै’ और ‘सुनो हो भैया लोक जहान’ ही ऐसे दो खंडकाव्य हैं, जो महाभारत या रामायण की कथाभूमि पर रचित नहीं है। नहीं तो सभी खंडकाव्य का कथा स्रोत बाल्मीकि की रामायण या व्यास का महाभारत ही है। आधुनिक अंगिका काव्य में लिखे गए खंडकाव्य दो रूपो में प्राप्त हैं- एक वर्ग के खंडकाव्य वे हैं, जो सर्गों या शीर्षकों में विभाजित हैं, जबकि दूसरे वर्ग में ऐसे खंडकाव्य आते हैं, जो शीर्षकों या सर्गों में विभाजित न होकर एक लंबी कविता की शक्ल में रचित हैं। हाँ, सर्ग के संकेत के लिए इन खंडकाव्यों में परिच्छेदों का अवश्य योजन कर दिया गया है। इसके अतिरिक्त दूसरे वर्ग के ये खंडकाव्य न केवल
सर्ग या शीर्षकविहीन हैं, बल्कि इनका रूप घटना-प्रधान न होकर विचारप्रधान है। इनमें एक अखंड अनुभूति बिना किसी अवरोध के आगे बढ़ती जाती है, जो कई-कई सवालों से उलझती-पुलझती भी है। बाह्य वर्णन की जगह इनमें एक आंतरिक संघर्ष की अभिव्यक्ति इन खंडकाव्यों में प्राप्त होती है। सच तो यह है कि सर्गविहीनता के कारण इन खंडकाव्यों में चिन्तन का जो एक अबाध प्रवाह मिलता है, उससे इसके प्रभाव में घनत्व-सा आ गया है। काव्यशास्त्रियों ने ऐसे प्रबंध को पर्यायबंध और पद्यात्मक निबंध कहा है। पर्यायबंध और पद्यात्मक निबंध न तो महाकाव्य है, न खंडकाव्य; ये मुक्तक काव्य भी नहीं है। ये खंडकाव्य और मुक्तक के बीच के काव्य हैं, जिनमें किसी वस्तुविशेष का वर्णन दूर तक होता है। पर्यायबंध और पद्यात्मक निबंध में यही भेद है कि पहले में किसी प्रसंग या वस्तु विशेष का उल्लेख होता है, जबकि पद्यात्मक निबंध में किसी विचार को बढ़ाया गया होता है।

पर्यायबंध की दृष्टि से अंगिका में नरेश पांडेय ‘चकोर’ कृत ‘भोरको लाली’ इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसका प्रकाशन १९७२ ई. में हुआ है। इस वस्तुवर्णनात्मक प्रबंध में श्री चकोर ने उषा के सौन्दर्य का जो अप्रस्तुतविधान किया है, वह मन को बांधनेवाला है। १९७ण्ण्ण्ई. में प्रकाशित डाॅ. तेजनारायण कुशवाहा का ‘अंग दर्शन’ और १९९४ में डाॅ. अमरेन्द्र का ‘अंगदेव’ भी वस्तुवर्णनात्मक प्रबंध ही है। इसीतरह चन्द्रप्रकाश जगप्रिय कृत ‘कोशी के तीरे-तीरे’ :२॰॰ण्ण्ण् ई., और ‘जागो हे ग्राम देव’ :२॰॰६ ई., दो प्रबंध हैं, जो पद्यात्मक प्रबंध की कोटि के हैं। जनार्दन प्रसाद सिंह वारिद-कृत ‘माय’,देवन्द्र-कृत ‘आरो सब हाल-चाल गामो’ के निक्के छौन’ :१९९६,, रामनंदन विकल-कृत ‘मंदार बोलै छै’, इन्दुभूषण मिश्र ‘देवेन्दु’-कृत ‘आपनो भारत देश वहे’, महेश्वर राय कृत ‘मंदार-मधुसूदन माहात्म्य’, डाॅ. परमानंदकृत ‘चिन्ता’, श्रीउमेशकृत ‘पतझड़’, मथुरानाथ सिंह ‘रानीपुरीकृत ‘हमरो देश: गजुरलो देश’ पर्यायबंध और पद्यात्मक प्रबंध की कोटि की ही काव्य-कृतियाँ हैं। लेकिन, अंगिका के आधुनिक प्रबंध काव्यों की सीमा-रेखा यहीं पर नहीं ठहर जाती। यह और भी बहुत आगे जाती है। लेकिन, उन प्रबंधों पर इसलिए बातचीत संभव नहीं है कि ये प्रबंध या तो यंत्रस्थ हैं या प्रकाश्य या फिर लोककंठों में बसे हुए। ऐसे
प्रबंधों में राम शर्मा अनलकृत महाकाव्य ‘एकलव्य’ भी है और आमोद कुमार मिश्र का खंडकाव्य ‘अंगद’ भी।

विजेता मुद्गलपुरी-कृत ‘सुकन्या’ राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या और चयन ऋषि की कथा पर आधारित पाँच सर्गों में विभाजित खंडकाव्य है, जिसका आरंभ ही नारी और माता की महत्ता के साथ होता है। कर्ण के जीवन पर ही आधारित महाकवि पं. अवधभूषण मिश्र का खंडकाव्य ‘अंगभारती’ अंगिका के प्रबंध-काव्यों में महत्वपूर्ण स्थान का अधिकारी है, परन्तु अभी तक अप्रकाशित अवस्था में पड़ा है। इसका एक अंश, हरिगीतिका छंद में है, जो अंगप्रहरी के अंक-६, २॰॰७ ई. में प्रकाशित भी हुआ है। जो हो, संस्कृत और हिन्दी के प्रख्यात कवि पं. मिश्र का प्रबंधकाव्य ‘अंगभारती’ पात्र, चित्रण और भाषा-शैली की दृष्टि से अलग महत्व रखता है।

अंगिका का मुक्तक काव्य : अंगिका काव्य का आरंभ ही मुक्तक काव्य से होता है, जिसके उदाहरण विक्रमशिला विश्वविद्यालय के सिद्ध कवियों के चर्यापद हैं और यह प्रवृत्ति मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक अविछिन्न रूप से प्रवाहित होती चली आयी है। नए समय में अंगिका में जितने मुक्तक काव्य का और जितने रूपों में सृजन हुआ है, वह निस्संदेह आश्चर्य में डाल देने वाला है। अगर भाव की दृष्टि से ही इस पर विचार किया जाए तो इन अंगिका मुक्तकों को आत्मपरक, भावात्मक, विचारात्मक, उपदेशात्मक, आलोचनात्मक, वर्णात्मक, कथाश्रित जैसे भेदों उपभेदों में स्पष्टता से बांटा जा सकता है।

अब तक प्रकाशित कविता-संग्रहों में कुछ प्रमुख निम्नांकित हैं- पनसोखा :सुमन सूरो,१९६४ ई, खोड़-पतार:सदानंद मिश्र,१९६८ ई, पंच रं चोल :उचित लाल सिंह १९६९ ई., माटी के चेत :सदानंद मिश्र, १९७१ ई., पछिया बयार :परमानंद पांडेय,१९७६ ई., शिवजी रो बनो हो :अच्युतानंद चैधरी, १९८२ ई., करिया झुम्मर खेलै छी.:डाॅ. अमरेन्द्र, १९८२ ई., गुमार :गुरेश मोहन घोष ‘सरल’, १९८४ ई., कानै छै लोर :उचितलाल सिंह, १९८४ ई., पछिया पुकारै छै :खुशीलाल मंजर, १९८४ ई., गुमसैलो धरती :डाॅ. सुरेन्द्र परिमल, १९८४ ई., गीतनाद :श्री स्नेही, १९८४ ई., पुष्पहार :नवीनचन्द्र शुक्ल ‘पुष्प’, १९८५ ई., रूप-रूप प्रतिरूप :सुमन सूरो, १९८६ ई., चन्द्रहार :नवीनचन्द्र शुक्ल ‘पुष्प’, १९८८ ई., सूर्यमुखी :सूर्यनारायण, १९८८ ई.,

अचरा :नरेश जनप्रिय, १९८९ ई., स्वाती के बूँद :बैकुठ बिहारी,१९९२ ई., अंग तरंग :परशुराम ठाकुर ब्रह्मवादी, १९९ण्ण्ण् ई., खोरना :भुवन, १९९४ ई., ई जिनगी :भूतनाथ तिवारी, १९९४ ई., कहभौं ते लागतौं भक :लक्ष्मण प्र. यादव बेलहरिया, १९९४ ई., नीक बात नै ठीक लागै छौं :विजेता मुद्गलपुरी, १९९५ ई., हंस के जीभ तरासल छै :रामदेव भावुक, १९९५ ई.,कृष्णलीला :दर्शन दूबे, १९९७ ई., आपनो देश :विनय प्रसाद गुप्त, १९९८ ई., कैटरेंगिनी के फूल :विजेता मुद्गलपुरी, १९९८ ई., धुँध :रानीपुरी, १९९८ ई., रेत रो राग :डाॅ.अमरेन्द्र, १९९९ ई., दरद सुरजमुखी छै :अरुणेन्द्र भारती, १९९९, ऋतुरंग :डाॅ. अमरेन्द्र, २॰॰॰ ई., उत्तंग हमरो अंग :हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, २॰॰१ ई., हम्में बबूल छी :दिनेश बाबा,२॰॰॰ ई., गुड़गुड़ी :सुरेन्द्र दास, २॰॰॰ ई., अहिणी :अनिल शंकर झा, २॰॰१ ई., जत्तेचले चलैनें जा :कैलाश झा ‘किंकर’, २॰॰१ ई., चेतना :गणेश कुसुम, २॰॰१ ई., मन रो मनका :चन्द्रप्रकाश जगप्रिय, २॰॰२ ई., जाह्नवी :कणीक, २॰॰२ ई., चेतना :गणेश कुसुम, २॰॰१ ई., अंगरथ :सुधीर कुमार प्रोग्रामर, २॰॰२ ई., सीपी में सागर :चन्द्रप्रकाश जगप्रिय, २॰॰२ ई., सोना के दाँत :हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, २॰॰२ ई., धमस :कुन्दन अमिताभ, २॰॰ण्ण्ण् ई., गीत झंकार :छोटेलाल मंडल, २॰॰ण्ण्ण् ई., उजरो मौसम :मथुरा प्रसाद सिंह ‘रानीपुरी’, २॰॰ण्ण्ण् ई., दीरा रो पहुना :मणिलाल मंडल मणि, २॰॰ण्ण्ण् ई.,परछाईं :डाॅ. मनाजिर आशिक हरगानवी, २॰॰४ ई., कुइयाँ में काँटो :डाॅ. अमरेन्द्र,२॰॰४ ई., की सखि साजन :दिनेश बाबा, २॰॰४ ई., लचकै रे निमिया के डार :अनिल शंकर झा, २॰॰४ ई., गगन घटा घहरावै :रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ’, २॰॰५ ई., अंगपरी :धीरज पंडित, २॰॰५ ई., टूटल सन पतवार यहाँ छै :राजेन्द्र प्रसाद मोदी, २॰॰५ ई., डंडाल :रामप्रकाश स्नेहिल, २॰॰६ ई., गाँव-जवार :नरेश पांडेयचकोर, २॰॰६ ई., आँगन-आँगन दीप :रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ’, २॰॰७ ई., अंगिका के स्तर :सियारामप्रहरी, २॰॰७ ई., भावगुच्छ :रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ’, २॰॰८ ई., के करतै तकरार :हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, २॰॰८ ई., बिसुआ: फगुआ :सान्त्वनासाह, २॰॰८ ई. आदि।

अंगिका के इन मुक्तक-संगहों में मुक्तक काव्य के सभी भेद उपभेद के उदाहरण ्रमिले जाते हैं। जहाँ तक स्फुट मुक्तक ‘दोहा’ का प्रश्न है, उसका विकास

अंगिका के नए साहित्य में खूब हुआ है। अंगिका में दोहा का प्रारंभ अंगिका के आदिकवि सरहपा से ही प्रारंभ होजाता है। फिर भक्तिकाल के अनेक कवियों को प्रभावित करते हुए आधुनिक काल तक चला आता है, जिसके विकास में मुख्य रूप से महाकवि सुमन सूरो, डाॅ. अमरेन्द्र, सत्यानंद, सियाराम प्रहरी, दिनेश बाबा, अंजनी कुमार शर्मा, हीरा प्रसाद ‘हरेन्द्र’, विजेता मुद्गलपुरी,रामधारी सिंह ‘काव्यतीर्थ’, छोटेलाल मंडल, डाॅ. आभा पूर्वे, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, धनंजय मिश्र आदि हैं। इनमें सत्यानंद की पहचान तो दोहाकार के रूप में ही है।

स्फुट मुक्तक के रूप में हायकू भी अंगिका में खूब प्रकाशित हुए हैं। जगप्रिय का काव्य संग्रह ‘सीपी में सागर’हायकू संग्रह ही हैं। बेशक हायकुकार के रूप में जगप्रिय, आभा पूर्वे, दिनेश बाबा, कैलाश झा किंकर, रामधारी सिंह काव्यतीर्थ, अनिरुद्ध प्रसाद विमल, धनंजय मिश्र, अंजनी कुमार शर्मा प्रमुख हैं।

स्फुट काव्य में ही अंगिका में माहिया छंद का भी प्रचलन विशेष उल्लेखनीय है। ‘माहिया’ पंजाबी छंद है, जिसका प्रयोग अमरेन्द्र के काव्य संग्रह ‘कुइयां में कांटो’में मिलता है। इसी तरह कवित्त छंद पर आधारित मुक्तक को अत्यधिक ऊँचाई देने में अनिल शंकर झा, विजेतामुद्गलपुरी, कैलाश झा किंकर, हीरा प्रसाद हरेन्द्र, अमरेन्द्र, आमोद कुमार मिश्र, नरेश जनप्रिय जैसे कवियों की भूमिका मुख्य रही है। ‘अहिणी’ अनिल शंकर झा का कवित्त-संग्रह ही है। दोहा, कवित्त की क्या, मुकरी का भी अंगिका काव्य में पूर्ण विकास प्राप्त होता है, दिनेश बाबा का ‘की सखि साजन’ अंगिका मुकरियों का ही संग्रह है। मुकरी मुक्तक को बहुत दूर ले जाने में कैलाश झा किंकर और विजेता मुद्गलपुरी का अवदान प्रमुख रहा है। छंद से अलग अगर चरणों के आधार पर ही अंगिका मुक्तक पर विचार करें, तो यहाँ द्विपदी से लेकर दसपदी तक के मुक्तक रचे गए है।

आधुनिक अंगिका काव्य के संयुक्त मुक्तक में जहाँ एक ओर शोकगीत के सुंदर उदाहरण प्राप्त हैं- ‘घरे घरे जहाँ देखो आय हे दीदी घरे घरे/पोतोहू मलकायन भेलै,सास नौड़ी धाय हे दीदी घरे घरे/पोतोहू पलंग पर सास बोढ़ै ऐंगनो/बेटा के ते चलती में नौड़ी हुवे ऐहना/बेटा केराजो में रोजे गोबर ठोकै माय हे दीदी घरे घरे।’ :वारिद,; वहाँ पत्रगीत के भी- ‘चिट्ठी लिखलको छौ भाय गोवर्धन/घोर भेलो जाय बिजुवन बिजुरावन/कुसमी के खेत भेलै लहुए लुहान, हीरिया चनावों में कानौ बेजान/नाची नाची बिलखै छै गरभी दयाल, सोहनी के दूरी भेकलकी महिवान।’ :भगवान प्रलय, या ‘बड़ी छगुनी गुनी लिखले छी पतिया रे/ले ले जहियैं हमरो नैहर पुरबैया/कते बछर भेलै मैया देखला सें/टोला परोसा याद आबै पुरबैया। रामशर्मा अनल। लेकिन अंगिका के काव्य पर विचार यहीं आकर समाप्त नहीं हो जाता। इसके अन्तर्गत उन कवियों के काव्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है, जिन्होंने संस्कृत के काव्यों को अंगिका में अनुवाद किया है, और जिस अनुवाद में कवि की अपनी मौलिकता भी कम प्रकट नहीं है। एकाध को अनुवाद कहना भी अनुचित होगा। वह मौलिक सृजन की तरह ही है। अनूदित काव्यों में ‘गीतांगिका’ : कमला प्रसाद उपाध्याय; ‘श्रीमदभगवत गीता अंगिका अनुवाद:दुर्गा प्रसाद वनफूल, ‘गीता में की की छै,:कनकलाल चैधरी प्रमुख हैं। अंगिका में संस्कृत के काव्यों का अनुवाद सन् १९७॰ ई. से ही प्रारंभ हो गया था, जब गदाधर अम्बष्ठ ने कालिदास के ‘मेघदूतम’ का समश्लोकी अनुवाद किया था, इसके कुछ छंद प्रकाशित भी हुए हैं। इसके बाद ही डाॅ. रामचन्द्र चैधरी ने १९९७ ई. में मेघदूत और १९९८ में रघुवंश के तेरहवें सर्ग का अंगिका अनुवाद प्रस्तुत किया। इस दृष्टि से सन् २॰॰४ में कणीक जी द्वारा ही  दुर्गासप्तशती का अंगिका अनुवाद ‘दुर्गा चरितायण’ का विशेष महत्व है। संस्कृत के अलावे हिन्दी साहित्य अन्य भाषाओं के उत्कृष्ट साहित्य का भी अंगिका में प्रचुर अनुवाद छपा है।

अंगिका बाल काव्य : अंगिका का बाल लोककाव्य अपनी विविधताओं को लेकर ही नहीं, विपुलता को लेकर भी समृद्ध है, जिसका भंडार लोककंठों में ही सुरक्षित है, जिसका संकलन अभी हो ही नहीं पाया है, वैसे नरेश पांडेय चकोर द्वारा ‘अंगिका के फेकड़े और लोरियाँ’ का संकलन-संपादन इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कार्य है, और इसी कार्य को साहित्यकार चन्द्रप्रकाश जगप्रिय ने ‘अंगिका लोकोक्ति फेकड़ा आरो बुझौवल’ के संपादन से किया है, जिसमें चकोर जी द्वारा संपादित बालगीतों से अलग कुछ और लोक बालगीत भी है, और अंगिका की पारम्परिक पहेलियाँ भी। लेकिन बालकाव्य के साहित्य को नया विकास और समृद्ध आधुनिक समय में मिल पाया। इस दिशा में अमरेन्द्र के बालगीतों के ही अब तक पाँच संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं, जो इस तरह हैं- ढोल बजै छै ढम्मक ढम , बुतरू के तुतरू , बाजै बीन बजावै तीन, एक छड़ी पर अंडा नाचै, तुक्तक-मुक्तक। इन संग्रहों में ‘एक छड़ी पर अंडा नाचै’ ऐसी पहेलियों के संग्रह हैं, जो बाल मनोविज्ञान को सामने रखकर रची गयी है, जबकि तुक्तक-मुक्तक’ पाँच साल तक के बच्चों के लिए रची गयी कविताएँ हैं। इस दिशा में कवयित्री सान्त्वना साह की बाल कविताओं का संग्रह ‘बाजै छै बीन’॰॰ण्ण्ण् ई., और दिनेश बाबा कृत ‘हँसी बिहनकी धूप’, डाॅ. मृदुला शुक्ला की ‘सोन चिरैया’, का भी अपना महत्व है। इन संग्रहों के अतिरिक्त चन्द्रप्रकाश जगप्रिय द्वारा संपादित ‘अंगिका बालगीत’, का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है कि इस संपादित बालगीत-संग्रह से यह तो ज्ञात होता ही है कि अंगिका में बालगीत के सृजन में लगे अन्य कवि कौन-कौन हैं। इस संग्रह में डाॅ. अमरेन्द्र के अतिरिक्त मधुसूदन साहा, डाॅ. श्यामसुंदर घोष, डाॅ. मृदुला शुक्ला, डाॅ. तेजनारायण  कुशवाहा, आभा पूर्वे, प्रदीप प्रभात, अंजनी कुमार शर्मा, सुमन और चन्द्रप्रकाश जगप्रिय बाल कविताएँ शामिल हैं। इनके अतिरिक्त कथाकार रंजन ने अंगिका की पारंपरिक और आधुनिक लोरियों को संकलित कर एक सुंदर संग्रह तैयार किया है, जो दुर्भाग्य से अभी तक अप्रकाशित है और जिसके प्रकाशन से अंगिका के बालकाव्य की समृद्धि का मूल्यांकन ठीक-ठीक हो पाएगा।

वैसे आधुनिक समय में रचे गए अंगिका के बाल साहित्य को देखने से इतना तो स्पष्ट हो ही जाता है कि इस साहित्य में न केवल पंचतंत्र की कहानियों को लेकर आभा पूर्वे और दिनेश बाबा ने बच्चों के मनोविज्ञान के अनुकूल बालकथा गीत लिखे हैं, बल्कि बालगीति नाट्य का भी सृजन हुआ है।स्पष्ट है कि सातवीं शताब्दी में ही बौद्धसिद्ध कवियों ने जिन चर्यापदों से अंगिका में काव्य के सृजन की नींव रखी थी, और जिसे आधुनिक काल में खड़ी बोली के प्रख्यात साहित्यकार पं. हास्यावतार जगन्नाथ चतुर्वेदी, जमुई, ने, अंगिका में कुछ पदों के सृजन से, इसमें पुनर्जागरण की नींव रखी, उसपर आलोक के स्तंभ खड़ा करने में कई ऐसे साहित्यकार हैं, जिनकी अंगिका कविताओं का कोई स्वतंत्र संग्रह अभी तक नहीं मिलता है, लेकिन अंगिका में इन कवियों ने लगातार सृजन किया है, कर रहे हैं। इन कवियों में कुछ प्रमुख हैं- पं. रामेश्वर झा द्विजेन्द्र, डाॅ. मधुकर गंगाधर, डाॅ. कुमार विमल, रामशंकर मिश्र पंकज, डाॅ. श्यामसुंदर घोष, डाॅ. वचनदेव कुमार, प्रभात रंजन सरकार, मधुसूदन साहा, डाॅ. देवेन्द्र सिंह, बालेन्दु, कृष्ण कुमार चैधरी, डाॅ. निवासचन्द्र ठाकुर, अभय सिंह, वेदप्रकाश वाजपेयी, प्रसून लतांत, डाॅ. बहादुर मिश्र, वारिद, पं. अवध भूषण मिश्र, भुवनेश, प्रो. कमला प्रसाद बेखबर, डाॅ. श्रीरंजन सूरिदेव, पंचानंद झा पंचम, डाॅ. सकलदेव शर्मा, डाॅ. शिवनारायण, डाॅ. जटाधर दूबे, डाॅ. राजेन्द्र पंजियार, महेन्द्र जायसवाल, प्रभात सरसिज, डाॅ. मतिकांत पाठक मधुव्रत, भगवान प्रलय, विकास पांडेय, डाॅ. शंकरमोहन झा, राम शर्मा अनल, पी.एन. जायसवाल, उलूपी, डाॅ. विद्यारानी, अर्पणा सिंह, मीना तिवारी, डाॅ. मृदुला शुक्ला, विश्वनाथ वाजपेयी, अनूप वाजपेयी, डाॅ. प्रतिभा राजहंस, प्राणमोहन साह ‘प्राण’, डाॅ. मीरा झा, श्री केशव, धनंजय मिश्र, अनूप, सुमन, डाॅ. श्यामलाल आनंद, डाॅ. देशभक्त, चन्द्रेश चन्द्र, सत्यानंद, साथी सुरेश, छन्दराज, कोकिल, ब्रह्मदेव झा रतैठिया, पतझड़ खैरावादी, केदार प्रसाद सिंह, डाॅ. छेदी साह, जयप्रकाश जयी, नन्देश निर्मल, बटेश्वर प्रसाद साह, नरेन्द्र प्रसाद लूचो, नलिनीकांत, हरिहर चैधरी विकल, प्रतिमा वर्मा, नंदनंदन, अश्वनी, अचल भारती, राजकुमार, मुरारी मिश्र, प्रदीप प्रभात, जयप्रकाश गुप्त, अनुज प्रभात, जनार्दन यादव, अभय भारती, संयुक्ता भारती, सुरेन्द्र प्रसाद यादव, गंगा प्रसाद राव, सोहन प्रसाद चैबे, रामावतार राही, राजेन्द्र राज, धर्मेन्द्र कुसुम, कुमार भागलपुरी, त्रिलोकीनाथ दिवाकर, कृष्णा सिंह, ब्रह्मदेव कुमार, स्मिता शिप्रा, जोगेश्वर जख्मी, धीरेन्द्र छतहारवाला, निर्मल कुमार सिंह, गायत्री प्रसाद, सरिता सुहाविनी, शिवनंदन सलिल, कृपाला, नकुल निराला, शाहिन खाँ, अशअर उरैनवी, विकास कुमार सिंह ‘गुल्टी’, डाॅ. रामचन्द्र चैधरी, डाॅ. कैयूम अंसारी, डाॅ. नृपेन्द्र प्रसाद वर्मा, डाॅ. गणेशानंद झा, रामचन्द्र घोष आदि प्रमुख हैं।

अगर भवप्रीता नंद ओझा के अंगिका मुक्तकों का संग्रह संपादक मोहनानंद मिश्र और डाॅ. शंकर मोहन झा के अथक प्रयास से न हो पाता, तो शायद भवप्रीता के गीत भी लोकगीत की तरह लोककंठों में ही होते, जैसे कि आज भी चामू कुमार, चन्दर दास के पद लोककंठ में ही फलफूल रहे हैं। दुर्भाग्य यह है कि लोकभाषाओं को हिन्दी ही माननेवाले विद्वान साहित्यकारों की दृष्टि भी इस दिशा में खुलना नहीं चाहती!

: अमरेन्द्र

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